गुरुवार, 4 मार्च 2010

भाँग, भैया, भाटिन, भाभियाँ, गाजर घास ... तीन जोड़ी लबालब आँखें - 1

.. आठवीं से मित्र संजय के साथ होली में गाँव के लिए निकल पड़ा हूँ। हम दोनों के परिवार लखनऊ में ही रहेंगे - परीक्षाएँ होली के अगले दिन से ही प्रारम्भ जो हो रही हैं। होली में पत्नियों को अकेला छोड़ चल देने का साहस बिरलों में होता है। मानव मन की तरंगें और उमंगें उसे साहसी बना ही देती हैं, इस बार तो परिस्थितियाँ भी पक्ष में हैं।...  वृद्ध पिता का आग्रह मुझे खींच रहा है तो संजय का मन किशोरावस्था की वीथियों में एक बार पुन: भ्रमण करने को उतावला है - रामकोला की गलियाँ, वह मुमताज जिसने बुलेट चलाना सिखाया और भी ढेर सारी स्मृतियाँ .. और वह लड़की जिसने पहली बार उस खास नेह को जगाया.. मैं छेड़ता हूँ - अबे 27 वर्षों के बाद वो कहाँ मिलेगी? अपनी ससुराल में बाल बच्चों के साथ मोटी सोटी होकर मस्त होगी !
..अपने दिवंगत हो चुके माता पिता की छवियों को मेरे माता पिता में देखने के भाव में वह मगन है। फिसल चुकी रेत को फिर हथेलियों में सँजोने का सम्मोहन या भ्रम ! नहीं दोनों नहीं - तरल भाव आकार ले चुके हैं - ठोस।  बीता समय प्रक्षेपित हो साथ चलने लगा है दैनिन्दिन  सा। उसका उत्तर आता है - चल, देखेंगे...वोल्वो चल देती है..चलती जाती है...
  गोविन्दा की राजा बाबू फिल्म और दो मित्रों की मौजूँ बकबक बच्चन की क्या भूलूँ क्या याद करूँ पर भारी पड़ते हैं ..जगह जगह पथांतरण को देख अपनी गाड़ी से न आने के निर्णय की सराहना करने के लिए ही बकबक थमती है नहीं तो बकबक और बस की गतियों में जुगलबन्दी है.. 6 घंटे की राह 8 घंटे में पूरी होती है लेकिन पता नहीं चलता। दूरियाँ छलिया होती हैं या चंचला या ईर्ष्यालु? यूँ समय का साथ क्यूँ छोड़ देती हैं ? छोड़ देती हैं या मारे डाह के सिमट जाती हैं ? डाह में कोई सिमटता है भला ?...
मोबाइल में गिनता हूँ - पिताजी ने 14 बार बात किया - कहाँ तक पहुँचे? गोरखपुर में अधिक रुकना नहीं, मैंने सब सामान मँगा लिया है।.. मैं उनके स्वर में छिपी आशंका को पहली काल से ही समझ रहा हूँ - शाम हो गई है, ससुराल की गाड़ी से आना है, साले सलहज भी रात में ही आने वाले हैं .. आज कहीं ससुराल में ही न रुक जाय ! ..आत्मज -कलेजे का टुकड़ा, नेह आशंकित है। समय भाग क्यों नहीं रहा? ...
कुछ फल, मेवे और पुआ के लिए होमोनाइज्ड दूध का पैकेट मोल लेता हूँ। संजय कोंचता है - ससुराल के लिए मिठाई तो ले लो! वह बताता है उसके बैग में अम्मा पिताजी के लिए गोंद के लड्डू पड़े हैं। मैं बताता हूँ दोनों मधुमेह ग्रस्त हैं - तुम्हारी मिठाई पट्टीदार खाएँगे और मैं ससुराल हमेशा से हाथ झुलाते ही जाता रहा हूँ। मन में हास्य उपजता है जो हाथ वहाँ थामे थे वो गले में पड़े झूल ही रहे हैं, मिठाई किस बात की !
वह कहता है - अबे! मेरा तो खयाल कर! ..मोहद्दीपुर में मिठाई लेने के लिए रुकते हैं और संजय अपनी कारस्तानी शुरू कर देता है - 25 वर्ष पुराने दोस्त को आने को बोल देता है। मैं कोस रहा हूँ - साँझ घिर रही है और यह प्रतीक्षा !
..उसका मित्र आता है अपार आत्मीयता लिए, मेरा भी सहपाठी रहा शायद आठ नौ महीने ही लेकिन बस सहपाठी ही। अब बड़ा आदमी हो गया है लेकिन उसकी सहज ऊष्मा में अपरिचय पिघलने लगता है। गाली गलौज और कुछ पुराने विशिष्ट मित्रों की गालीमय खोज खबर के बाद वापसी में बैठकी की बात पक्की कर हम लोग चल पड़ते हैं ..
ससुराल की नवनिर्मित मकान प्रभावित करती है। ससुर के जीवट की प्रशंसा करता हूँ। गाँव में भी आधुनिक वास्तु, साजो सामान और सारी सुविधाएँ .. संजय मगन है। सास ससुर का आग्रह है कि साँझ हो ही गई है, वह लोग भी आने वाले हैं, आप लोग रुक जाइए, भेंट मुलाकात के बाद कल सुबह चले जाइएगा। डॉन के आतंक की उन दोनों लोगों को याद दिला ही रहा हूँ कि डॉन मोबाइल पर ऑनलाइन होते हैं - खाना बन गया है, तुम लोग जल्दी पहुँचो। समवेत अट्टाहस के बीच हरी मटर और पकौड़ी भकोसते मैं उन्हें अपनी स्थिति के बारे में बताता हूँ, साथ ही आश्वस्त करता हूँ कि हमलोग अभी चल देंगे। उधर से आवाज आती है - ठीक है।...
काल कट गई है लेकिन 'ठीक है' में छिपे आशंका और किंचित अवसाद मुझे खड़ा कर देते हैं - पिता की ममता सास ससुर की ममता ! .. ये ममताएँ हर दौर में मनुष्य को दुविधा में डालती रही हैं। ... लेकिन मैं तो जब चला था उसी समय से निश्चित था .. ससुराल की कार हम लोगों को लादे हाइवे पर दौड़ रही है, ऑपरेशन के बाद मोतियामुक्त दो जोड़ी आँखों का प्रकाश उसे अपनी ओर खींच रहा है। क्या सचमुच यह यात्रा प्रकाशयात्रा है ? ... (जारी)

