शनिवार, 16 जनवरी 2010

बाउ और मरा हुआ सिध्धर -2 : लंठ महाचर्चा

ममहर में खलिहान पहुँचते ही आदतन गाड़ा पर से बाउ कूद पड़े। गाड़े को मामा के दुआर की तरफ ले जाते बैलों को देख बाउ बुदबुदाए,
” जानल बूझल  गलती मानुख करेला, डंगर नाहीं। जानते बूझते भी गलती मनुष्य करता है, बैल नहीं।
पिपराइच की मंडी में गुड़ की लदनी करते बाउ बैलों को लीक पकड़ा सो जाया करते थे, मजाल क्या कि बैलों ने कभी भी पहुँचने या लौटने में गलती की हो! अधराति एक बार जब उनकी नींद टरक के भोंपा से खुली तो देखा कि टरक और गाड़ा आमने सामने खड़े थे और बीच डगर बिसाल निलबाछा मरा पड़ा था। उस दिन डलएबर ने बैलों की खूब तारीफ की थी।  खड़े हुए बैलों की चमकती आँखें नहीं दिखी होतीं तो काने टरक के साथ अनहोनी निश्चित थी।...
   खलिहान पर इकठ्ठे लोगों को पयलग्गी करते ही उनकी नज़र परबतिया के माई पर पड़ी। शायद उसी समय उसने भी बाउ को देखा था – लगा कि सुखरिया की कटी मूड़ी हवा में तैरती आ रही है,टप टप खून।
गोरा, सुदर्शन मुस्कुराता सुखरिया !
काला कुरूप अट्टाहस करता बनमानुख  - लाल लाल आँखें ज्यों रात में धू धू कर जलती बखारें...renu
सुखरिया, बनमानुख , मुसकान, अट्टाहस, सुखरिया, अट्टाहस, बाउ, मुस्कान, अट्टाहस  – हा, हा, हा,....
 परबतिया के माई के चेहरे का रंग उतरता चला गया ।
झाड़ा फिरने निकला पेचिश का मरीज सोहिता रिक्शा वाली दिल्लगी सुनने के बहाने बहोरना के साथ उस समय वहीं खड़ा था। उसके चेहरे की पल भर में उतरी रंगत दिखी और फिर बाउ!
रक्कतसोख बरमराछस !! 
इस तरह से आदमी की रंगत बदलती उसने आज तक न देखी थी। परेत, बरमराछ्स की सुनी हुई कथाएँ यकायक याद हो आईं और लगा कि पेट में धनकुट्टी चलने लगी हो !  हाथ में हरदम रहने वाला पानी भरा लोटा छूट जमीन पर ढुलक ढुलक बह चला और खड़े खड़े वहीं धोती में ही
छेरने लगा
बहोरना तो मारे बदबू के नाक पर गमछा लगाए हट गया – धुत्त इयार, ई का धत्त दोस्त, ये क्या ?
सबको भारी अचरज में डालते हुए परबतिया के माई अपने घर की ओर भाग चली। जिसके लिए दस कदम भी एक साँस चलना मुहाल था, वह ऐसे दौड़े जा रही थी जैसे
पँचई की रेस लगी हो!
मधया तो मुँह बाए कभी अपना रिक्शा देख रहा था तो कभी बाउ को ! अचानक पीपल के पत्ते कुछ अधिक ही डोलने लगे थे ।
बरमराछस !
उस शाम घर घर पुरानी बातें नमक मिर्च कलेवा हो गई थीं ।

