शनिवार, 25 जुलाई 2009

दूसरे दिन की पूर्वपीठिका- बाउ मण्डली और बारात एक हजार

पिछले भाग से जारी...
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क्या हो अगर आप हैरी पोटर देखने जाँए और मल्टीप्लेक्स वालाबिदेसियादिखाए?
नाहर आनन्द लेने आए थे और पूरे विश्वास से कि द्वारपूजा के पहले ही कुछ कुछ तो जरूर घटित हो जाएगा। लेकिन यहाँ तो ग़जब कासन्नाटाथा और यह अचानक की उथल पुथल जैसे पूरा गाँव और पास पड़ोस उद्वेलित हो किसी कठिन की साधना में लगा हो। पंचतंत्र की पंक्तियाँ स्मरण कर भेदियों को बुलाया। टोह लो (पता लगाओ)

जिस बाउ को बचपन से ही गाँव गाँव की खिरकी(घर के पिछवाड़े या दो घरों के बीच काबफरसा हिस्सा जो अशोभनीय कर्मों और अस्थाई टॉयलेट स्थल के रूप में भी प्रयुक्त होता था।) तक की टोह लेने में महारत हासिल थी, उसकी पैनी नज़र से ये भेदिए कैसे बच सकते थे? वक़्त की नज़ाकत देख चुपचाप उन भेदियों का ही भेद लेते रहे।
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द्वारपूजा। गजब की बारात सजी थी! ऐसी कि गाँव में कभी नहीं देखी गई।
गोधूलि बेला। सबसे आगे स्वर्णरंग खचित आभरण सज्जित मत्त गजराज पर रेशमी वस्त्रों में नाहर सिंह। ठीक पीछे सफेद घोड़ों से जुते रथ पर दुल्हा और सहबलिया(दुल्हे का संगी) उसके पीछे बाकी नौ हाथी, सफेद और पीले रंगों से की गई चित्रकारी से सज्जित, जिन पर और बुजुर्ग सवार थे। हाथियों के बगल में शहनाई पर बहुत ही धीमे स्वर में मंगल वादन करते बजनिए और सधी संतुलित मन्द नृत्य करती गणिकाएँ। भद्र समाज घोड़ों पर। सेवक समाज पंक्तियों में पैदल। दोनों किनारों से गुलाब जल का छिड़काव। मध्य वर्ग पैदल पूरी गरिमा के साथ जैसे चलने का पूर्वाभ्यास कराया गया हो। सबसे बाहरी किनारों पर मशालचियों की पंक्ति। निर्धूम मशालें, मन्द लपटें और सुगन्धि जैसे कपूर !
थोड़ी दूरी बना कर पीछे नरसिंगा, पखावज, तुरही, झाल और तासे बजाते नौटंकियों के दल। सबसे पीछे थे आतिशबाज अपना हुनर दिखाते। हाथी तेज आवाजों से बिदक सकते थे, इसलिए इन्हें दूर रखा गया था।

बारात के स्वागत हेतु खड़ा दरिद्र अठोलिया (आठ टोलों का सामूहिक नाम) समाज।

पँड़ोही पीली धोती में, शरीर के उपरी हिस्से पर केवल जनेऊ। मिसिर का वृद्ध गौर शरीर केवल पीली धोती से सज्जित, माथे पर त्रिपुण्ड। बाउ! काला शरीर, नया जोगिया रंग गमछा, सफेद झक्ख अंगरखा और उससे मिलान करतीउतनी ही मैलीभैंसवार की धोती। विरुद्धों का सामंजस्य!

बाकी लोग? जैसे नाहर द्वारा सजाई गई बारात का स्वागत करने शंकर की बारात आई हो। पतुकी( चौड़े मुँह वाला मिट्टी का बरतन) में वर्षों से सँभाले गए ऐसे अवसरों के लिए रखातू वस्त्र पहने। सलवटें अपार। किसी का अंगरखा छोटा तो कोई जैसे उसमें डूब रहा हो (दूसरे के यहाँ से जो माँगा था!) बहुतेरे तो बस बजगानी (घुटने तक पहनी जाने वाली कस कर बाँधी गई धोती, जिसे या तो बच्चे पहनते या काम के दौरान पुरुष, सुभीता रहता था) में। कुछेक को छोड़ सारे पुरुष शरीर श्रम सधित (साधित नहीं) गठान लिए, आज कल के सिक्स एट पैक की तर्ज समझें। बच्चे नंग धड़ंग पूरे जोशो ज़ुनून में।

