गुरुवार, 6 अगस्त 2009

इन्हें घर नहीं मिलते

 जब मैं यह लिख रहा हूँ तब यह मान कर चल रहा हूँ कि आप एक आम मनुष्य हैं जिसका बौद्धिक स्तर भी आम सा है। आप देवदूत नहीं, पूर्वग्रह मुक्त दार्शनिक नहीं, विराट चिंतन वाले बुद्धिजीवी नही। आप बड़ी दार्शनिक और राजनैतिक बहसों को एक सीमा के बाद छोड़ कर तरकारी और राशन के लिए पण की ओर चल देते हैं क्यों कि वह अधिक आवश्यक होता है।
अपने पास पड़ोस में भी आप ऐसा कुछ नहीं चाहते जो अवांछित हो या जो आप के इस सुखमय संसार में किसी भी तरह से विघ्न बाधा डालता हो। आप यहाँ तक कायरऔर सुविधावादीहैं कि एक सीमा के बाद ऐसे कुछघटित होने का प्रतिरोध भी नहीं करते। आप जो कुछ हो चुका होता है उसे स्वीकार कर उससे समायोजन बिठा लेते हैं या उसके लिए जीवन भर प्रयास रत रहते हैं। मैं भी आप में से ही एक हूँ जिसे पड़ोस में अवांछित तत्व के आने की सम्भावना और उसके बाद होने वाली दुर्घटनाओं की सम्भावनाओं से भय लगता है।
घर । एक स्थान जहाँ आप राजा रानी होते हैं। जिसके भीतर आप और आप का परिवार सुकून, अपनापन और लगाव के चरम पर होता है। दिन भर जूझते थके हारे लौट कर आप घर में ही तो विराम और विश्राम पाते हैं।
कुछ अरसे से कुछ लोगों को घर की इस मूलभूत आवश्यकता से वंचित करने का षड़यन्त्र चल रहा है। कम से कम वे तो ऐसा ही कहते या ऐसे ही कुछ का प्रभाव डालने वाली बातें जोर शोर से कहते हैं। बड़े नामचीन हैं वे। ज़ाहिर है उनके साथ ऐसा कुछ होता है या ऐसा कुछ होने का आभास सा भी पाया जाता है तो बड़ा हंगामा होता है।
उन लोगों का यह कहना है कि मैंने आप ने उन्हें उनके इस अधिकार से वंचित कर रखा है। हम और आप बड़े संकीर्ण हैं। हम कठमग़ज, साम्प्रदायिक और मूढ़मति हैं क्यों कि वे अल्पसंख्यक समुदाय, जिसकी संख्या कोड़ी करोड़ के आस पास है, से सम्बद्ध हैं और हम आप उनके चैन से जीने के अधिकार पर ताला लगाए बैठे हैं। वे यह नहीं बताते कि संसार में यह एकमात्र जगह है जहाँ अल्पसंख्यकदिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ रहे हैं। मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि ये अल्पसंख्यक लोग जहाँ जहाँ बहुसंख्यक हुए, वहाँ वहाँ इनके ग़ैर मजहबी लोगों की संख्या क्यों घटती चली गई? हालात ऐसे हो गए कि वे लोग लुप्त होने के कग़ार पर आ गए। आप के ही देश में इन बहुसंख्यक अल्पसंख्यकों ने लाखों गैर मजहबियों को घर से दर बदर कर टेंटों में रहने पर मज़बूर कर दिया। उस समय आज घर न मिलने पर चिल्ला चोट करने वाले इन नामचीनों ने मौन व्रत रखा हालाँकि उनके मजहब में मौन व्रतको कुफ्र माना जाता है।

आज भी उन विस्थापितों के बारे में पूछने पर ये लोग काफिरों सा मौन व्रतधारण कर लेते हैं। मुझे पूरा यकीन है कि अब तक आप को मेरे संघी या साम्प्रदायिक या संघ के लतियाए लतखोर या प्रतिक्रियावादी होने में कोई शको सुबहा नहीं बँचा होगा। आप समायोजित जो हो चुके हैं ! चुपचाप इस प्रतीक्षा में हैं कि कब आप का जीवन शांतिपूर्वक बीते और परलोक गमन हो। बच्चों का क्या? जो जैसा जिसके सामने आएगा वह देखेगा और सलटेगा । लेकिन मैं व्यग्र हूँ इसलिए रात को यह लिखते आँख फोड़ रहा हूँ। ऐसी घटनाएँ होने पर मुझे वर्षों पहले की घटनाएँ ध्यान में आने लगती हैं। घर बेचने खरीदने का नहीं, किराए का मामला है। लेकिन प्रासंगिक है।

