सोमवार, 29 जून 2009

हमहूँ नामी हो गइलीं

वफादारी सीखनी हो तो कोई पेंड़ पौधों से सीखे। सर्वहारा 'कनैल' पर लेख क्या लिखा, नामी हो गया।

महीनों से मेहनत करते रहे लेकिन किसी अखबार ने नहीं पूछा । 'बरियार' और 'कनैल' पर लिखते ही दोनों ने जाने क्या गुल खिलाया कि 'अमर उजाला' ने अभी इस बच्चे से ब्लॉग के लेख को जगह दे डाली। स्कैन नीचे लगा हुआ है, यह 25/06/09 के अंक में छपा था।


जरा सोचिए, थोड़ी सी संवेदना दिखाने पर ऐसा हो सकता है तो इन पेंड़, पौधों और वनस्पतियों की अगर आप सही देखभाल और पोषण करेंगे तो परिणाम कितने सुखद होंगे!

तो चलिए एक पौधा रोपते हैं और उसे जिलाते हैं।

शुक्रवार, 26 जून 2009

एक 'ज़ेन कथा'

एक जादूगर था जो अपनी टोप से भाँति भाँति की चीजें निकालता था। एक दिन जादूगर ने टोप से खुद को निकाला। उसके बाद वह फिर नहीं दिखा

आगे की लाइन ऑप्सनल है:

अब टोप से निकला जादूगर टोप पहन कर कहानियाँ सुनाया करता है।

गुरुवार, 25 जून 2009

लंठ महाचर्चा: 'बाउ' हुए मशहूर, काहे?