मुन्नर और मनसुख ने द्वारपूजा का बहिष्कार किया, मतलब कि अपने काम में लगे रहे। हाथियों और घोड़ों ने सारी कोला कोलवाई को रौंद डाला, कुछ तो पशु व्यवहार और कुछ मानव उकसावा। पँड़ोही का दुआर धन्य हो गया !
बिष्णु भगवान सरीखे भावी दामाद को पूरे कर्मकाण्ड के साथ सहारा दे पँड़ोही ने आदर पूर्वक आसन ग्रहण कराया पंचमहिषियों के घेरे के भीतर से सुरसतिया ने भावी पति का प्रथम दर्शन पाया और स्वीकृति स्वरूप अक्षत दुल्हे के उपर न्यौछावर कर दिया। हर्ष के साथ मिसिर के बेटे हरिहर ने मंत्रोच्चार प्रारम्भ किया ,”गणानांत्वा गणपतिगों . . . “
द्वारपूजा बिना विघ्नबाधा के सम्पन्न हो गई। मिसिर की संस्कृत के अनुसार - प्रथमम् शुभे सर्वम शुभे।
घराती जन बारात के पनपियाई(जलपान) में लग गए। शर्करा पाक में पगी सुगन्धित बुनिया, मेवे और भाँग का आभरण लिए ठण्ढई, काली मिर्च और अदरक से युक्त बाँगर के गुड़ का शर्बत और साथ में इलायची के साथ बनारसी पान। मिसिर की बेवस्था टंच थी। नाहर सिंह दरिद्रता का ऐसा वैभव देख दंग रह गए।
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भोजन के लिए आज्ञा बिजै(औपचारिक निमंत्रण) देने मिसिर, बाउ को छोड़ पँड़ोही के बाकी पट्टिदार और मँगरू बारात में आए तो बारात व्यवस्थित हो चुकी थी। नाच नौटंकी वाले तैयारी में लगे थे। रोशनी चकाचक झिलमिला रही थी। पहले दिन लौण्डा गोथार(मंडली) सारंगा सदाब्रिज खेलने वाला था तो रण्डी गोल कृष्ण रुक्मिणी।
बाउ लकड़ी की खेप लेने पोखरे की तरफ खिसक लिए थे। लौटते समय बिरछा और उसकी गोल कोजरूरीनिर्देश भी दे आए।
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आजकल भी बारातों में ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो खाते कम नुकसान अधिक करते हैं। सुलझाते कम उलझाते अधिक हैं और जरूरत हो तो भी भाँति भाँति की माँगें रखते हैं। प्राय: इस तरह के तत्व एक साथ ही बैठते हैं। यहाँ भी ऐसे ही हुआ। नरसिंघवा का प्रमुख भेदिया लोचन भी इसमें सामिल था। बाउ ने ताड़ लिया था। उस पंक्ति को परोसने का जिम्मा खुद ले लिया। बाउ पूरी की ओसौनी(बाँस की बने उथली टोकरी) मँगवावें और सभी दो दो पूरी एक कौर में खाएँ। मिसिर की तरकारी तो जैसे पहली ही खेप में मशहूर हो गई। सुरुवा (शोरबा) माँग माँग सब पिएँ। पहली पंक्ति उठ गई लेकिन किनारे बैठी यह दुष्ट मंडली डँटी रही जैसे अनाज की दुश्मन हो।

बाउ ने लोचन को रक्तलोचनों से घूरा तो उसे डर सा लगा। यह आदमी अज़ीब था। किसी के कान में खुसुर फुसुर कर बाउ ने जो तरकारी मँगवाई वह मिर्च चर्चित पटाखा थी। सुरुआ पीने को जब पत्तल को दोने सा कर मुँह में आदतन लगा लोचना ने खींचा तो इस बार जैसे कंठ के नीचे तक आग उतर गई। अभी सँभला ही था कि पूरी गागर लिए पतरुआ उसके उपर गिरा- धड़ाम !
बाउ ने सँभालने और भीगे कपड़े झाड़ने के लिए लोचन को हाथ लगाया और ? और एक हाथ का बस पंजे से लगने वाला सबरनी बन्ध लोचना के पेट की जाने कौन सी नस पर लग गया। जानवर की तरह डकारते हुए वह जमीन पर लेट गया। बारात के लोग दौड़े, पूछें तो दर्द से ऐंठती शरीर का साथ मिर्च से जली जीभ भला क्यों दे? बन्ध ने बोलने की शक्ति वैसे ही दो दिनों के लिए छीन ली थी। बाउ ने यह कहते हुए कि ,”गर्मी चढि गइल होई अब्बे ठीक हो जाई (गर्मी चढ़ गई होगी। अभी ठीक हो जाएगी)“ , पतरुआ को गाली देते हुए गुड़ का शरबत मँगाया तो उसमें केवाँच(बाँसों के झुरमुट में होने वाली बला की खुजली देने वाली एक वनस्पति)के रेसे घुले थे। लोचना ने जैसे तैसे गटका और त्रिविध ताप से पीड़ित हो उठापेट में भयानक ऐंठन, गले में जलन और खुजली।