25 टिप्‍पणियां:

  1. ससुर और पिता के बीच फंसे बेचारे एक आदमी की व्यथा रोचक अंदाज में पिरोई है ...

    २०-२२ साल पहले रामकोला जाने के लिए नाव का प्रयोग करना पड़ता था ...क्या अब भी ...??

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक पर्यटक के अन्दाज़ में ससुराल यात्रा का इस तरह रोचक वर्णन अच्छा लग रहा है ..जारी रखें

    उत्तर देंहटाएं
  3. @ वाणी जी
    जाने किस रामकोला की बात कर रही हैं आप? मध्यप्रदेश/छतीसगढ़ और बिहार में भी इस नाम के टाउन हैं। उत्तरप्रदेश के इस रामकोला का नदी नाले से दूर दूर तक रिश्ता नहीं। यह गन्ना उत्पादन केन्द्र रहा है जहाँ किसी समय एक ब्लॉक में ही 3 गन्ना फैक्ट्रियाँ थीं। आज एक ही है लेकिन ट्रिपल प्लांट - जरा गुगल पर Ramkola टाइप कर सर्च कीजिए। हमेशा से यह जगह सड़क मार्ग से जुड़ी रही है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. प्रणाम

    अब जल्दी से आगे की पोस्ट पूरी करिये वरना भाभी से "ज्ञापन पत्र" दिलवा दूंगा ......
    जिसका जवाब देना भारी पड जायेगा ........

    समझे भैया या नहीं ?
    या अभी और धमकी देनी होगी .......

    आपके ब्लोग के जरिये गांव घूमने की इच्छा दबाए नहीं दबती .........

    उत्तर देंहटाएं
  5. आनद
    अब परमानन्द की प्रतीक्षा है.

    उत्तर देंहटाएं
  6. कई बातें मन में उमड़ घुमड़ आयी हैं -सब एक साथ लिखूंगा इसलिए की एक बार और पढने की साध है यह पोस्ट !

    उत्तर देंहटाएं
  7. हो सकता है कुछ गलतफहमी हो मुझे इस स्थान की जानकारी में...मिलते जुलते नाम के कारण ही यह हुआ होगा....

    उत्तर देंहटाएं
  8. इस पोस्ट में मेरे काम की पंक्ति तो प्रारंभ में ही दिख गयी - "मानव मन की तरंगें और उमंगें उसे साहसी बना ही देती हैं"
    शेष, जीवन-रंग-रंगा/पगा ही लिखता है ऐसी प्रविष्टि !
    मैं तो पढ़ लूं बस !