..आगे की कथा पढ़ने से पहले अगर आप यह भूमिका नहीं पढ़ेंगी/गें तो घोर पाप की/के भागी होंगी/गे। अगर उसे पढ़ने के बाद भी आप इस कथामाला से गुजरने का निर्णय ले चुकी/के हैं तो अपने रिस्क पर! लेखक किसी भी अनहोनी का ज़िम्मेदार नहीं होगा।
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(3) समय- चालिसे का पूर्वार्द्ध; परम्परा -श्रौत
बाउ ठिगने कद के आबनूसी रंगत लिए एक पहलवान थे। शरीर ग्रीक देवताओं की गठन लिए और शक्लो सूरत? पहलवान की शक्लो सूरत क्या देखना? लेकिन बाउ की विलक्षणता और नाम का इससे सम्बन्ध है इसलिए चर्चा आवश्यक है। पाँच बहनों के बाद बाउ पैदा हुए थे सो उनके जन्म के समय पूरे गाँव को बड़ी उत्कंठा थी - देखें इस बार क्या होता है? सौरी (प्रसूति गृह) से जब मँगरी दाई ने बाहर आकर पूत पैदा होने के सूचना दी तो उनके बाप उछाह रोक न सके। टोले के इतिहास में एक क्रांतिकारी घटना घटी, किसी पति ने पहली बार(!) सार्वजनिक रूप से पत्नी का नाम ले उससे डायरेक्ट बात किया, वह भी सौरी के बाहर खड़े होकर ! मॉल में, पार्क में या कहीं भी बेशर्म चूमा चाटी देखने के अभ्यस्त आप लोगों को यह घटना क्रांति लग सके इसके लिए थोड़ी व्याख्या आवश्यक है।
उस जमाने में पति पत्नी आपस में सबके सामने बात नहीं करते थे। मरजाद और शरम की बात थी। एकांत और मिलन की रैना में क्या होता होगा, इसकी सूचना मुझे नहीं। अन्योक्ति, सन्देश या किसी और बहाने से आपस में बात होती थी। लोग धीरे धीरे इस कला में इतनी महारथ हासिल कर चुके थे कि डायरेक्ट बात करना एक फिजूल और वाहियात सी बात समझी जाती थी। सेक्स को लेकर इतना पूर्वग्रह कि लोग अपने बच्चे को सबके सामने गोद में नहीं लेते थे। क्यों कि यह उस सनातन क्रिया का प्रमाण होता था। जे बात अलग है कि शादी के एक साल के भीतर बहू के पाँव भारी न हों तो खुसुर फुसुर शुरू हो जाती थी। उस सेक्सलेस सोसाइटी में चार पाँच बच्चे पैदा होना आम बात थी। औरतें दूधो नहाती और पूतों फलती थीं।
बाउ के बाप ने पूछा, ए झलकारी! लइका (लड़का) कैसा है? झलकारी देवी संतान के अद्भुत सौन्दर्य के आघात से उबरी ही थीं कि यह प्रश्न? वह भी पतिदेव जिन्दगी में पहली बार सबके सामने बोले! ममता ने कुलाँच भरी और माँ ने जवाब दिया लइका कइसन होलें? मतलब बच्चे बच्चे होते हैं। बाप को इतने से संतोख कहाँ। अरे ई बताव नीक कि बाउर कइसन बा (ये बताओ अच्छा है कि बुरा कैसा?)। बड़ा अजीब सा सवाल था । माँ यथार्थवादिनी थी और पति को शॉक भी नहीं देना चाहती थी सो बोली हमार बउरे बढ़िया (मेरी बुरी संतान ही बढ़िया है)। बाप समझ गया। वर्षों के इनडायरेक्ट संवाद का प्रताप था। असल में बाउ की सूरत हमारे पूर्वज नरवानरों की तरह थी। माँ का दुलारा 'बाउर' ही परिशोधित हो 'बाउ' रह गया।
बाउ पहलवान थे लेकिन डेली दण्ड बैठक नहीं करते थे। उनका मत था कि मड़ुवा की रोटी और कोदो के भात खाने और रोज सुबह शाम भैंस चराने से कसरत की आवश्यकता नहीं रह जाती ! बाउ बड़े सफाईपसन्द थे। एक भैंसवार के लिहाज से यह अजीब नहीं क्यों कि अगर भैंस को नहलाधुला कर साफ सुथरा न रखो तो दूध कम देती है। बाउ ने कभी शादी नहीं की और लंगोट को सच्चा रखा लेकिन इस हनुमान भक्त का ब्रह्मचर्य बस यहीं समाप्त हो जाता था। लेना न देना देख तो लेना की तर्ज पर आस पास के दस टोले की कुवारियों से लेकर विवाहिताओं और विधवाओं के सौन्दर्य और निजी जिन्दगी के वह विराट विद्वान थे। नायिका भेद पर उनका सहज निरीक्षण से प्राप्त ज्ञान इतना विशद था कि वात्स्यायन या रीति कालीन कवि वगैरह फीके हो जाँय। औरतों की प्राइवेसी वगैरह में उन्हें यकीन नहीं था।
जिस पहली घटना ने उन्हें जवार (इलाके) में मशहूर कर दिया, वह सुनाता हूँ।
सुबह शाम निपटने (शौच कर्म) के लिए लोग लुगाई खेतों की राह आज भी पकड़ते हैं, ये जग जाहिर है। उनके जमाने में नारी समाज गोलबन्दी कर जाता था और यह कुछ इतना स्वाभाविक हो चला था कि भोर और शाम के समय पूरा टोला इनके गलचउर (आपसी खुसुर फुसुर) से गुंज़ायमान हो उठता था। इसी समय बाउ भैंस चराने के बहाने सबकी टोह लेते रहते थे। ऊँची जात वाली लोटे लेकर जाती थीं लेकिन पंचम समाज (प्रचलित शब्द नहीं लिख रहा) में लोटे लेकर जाने का चलन नहीं था। सब ऐसे ही जातीं और घर पर आ एक टुटहे नाँद ( पकाई हुई मिट्टी का अर्धगोला जिसमें जानवरों को खिलाया जाता था।) में भरे पानी में सामूहिक रूप से धोतीं। बाउ के सफाई पसन्द स्वभाव को यह एकदम अच्छा नहीं लगता था। एक दिन उन्हों ने रमरतिया को भोरे अकेले पा रोका। बाउ के हिसाब से रमरतिया पद्मिनी श्रेणी की नायिका थी और गोल की लीडर भी। बाउ की ताक झाँक एक ओपेन सीक्रेट थी और नुकसानहीन होने के कारण रसिक टाइप की नारियों के लिए मनोरंजन का एक सामान भी थी। लेकिन एक सवर्ण पुरुष जिसका यौन भ्रष्टाचार का कोई रिकार्ड नहीं था, भोर में टोले के इस इलाके में किसी औरत की राह रोके ! असामान्य घटना थी। बाउ ने बेलाग कह दिया तुम लोग लोटा लेकर जाया करो। जिस तरह से घर में आकर धोती हो वह ठीक नहीं। तुम लोगों को जनाना बिमारियाँ इसीलिए होती हैं। अब बाउ को कौन समझाए कि जहाँ लोटे का चलन था उस सवर्ण टोली में जनाना बिमारियाँ कुछ अधिक ही होती थीं। स्तब्ध सी रमरतिया की सटक गई, उस दिन वह गई ही नहीं।
बाउ ने अगले दिन फॉलो अप के तहत फिर टोह ली। सब वैसे ही जा रही थीं और रमरतिया भी साथ में थी। बाउ ने डायरेक्ट ऐक्शन की ठान ली। उसी दिन शाम को जब सब निपटने गई थीं, बाउ रमरतिया के घर में घुस गए ।भौजी के जाँते (जिस पर औरतें अनाज वगैरह पीसती थीं, इस जमाने के मिक्सी ग्राइण्डर का बाप) से उठाई गई गमझे में बँधी लाल मिर्च की बुकनी (पाउडर) नाँद के पानी में खाली कर भैंस चरवाही के पैना (डण्डे) से अच्छी तरह मिला दिया।
आगे जो कुछ हुआ होगा उसका अनुमान आप लगा सकती/ते हैं। लाज शरम के कारण यह घटना ओपेन सीक्रेट बन कर रह गई। बाउ मुँह मुँहाई मशहूर हो गए।
उस दिन के बाद से आज तक भी सात टोले की औरतें बिना लोटा लिए निपटने नहीं जातीं।
लंठ महानिष्कर्ष: निषिद्ध जगह अवश्य ताक झाँक करनी चाहिए। समाज की बुराइयाँ ऐसे ही क्षेत्रों में पनपती और फलती फूलती हैं। ठहरा हुआ पानी सड़ जाता है। सामाजिक क्रांति के लिए कठोर कदम उठाने से कभी हिचकना नहीं चाहिए भले वे अनैतिक, वीभत्स या अश्लील कहलाएँ।
जारी . . .आगे की लंठई में बाउ और परबतिया के माई

