बुधवार, 6 जनवरी 2010

इन भुक्खड़ ब्लॉगरों को पहचानिए: एक पहेली ऐसी भी

इन तीन भुक्खड़ ब्लॉगरों को पहचानिए।
नीचे लिखे ब्लॉगरान इस पहेली को बूझने में भाग नहीं ले सकते:
(1) डा. अरविन्द मिश्र
(2) हिमांशु पाण्डेय
(3) श्रीश पाठक 'प्रखर'
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प्रहेलिका बुझौवल अब समाप्त: समय: भारतीय 22:55, दिनांक: 06/01/10


खाली प्लेट लिए मैं हूँ यानि गिरिजेश
लालची निगाहों से ताकते भए अमरेन्द्र
तन्मयता से भकोसते भए महफूज

विजयी हुए:
(1) परम आदरणीय समीर लाल 'समीर' 
(2) परम आदरणीया स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा' ( ' आदरणीया' के प्रयोग पर क्षमाप्रार्थी हूँ ;)) 
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अवधी कै अरघान और कुछ औरों की , कुछ अपनी ... के रचयिता अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी  से मेरी पहली मुलाकात महफूज अली  के सौजन्य से मेरे आवास पर हुई। अचानक ही फोन आया था और मैं फोन पर अमरेन्द्र जी को पहचान नहीं पाया था। श्रीमती जी के हाथ के बने गोभी के पकौड़े, धनिए की चटनी और सॉस के साथ भकोसते हुए हम लोगों ने खूब गपोष्ठी की। रात में 10 बजे अमरेन्द्र जी की दिल्ली के ट्रेन थी सो 9 बजे के आसपास विदा हुए। 


इस मुलाकात को यादगार बनाने के लिए इस पहेली का आयोजन हुआ। मैं सभी प्रतिभागियों का हृदय से आभारी हूँ। 
विजेताओं को ढेर सारी बधाइयाँ।


वैसे इन लोगों के विजयी होने में मुझे कुछ गड़बड़ी की आशंका भी हो रही है। शक की सुई स्वामी अरविन्दानन्द सरस्वती उई ! शरारती और बाबा महफूजानन्द की ओर संकेत कर रही है। 
 सबूतों के अभाव में दोनों बाबाओं को माफी दी जा रही है। 
हम भी प्रथम पहेली के सफल आयोजन पर अपनी पीठ थपथपा ले रहे हैं। अब ताऊ, उड़नतश्तरी, तसलीम और अन्य पहेली आयोजकों से दहशत खाने की कोई आवश्यकता नहीं रही। 
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अमरेन्द्र जी से अत्यधिक प्रभावित हुआ। उतनी ही देर में सहजता और विद्वता के एक साथ दर्शन हुए। इतनी सरलता से अवधी के काव्य उदाहरण और संस्कृत के भी उद्धरण देने वाले किसी व्यक्ति से बहुत दिनों के बाद मुलाकात हुई। मुझे अपने संस्कृत के पूज्य आचार्य शास्त्री जी याद आ गए। हाँ, अरविन्द जी के  समर शेष है पर भी चर्चा हुई। 
आश्वस्त हुआ कि ब्लॉगरी में हिन्दी साहित्य का भविष्य उज्जवल है। साथ ही निश्चिन्त भी हुआ कि एक और अपनी कटेगरी का लंठ मिला।
महफूज जी के बारे में क्या कहें ! प्याज के छिलके  उतारने के बाद बताएँगे। 


bhukkhad

32 टिप्‍पणियां:

  1. गिरिजेश राव, अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी एवं महफूज़ अली :)

    एक अंदाज ही लगाना है.

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  2. मूंछें, चश्मा और टोपी वाले तो लखनऊ में देखे गए हैं, recently.

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  3. बिना टोपी वाले ब्लोगर का सबूत कहाँ है कि वे खा रहे हैं ? ये फिर वे इन दोनों साथियों के अग्रज हैं और भारतीय राजनीति के पोषक कि सब खा लिए जाने के बाद भी सबूत नहीं दिखाई दे रहे. वैसे तीनों को ही नहीं पहचान सका हूँ.

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  4. पहचान तो लिया लेकिन इन्हे खाते देख भुख मह्सूस हो रही है

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  5. मुझे तो गान्ही बाबाके तीन बन्दर लगे हैं -ओह सारी मुझे भाग नहीं लेना था ....

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  6. गिरजेश को तो पहचान लिया। उन की निगाह कैमरे पर है। करें भी क्या? प्लेट जो खाली हो चुकी है।

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  7. पहले अपने गिरिजेश भाऊ !
    दूजे ,,,अमरेन्द्र भाऊ !
    तीजे को ना समझ पाए !
    भैये ......सो मुआफी !


    जय हो !

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  8. सही बात है...गाँधी जी के तीन बन्दर ही हैं....
    दू बन्दर कैसे नज़र गप्चाये हुए हैं....पूरे भुक्खड़ ही लग रहे हैं....इस दोनों मेर से एक बन्दर तो महाआलसी अधिपति रजाई ओढ़न महाराज.....गिरिजेश जी हैं.....दूसरे जो दुई भुजा भक्षण कर रहे हैं .....टोपी कनटोप धारी, मफलर अधिकारी......जैकेट विहारी..सर्वश्री मह्फूजानंद जी महाराज हैं....और तीसरे को पहचानने में मेरे चक्षु असमर्थ हैं प्रभू.....
    इनाम ६६% के भागीदारी हैं हम..भेज दीजियेगा.... :):)

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  9. These are 3 idiots,

    Shrish, Girijesh and Himanshu.