    उत्तर देंहटाएं
  9. पता नहीं हमारे चश्में का क़ुसूर है याकि उसके पीछे टिम टिमाते दीपकों का ...कई बार पढा ...बस एक ही बात क्या ये ठीक है ?
    "होली में पत्नियों को छोड़कर अकेला निकल पाने का मौका बिरलों को मिलता है "
    कुछ शंकायें और भी हैं यथा..."जो हाथ वहां थामें पहले ही गल॓ पड॓ हैं मिठाई किस बात की "
    द॓खिय॓ पंचमी कल है तो समझ में आया कि जमाई ससुराल पर लद जाते हैं :) श॓ष टिप्पणी आगे ज़ारी...

    उत्तर देंहटाएं
  10. दिलचस्प ठेला है भाई.....अगली कड़ी की प्रतीक्षा है ...

    उत्तर देंहटाएं
  11. क्या गिरिजेश जी, इस मामले में भी मेरे जोडीदार ही निकले आप तो....मैं भी ससुराल हमेशा हाथ झुलाते ही जाता हूँ :)

    उत्तर देंहटाएं
  12. .
    .
    .
    क्या सचमुच यह यात्रा प्रकाशयात्रा है ? ...

    हाँ हाँ और हाँ...

    अच्छा लग रहा है इसे बांचना,
    आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  13. गिरिजेश सर, हमारी समझ में तो यही प्रकाश यात्रा है। आगे का वर्णन जानने की उत्सुकता रहेगी।

    उत्तर देंहटाएं
  14. "भकोसते" ये शब्द रोज घर में सुनने को मिलता है और पढ़ कर तो बहुत ही आनंद आया :)

    उत्तर देंहटाएं
  15. अरे! हमरा कमेंटवा केहर गईल? हमनी के दिहलस रहलीं सबेरवा...

    उत्तर देंहटाएं
  16. ओहो ! आगे का जल्दी लिखिए भाई... कर क्या रहे हैं आप?

    उत्तर देंहटाएं
  17. रोचक पोस्ट! पिता एवं ससुर के बीच की दुविधा और डॉन का आतंक। सजीव चित्र उपस्थित हो गया।

    उत्तर देंहटाएं
  18. होली में भी तुमने अवसाद भर दिया भैया. चलो ये भी एक रंग है. और हाँ! भैया तुम्हारी झोली में क्या क्या है, कहानी, कविता, लेख,निबंध, रिपोर्ताज और अब ये ट्रैवलौग भी. कुछ छोड़ोगे भी. पिछले दिनो टैवलौग आधारित एक किताब पढ़ी थी, नाइन लाइव्स. तुम्हारा यहाँ टैवलौग बिल्कुल वैसा ही लग रहा है, जिसमें यात्रा के बहाने संस्कृति, इतिहास और समाज सब दिखता है. (समय मिले तो पढ़ना वो किताब).

    उत्तर देंहटाएं
  19. logon ki tippani padakar teri patibha ka gyan hua varna ham to uhi tujhe khush karane ke liye tera blog dekh lete hain.

    उत्तर देंहटाएं
  20. बढ़िया है यात्रा वर्णन। आप तो लिखते ही शानदार हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  21. लीजिये पहली प्रविष्टि पढी , लबालब सीरीज की , मन कह रहा चला जाऊं
    घर की ओर और कुछ ऐसा ही जीने लगूँ .. पर बेरोगारी का टीका लिए कहाँ
    जाऊं ! .. लेकिन फिर भी - '' ये ममताएँ हर दौर में मनुष्य को दुविधा में
    डालती रही हैं। '' सो कल्पना-पंख से उड़ रहा हूँ , पर यथार्थ का मजा कल्पना
    में कहाँ !

    संजय बड़ा कामन किस्म का नाम है .. मुझे भी कई सहपाठी 'संजयों' की याद
    आ गयीं ! दिल्ली में धृतराष्ट्र की तरह अंधा सा बैठा हूँ ! बस इन्हीं कुछ संजय-नेत्रों
    से देख रहा हूँ कुरुक्षेत्र-जीवनक्षेत्र !

    उत्तर देंहटाएं
  22. सतीश पंचम ने कहा…
    क्या गिरिजेश जी, इस मामले में भी मेरे जोडीदार ही निकले आप तो....मैं भी ससुराल हमेशा हाथ झुलाते ही जाता हूँ :)


    :)

    उत्तर देंहटाएं

कृपया विषय से सम्बन्धित टिप्पणी करें और सभ्याचरण बनाये रखें।
साइट प्रचार के उद्देश्य से की गयी या व्यापार सम्बन्धित सामग्री वाली टिप्पणियाँ स्वत: स्पैम में चली जाती हैं, जिनका उद्धार सम्भव नहीं क्यों कि उनसे दूसरी समस्यायें भी जन्म लेती हैं। अग्रिम धन्यवाद।