मंगलवार, 23 जून 2009

कनैल: वनस्पति, पौधा, लता, वृक्ष - 2

पौधा है : कनैल , वैज्ञानिक (Botanical) नाम: Thevetia neriifolia, अन्य नाम - अश्वमारक,कर्वीर(संस्कृत), करबी (बंगला)

कनैल एक निहायत ही सुन्दर और देसी टाइप का 'सर्वहारा' पौधा है। पत्तियाँ, फूल और बीज - सबकी छटा निराली है। इसके फूलों का रंग प्रमुखत: पीला होता है लेकिन ललछौहें, सफेद, रंगहीन तरह के फूल भी देखे गए हैं। पौधा बढ़ कर पेंड़ाकार भी हो जाता है, वैसे हमारे विद्वान इसे झाड़ी श्रेणी में रखते हैं।

जन जन उपयोगी यह 'थेथर' श्रेणी का पौधा कहीं भी उग आता है। घूरा, कोला, बाँस के झुरमुट, काली माई वाले बरगद के नीचे, घर के आँगन, बाग बगइचा, गँवारू मन्दिर, शहरी रोड डिवाइडर, अगाड़, पिछवाड़ कहीं भी लगा दो बेचारा टनाटन्न हरा भरा रहता फूलों की बरसात करता रहता है। निस्पृह इतना कि जोगी भी फेल !


हम अधम मानवों ने अपनी जाति या वर्ग व्यवस्था चारो तरफ थोप रखी है। पौधा जगत भी अपवाद नहीं है। सर्वसुलभ और सर्व-उपयोगी होने से इसे सर्वहारा की तरह ही उपेक्षित रखा गया है। मेरी बात पर ऑबजेक्सन करने के पहले जरा बताइए कि अपने प्रेमी या प्रेमिका को कभी कनैल का फूल भेंट किया है? नहीं। क्यों? क्या यह सुन्दर नहीं होता कि इसमें सुगन्धि नहीं होती?

उपेक्षा का आलम यह है कि:

- कभी इसे 'बुके' में स्थान नहीं मिलता।
- किसी लेखक ने इसके बारे में नहीं लिखा।
- दुष्ट कवियों ने जूही, मोगरा, गुलाब, कमल, चम्पा, चमेली, रजनीगन्धा आदि को लेकर तो खूब उपमाएँ गढ़ीं लेकिन कनैल की कहीं चर्चा तक नहीं हुई।
- एक और सर्वहारा गेंदा फूल पर भी फिल्मी गाना रच दिया गया, लेकिन बेचारा कनैल !
- पौधारोपण करने जब हस्तियाँ आती हैं तो अशोक, अमलतास, गुलमोहर वगैरह ही लाए जाते हैं, कनैल नहीं।
- नारी समाज की निजी टाइप के पूजा पाठ में एकमात्र उपयोगी फूल होने पर भी वे इसे कभी जूड़े में स्थान नहीं देतीं।

बच्चे इसके सूखे बीजों से गोट्टी खेलते निशाना साधने का अभ्यास करते हैं। है कोई माई का लाल पौधा जिसके बीजों में इतना दम हो? आखिर यह क्यों उपेक्षित है? गँवई होने के कारण?

गाँवों में अभी एक पीढ़ी पहले तक इसकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। पीले फूल किसी भी सात्त्विक टाइप की पूजा के लिए सर्वोत्तम माने जाते थे। गुरुवार व्रत में तो इसके फूलों का आदर देखने लायक होता था।

नई नवेली दुल्हनें नैहर सन्देशा देते समय बटोही को बाबा के घर की पहचान बताती थीं ," कुववाँ जगतिया कनइल बन फूले, दुवरे निबिया के गाछ हो.” ( मेरे पिता के घर के आगे कुआँ है, उससे लग कर कनैल का झुरमुट फूलता है और दरवाजे पर नीम का पेंड़ है)। इतना आदर कि कुएँ जैसी सार्वजनिक जगह पर एक दो नहीं कनैल के पूरे झुरमुट को स्थान दिया जाता था और इतना स्नेह कि बेटी को बाबा के घर की पहचान बताते समय यह थेथर पौधा ही याद आता था नीम से भी पहले!

लेकिन जिस तरह से मुए खम्भे अशोक ने आकर नीम की इज्जत का फालूदा बना दिया वैसे ही कमबख्त पूँजीवादी समाज प्रिय गुलाब ने गाँवों में पदार्पण कर कनैल को उसके आसन से नीचे कर दिया।

कनैल इतना अत्याचार होते हुए भी फूल, पत्ती या डाल तोड़ने पर निस्पृह भाव से दूध स्रवित करता है मानों आशीर्वाद दे रहा हो फलो फूलो, हम तो ऐसे ही हैं। मुझे बड़ी करुणा होती है। लेकिन कर भी क्या सकता हूँ, सिवाय एक अदद लेख के?