मेरा एक मित्र है। उसका परिवार बड़े सुखपूर्वक रह रहा था लेकिन एक खामी थी। वह राष्ट्रीय स्तर पर बहुसंख्यक समाज से था । लेकिन जिस मुहल्ले में था वहाँ शतप्रतिशत अल्पसंख्यक था सैकड़ों घरों के बीच अकेला घर। नीचे का हिस्सा खाली था इसलिए ईश्वर के अंतिम दूत के अनुयायी गिद्ध दृष्टि लगाए रहते थे
हम दस दस दो कमरों में रहें और यह काफिर परिवार जमा जमा चार प्राणी दोमंजिले घर में रहें ! बड़ी नाइंसाफी थी। चूँकि उसके घर में घुसना था इसलिए उन लोगों ने मित्र के बाप को समझाया कि मियाँ किराए पर उठा दो कुछ आमदनी हो जाया करेगी। उन्हों ने घर यह सोच कर बनवाया नहीं था सो टालते रहे। नीचे का खुला बरामदा उनका बैठका था। एक दिन सुबह उठे तो देखा कि वहाँ पड़ोसी ने क़ुरबानी का बकरा बाँध दिया था। आपत्ति जताने पर उन्हें शिक्षा दी गई कि खुदा का काम है, कुछ ही दिनों का तो मेहमान है। दूसरे दिन सुबह मुर्गियाँ भी नजर आने लगीं। अब वे रिटायर होने के कगार पर पहुँचे बुजुर्ग मुर्गियों की बीट भी साफ करते थे। खुदा के किसी नेक बन्दे ने उन्हें फिर सलाह दी,” मियाँ किराए पर उठा दो, किराएदार खुद निपट लेगा। चाहो तो मेरी ग़वाही में इकरारनामा लिखवा लो।बेचारे ने किराए पर उठा दिया नेक बन्दे का जूते का व्यापारी भतीजा किराएदार हो घर में आ गया। नीचे के तल का प्रवेश द्वार दूसरी तरफ से था सो यह तय हुआ कि बरामदा मकान मालिक के पास ही रहेगा।
क़ुरबानी का बकरा तो जिबह हो गया लेकिन मुर्गियों के साथ साथ बकरियों ने भी बरामदे में बसेरा बना लिया। किराएदार ने हाथ खड़े कर दिए। आप का है आप जानो। अब बरामदे में किराएदार की कुर्सियाँ लग गईं। उसे मुर्गी या बकरी से कोई फर्क नहीं पड़ता था। किराएदार ने दो साल तक किराया कभी तीन तो कभी चार महीने पर मिन्नतों पर दिया। इकरारनामें की अवधि समाप्त होने पर उसने खाली करने से इनकार कर दिया। खुदा के बन्दे ने कहा कि मियाँ क्यों किसी का घर उजाड़ते हो?
किराएदार बिना किराए दिए छ: महीने तक रहा तो मुआमला पुलिस तक पहुँचा। इलाका संवेदनशील था (होना ही था)। इसलिए पुलिस समझाने बुझाने के अलावा कुछ नहीं कर पाई। पंचायत हुई तो खुदा के बन्दों ने व्यवस्था दी कि किराएदार वहीं रहेगा और मरम्मत कराने के एवज में छ: महीने का किराया मुआफ कर दिया जाय। किराएदार ने कभी मरम्मत नहीं कराई। सीना तान रहता रहा। खुदा के बन्दे जो उसके साथ थे।
मामला कोर्ट में पहुँचा। जिसने हजारों साल तक लगातार पाप किए हों, वही भारतीय कोर्ट के चक्कर में पड़ता है। यह आप आम आदमी होने के कारण जानते ही होंगें। जैसा कि होना था हुआ यथास्थिति बनी रही। दो वर्ष और बीत गए। किराए का एक धेला नहीं मिला। खुदा के बन्दे ने कहा मियाँ अब तो इकरारनामा भी नहीं है, किराया किस बात का। तुम यह मकान बेंच क्यों नहीं देते? मेरे मित्र के बापू आसमान से गिरे।
यही समय था जब हमारे मित्र ने इंजीनियरिंग में दाखिला लिया। बड़ा उग्र था और हरदम खुदा के बन्दों को कोसता रहता था। मैं उसका मजाक उड़ाता। एक दिन मुझे हॉस्टल से पकड़ कर अपने घर ले गया।