(उ)
अपनी झोंपड़ी में पहुँच परबतिया के माई ने
चेंचरा लगा दिया। चेंचरा पीटती मधया की आवाज फैलती रही। उसकी मैभा महतारी सरापती विलपती अपने बेटे को खींचती घर ले गई – “मुँहझौंसी कुटनी ! रेक्सा पर घुम्मे खतिरा भेस बनवले रहलि हे एतना दिन । कलमुँही, कुटनी! रिकशे पर घूमने के लिए इतने दिनों से भेष बनाए थी..” । फिर किसी ने कुछ कहना उचित नहीं  समझा – बिहाने देखल जाई सुबह देखी जाएगी
जिस मरद से इतने बरस
घिरना ही घिरना रही, जिसका गला काटते एक पल भी नहीं सोचा, जिसको सुखरिया कह कर बुलाते आज तक शरम नहीं आई, काला पानी की सजा के दौरान भी जिसकी याद में एक आँसू तक न गिरा था वह आज क्यों ... ? ऐसा क्या था इस बनमानुख में जो कत्ल की रात बिना सोचे समझे उसकी बात मान अपने मरद को ही काट डाला था? कैसा भी था , आपन मनई था !
परबतिया की लाज और उसको मार से बचाने के लिए टाट फाड़
परगट हुए बाउ याद आए, साथ ही फिर याद आया सिर कटा दुआरे सुलाया गया सुखरिया ! फूट फूट कर रोते जमीन पर गिर पड़ी । देह में इतना दाहा, इतनी गरमी जैसे उस दिन बखारें जल रही थीं .... परबतिया के माई ने सारे कपड़े शरीर से नोच कर फेंक दिए।
मरा हुआ सुखरिया इतने दिनों के बाद बदला ले रहा था !
(ऊ)  
स्तब्ध हुए थे बाउ और फिर पहचान भी गए थे। ...  मामा से पूरी कहानी सुनते सुनते जाने कब आँख लग गई।  
अधराति नींद खुली तो पाया कि तकिया के दोनों और नमी थी। आँखें अभी भी नम सी थीं। बेचैनी हुई और बाहर निकल परबतिया के माई की झोपड़ी की ओर चल पड़े।
झोपड़ी में रोशनी थी। चेंचरे से छ्न छन कर दिखती रोशनी -
लपर लपर। बाउ ने धीमी पहचान वाली आवाज लगाई – मामी!
जैसे पुकार का कोई असर ही न पड़ा हो। थोड़ा और नजदीक आने पर हिचकियों की आवाजें आने लगी थीं ।  जमीन पर बैठ कर चेंचरे के थोड़े
फरकोर हिस्से पर आँख लगाई । ये क्या ? एकदम उघारे थुलथुल काया जमीन पर बैठ विलाप कर रही थी – कोई आवाज नहीं, बस हिचकियाँ । लय में झोंटा खोले सिर उपर ले आती फिर जमीन से छुआती।
ह हँ – ढेबरी की लौ बुझने को होती 

ह हँ – ढेबरी की लौ जी उठती ... 
अधेड़, देह पर लदर लदर मास लिए एकदम नंगी औरत ! - बाउ एक क्षण को जुगुप्सा से भर उठे थे लेकिन फिर जैसे सब कुछ जी उठा। यहीं तो ... ! कटी हुई मूड़ी – मरा हुआ सुखरिया।
वापस जाने का मन न हुआ। जमीन पर ही लेट गए -  ठीक उसी जगह ।
थोड़ी देर में ढेबरी भी बुझ गई लेकिन हिचकियाँ सुनाई दे रही थीं । बाउ दुबारा सो गए।

(ए)
महतारी की नजर बँचा मधया सुबह अपने काकी के घर आया तो पाया कि अभी तक चेंचरा बंद था। 
काकी काकी पुकारता चेंचरा देर तक पीटता रहा तब कहीं चेंचरा खुला। काकी बाहर आई – उसकी आँखें सूजी थीं और चेहरा बेरंग। हिकारत से उसे देखते बोली,