रविवार, 21 जून 2009

अथ लंठ महाचर्चा

(1) अथ लंठ महाचर्चा।
(2) बहुत दिनों तक टालने के बाद आज अंगुलियाँ इस बिषै (विषय नहीं) पर चल ही पड़ीं। आलस की भी एक सीमा होती है !
चिट्ठा जगत के शिशुओं, जवानों और बुजुर्गों सबको (नारी जाति को भी सम्मिलित समझा जाय) पहले यह स्पष्टीकरण कि न तो मैं शब्दशास्त्री हूँ और न ही पंडित। इस लेखमाला में मैं जो भी लिखूँगा वह काफी खतरनाक है और मात्र अनुभव अर्जित है या श्रौत परम्परा से आया है जिसे मैं सत्य मानता हूँ। खतरनाक मेरे लिए क्यों कि अनुभववादी, मनोगतवादी , प्रतिक्रियावादी , संशोधनवादी , समाजद्रोही , राष्ट्रद्रोही , साम्प्रदायिक , अश्लील...आदि टाइप की गालियों के मिलने की पूरी सम्भावना है और आप के लिए क्यों कि आप की संस्कारवान आँखों और मस्तिष्क को तेज़ झटके लगेंगे। अत: कमजोर दिल वाले न पढ़ें । .... घबरा गए? ऐसा नहीं भी हो सकता है। और अगर ऐसा नहीं होता है तो आप या तो ‘लंठ’ हैं या ‘भठ्ठर’ टाइप के व्यक्ति। इसकी व्याख्या इस तर्ज पर कि प्रकाश अति अधिक हो या एकदम न हो, दोनों ही स्थितियों में चीजें नहीं दिखती हैं।
“ ?!@#$%*:(:)”
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हरि अनन्त हरि कथा अनंता । यह बिषै बहुत ही गूढ़ है और प्रस्तुत कर्त्ता मूढ़ है। दुस्साहस इसलिए कर रहा है कि महारथियों और अतिरथियों की असफलता के बाद ब्याख्या की इस सनातन समस्या से जूझने का बीड़ा उठाने को यह पैदल (अक्ल से या चाहे जैसे) सैनिक ही बचता है।
अविगत गति कछु कहत न आवै। गूँगे का गुड़। सो महाचर्चा ‘विपरीत पंचतंत्र’ की शैली में होगी।
विपरीत इसलिए कि पंचतंत्र वाले विष्णु शर्मा महापंडित थे और शिष्य महामूढ़ लेकिन यहाँ प्रवक्ता महामूढ़ और श्रोता (ब्लॉग रचयिताओं/पढ़ाकुओं से अर्थ लें) महापंडित। लेकिन महापंडितों को भी महामूढ़ों के समझ की आवश्यकता होती है। बोधकथाओं पर या तो तथागत टाइप के मानुषों का अधिकार है या मूढ़ों का। इतिहास भरा पड़ा है ऐसी कहानियों से। श्रोता कहानी के बाद ‘लंठई’ से उसके सम्बन्ध जोड़ने और अपनी व्याख्या देने के लिए स्वतंत्र होंगें। आवश्यकता हुई तो यह मूढ़ अपनी समझ बताएगा।
अगर आप फॉर्मेट में कुछ और जोड़ना चाहते हैं तो अभी बता दें । मूढ़मति बाद में अपनी ढपली और अपना राग बजाएगा। अस्तु ..प्रारम्भ करते हैं। .. जारी

गुरुवार, 18 जून 2009

श्रद्धांजलि : मुठभेड़ अभी जारी है (अद्यतन किया गया 20/06/09)

यह पोस्ट उन पुलिस कर्मियों को श्रद्धांजलि देने के लिए जो चित्रकूट जिले में पिछले दिनों घनश्याम केवट डकैत गैंग के साथ मुठभेड़ में वीरगति को प्राप्त हुए।

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श्रद्धांजलि:

एस ओ जी जवान शमीम
कंपनी कमाण्डर बेनी माधव सिंह
गनर इक़बाल अहमद
जवान बीर सिंह
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ये पुलिस वाले
- सड़ती हुई लावारिस लाश का पोस्टमार्टम करा उसका अंतिम संस्कार करते हैं।
- धूप, बारिश, कड़ाके की ठंड में गस्त लगाते हैं, ट्रैफिक संभालते हैं।
- दंगों में अपने ही लोगों से जीवन मृत्यु की लड़ाई लड़ते हैं।
- ये हैं इसलिए हम आप घरों में सुख से सो पाते हैं।

उनको कोसने के पहले जरा उनके कार्य के वातावरण और उसकी संवेदनशीलता को जानें और परखें। जरा सोचें कि अपने घर परिवार के साथ कितना 'क़्वालिटी टाइम' ये बिता पाते हैं !
ये वीर आप की सहानुभूति और संवेदना की दरकार रखते हैं। विश्वास नहीं होता ? एक बार कर के देखें !
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दस्यु मारा गया। कुल चार जाबांजों की बलि लेकर ।

" मुठभेड़ अभी जारी है" पंक्ति नहीं हटा रहा हूँ। यह तो निरंतर चलना है. . .