    4th idiot Arvind mishra is clicking photo :)

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  10. गिरिजेश जी,
    अमरेन्द्र जी
    और तीसरे भाई को नही पहचान पा रहे हैं क्योंकि साईड पोज है,
    अब कुछ ईनाम का बेवस्था है क्या?
    पुरा नही आधा ही सही।

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  11. अरे ई त बडिए मुश्किल है......हालांकि आलसी ने अपने लिए तो संकेत छोड़ा है (आलसी और रजाई सर्दी में अभिन्न मित्र जो ठहरे ) और एक रजनीश जी लगते हैं.........

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  12. अरे ई त बडिए मुश्किल है....हालांकि आलसी ने अपनी पहचान का संकेत छोड़ा है (सर्दी में रजाई और आलसी अभिन्न मित्र जो ठहरे )
    बाकी तो सामने कुर्सी परा रजनीश जी लगते हैं .....और दुसरे जनाब तो मानो चेहरा छुपा के खाना चाहते हैं .......

    वैसे इन पकौडों (शायद.... ) में मेरा हिस्सा भी ये भुक्खड़ ब्लोगर खा गए ........

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  13. Bahut gaur se dekhne ke pashchaat...saamne waala prani kahin....
    AMRENDRA ji to nahi hain...???

    to teen bandar nimnlikhit hain:
    1.rajaii dhaari..Girijesh Rao
    2.Giddh Drishti...Amrendra
    3.Bhakshak...Mahfoozanand

    aur ii ka commentwa release nahi karne ka iraada hai...ab to poora prize hamra hai...bhej dijiyega...

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  14. जब आपने 1,2 और 3
    पहले ही कर दी है तो
    फिर नाम काहे पूछ रहे हो जी
    और खाने पर क्‍या आपने
    बुलाया है ?

    जिसने बुलाया
    सबको क्‍यों नहीं बुलाया
    ये तो हमारे हिस्‍से का खा रहे हैं
    आप को भुक्‍खड़ नजर आ रहे हैं
    हमें तो खिलाने वाले ही ...

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  15. ठीक है कि समय हो गया भारतीय 22:55, दिनांक: 06/01/10

    लेकिन

    तस्वीर किसने ली?

    बी एस पाबला

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  16. @ पाबला जी,

    तस्वीर मेरी सुपुत्री ने खींची थी।

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  17. वैसे इन लोगों के विजयी होने में मुझे कुछ गड़बड़ी की आशंका भी हो रही है। शक की सुई स्वामी अरविन्दानन्द सरस्वती उई ! शरारती और बाबा महफूजानन्द की ओर संकेत कर रही है।


    माने की हम अपने से नहीं पहचाने हैं क्या.....??
    prize नहीं देना है मत दीजिये बाकि हमपर doubt तो मत कीजिये...
    आपको पहचाना कौन बड़ी बात ....५ कोस दूर से महा कोढ़िया दिख रहे हैं....हां नहीं तो...
    दूसर महाराज को तनी टेम लगा लेकिन...एक दू फोटो से मिलान में किया तो मिल गया...
    अब रहा तीसर.....
    तो एक तो चश्मिश ...दूसरा लखनऊ...और कहीं साइड प्रोफाइल देखा है जिससे मिलान हुआ है...
    प्रतिभागियों पर विस्वास करना चाही...!!
    समीर जी भी संदेह के घेरे हैं....ई कनाडा वालों के प्रति सौतेला व्यवहार काहे ???

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  18. आपकी त्वचा से आपकी उम्र का पता ही नहीं चला... इसलिए पहचान नहीं पाया. घर की दीवार और पर्दा तो कहते थे कि ये उन्हीं दो प्यारे से बच्चों का घर है.

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  19. ऐसा लगता है की पहले भी कहीं देखा है :)

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  20. वाह! ये हुई ब्लौगिंग तो....

    आपसे मिलने की तमन्ना तो हम भी संजोये बैठे हैं।
    उधर एक जिद्दी धुन पर कल्पित साब का लिखा देखा आपने? लय-प्रवाह-कविता को लेकर बेवजह की बहस वहां भी छिड़ी है ,सोचा आपको बताऊं।
    http://ek-ziddi-dhun.blogspot.com/2010/01/blog-post_7845.html

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  21. तीनो ब्लॉगरान को देखकर खुशी हुइ, ज्ञान के भूखे.

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  22. भूख है तो सब्र कर रोटी नही तो क्या हुआ ( दुश्यंत)
    आजकल लखनौ मे है जेरे बह्स ये मुद्दआ ?

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  23. जीत गये भई जीत गये!!!


    अब हमें भी पकोड़े खिलाये जायें. :)

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  24. धत्‌ ... इतनी आसान पहेली बूझने का मौका निकल गया हाथ से। एलेक्शन ड्यूटी का दर्द और बढ़ गया। जिस स्थान का यह फोटू है वहाँ मैं भी नाश्ता-भोजन कर चुका हूँ।

    जीतने वाले चुनाव आयोग को धन्यवाद भेंजे जिसने मुझे उधर ही फँसा दिया था... नहीं तो विजयश्री मुझे ही मिलती।

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