सारा कुछ देखने और जानने के बाद मैं भी उसकी तरह साम्प्रदायिक हो गया और आज तक मेरे मित्र मुझे साम्प्रदायिककहते हैं। उनमें कुछ तो खुदा के बन्दे भी हैं।
आखिर यह हुआ कि कॉलेज से लड़कों को ले जाकर शक्ति प्रदर्शन करना पड़ा। उस समय प्रदेश में साम्प्रदायिक तत्त्वों की सरकार थी। इसलिए मेरे मित्र के अल्पसंख्यकपड़ोसी थोड़े सहमें हुए थे। लेकिन उस सरकार के प्रशासन में भी एक सम्वेदनशील इलाके को डिस्टर्ब करने का साहस नहीं था। पंचायत बैठी।

खुदा के बन्दों ने पुलिस दबावके बाद यह व्यवस्था दी कि किराएदार घर खाली कर देगा लेकिन पच्चीस हजार रूपए लेने के बाद। यह पूछने पर कि किस बात का? जवाब मिला हिफाजत का’! नहीं तो बेंच ही दो, किस्तों में दो लाख तो किराएदार ही दे देगा। पच्चीस हजार देकर मित्र के बाप ने पिण्ड छुड़ाया।

आज भी बरामदे में क़ुरबानी का बकरा, बकरियाँ और मुर्गियाँ टहलती हैं। बच्चे हगते रहते हैं। मित्र के बापू इस मकान को ले कर सेंटी हैं इसलिए अभी भी बेंचने का नाम नहीं लेते। दोनों बेटों ने ग़ाजियाबाद की राह पकड़ ली है और वृद्ध दम्पति अकेले रहते हैं। बेटों ने ठान लिया है कि उन लोगों की मृत्यु के बाद मकान . .

.मुझे दिल्ली और जम्मू की शरणार्थी बस्तियों में आज कल घूमते और मकान का सौदाकरते खुदा के नेक बन्दे दिख रहे हैं। समस्या राष्ट्रीय स्तर की सुर्खियों वाले आतंकवाद की कम; भारत के हर मुहल्ले, क़स्बे में घटित दैनिक और इस तरह के छोटेआतंकवाद की अधिक है। यह बहुत ही धीमा पूर्वाभ्यास होता है कश्मीर, बंग्लादेश और पाकिस्तान को दुहराने और फैलाने का। समस्या है कि एक ऐसा ईश्वरीय दूत हुआ जो अंतिम था और जिसकी हर बात अंतिम थी। समस्या है कि हजारों साल पहले लिखे और कहे में बदलाव की कोई गुंजाइश नहीं। समस्या है कि दुनिया का हर इंसान या तो प्रथम श्रेणी का खुदा का बन्दा है या द्वितीय श्रेणी का या क़ाफिर। इन श्रेणियों के अलावा मनुष्य होते ही नहीं। समस्या है कि खुदा के बन्दों की संख्या बढ़ाना है चाहे जैसे हो। बावले ब्लॉग जगत में भी घूम रहे हैं - बेहयापन और बद्तमीजी का परचम फहराते हुए। हम हैं कि वहाँ जाते और कुतर्कों को झेलते शर्म भी नहीं करते। उनका प्रचार तो हो ही रहा है।. . . .
हम आप अपने घर के आस पास ऐसा पड़ोस नहीं चाहते। संकीर्ण कायर हैं न। इसीलिए इन्हें घर नहीं मिलते। लेकिन क्या यह सच है? क्या वे नामचीन लोग सड़कों पर रहते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें बस फोकट में झूठे अपराधबोधसे ग्रसित करने वाले प्रचारतंत्र का यह भी एक भाग भर है ताकि दैनिक आतंकवाद से हमारा ध्यान भटका रहे।
संकीर्ण, साम्प्रदायिक और बेवजह डरे अपने एक साथी को आप ने पढ़ा, इसके लिए धन्यवाद।
बौद्धिक किस्म की टिप्पणियाँ मेरे लिए न करें तो अच्छा ही होगा क्यों कि मैं उन्हें समझ नहीं पाऊँगा। अपने देश में जो हो रहा है, उस पर मेरी बुद्धि बौराई हुई है। आपस में जूतम पैजार और गाली गलौज करनी हो तो नववेद-कल्कि-मैत्रेय-वादी स्वच्छ प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं, वहाँ जाएँ।         

15 टिप्‍पणियां:

  1. आप के आलेख मे सच्चाई है ऐसी घटना एक बार हमारे सामने भी घट चुकी है.......ऐसे मौकों पर मकान मालिक बेबस हो जाता है....

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  2. "आपस में जूतम पैजार और गाली गलौज करनी हो तो नववेद-कल्कि-मैत्रेय-वादी स्वच्छ प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं, वहाँ जाएँ।"
    मुझे पक्का पता नहीं । किधर है यह प्लेटफॉर्म ? या किधर-किधर है ?