”का बिहाने बिहाने बजर डरले बाड़े ? भागु इहाँ से क्या सुबह सुबह शोर कर रहे हो, भगो यहाँ से!
आज तक काकी ने उससे इस तरह बात तक नहीं की थी - भगाना तो नामुमकिन था। लेकिन आज ..!
उदास सा वह अपने घर वापस चला गया। परबतिया के माई के शरीर में सुखरिया की लाश जल रही थी। शरीर में जाने कहाँ से इतनी जान आ गई थी कि चलने फिरने के लिए किसी सहारे की जरूरत नहीं रही।  लेकिन वह जलन । ताप बढ़ता गया और फिर उसके मुँह से जाप सा निकला – सुखरिया, सुखरिया .... पहले बुदबुदाहट फिर सुनाई दे सके वैसी आवाजें लय के साथ –
मरल सुखरिया, मरल सुखरिया, मरल सुखरिया ....
गाँव मे बात फैल गई – मधया के काकी पगला गइलि बा, उसे अब कोई परबतिया के माई नहीं कहता था ।
बाउ ने सुना लेकिन हाल पूछने नहीं गए। रात का देखा नजारा अभी भी दिमाग पर हाबी था – अपशकुन सा।   मन ही मन तय किया कि सुत्ता पड़ने के बाद रोज परबतिया के माई के दुआरे जा कर सोया करेंगे।
(ऐ)
रात की बेला। ढेबरी की लपर लपर । हिचकियों की आवाज। बाउ ने झाँका ।
आज भी परबतिया के माई उसी अभिचार में लगी थी लेकिन शरीर पर कपड़े थे। जाने क्यों बाउ ने संतोष की साँस ली और सो गए।
भिनसारे से कुछ पहले अचानक जोर की आवाज से नींद खुली तो देखा कि थुलथुल औरत तेज कदमों से गाँव के बाहर जा रही थी। चुपचाप पीछे लग लिए।
बसगित से बाहर आते ही परबतिया के माई दौड़ चली। बाउ पीछे पीछे इस तरह लगे रहे कि उसको पता न चला। पोखरे के किनारे आ कर थोड़ी देर खड़ी बड़बड़ाती रही – मरल सुखरिया,
जरल सुखरिया, मरल सुखरिया .... और अचानक छपाक से पोखरे में कूद गई। आव न देखा ताव बाउ ने भी छ्लाँग लगा दी।
उसे पोखरे से बाहर निकाला तो बेहोश थी ।  दोनों बाहों में उसे उठाया तो लगा कि उसके शरीर में कुछ
तड़फड़ा रहा था। जो शरीर देखने में इतनी भारी लगती थी, असल में उसमें वजन जैसा कुछ था ही नहीं।
उसकी बेहोश देह को बाहों में उठाए बाउ चोरों की तरह गाँव में जब वापस आए तो अभी अँधेरा था। चुपचाप उसे झोपड़ी में लिटाया और मामा के घर चले गए।

(ओ)
परबतिया के माई की पगलाई बढ़ गई थी। झोंटा लहराए अस्त व्यस्त कपड़ों में वह अकेले गाँव में घूमने लगी, वही बुदबुदाहट, बड़बड़ाहट – मरल सुखरिया, जरल सुखरिया ....    
किसी ने कुछ दिया तो खा लिया नहीं तो बस बहुत धीमे धीमे घूमना और जपना ! आश्चर्य था कि बाउ के पास नहीं गई। उसकी देह
बस्साने लगी। दिन चढ़ते चढ़ते बदबू इतनी तेज हो गई कि उसके पास खड़े होना भी मुहाल हो गया।
और शाम होते होते बच्चों और बड़ों को मनोरंजन का एक साधन मिल गया ।
उसको घेर कर नाक पर हाथ धरे बच्चे लकार लेने लगे 
“मार बढ़नी काकी बसइलि का ?” मर परे, काकी बदबू मार रही है क्या ? 

मनचले जवान पूरा करने लगे
“ काका मुअवलि डेरइलि का ?” काका की जान लेते डरी थी क्या?

अधिक बरस नहीं बीते थे, सुखरिया अत्याचार और शोषण का खलनायक था जिसकी मौत पर सबने मौन उत्सव मनाया था। आज चन्द क्षणों के मनमनसायन के लिए वह ‘काका’ हो गया था। उसकी मौत से सहानुभूति जताते लोग जीवित काकी के दु:खों से निस्संग मजा लेने में व्यस्त हो रहे थे।  हाय रे जन!
बाउ ने जाना सुना और बेचैन हो गए। उस बदबू का क्या कारण हो सकता था ? कहीं मन में अपराधबोध सा घर कर गया। उनके आने से इस ‘मर्दानी’ औरत की दु:ख यातनाएँ काटने के बाद सुखी हो चली जिन्दगी फिर नरक हो गई थी।
... उनको देखते ही परबतिया के माई का दौड़ पड़ना ... अचानक पागलपन - मरल सुखरिया, जरल सुखरिया ... नंगी हो स्यापा करती अधेड़ औरत ... पोखरे में कूदना ... बेहोश थुलथुल देह में वह अजीब सी तड़फन ... और बदबू । इनका आपस में  क्या सम्बन्ध हो सकता था?  उस रात बाउ सो नहीं पाए।

भोर में आँख लगी तो सपना देखा – हाथ मे सड़ी गली मछली लिए परबतिया के माई घर घर घूम रही थी, इसे कहाँ फेंकूँ ? लोग पागल से  हँस रहे थे। अचानक उसने बाउ के हाथ में रख दिया – बाउ ने देखा तो मछली की जगह सुखरिया का सिर था। नींद खुल गई । फिर नींद आई तो पोखरे में डूबती परबतिया के माई दिखाई दी ।
(औ)