रविवार, 14 जून 2009

संशय निकष है . ..

आज 'लंठई' पर लिखने का मन था । लेकिन बहुत दिनों से 'कविताएँ और कवि भी...' पर कुछ नया न आने से सुधी जन दु:खी थे। इसलिए वहाँ के लिए लिखना प्रारम्भ किया तो बहाव कुछ और ही हो गया ।
गम्भीरता और हास्य को एकइच साधना मेरे लिए कठिन है। सो वहाँ का लिंक दे रहा हँ। पढ़ें और टिप्पियाएँ।

मंगलवार, 9 जून 2009

बरियार : वनस्पति, पौधा, लता, वृक्ष - 1

आप लोगों ने सम्भवत: देखा होगा, मेरे प्रोफाइल का फोटो बदलता रहता है। आज एक वनस्पति तो कल दूसरा पौधा। असल में एक पुराने वादे को निभाने की कोशिश करता हूँ। प्रतिदिन तो नहीं बदल पाता लेकिन आवृत्ति अधिक ही है। हमेशा की तरह इस बार भी मुझे कुछ नया करने के लिए सिद्धार्थ जी और बालसुब्रमण्यम जी ने प्रेरित किया है। 

सिद्धार्थ जी जब लखनऊ आए थे तो उन्हों ने मुझे वादे के विपरीत अनियमित होने के लिए टोका था। मैं कई दिनों तक फोटो  जो नहीं बदलता हूँ। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि इतनी बारीकी से जाँच पड़ताल चल रही है ! कल क्या हुआ कि ऐसे ही चैटिंग करते हुए बालसुब्रमण्यम जी ने टोका आप फोटो तो बदलते हैं लेकिन इतने छोटे फोटो को देख कर देसी/वैज्ञानिक नाम वगैरह कौन जानेगा? एक बार फिर मैं बारीक निगाहों द्वारा चेताया गया । उनकी सलाह पर अमल करते हुए मैं यह श्रृंखला प्रारम्भ कर रहा हूँ - अपने दिवंगत नाना की स्मृति में जिन्हें लोग उनके जीवन काल में ही देवता कहते थे और जो वनस्पतियों की चलती फिरती एनसाइक्लोपीडिया थे। 

मुझे कुछ नहीं आता जाता । बस एक भावुक प्रयास है। आप लोगों को प्रस्तुत वनस्पतियों के बारे में कुछ अधिक पता हो तो कृपया पोस्ट करें और मेरी त्रुटियों को सुधारने में तनिक भी संकोच न करें। हाँ , आलसी स्वभाव के कारण प्रतिदिन नया नहीं प्रस्तुत कर पाऊँगा। इस बार का कुछ भाग आप को टूटी फूटी पर मेरी टिप्पणी के रूप में भी मिल जाएगा।
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पौधा है : बरियार , अधिक जानकारी:http://ayurvedicmedicinalplants.com/plants/1176.html 
वैज्ञानिक  (Botanical) नाम: Sida retusa (Linn.) Borssum, सामान्य नाम - जंगली मेंहदी
हम पूरबियों का एक त्योहार है - जिउतिया । शुद्ध नाम है जीवित्पुत्रिका  (जो जीवित पुत्रों की माँ हो )। आश्विन (क्वार माह)  कृष्ण पक्ष अष्टमी को यह तप-पर्व पड़ता है। वे सारी नारियाँ जिनके पुत्र जीवित होते हैं, वे उनके दीर्घायु और कल्य़ाण  के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। विद्रोही स्वभाव की माताएँ, जिनकी केवल लड़कियाँ ही होती हैं, भी अपनी दुलारियों के लिए यह व्रत रखती हैं। पूरे 24 घण्टों तक निर्जल निराहार व्रत, भयानक उमस गर्मी में !  

इस तप-पर्व के दिन बरियार बनता है - लाखों माताओं का सन्देशवाहक । पौधा ढूढ़ कर उसके चारो तरफ सफाई कर उसे विशिष्ट दूत की तरह सजा दिया जाता है। माताएँ अक्षत रोली से ' अँकवार' देती हैं (भेंटती हैं) । बरियार का अर्थ होता है - बलवान। राम के पास जाता दूत बलवान तो होना ही चाहिए। बजरंग बली जो वहाँ हैं !

