शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

चलो..

घर में रहते हुए भी 
बहुत दूर है किताबों की आलमारी।
टी वी पर है पत्नी और बच्चों के कब्जे।
चलो, 
अंतर्जाल में कहीं नीचे फँसे 
किसी अच्छे ब्लॉग को ढूंढ़ा जाय, 
अपने को सँवारा जाय, 
उसे टिप्पणी दे उत्साह बढ़ाया जाय।

14 टिप्‍पणियां:

  1. चलो,
    कहीं ऐसा करते हैं,
    कभीं ऐसा करते हैं ।

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  2. धन्य हो !

    आपका आलस्य नि:संदेह अद्वितीय है..........

    आलसियों का अगर कभी इतिहास लिखा जायेगा तो आपको गौरवपूर्ण स्थान मिलेगा............

    आपके आलस्य को कोटि कोटि नमन!!!!!!!!!!!!

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  3. घर घर में यही हो रहा है बंधू....कहीं बालिका वधू तो कहीं ये सा तो कहीं वो सा...

    ब्लॉगिंग में यदि बालिका वधू सा कुछ आ जाय तो क्या हो ..... कभी इसकी भी कल्पना करें :)

    अच्छी Micro post।

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  4. कहा भी है की जिन खोजा तिन पाईयां गहरे पानी पैठ !जो दिख रही हैं वे सचमुच हल्की फुल्की ही हैं !

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  5. ये हुई न कोई बात! चलो हम तुम्हारा भी उत्साह बढ़ा देते हैं।

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  6. प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद !!!
    खैर ,फिलहाल तो यह आपका मोटो ही दिख रहा है ! :) :)

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  7. बहुत देर से गई बिजली आई है। पत्नीजी ने टीवी का रिमोट हथियाया है और हमने माउस।
    उत्साह बढ़ाने का उद्यम कर रहे हैँ!

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  8. क्या बात है ! किताब की अलमारी तो खैर दूर बहुत दूर होती जा रही है. जब तक डेस्क टाप थे तो बैठकर सर्फिंग ज्यादा देर नहीं हो पाती थी और किताब लेटकर पढ कर तकिये के नीचे रखने की सुविधा के कारण हाथ आ ही जाती थी. पर ये लैपटाप ! इसने किताब का तकिया भी छीन लिया....

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  9. टी वी का तो मै मान सकता हूँ उसकी ज़रूरत भी नही है लेकिन किताबे कहीं भी हों पहुंचा जा सकता है .. यह बहाना नही चलेगा , वैसे यहाँ भी ठीक है .. पता तो चल रहा है कि आप जीवन मे उपस्थित हैं ।

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  10. आपकी इस कविता पर समीर जी और संगीता पुरी जी कि अनुपस्थिति खल रही है.
    वैसे सरकार इस काम में अपन थोड़े निखट्टू किस्म के हैं मन होता ही नहीं ...

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  11. TV aur kitaab hai bahut door yun ki aisa kar len sote huye kisi lanth ko jagaya jaye

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