सिर भारी था। एक बहुत ही उटपटांग निर्णय लेने के बाद बाउ दुविधा में पड़े थे। आखिरकार बैलों को खिला कर गाड़ा नाध कर खलिहान पर खड़ा कर आए । वापस आ मामा से बातें करने लगे:
”मामा एगो कार करेके बा। परबतिया के माई के दु:ख नाहिं देखल जाता।“ मामा, एक काम  करना है। परबतिया के माई का दु:ख नहीं देखा जा रहा।
”हँ, बताव।“ हाँ, बताओ।
”बताइब नाहिं। खरिहाने गाड़ा खड़िया देहेले बानी। अगर कुछ ऊँच नीच भइल त ओनहे से अपने गाँवे चलि जाइब । फेर कब्बो एइजा नाहिं आइब।“ बताऊँगा नहीं। खलिहान पर बैलगाड़ी खड़ी कर दी है। अगर कुछ ऊँच नीच हुई तो उधर से ही अपने गाँव चला जाऊँगा। फिर कभी यहाँ नहीं आऊँगा।
बाउ की बात पहेली सी लगी लेकिन कुछ तो अपने इस विचित्र भांजे का स्वभाव और कुछ बाउ के चेहरे का भाव, मामा सिर हिला कर रह गए।
(अं)
... खलिहान पर परबतिया के माई को घेरे लोग मनमनसायन में व्यस्त थे - मार बढ़नी काकी बसइलि का ?, काका मुअवलि डेरइलि का ?
वहीं पीपल के पेंड़ तले  मधया उदास आँखों से नजारा देख रहा था।
बाउ को लगा कि समय आ गया। चुपचाप गाड़ा को वहाँ ले गए, खडा किए और कूद कर घेरे में घुस गए।
परबतिया के माई बड़बड़ा रही थी – मरल सुखरिया .... बाउ ने उसके पेट और छातियों को झकझोरा जैसे मांस की पर्तों से कुछ निकालने की कोशिश कर रहे हों और फिर सामने से उसकी कमीज को उठा दिया – गला सड़ा गन्धाता एक सिद्धर जमीन पर गिरा। चिढ़ाना बन्द हो गया। उपस्थित लोग अवाक रह गए!  सरेआम उघर गई! मारे लाज के परबतिया के माई वहीं बैठ गई।
… बुदबुदाना बन्द हो गया था। आँखें मुँदीं थीं। चेहरे पर ऐसे भाव जैसे किसी और दुनिया को देख रही हो – अजीब सी बदबू लिए सुखरिया का सिर धू धू कर जल रहा था । सिर राख हुआ और बदबू खत्म हो गई। ...
... आँखें खुलीं तो सबने देखा काकी के चेहरे पर पुरानी रंगत लौट आई थी। अपार शांति।
काकी ने पुकारा,” अरे ए माधो ! रेक्शा ले आव घरे नाहिं जा पाइब।“
अरे माधो ! रिक्शा ले आओ, घर नहीं जा पाऊँगी।
मधया भागता  रिक्शा ले आया। काकी सवार हुई और बाउ को देख बोली,

” अरे भैने! तुहूँ आव बइठ। बड़ा बढ़िया बयार लागेला।“ अरे भांजे! तुम भी आओ बैठो। बहुत अच्छी हवा लगती है।   
बहोरना बोल पड़ा,” अरे काकी, फेर न ढिमिला जइह।“
अरे काकी, फिर न रिक्शे से नीचे जमीन पर लुढ़क जाना!
भौंचक्के से उपस्थित लोग लुगाई जोरों से हँस पड़े।

