गुरुवार, 6 अगस्त 2009

तीसरे दिन की पूर्वपीठिका – बारात एक हजार और बाउ मंडली

पिछले भाग से जारी.....
शिष्टाचार में दोनों पक्षों की हार हुई थी। लेकिन बाउ अपनी ‘जीत’ पर मगन थे। नरसिंघवा, मोछिउखरना (महेशानन्द का बाउ नाम) और बाकी बाराती जिन्दगी भर घरौठा को याद रखेंगे। वह रात नाहरसिंह ने नृत्य नौटंकी से दूर करवटें बदलते हुए काटी। कुछ था जो बहुत बुरा लगा था।
(य)
तीसरे और अंतिम दिन की महत्त्वपूर्ण गतिविधियाँ होती थीं – दुल्हन की विदाई और उसके पहले समधी द्वारा मड़वा अस्थिर कराई(मंडप स्थिर करना)। जिस मंडप में विवाह होता है, उसमें इस अवसर के लिए एक गाँठ बाँध दी जाती है। समधी आ कर इस गाँठ को खोलते हैं और मंडप को थोड़ा हिला देते हैं। इसे ही मड़वा अस्थिर करना कहते हैं। गाँठ खोलने और मंडप हिलाने का ‘स्थिरता’ से क्या सम्बन्ध है? मुझे नहीं पता। स्वाभाविक है कि इसी अवसर पर समधी अपनी विदाई की उम्मीद रखते हैं जो उन्हें सामान्यत: बिन माँगे ही दी जाती है। हाँ, अगर जिद पकड़ लें तो और बात है। मान मनौवल सब होता है।
इसके पहले समधी के साथ उनके पाँच सगोतिओं के लिए विशेष भोजन बनता है। वे लोग यहीं ‘गाली गायन’ सुनते हुए भात खाते हैं – बरहोबीजन (बारह व्यञ्जन)। उस समय बहुत ही मर्यादित, गरिमापूर्ण और हास्यपरक माहौल होता है।
(र)
झलकारी देवी आज मगन थीं। प्रात: से ही मन में गाली गीत उमड़ रहे थे – समधी भात खाने आएँगे। इस माँ ने जो कि विधवा थी और जिसके ‘नालायक’ लण्ठ बेटे ने विवाह न करने की ठान ली थी, गाँव की हर बेटी बहू को अपनी बहू बेटी मान लिया था। किसी भी विवाह का अवसर इस अभागी माँ के लिए बहुत ही विशिष्ट होता था।
परम्परानुसार सूर्योदय के पहले ही दुल्हन की विदाई होती थी। इसलिए सुरसती को गाँव के सीवान से बाहर ‘बुढ़िया काली माई’ के स्थान पर सहेलियों और बुढियों की निगरानी में निकसा (निकाल) दिया गया था। सब कुछ सम्पन्न हो जाने के बाद पूरे गाँव को घरघुमनी को विदाई देने यहीं आना था।
(ल)
दिन का पहला प्रहर बीत जाने पर जब मंगल कलश सजा कर हजाम के साथ पँड़ोही सिंह के नेतृत्त्व में समधी को भोजन निमंत्रण देने घरौठा समाज खलिहान पर बारात में आया तो माहौल गम्भीर था। नाहर सिंह ने साफ मना कर दिया। बोले कि उस दरवाजे पर अब और नहीं जाना। बारात ऐसे ही विदा होगी।
सबको काठ मार गया। बारात के लोगों ने भी ऐसे अतिवादी कदम की अपेक्षा नहीं की थी। मरजाद के दिन झड़प वगैरह होनी आम बात थी। कोई उसे अगले दिन तक दिल पर सँजोए नहीं रखता था।
बाउ तो आगबबूला हो उठे। यह तो समूचे आयोजन को अधूरा ही रखना हुआ ! लोग क्या याद रखेंगे? घरौठा वाले विवाह में तो समधी ने न भात खाया और न मँड़वा अस्थिर किया।
समझाने का पहला प्रयास अष्टभुजा बाबा ने किया। नाहर के उपर कोई असर नहीं हुआ। वधू पक्ष की ओर से मिसिर, बाउ और पँड़ोही ने समझाने का बीड़ा उठाया। आदतन पँड़ोही कुछ कहने के पहले ही फफक फफक कर रो पड़े लेकिन नाहर नहीं पसिजे। सुद्धन ने नाहर के पैर पकड़ लिए,”बाबू, जौन भइल ऊ हमरे वजह से भइल, भुला के माफी दे दीं, रिश्ता हो गइले के बाद ई कुल बढ़िया न लगेला। उठीं देरी होता (जो भी हुआ मेरी वजह से हुआ। भुला कर माफी दे दें। रिश्ता हो जाने के बाद यह सब अच्छा नहीं लगता।उठिए विलम्ब हो रहा है)”। सुद्धन की बातों ने जैसे आग में घी का काम किया ,”ओ बेरा त बड़ा अँइठत रहलS| अब चलित्तर देखावतड़SS (उस समय तो बहुत ऐंठ रहे थे, अब चरित्र दिखा रहे हो)।"
बाउ ने अपनी पगड़ी उतार कर नाहर के कदमों में रख दी। यह उनका सबसे बड़ा समर्पण होता था जिसे वह कई बार सफलता पूर्वक आजमा चुके थे। लेकिन नरसिंघ को ‘बैल की सवारी करता प्रेत’ याद था। इस प्रेत में तो कन्हैया वाली लीला भी समाई थी ! ज़िद अड़ी रही. . .
सबसे आश्चर्यजनक था कुलगुरु महेशानन्द का उदासीन रहना। बाउ को मोछिउखरना धर्मभ्रष्ट लगा। एक कुलगुरु यह और एक उप्रोहित(पुरोहित) मिसिर ! नरसिंघवा के लिए सुबह से उठ कर बरहोबीजन रीन्हा(पकाया) और अब खाने के लिए मनौवल भी कर रहे हैं। कितना अंतर!! न जाने कितना आदर मिसिर के लिए बाउ के कलेजे में उमड़ आया।
गोंसाई जी के रमैन से कुछ याद आया – “बिनै न मानें जलधि जड़....”। बाउ किनारे हट गए। भीड़ बढ़ने लगी थी। मुन्नर, मनसुख, बिरछा, मुनेसर, ढेला, सक्कल, माधो . . . . ज़ारी...

