रविवार, 7 फ़रवरी 2010

ब्लॉगर की अम्माँ गोंइठी दे।

फाग महोत्सव में अब तक:
(1) बसन तन पियर सजल हर छन
(2) आचारज जी
(3) युगनद्ध-3: आ रही होली
(4) जोगीरा सरssरsर – 1

(5) पुरानी डायरी से - 14: मस्ती के बोल अबोल ही रह गए
(6) आभासी संसार का होलिका दहन 
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 होलिका दहन के सामान जुटाने हेतु दूसरों के मचान, झोंपड़ी, चौकी, दरवाजे पर पड़ी लकड़ी, पतहर, यहाँ तक कि फर्नीचर भी सहेज देने की पुरानी परिपाटी अब समाप्तप्राय हो रही है। लोग इस अवसर पर वैमनस्य भी साधते रहे हैं। 
इसके साथ ही एक परम्परा रही है - गोंइठी जुटाने के लिए भिक्षाटन जैसी। गोंइठी कहते हैं छोटे उपले को। पूर्वी उत्तरप्रदेश के कुछ भागों में इसे चिपरी भी कहते हैं। 
नवयुवक गोलबन्दी कर हर दरवाजे पर जा जा कर कबीरा के साथ एक विशिष्ट शैली का गान भी करते थे जिसमें गृहिणियों से होलिका दहन के ईंधन हेतु गोइंठी की माँग की जाती थी। इस गान में 'गोंइठी दे' टेक का प्रयोग होता था। लयात्मक होते हुए भी कई लोगों द्वारा समूह गायन होने के कारण इसमें बहुत छूट भी ले ली जाती थी। जाति और समाज बहिष्कृत लोगों के यहाँ इस 'भिक्षा' के लिए नहीं जाया जाता था। किसी का घर छूट जाता था तो वह बुरा मान जाता था। 
.. समय ने करवट बदली और कई कारणों से, जिसमें अश्लीलता सम्भवत: मुख्य कारण रही होगी, यह माँगना धीरे धीरे कम होता गया। आज यह प्रथा लुप्त प्राय हो चली है। 
 लेकिन कभी इस अवसर का उपयोग पढ़े लिखे 'सुसंस्कृत ग्रामीण लंठ जन' लोगों के मनोरंजन के लिए भी करते थे। गाँव समाज से जुड़ी बहुत सी समस्याओं और बातों को जोड़ कर गान बनाते और घर घर सुनाते। इन गीतों  में बहुत चुटीला व्यंग्य़ होता था। 
मेरे क्षेत्र के एक गाँव चितामन चक (चक चिंतामणि) में एक अध्यापक ऐसे ही थे जिनके मुँह से कभी कुछ बन्दिशें मैंने सुनी थीं। आभासी संसार के इस फाग महोत्सव में आज की मेरी प्रस्तुति उन्हें श्रद्धांजलि है, एक प्रयत्न है कि आप  को उसकी झलक दिखा सकूँ और यह भी बता सकूँ कि होलिकोत्सव बस लुहेड़ों का उच्छृंखल प्रदर्शन नहीं था, उसमें लोकरंजन और लोक-अभिव्यक्ति के तत्त्व भी थे।  क्या पता किसी गाँव गिराम में आज भी हों !
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 तुमको लगाएँ दाल का गुलाल
जल गइ बजरिया फागुन की आग
महँगा बुखार महँगा इलाज
अब की हम फूँके शरदी बखार 
राउल की अम्माँ गोंइठी दे।

आज नहिं जाना पास नहिं जाना
कोठरी के भीतर बड़ा मेहमाना
घट गइ आग सीने में
अरे सीने में भठ्ठी में
हमको चिकन तन्दूरी बनाना
चिद्दू की चाची गोंइठी दे।

बोले मराठी हिन्दी न(?) आती
जल गई जुबाँ अँगरेजी में
अँगरेजी में गाली मराठी में गाली
हिन्दी हो गइ ग़रीब की लाली
आँसू चढ़े बटलोई में
मनमोहना अब गोंइठी दे।

दो कदम आए एक कदम जाए
करांति की खातिर कौमनिस्ट बुलाए
अरुणाँचल भी आए लद्दाख भी आए
ग़ायब मिठाई चीनी में ।
हुजूर की कमाई जी जी में
सुलगे सिपहिया बरफीली में
एंटी की लुंगी में गोंइठी दे।

बिस्तर पे खाना बिस्तर पे पाना
सारा अखबार बस कूड़े में जाना
गैस है खत्तम और खाना बनाना
खाना चढ़ाया चूल्हे पे ।
लकड़ी न लाए बस टिपियाए
झोंक दूँ कम्पू चूल्हे में
ब्लॉगर की अम्माँ गोंइठी दे। 