... बुढ़वा पीपल के पत्ते जोर जोर से डोल रहे थे। (प्रसंगांत) 
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शब्द संपदा:
(1) ममहर - मामा का घर (2)गाड़ा  बैलगाड़ी (3) लीक - सड़क (4) अधराति - अर्धरात्रि(5) टरक के भोंपा - ट्रक का हॉर्न(6) बिसाल निलबाछा - विशाल नर नीलगाय (7) डलएबर - ड्राइवर(8) काने टरक - ऐसा ट्रक जिसकी एक हेडलाइट न जल रही हो (9) पयलग्गी - अभिवादन(10) मूड़ी - सिर (11) झाड़ा फिरने - मलत्याग करने हेतु खेत की तरफ निकलना (12) रक्कतसोख बरमराछस - रक्तशोषी ब्रह्मराक्षस (13) छेरने लगा - दस्त होने लगे (14) पँचई की रेस - नागपंचमी की दौड़  (15) चेंचरा - चीरे हुए बाँस से बना झोंपड़ी का दरवाजा (16) सरापती - शाप देती (17) घिरना - घृणा (18) आपन मनई - गृहस्वामी (19) परगट - प्रकट (20) लपर लपर - लपलपाती (21) फरकोर - झिर्री (22) उघारे - नंगी (23) मरल - मर गया (24) बसगित - बस्ती (25) जरल - जल गया (26) तड़फड़ा - तड़पने के अर्थ में प्रयुक्त (27) बस्साने लगी - बदबू आने लगी (28) मनमनसायन - मनोरंजन (29) सिद्धर -एक प्रकार की छोटी मछली, उससे भी छोटी को सिधरी कहते हैं। 
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लंठ महानिष्कर्ष:
हर युग, हर समाज में ऐसे लोग रहे हैं जिन्हों ने दूसरों जैसा ही देखा सुना लेकिन सोचा और किया - अलग ढंग से। इन साहसी लोगों ने वह सोचने का खतरा उठाया जिसके पास दूसरे फटक भी नहीं सके। .. तमाम वर्जनाओं और जड़ता से मुक्ति पा उन्हों ने जब अपनी सोच को कार्यरूप दिया तो चमत्कार हुए। 


21 टिप्‍पणियां:

  1. क्या कहें और क्या न कहें! स्तब्ध करती रचना है .जिस देश काल की रचना यह है वह आज भी बहुत व्यतीत नहीं हुआ है -लेकिन वह संवेदना जो इन शब्द चित्रों को उकेरती है ,सुरक्षा /संरक्षण की पात्र है -मुझे तो नहीं लगता इतनी महीन संवेदना वाला रचनाकार आज की इस निर्वैयक्तिक और भोथरे संवेदना वाली दुनियां में गुजर बसर भी कर सकता है -कोई है जो स्नेह सरंक्षण का दामन फैला सके इस विलुप्तप्राय रचना धर्मी को बचाने कीमुहिम में ?

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  2. मैं भी पूछ ही लूं क्या 'गिरिजेशजी आप इंजीनियर क्यों हुए?' लेकिन इस क्यों का जवाब शायद मालूम है इसलिए नहीं पूछ रहा ! हाँ इंजिनियर होकर... खैर फिलहाल बाऊ. कानी गाडी वाली बात करते किसी को सुना था वो आज शुरुआत में ही मिल गया. फिर तो खो गया और हर कड़ी की तरह बैठ के देखता रहा कभी थ्रीडी, कभी फॉरडी व्यू चलता रहा... मैं पढता रहा.

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  3. भाई मै 2के बाद पढ नही पाया,कि इसलिए इसे एकदम फ़ुरसुत मे पढुंगा। खोटा सिक्का बाजार मे पहले आता है। असली आपात काल मे जरुरत पड़ने पर् निकाला जाता है।

    बहुत सुंदर है।

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  4. बाऊ फैन क्लब अगर सदस्यता के लिए खुला हो तो हमारी अर्जी भी है लाइन में. गिरिजेश फैन क्लब के सदस्य तो पहले से ही हैं. किसा और निष्कर्ष दोनों ही पसंद आये.

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  5. आपनें बहुत सार-गर्भित लेखन किया है,बधाई.इसे समझने के लिए मुझे दो-तीन बार पढना पड़ा.

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  6. अरे हो बाबू , एक तो ओईसे ही लोग बिदक बिदक के पढता है इहां ऊपर से आप और आपकी ई बाऊ कथा , हमरा बस चले तो ब्लोगजगत में अद्भुत लेखन का कौनो भी पुरस्कार हो , सिर्फ़ एक नाम हकदार है , आप नहीं जी ...बाऊ लंठ । आपको पढने और पढ के समझने वाला अपने आप मैं कौनो माद्दा रखता है , ऊ हममें भी है ।देखते नहीं हैं कितना छनिया छनिया के टीप आता है , ई बाऊ कथा तो अमर है जी अमर है । हिंदी ब्लोग्गिंग की एक धरोहर ! आपके लिए तो हम का कहें , नतमस्तक !!!
    अजय कुमार झा