बाउ के इस कदम ने खान पान का निर्विघ्न सम्पन्न होना सुनिश्चित कर दिया। एक पहर में सब निपट गया। इस दौरान गुरहथनी (दुल्हे के अपने या निकट रिश्ते के किसी अग्रज बन्धु द्वारा दुल्हन का पूर्वावलोकन और सांकेतिक प्रथम और अंतिम स्पर्श जब वह दुल्हन को वस्त्र, आभूषण और उपहार भेंट करता है। उसके बाद आजीवन वह कभी उसका स्पर्श नहीं कर सकता) समाप्त हो गई और दुल्हा विवाह हेतु मंडप में प्रवेश कर चुका था।

पहली लड़ाई में विजय बेटिहा के हिस्से रही। अब नाहर को एकमात्र बचे दूसरे भेदिए तेतरा पर निर्भर रहना था। वह भी परम कुटिल लेकिन ताड़ नहीं पाया था, बस नाहर के सामंती काँइएपन ने बाउ को टीप लिया। बनमानुख।
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जब सारा समाज नौटंकी देखने में व्यस्त था, सुरती चूना(खैनी) के ब्याज से जोखन सिंघ बारात के किनारे दो रखवारों को बाउ की प्रेतगाथा सुना कर उपसंहार कर रहा था, पीछे खड़े तेतरा को जान कर भी अनजान जताते हुए,”...तब से अँजोरिया में पंचमी के दिने सगरे सिवान के रखातू बाउ अगिया बैताल के साथे बुड़वा बझावेलें। देक्ख जा पोखरा पर कइसे अगिन बरखा होता (. . तभी से शुक्ल पक्ष की हर पंचमी को सारी सीमाओं के रक्षक बाउ अग्नि राक्षस के साथ मिल कर जलप्रेतों को बाँधते हैं। पोखरे पर बरसती आग देखो)कहते हुए उसने दूर पोखरे पर चमकते एक निश्चित लय में घूमते आलोक पुञ्जों की ओर हाथ उठा दिया। बिरछा, मुनेसर, ढेला, सक्कल और माधो ने बाउ की लाज रख ली थी।
सुबह होते होते ब्रह्मराक्षस गाथा का पूरा प्रसार सुनिश्चित हो चुका था।

ठीक उसी समय बाउ, मुन्नर, मिसिर और सुक्खल बचे राशन को आँकने के बाद आगामी दिन के लिए योजना बना रहे थे। यह तय पाया गया कि सब कुछ सुक्खल के यहाँ से उधारी आएगा कल एकदम तड़के और अगले एक साल के अन्दर भरना (भुगतान) होगाकेवल मूल बिना ब्याज। मुन्नर ने संशोधन प्रस्ताव रखाएक साल नहीं उसके बाद भी। फसल का क्या ठिकाना? इसे सुक्खल ने कुनमुनाते हुए मान लिया था।

इसके बाद तेज कदमों से बाउ सुद्धन को खोजते चल पड़े रात में ही कल होने वाले जनवासे के लिए उन्हें एक बार और चेता देना था। एक बार जनवासे में नरसिंघवा हार जाय, फिर तो दुर्बी दुलाम दुलक्षणम् भैंस चरे मसल्लमम्. . . जारी

13 टिप्‍पणियां:

  1. बारात और द्वारपूजा का इतना समृद्ध विवरण दिया है आपने कि न पूछिये । सब कुछ सूक्ष्मतः अवलोकित ।

    विस्मृत किये जा रहे आचार-व्यवहार, परंपरा और शब्द संपदा का इतना सुन्दर विनियोग देख कर मन हुलास से भर गया है । मैं और-और की चाह में अतृप्त हुए जा रहा हूँ । ब्लॉग की चौखट पर ऐसी अभिव्यक्ति से किस छपाई की तुलना है इस वक्त । सब बेमानी है ।

    और बाऊ ! वह तो सबके बाऊ ही हैं ।

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  2. कितने ही नए शब्दों से सामना हुआ। अब घंटों शब्दकोश उलटना-पलटना पड़ेगा।

    बारत वर्णन में एक कमी रह गई। सब पुरुषमय था। बारत में और सामनेवालों की तरफ से आई स्त्री-पात्रों का वर्णन भी रहता तो और भी मजा आ जाता।

    बेहतरीन पोस्ट, अब तक का सर्वश्रेष्ठ। घात-प्रतिघात से पूर्ण। बाऊ अच्छे हीरो के रूप में उभर रहा है।

