सोमवार, 29 जून 2009

हमहूँ नामी हो गइलीं

वफादारी सीखनी हो तो कोई पेंड़ पौधों से सीखे। सर्वहारा 'कनैल' पर लेख क्या लिखा, नामी हो गया।

महीनों से मेहनत करते रहे लेकिन किसी अखबार ने नहीं पूछा । 'बरियार' और 'कनैल' पर लिखते ही दोनों ने जाने क्या गुल खिलाया कि 'अमर उजाला' ने अभी इस बच्चे से ब्लॉग के लेख को जगह दे डाली। स्कैन नीचे लगा हुआ है, यह 25/06/09 के अंक में छपा था।


जरा सोचिए, थोड़ी सी संवेदना दिखाने पर ऐसा हो सकता है तो इन पेंड़, पौधों और वनस्पतियों की अगर आप सही देखभाल और पोषण करेंगे तो परिणाम कितने सुखद होंगे!

तो चलिए एक पौधा रोपते हैं और उसे जिलाते हैं।

10 टिप्‍पणियां:

  1. बधायी ! अभी तो इस उर्वर लेखनी से बहुत उम्मीदें हैं !

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  2. Rao Sahab apne gyan chkshu kholye i next ne to aapko aalsi se karmath bana diya hai, aapke poore blog ko tamga pahna diya hai

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  3. बधाई। पेड़-पौधे तो फलदायी होते ही हैं :)

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  4. हां, आप सही कह रहे हैं, पेड़-पौधों वनस्‍पतियों की देखभाल से सबका भला होगा। और नाम हो या न हो, काम तो होगा ही। अच्‍छा लगा कि आपके ब्‍लॉग का जिक्र अखबार में हुआ। और ''सर्वहारा'' वनस्‍पतियों पर भी लिखते रहिए। शुभकामनाएं।

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  5. बधाई हो (२५ जून के पर्व की)
    ....आगे-आगे देखिये होता है क्या! ;)

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