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  7. किसी चीज के बहुत पसंद आ जाने पर जब प्रशंसा में कोई शब्द न मिले तो कहते हैं कि नि:शब्द......लेकिन यह उससे भी आगे की कोटि की रचना है ।

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  8. अरे एहो गिरिजेस बाबू..
    इ सब पढ़त पढ़त हमनी के मुस्कियाते मुस्कियाते ठोर दुखा गईल हो....
    अबहु जब हम आप गाँव जाईला तो दिसा फिरे और झाड़ा सुनबे करीला...हा हा हा..
    कहनी में लोच और कथनी में खनक...का कहें...बातकुचन के मास्टर तो आप ही हैं महराज..
    फिन कोई लोहा सिंग और खदेरन का मदर जनमिये जावे लगे हाथों....हाँ नहीं तो...

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  9. कहीं आप मुझे गलत न समझ लेवें...!
    मेरा 'मुस्कुराना' होता है ..आपके शब्द सामर्थ्य को देख कर और उन शब्दों से दो-चार होकर जो कहीं ख्यालों के तहों में दबे पड़े थे...
    कहानी आपकी सचमुच मुझे भी यातना में 'भूँज' गयी है...

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  10. हम भी रीझे हुए हैं .सभी टिप्पणियों से सहमत और आपके लेखन पर नतमस्तक . हाँ ये धरोहर ही है .

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  11. पिछ्ले एक महीने से इस ब्लाग जगत मे स्व्छ्न्द भाव से विचरण कर रहा था , अधिकतर स्थानो पर समसामयिक खबरो और चर्चा की भरमार है कुछ स्थानो पर उट पटांग की कविता भी चल रही है मन खिन्न ही हो रहा था कि "मा पलायनम !" और "क्वचिदन्यतोअपि " से मन अभीभूत हो गया । इसीबीच एक ब्लाग वैज्ञानिक ने सलाह दी की इस तरफ के सबसे बड़े दिग्गज गिरिजेश राव है

    अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा

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  12. पूरी गंवई मिटटी की महक लिए हुए है यह रचना...जाने कहाँ पहुंचा दिया...बरसों बाद ऐसी भाषा में लिखा कुछ पढ़ा...अप्रतिम

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  13. हम तो बाऊ और परबतिया के माई के किस्से के चश्मदीद गवाह सा महसूस कर रहे हैं। बिल्कुल अपने आस-पास घटित लग रहा है यह।

    यह मरा हुआ सिद्धर काकी के शरीर में इतने दिनों तक अटका रहा और लोग भाँप न सके। जो बाऊ न होते तो क्या होता?

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  14. कहो महराज.. झीन मुटी के सिद्धर से पूरा देहिया कैसे गन्हा गईल??

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  15. @
    एक ठो प्रेक्टिकल करो। गरम मौसम में दो तीन दिन बिना नहाए रहो और शरीर से हरदम लगा रहे ऐसे एक सिध्धर भी रखे रहो। मोटाई और दमा की बिमारी वाला कोई वालंटियर मिल जाय तो और बढ़िया ! :)
    सिधरी से सिध्धर जिवगर होता है। कल ही परदरशनी माँ देख आए हैं। ...घटना सच्ची है। हमरी अम्मा जब किशोरी थीं, उस समय की।... मनोवैज्ञानिक और सामाजिक संकेत हैं जहाँ सिध्धर एक प्रतीक बन जाता है। सुखरिया-कालापानी-मोटापा-दमा-गँवई मौज-सिध्धर-बाउ-मुक्ति. . . संकेतों को समझो आर्य!

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  16. @मनोवैज्ञानिक और सामाजिक संकेत हैं जहाँ सिध्धर एक प्रतीक बन जाता है। सुखरिया-कालापानी-मोटापा-दमा-गँवई मौज-सिध्धर-बाउ-मुक्ति. . . संकेतों को समझो आर्य.

    क्या वो दमे का इलाज़ ..... मुहं में जीवित मछली डालता एक वैध ......

    धत ...... खाम्खाव दिमाग लगा रहा हूँ.

    पूरी लंठ चर्चा को पुस्तक के रूप में कम्पोज करवाइए.. छापने की जिम्मेवारी हमारी.

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  17. lovely heart touching stories - aapke bau gaanv ke bambaiya hero hain - all rounder - ab to psychiarist bhi ho chale hain....

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