    अगली किश्त का इंतजार रहेगा।

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  3. @बालसुब्रमण्यम

    अन्ने, उस जमाने में नारी समाज बारात में नहीं जाता था। इधर यह प्रथा मेरे होश में शुरू हुई है। अभी भी शहरों तक ही सीमित है।
    घराती औरतें तो बेचारी अलग उद्योग में लगी थीं - अन्नपूर्णा का रसद आपूर्ति विभाग। पहले ही बता चुका हूँ कि उस रात नारी समाज का उद्योग पुरुषों के श्रम पर भारी पड़ा।

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  4. आजतक कई विचित्र किस्से सुने हैं , परन्तु ये बारात यादगार रहेगी ...सनकर पारबती की बारात , सा द्रश्य उपस्थित हो गया
    ख़ास , ये पढ़कर , कईयों के कपडे इत्ते लम्बे चौडे थे के वो डूब रहे थे उनमे .;-))

    ....कितने भोले लोग थे,
    और कितने चतुर भी !
    परिहास और व्यवहार का अद`भुत सम्मिश्रण ..आगे पढने का इंतज़ार रहेगा गिरिजेश भाई ...आप गजब लिख रहे हैं
    - लावण्या

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  5. गिरिजेश जी,
    पिछले दिनों एक बहस चली हुई थी ब्लॉगजगत में की ब्लॉग को साहित्य नहीं कहा जा सकता..मुझे नहीं मालूम की यदि इस लेखनी को ..इस शैली को ..साहित्य नहीं कहूँ तो क्या कहूँ...मैंने खुद हिंदी साहित्य को बहुत पढ़ा है..और अभी भी पढता हूँ..और सच कहूँ तो अभी तक ये शब्द, ये शैली मुझे तो कहीं भी देखने को नहीं मिली..यकीन माने मुझे जब भी ब्लॉग्गिंग में कालजयी पोस्टों के बारे में पूछा जाएगा..बाउजी की लंठ चर्चा का उसमें अग्रिम स्थान होगा..अद्भुत है सब कुछ ..संग्रहनीय..मैं चाहूँगा की ये कथा ..ग्रन्थ के रूप में सामने आये ..मेरा आग्रह भी यही है..

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  6. कौन कहेगा यह किसी आलसी का चिठ्ठा है :-)
    संजो कर रखूंगी इस पोस्ट का लिंक, धन्यवाद.

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  7. अद्वितिय ! अन्य कोई शब्द उपयुक्त नहीँ है.

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  8. मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत बढ़िया लिखा है आपने ! अब तो मैं आपका फोल्लोवेर बन गई हूँ इसलिए आपके ब्लॉग पर आती रहूंगी! मेरे ब्लोगों पर आपका स्वागत है !

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  9. बारात के आने और जमने में ही इतना कहानी बना दिए तो अभी दूसरे दिन की रस्में बताते-बताते तो आप एक किताब पूरी कर देंगे। जनवासे में कलेवा ले जाने का आइटम शायद छूट गया। अभी कन्यादान भी बाकी है। और कोहबर का पासा भी। सबेरे दतुअन-कुल्ला और नस्ता के बाद भोजन, दोपहर की नाच, शाम की सभा-शिष्टाचार, दूल्हे की बसियाउर व खिर-खवाइ, नचदेखवों का झगड़ा और गोलबन्दी। सुकुरिया आदा धकाधक के चक्कर में सिर-फुटौअल की नौबत और तीसरे दिन की भतवान और समधो की कहानी प्रतीक्षित है। साथ में बाऊ की लंठ मण्डली की अपनी विशेष कहानी तो प्रतीक्षित है ही।

    जारी रखिए और सहेज कर रखिए। ब्लॉग साहित्य से जब कुछ चीजें प्रिन्ट साहित्य में आयातित होंगी तो उसमें आपकी बाऊमन्डली जबरदस्त रिटर्न देगी। आञ्चलिक शब्दों का परिचय बेजोड़ है।

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  10. शब्दों का ब्रैकेट में मतलब देकर आप हम जैसों को तो और कन्फ्फ्युज कर देते हैं. फ्लो ही बिगड़ जाता है, वैसे जरूरी है यहाँ देना तो. पर बेहतर होगा फूटनोट दे दिया कीजिये. अब गुरहथी और खिरकी... हम तो सब समझते हैं जी. आपसे तो भोजपुरी में ही बात हुआ करेगी. बचपन में सुना था 'लिलवतिया के बियाह में पत्तल धोए के परी गइल रहे' आज परबतिया के बियाह में भी... हमें तो वास्तविक लगता है जी.

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  11. फिर तो दुर्बी दुलाम दुलक्षणम् भैंस चरे मसल्लमम्.

    दरिद्रता का वैभव ???

    शत शत नमन आपकी लेखनी को ..........

    साथ हे पूर्वांचल की संस्कृति का ज्ञान करवा रहे हैं.

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