9 टिप्‍पणियां:

  1. इस बार का ब्रेक कुछ जल्दी ले लिए हैं। थोड़ा बमचक तो प्रत्येक किश्त में होना चाहिए। अगली किश्त जल्दी भेंजिए।

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  2. hamaaree dilli tamanna hai ki bau kathaa sajild sabke samne ho ..ishwar ne chaahaa to aisaa bhee hogaa hee..kathaa jaaree rahe ..og padh rahe hain..ham gun rahe hain..aaj baahar hain so angreji mein tippnniyaan jheliye.

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  3. इस यूपोरियन परिवेश से जबरद्स्त आइडेण्टिफिकेशन है इस ब्लॉग और पोस्टों का। काश मुझे इतना ज्ञान होता "अपने कइती" का कहने - लिखने - समझने में पैनी धार होती!
    इस समग्र को एक बार फिर पढ़ना चाहूंगा।

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  4. "...लेकिन नरसिंघ को ‘बैल की सवारी करता प्रेत’ याद था। इस प्रेत में तो कन्हैया वाली लीला भी समाई थी !"
    आपकी लेखनी में भी वही कलाकारी समायी है । एकदम सच्ची और टटकी अभव्यक्ति । बनावट भी, बुनावट भी - सब असली ।

    छोड़ते हैं अजीब सी जगह पर.. हम तो ताकते ही रह जाते हैं ।

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  5. गोसाई जी तो ठीक उसी लिहाज में रचे बेस हैं जैसा आपने याद किया. का हुआ फिर नरसिंघवा का?

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  6. यहां तो एक बिपत नौ नौ हाथ हाथ की होती जा रही है । देखते हैं
    बाउ कैसे इन सब से निपटेते हैं । एक बार फिर एक सांस में पूरा पढ गया ।

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  7. मजा आ रहा है। अब देखें बाऊ क्या करते हैं।

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