सीधे प्रभु राम को सन्देश जाते हैं , "ए अरियार ए बरियार जा के राजा रामचन्द्र से कहि दीह (बेटा, बेटी का नाम) के माई जिउतिया भूखल बाली"।कितनी ममताओं का आश्रय बनता है एक झँखेड़ा पौधा - भले साल में एक ही दिन ! मुझे इसे जंगली कहते शर्म आती है। नागर न सही ग्रामीण तो है ही। 

मुझे इतना ही पता है। माताओं, बरियार दूत और राम के बीच कुछ और गोपन होता हो तो नहीं मालूम ।  आप को पता हो तो बताइए। 

सोमवार, 8 जून 2009

लाज और झिझक छोड़ें




जून का पहला सप्ताह बीत गया लेकिन गड्ढा प्रतियोगिता पर कोई प्रविष्टि प्राप्त नहीं हुई। 

आप सभी नर नारी झिझक और लाज  छोड़ें और प्रविष्टियाँ मुझे ई मेल girijeshrao@gmail.com करें। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि उनमें बिना किसी परिवर्तन किए तुरंत निर्णायक मंडल: (1) समीर जी (उड़न तश्तरी) (2) ताऊ रामपुरिया जी (3)अजित वडनेरकर जी को भेज दूँगा। 

जून का महीना बारिश के पहले का है। इसी समय कागज पर दिखाने के लिए निगम वगैरह कुछ काम कराते हैं जिनका प्रथम कदम गड्ढा खोदना और अन्तिम कदम खोद कर छोड़ देना होता है।

झेलते हैं हम आप। ब्लॉग से कुछ परिवर्तन हो न हो लेकिन सोए को जगाने और बहरे को सुनाने का सामान तो जुटेगा ही। लिहाजा जन जागरण के हित में अपनी प्रविष्टियाँ भेजें। 

शनिवार, 6 जून 2009

इन्डीब्लॉगर पर 'Blogger of the Month - April' प्रतियोगिता


http://www.indiblogger.in/ पर 'Blogger of the Month-April' की प्रतियोगिता चल रही है। अगले 12/06/09 तक चालू रहेगी।

आम धारणा के विपरीत यह अंग्रेजी के अलावा हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं का भी एग्रीगेटर है। अत: आप सभी हिन्दी ब्लॉगरों से अनुरोध है कि यहाँ अपने ब्लॉग रजिस्टर करें और सदस्य बनें। अप्रैल माह की प्रतियोगिता ' सामाजिक मुद्दों' पर केन्द्रित है।

आप के इस मित्र ने भी प्रतियोगिता में भाग लिया है। यदि आप को मेरे पोस्ट पसन्द हैं तो कृपया वहाँ जाकरअपना 'मत' मेरे पक्ष में दें। इसके लिए आप का http://www.indiblogger.in/ पर सदस्य होना अनिवार्य है। वोट देने के लिए वहाँ पहँच कर लोगो पर क्लिक करें। नए खुले पृष्ठ पर एक बार और क्लिक कर आप विभिन्न प्रविष्टियों की सूची और उनके 5 पंजीकृत पोस्ट देख सकेंगी/गें। प्रविष्टियों में से आप को एक चुनना है। धन्यवाद।

http://www.indiblogger.in पर इस समय तकरीबन 350 हिन्दी ब्लॉगर पंजीकृत हैं। सदस्य होने और अपना ब्लॉग पंजीकृत होने पर आप आगे की प्रतियोगिताओं में भी भाग ले सकती/ते हैं। चूँकि यहाँ भाषा के आधार पर वर्गीकरण नहीं है, इसलिए हिन्दी की प्रविष्टियों को कड़ी चुनौती है। अत: सभी हिन्दी प्रविष्टियों के लिए भी आप का सहयोग प्रार्थित है।

शुक्रवार, 5 जून 2009

कड़वी ‘करी’ (भाग – 2)

पूर्ववर्ती कड़ी कड़वी ‘करी’(भाग – 1) से आगे . .

माइग्रेशन के तार सभ्यता के विकास से जुड़े हुए हैं। बड़ा अजीब है कि आधुनिक सभ्यता को विकास का लांचिंग झटका भी एक अलग ढंग के माइग्रेशन से ही मिला। यह लुटेरे यूरोपियन्स का माइग्रेशन था, जिनका दंश एशिया, अफ्रीका, अमेरिका, आस्ट्रेलिया सभी ने झेला। यूरोप इनका शोषण और विनाश कर के समृद्ध हुआ। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में मानव सभ्यता में आपसी जान पहचान ही नहीं बढ़ी बल्कि एक सार्वभौमिक विश्व सभ्यता की नींव भी पड़ी जिसने विकसित होते होते कमोबेश ऐसा वातावरण तैयार कर दिया कि आज विश्व के किसी कोने का मनुष्य कहीं भी किसी भी समाज से जुड़ने, जीने खाने और फलने फूलने के स्वप्न ही नहीं देख सकता है बल्कि उन्हें साकार भी कर सकता है।

यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें हर सभ्य, शिक्षित और समर्थ मनुष्य अपनी सम्भावनाओं के विकास और उनकी तार्किक परिणति के लिए जिस वातावरण को भी उपयुक्त पाए, उसे अपना सकता है और उसके द्वारा अपनाया जा सकता है। जब हम सभ्यता को इस कोण से देखते हैं तो पाते हैं कि मानव मानव में रूढहो चुकी विभिन्न सीमाओं को तोड़ने और एक विश्व मानव के विकास में इसने बहुत ही योगदान दिया है।