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लद्दाख और अरुणांचल में  रोज़मर्रा सी हो चुकी घुसपैठों के मद्देनज़र पसरा हुआ सन्नाटा डराता है। . . .
इस पोस्ट को लिखते समय मुझे भारत के रक्षा मंत्री  का नाम नेट पर ढूँढना पड़ा :(  
जब मैं मराठी और हिन्दी की गुथ्थी सुलझाने के लिए अंग्रेजी का अखबार पढ़ रहा होता हूँ , उस समय  मेरे कान सन्नाटे में  सीमा से आती मंडारिन की फुसफुसाहट सुनते हैं । अपने बच्चे की साथ खेलने की माँग पर मैं मुँह बा देता हूँ - आवाज़ नहीं निकलती ।  भाषाओं ने मुझे मूक बना दिया है ..  

 कोई है जो गोंइठी की मेरी मूक माँग को कृषि मंत्री तक पहुँचा दे? - चूल्हे जलाने हैं। 
 कोई है जो गोंइठी की मेरी मूक माँग को गृहमंत्री तक पहुँचा दे ? - क़ानूनी रवायतों के चिथड़े जलाने हैं।
 कोई है जो गोंइठी की मेरी मूक माँग को प्रधानमंत्री तक पहुँचा दे ? - भारत माता की सूज गई आँखों को सेंकना है।
 कोई है जो गोंइठी की मेरी मूक माँग को रक्षामंत्री तक पहुँचा दे ? -भारत की सीमाओं पर होलिकाएँ सजानी हैं। 
 कोई है जो गोंइठी की मेरी मूक माँग को ब्लॉगर तक पहुँचा दे ? - टिप्पणियों के भर्ते के लिए पोस्ट का 'बेगुन' भूनना है।

26 टिप्‍पणियां:

  1. आज अभिधा में ही कहूँगा की गिरिजेश जी आप जैसों से ही यह ब्लागजगत है और रहेगा ..और आप जैसा भी दूजा न कोई..... आप खुद ही अपने जैसे हैं .
    फाग के बहाने आप कहाँ तक का विमर्श कर ले रहे हैं ! दूर दृष्टि फौलादी इरादा !
    और हाँ फाग अश्लीलता का बाना क्यों पहनने लग गया -इस पर हम परिचर्चा कर सकते हैं

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  2. जियो करेजा, जियो....

    क्या खूब लिखा.....एकदम धांसू। भूल चुकी बातों को, बिसर चुकी यादों को बहुत खूबसूरती से पेश किया है।

    एकदम बमछूट पोस्ट।

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  3. धन्यवाद गिरिजेश,
    हमने न कभी कबीरा गायन सुना और न ही गोंइठी का भिक्षाटन देखा. हमारे इलाके से यह परम्पराएं शायद बहुत पहले ही गायब हो चुकी थीं. तुम्हारा गोंइठी गायन बहुत प्रभावशाली रहा और गोंइठी.

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  4. लकड़ी न लाए बस टिपियाए
    झोंक दूँ कम्पू चूल्हे में
    ब्लॉगर की अम्माँ गोंइठी दे।

    गजब भाई..जय हो..क्या शानदार लिखते हो..आनन्द आ गया. बेहतरीन बात में बात!

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  5. हमार छत्तिसगढी फ़ाग का छौंक फ़गुवा मे,

    तोला ससुरे जाए के बड़ा डर भारी
    मईके मे मजा मारे होSSSS बाई।

    जय हो

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  6. लकड़ी न लाए बस टिपियाए
    झोंक दूँ कम्पू चूल्हे में
    ब्लॉगर की अम्माँ गोंइठी दे।

    हा हा हा वाह मेरे लिये एक नई जानकारी है फाग पर पंजाब मे तो ये सब देखा नही है। आनन्दमय शुभकामनायें

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  7. आज अच्छा लग रहा है ---
    कह रहा हूँ ---
    '' बाऊ ! क्यूँ बउवा जाते हो ? ,
    बढियां - बढियां लिख जाते हो |
    कभी-कभी फगुनांध दीखते !,
    कभी नयन - धर दिख जाते हो ||
    ....... आभार ,,,

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  8. कई बार मुझे आपकी हिंदी समझने में .... सर फोड़ना पड़ता था.... एक बार तो फुक्का फाड़ कर रोया भी था...... पर यह पोस्ट बहुत अच्छे से समझ में आ गई..... और जब समझ में आई ...तो मूंह से यही निकला.... कि क्या लिखा है आपने.....वाह! ...............

    आपकी लेखनी को सैल्यूट....

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  9. एक सूक्ष्म टिप्पणी ही पर्याप्त है,
    वह है.. " वाह ! "

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  10. वाह, कलम चूम लिखा है। इस बेरी अपने आस पास तलाशता हूं फागुन के तत्व। मुश्किल होगा पर शायद इतना मुश्किल भी नहीं!