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  3. जब तक लोगों को उन के धर्मों से पहचाना जाता रहेगा। यह होता रहेगा।

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  4. @दिनेश राय द्विवेदी
    जब तक उन लोगों को उनके धर्म से पहचाना जाता रहेगा तब तक...
    विडम्बना यही है कि वे अपने धर्म की चारदीवारी से बाहर जीवन के किसी भी कार्य के लिए नहीं निकलना चाहते। जिन्दगी का हर पहलू कैसे बिताया जाय यह हजार साल पहले हजरत मूसा ने उनकी धार्मिक किताब में निर्धारित कर दिया है। बस, सबकुछ वहीं सन्दर्भित कर दिया जाता है। स्वतंत्र रूप से सोचने की गुन्जाइश ही नहीं छोड़ी गयी है। फिर हम कैसे अलग तरीके से पहचान पाएंगे? उन्हें इस पहचान पर ही तो गर्व है, और कदाचित्‌ उन्माद भी।

    गिरिजेश जी ने एक कड़वी सच्चाई की ओर इशारा किया है और यह करने के जुर्म में साम्प्रदायिक कहलाने का दण्ड स्वयं कबूल कर लिया है। यह भी एक विडम्बना की ओर ही इशारा करता है।

    मौन व्रत के बारे में कोई खुलासा करेगा?

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  5. हूँ -तो यह थी वह पोस्ट जो अपने को खुद लिखा लिया बाकी तो आपने अपनी और से जोड़ कर एक दिन में तीन तीन पोस्ट ठेल दी !
    सब तो आपने कह ही दिया -अब क्या कहूं ?

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  6. Raam Raam. aap ne to shi sahi kah diya. Dharm nirpeksh logon ko lagega ki aap ne zahar ugala hai. ab aap neelkanth to hain nahin. aap ne jo likha vo har shahar aur mohalle ke purane gharon ki kahani hai, giddh katam hote ja rahe hain lekin doosaron ki sampatti per Giddha drishti vale badhate ja rahen hain. Fantastic chttha. Badhai

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  7. इस पर क्या कहा जाय आपने कहा ही है. रोचक बात ये भी है की जो बड़े लोग हैं उन्हें ही मकान मिलने में परेशानी होती है. कुछ दिनों पहले भी एक मोहतरमा को मुंबई में ही ये दिक्कत आई थी !

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  8. धर्म को पहचान का आधार बनाएंगे, तो ऐसी समस्याएं आएंगी। असल बात यह है कि धर्म हम अप्रासंगिक हो चुका है। उससे बड़ी-बड़ी पहचानें संभव हैं, जैसे भारतीय होने का, या मनुष्य होने का। इसी ओर हमें बढ़ना चाहिए। बौद्धिक टिप्पणी करने के लिए क्षमा करें।

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  9. दो दिशाओं मे जाता हुआ अपना देश एक तरफ वो लोग जिन्हे विज्ञान और प्रोद्धौगिकी पर बहस करना अच्छा लगता है और एक तरफ वो लोग जिन्हे धर्म और जात के बारे मे....

    सोचनीय है..ऐसी घटनाएँ...

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  10. विश्वगुरु, धर्मगुरु, महानतम राष्ट्र के तीन (या पाँच? तिया-पाँचा कहावत यूँ ही तो नहीं बनी) टुकड़े हो गये तब किसी भले मानस के कान पर जूँ नहीं रेंगी तो किसी काफ़िर के मामूली से घर के लिये कौन सा पहाड़ टूटने वाला है यहाँ? जिस देश के अधिष्ठाता भगवान खुद अपनी जन्मभूमि से निकाल बाहर कर दिये गये हों वहाँ नश्वर जीवों चिंता किसे होनी है। अलख जगाये रहो, नामालूम किस बेज़र, बेघर का जमीर जग जाये और दुनिया वाकई पलट जाये।

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  11. सौहार्द की मार अन्दर की मार होती है, उसका तो हृदय ही विदीर्ण रहता है, आह भी निकले तो लोग व्यंग्य से मुस्करा देते है। वेदना भी शत्रु बन जाती है। मानवता स्थापित करने की जिम्मेदारी के बोझ तले गधामजूरी करने को अभिशप्त!!

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  12. खुदा के बंदे अब भी अपने रंग में हैं, पर इंसान के बंदे क्यों उनकी तरफदारी करते हैं, ये बात समझ से परे हैं.

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  13. खुदा के इन बन्दों से खुदा बचाये। अपने यहाँ हरियाणा की ही बात करूँ तो खुदा के बन्दों के क्षेत्र मेवात में हिन्दुओं का पाकिस्तान जैसा हाल है।

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