बहुत ही प्रगतिशील देन है यह। भारतीय छात्रों के आस्ट्रेलिया प्रयाण को इसी देन के प्रकाश में देखना होगा। मानव स्वतंत्र है अपने स्व के विकास के लिए। समूची धरा उसकी अपनी है।इस मानव का माइग्रेशन पूर्ववर्ती यूरोपियन माइग्रेशन से इसलिए एकदम उलट है इसलिए कि यह सभ्यता-संवाद और सम्मिलन के द्वारा एक इकाई और समूह दोनों का विकास और कल्याण करता है न कि एक के विकास के लिए समूह का विध्वंश। ।

जो लोग इस का विरोध कर रहे हैं, हिंसा फैला रहे हैं वे समूचे मानव वंश की इस बहुत ही मूल्यवान उपलब्धि को समाप्त करने पर तुले हुए हैं। यही कारण है कि चाहे देश के भीतर बिहारियों या उत्तर प्रदेश वालों का उत्पीड़न हो या विदेश में सिख या दक्षिण भारतीयों छात्रों का उत्पीड़न, यह न केवल निन्दनीय है बल्कि बहुत ही कड़ाई से समाप्त करने योग्य है। हमारी सरकारें दोनों सीमाओं पर विफल हुई हैं। दु:ख यही है और चिंता का कारण भी।

जब तक समूचा विश्व राष्ट्रहीन और सीमाहीन नहीं हो जाता (और ऐसा होने में बहुत समय लगेगा) तब तक सभ्य सरकारों का यह दायित्त्व बनता है कि इस तरह की प्रवृत्तियों को पनपने ही न दें, उन्हें फलने फूलने देने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। इनके समर्थक और तर्क पुरुष इन्हें जायज ठहराने, पर्दा डालने या अतिवादिता से आँख चुराने के लिए बहुत से कारण ढूढ़ लेंगें – जैसे भूमिपुत्रों का असंतोष, रोज़गार के अवसरों की कमी, असुरक्षा की भावना आदि आदि।

यदि कोई माइग्रेण्ट उस धरा के नियम कानून को मान रहा है और सभ्य तरीके से रह रहा है तो उसे खँरोच भी नहीं आनी चाहिए। अब यह सरकारों को देखना है कि रोजगार के पर्याप्त अवसर हों या कोई किसी से अपने को असुरक्षित न समझे।

मानव के अन्दर की प्रतिक्रियावादी और ह्रासशील शक्तियाँ समाहार और उदात्तीकरण के लिए अनवरत संस्कार की धारा की चाहना रखती हैं। शिक्षा और तंत्र के द्वारा सभ्य समाज की सरकारें ऐसा वर्षों से कर रही हैं। परिवर्तन की यह पूरी प्रक्रिया बहुत ही धीमी होती है और परिणाम के बीज बहुत ही नाज़ुक। उन्हें जरा भी विपरीत वातावरण मिले तो वे अंकुरित ही नहीं होते। वर्षों की साधना एक छोटी सी दुर्घटना से मटियामेट हो जाती है। यहाँ तो दुर्घटना नहीं जातीय घृणा पूरी चेतना के साथ विनाश ताण्डव कर रही है। परिणाम सामने हैं।

भारत और आस्ट्रेलिया दोनों सरकारें मानवता के गुनहगार हैं, इनकी जितनी निन्दा हो कम है ।

भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में अपने को विकसित करना चाहिए क्यों कि यह मानव समाज के दूसरे सबसे बड़े समुदाय के आत्मसम्मान की बात है। इसका पतित होना या निर्बल होना सभ्यता के विकास में एक बहुत बड़ा रोड़ा है। भले भारतीय छात्र नागरिकता छोड़ने पर ही आमादा हों, भारत के नागरिकों और भारत सरकार को डँट कर उनके समर्थन में सामने आना चाहिए क्यों कि यह सार्वभौम मानव सभ्यता का मुद्दा है, केवल दो देशों या उनके चन्द नागरिकों का नहीं।

बुधवार, 3 जून 2009

कड़वी 'करी' (भाग – 1)

बहुत ही भारी मन से लिख रहा हूँ।

जिस आस्ट्रेलिया में समूचे विश्व से छात्र अध्ययन हेतु आते हैंवहाँ केवल भारतीयों को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा हैउन्हें करी‘ अचानक इतनी कड़वी क्यों लगने लगी हैकहीं ऐसा तो नहीं कि यह समस्या बहुत दिनों से थी और अचानक बढ़ोत्तरी के कारण इस पर सब का ध्यान गया है?