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  11. कोई है जो गोंइठी की मेरी मूक माँग को ब्लॉगर तक पहुँचा दे ? - टिप्पणियों के भर्ते के लिए पोस्ट का 'बेगुन' भूनना है।

    अरे महराज..आप हमसे कहें कहाँ पहुँचाना है ...दो मिनट में पहुचाये आपका सन्देश और..सन्देश की गोंइठी ले आविन हम फट दनी....
    अरविन्द जी की बात का हम पूरा-पूरी अनुमोदन करते हैं...गिरिजेश बाबू..जिंदाबाद..
    आप जैसा लिखने वाला नहीं भेटाया है...ऐसी शैली और ऐसा अंदाज़..अनोखा, अनुपम है...

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  12. फागुन के बारे में उम्दा प्रस्तुति ... पढ़कर आनंद आ गया .. धन्यवाद

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  13. अगर एक आलसी ऐसी-ऐसी लाजवाब पोस्ट लिखेगा तो भई यह आलस ही अच्छा.

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  14. अब गोंइठी कहाँ है भयवा,
    आप तो पूरा ब्लाग ही फगुनिया दियें हैं,
    एक दम करेजवा में गड़ जा रही है आपकी हर लैनिया,
    जिया भइया जिया,
    एसय लिखत रहा .

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  15. @ अदाजी
    कहाँ सन्देश पहुंचा आयीं ...सोच रहे थे अब कोई हंसी मजाक नहीं करेंगे ..मगर आपकी टिपण्णी पढने के बाद आपको छेड़े बिना रहा ही नहीं जाता

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  16. आपकी प्रविष्टि के बारे में तो कुछ लिखना भूल ही गए ...
    फागुन की आंच में देश में चल रहे वर्तमान हालात पर गहरा तंज ...दुआ करेंगे .. आपकी मूक मांग इन मंत्रियों तक भी पहुँच जाए ...
    ब्लोगर तक पहुँचाने का काम तो अदाजी कर ही रही हैं ...:):)

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  17. और हाँ ...टिपण्णी को टिप्पणी पढ़ा जाए ...!!

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  18. गोइंठी ने पुराने दिनों को जिंदा कर दिया। सामान्यतः द्वार-द्वार पर ये गाया जाता था-

    ए जजिमानी
    तहरा सोने के केंवाड़ी
    दू गो गोइंठी द

    और मिल जाने के पश्चात दिल से शुभकामनायें दी जाती थीं-

    एह पार पकड़ी ओह पार वर
    बनल रहे जजिमानी के घर

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  19. @ रविकांत जी

    जिस भूली हुई धुन को याद करने के लिए मैं सिर धून रहा था, आप ने याद दिला दी।
    आभार। हाँ, आभार प्रदर्शन भी होता था और शायद मनुहार भी।

    जल्दी से क दीं बिदइया हे चलीं दुसरे दुआर
    राम लखन दुनू भैया हे चले फागुन बयार
    फागुन बयार चले फागुन बयरिया...

    अफसोस है कि ये मंत्री आभार प्रदर्शन का अवसर नहीं देंगे - मनुहार करूँ तो भी :(

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  20. बेहतर प्रस्तुति...

    अरविंद जी क्या खूब कह गये हैं...
    फाग के बहाने आप कहाँ तक का विमर्श कर ले रहे हैं !

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  21. अरे वाह गोईंठी माँगने के बहाने देश की राजनीतिक स्थिति को बखूबी उभारा है आपने और बेगुन कौन सा भूनना है आपको? बी.टी. बेगुन तो नहीं, तो जयराम रमेश तक भी संनेसा पहुँचाय दिया जाय.

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  22. गिरिजेश सर, आप बुरा बोलते हैं,
    और सोचते हैं कि आपकी मांग अलाना मन्त्री, फ़लाना मन्त्री तक कोई पहुंचा दे।
    उधर तो प्रेरणा स्रोत हैं,गांधी जी के तीन बन्दर -
    बुरा मत देखो, बुरा मत बोलो और बुरा मत सुनो।
    जाओ, आप को कभी कोई अवार्ड भी नहीं दिया जायेगा।
    ..............
    हम जैसों का गोईंठी से परिचय करवाने पर बहुत धन्यवाद।

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  23. AAYE HAAYE.... KAREJE ME TEER MARA HAI ... KAISI YAAD DILA DI AAPNE FAG KI... YE LO -

    रुत बासंती देख कर, वन में लग गयी आग

    धरती बदली से कहे, आजा खेलें फाग

    आजा खेलें फाग, भाग जागे मनमौजी

    रंगों जिसे पाओ मत खोजो औजी भौजी

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