जातीय या नस्लीय घृणा किसी न किसी रूप में समूचे विश्व में पाई जाती है जिसके तार देशों के इतिहास और समाज की रचना से जुड़ते हैं। लेकिन यदि यह बेकाबू हो कर घृणित और हिंसक रूप ले ले तो पूरी व्यवस्था पर प्रश्न उठते हैं। मानव की गोरी प्रजाति का इतिहास ऍइवेंचरलालचशोषण और संहार के द्वारा नई व्यव्स्थाओं को जन्म देने का रहा है। अमेरिका के रेड इंडियन्स और आस्ट्रेलिया के ऐबोरिजिंस के साथ जो हुआ वह इतिहास की चीज है। आज भले उन्हें संरक्षण दिया जाय या उनकी संस्क़ृति को पर्यटन उद्योग को बढ़ाने के लिए पोषित किया जाय लेकिन ऐसा करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ीसुनियोजित नस्लीय विनाश के कारण।

उस मानसिकता के अंश ठीक उसी तरह आज भी इन विकसित राष्ट्रों में मौजूद हैं जिस तरह शूद्र और नारी घृणा या दमन के अंश आज भी भारतीयों की मानसिकता में हैं। सभ्यता की कसौटी यह है कि वह हमारे मन के बर्बर को कितना नियंत्रित रखती है और उसका कितना परिष्कार करती है। इस मामले में एक सभ्य राष्ट्र के रूप में आस्ट्रेलिया असफल रहा है। हम क्या करें?

सहज ही मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या भारतीय छात्र इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैंअन्याय और अत्याचार को मात्र इस लिए सहना कि पुलिस केस बन जाने पर आस्ट्रेलिया की नागरिकता मिलने में कठिनाई आ सकती हैकहाँ तक क्षम्य हैक्या यह प्रवृत्ति स्वयं में पराजय के बीज नहीं लिए हुए हैयदि ऐसा करते हुए एक समूह वहाँ का नागरिक बन भी जाता है तो खोए हुए आत्मसम्मान को वापस कैसे पाएगा?अपने जेनेटिक प्रिंट से तो उसे छुटकारा तो नहीं मिलेगारहेगा तो ब्राउन‘ या कलर्ड स्किन‘ वालों का ही समूह नउपर से अन्याय को बर्दास्त करने वाली छवि भी जुड़ जाएगी। जो लोग भारत की नागरिकता छोड़ने का मन बना ही चुके हैंउनसे सहानुभूति क्यों होनी चाहिएपिटें या मरें उनकी बलाहमें क्या?

काश समस्या इतनी सरल होती!

आस्ट्रेलिया में जो कुछ हुआ या हो रहा है और उससे जिस तरह से हम निपट (या निपटा?) रहे हैंवह भारत की एक राष्ट्र के रूप में छवि को प्रभावित कर रहा है। या यूँ कहें कि एक राष्ट्र के रूप में भारत की और उसके नागरिकों की इतर विश्व में जो छवि है उससे इसका अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। यह समस्या दोधारी है भारत की और समूचे विश्व की।

पहले भारत।

भारतीयों के उपर उनके बहुत ही कायर और समर्पणशील नए इतिहास का बोझ है। कूटनीति या अधिक उपयुक्त कहें तो विदेशनीति नैतिकता की पाठशाला नहीं होती। नैतिकता और उदात्तता की बातें इस क्षेत्र में केवल मुखौटे और छ्द्म सौहार्द्र के लिए की जाती हैं। दुर्भाग्य से स्वतंत्र भारत ने ऐसा एक भी उदाहरण संसार के सामने नहीं रखा जिससे एक परिपक्व और मज़बूत राष्ट्र की छवि संसार के सामने आए।

संयुक्त राष्ट्र में काश्मीर का मामला ले जानाशांति और नि:शस्त्रीकरण की बकवास करते करते इतना लापरवाह और आत्ममुग्ध हो जाना कि जब हमला हो तो सैनिकों को लड़ने के लिए ढंग के हथियार भी न मिलेंएकदम कमाण्डिंग स्थिति में रहते हुए भी समर्पण किए हुए सैनिकों के बदले एक पुरानी गलती को ठीक नहीं करनाचन्द आतंकवादियों द्वारा अपहृत हवाई यात्रियों की रिहाई के लिए घुटने टेक देना . . .

यह सब संघनित हो कर विश्व के सामने हमें एक निहायत ही कमजोर और पिलपिले राष्ट्र की सिद्धि दे चुके हैं। ऐसे राष्ट्र के नागरिकों के लिए विकसित देशों के निवासी क्या सम्मान रखेंगेंइन घटनाओं के लिए हमें आस्ट्रेलियाई सत्ता को घुटने पर ला देना चाहिए था लेकिन हम क्या कर रहे हैं औपचारिक विरोध उसके राजदूत को देश छोड़्ने पर विवश कर देना थाहम क्या कर रहे हैंमान मनौवलहम सह दे रहे हैं उन नस्लभेदी जानवरों को हमारे साथ कुछ भी करो। हम ऐसे ही रहेंगें। हिम्मत है तो वे जरा चीन या जापान के नागरिकों के साथ ऐसा कर के देखें वे सोच भी नहीं सकते जब कि उन जानवरों के पास उनके साथ ऐसा करने के लिए कुछ अधिक ही कारण‘ हैं। ऐसा क्यों हैइसलिए कि उनको नहींउनकी सरकार को पता चलेगा कि नागों को छेड़ना कितना घातक होता हैएक बार फिर प्रश्न उठता हैजब मालूम है कि उनकी सरकार संकट में मदद के लिए कुछ नहीं करेगीये भारतीय वहाँ जाते ही क्यों हैं? . . . जारी