मंगलवार, 9 मार्च 2010

भाँग, भैया, भाटिन, भाभियाँ, गाजर घास ... तीन जोड़ी लबालब आँखें - 2

पिछले भाग से जारी ...

राजमार्ग से होते हुए हम क़स्बे और फिर खेतों के बीच रेंगती पक्की सड़कों पर दौड़ रहे हैं । हवा से सुर मिलाते सर र र ... आवाजें आ रही हैं । लंठ युवा होलिका दहन की तैयारियों में लगे हैं और मैं अम्माँ के चूल्हे पर चढ़े तवे की आँच का अनुभव कर रहा हूँ। इन रास्तों से  कितनी बार ग़ुजरा हूँ, ऐसा क्या है जो हरदम नया सा लगता है ! अपनी माटी और अपनी माँ शायद हमेशा नए रहते हैं या यूँ कहें इनमें नए पुराने सा कुछ नहीं होता - बस कुछ होता है जो अकथनीय है.. 
गाड़ी घर के गेट के आगे खड़ी है। गेट पिछले सप्ताह पछेलते ट्रैक्टर ट्रॉली की ठोकर से गिर गया था - सँकरा था सो पिताजी ने दो फीट बढ़वा कर दुबारा लगवा दिया है। खम्भे कच्चे हैं इसलिए द्वार बन्द है और बगल में चहारदीवारी तोड़ कर आने जाने के लिए जगह बना दी गई है.. अम्माँ की आवाज आती है, "बगले से चलि आवजा ! अभइन गेटवा कच्चा बा ।" 
.. सँकरा द्वार ध्वस्त हुआ - मुझे प्रसन्नता हुई। पट्टीदार भी प्रसन्न हुए। प्रसन्नता प्रसन्नता में अंतर होता है। आदमी की खुशियाँ मन की जाने कितनी सँकरी गलियों में उलझी हुई हैं, राजमार्ग की तरफ द्वार कब खुलेंगे ? .. अपनी आशंका को सही मान बैठे थे - पिताजी भोजन कर चुके हैं। अब हमलोगों को भोजन कराने हेतु व्यग्र हैं - संजय प्रगल्भ हो चला है, कुछ कुछ बच्चे जैसा। सोचता हूँ जब ये लोग नहीं रहेंगे तो मैं संजय बना किस गिरिजेश के माता पिता में इनकी छवि ढूढ़ूँगा ? मच्छरदानी लगाते सिर झटकता हूँ। इस विचार मसक से क्यूँ डँसवाना? अभी तो बरम-पीपल के साये में बने घर में वृद्ध युगल का स्नेह वितान है। संजय की नाक बज रही है और मैं अपने धीमे खर्राटों को स्वयं सुन रहा हूँ - मुझे नींद आ रही है...
.. प्रातबेला। पीपल पाखी बोल रहा है। हैण्डपम्प को चलाते हुए सुनता हूँ - लगता है जैसे समय ठहर गया है। पीता (बगल के चाचा) बताते हैं इस पंछी का बोलना ग्रीष्म ऋतु के आने का संकेत है। मुझे हँसी आ जाती है - किसे फुरसत है सुनने की पीता? जाने कितने कोलाहलों को शहर अरसे से गाँव में उड़ेलता रहा है - कौन सुनेगा पाखी को ? कैसे सुनेगा पाखी को ? सुबह सुबह उच्छृंखलता - जोर जोर से कहीं सी डी प्लेयर बज रहा है - "आहूँ आहूँ आहूँ ..." यह पंजाबी तड़के वाला मुम्बइया कचरा शहरी मुहल्ले तक में कोई सबेरे नहीं बजाता । .. चैती की धुन गुनगुनाता हूँ - शब्द याद नहीं रहे।..
संजय जिद करता है। अपने से 24 दिन बड़े चचेरे भैया और संजय के साथ खेतवाही करने निकल पड़ता हूँ। इन खेतों से कैसा लगाव - बटाई पर हैं लेकिन पिताजी छोड़ कर कहीं और रह नहीं सकते। मैं जब भी आता हूँ, इन मेड़ों पर घूमते अजीब सा सुकूँ पाता हूँ। हम दोनों शायद दिल से किसान हैं । खेतों की मेड़ों के लिए किसान दिलों में मेंड़ बनाने तक से नहीं चूकता - मेंड़ बनते बिगड़ते रहे लेकिन खेतों का दिल पर राज क़ायम रहा।.. भैया पूछते हैं - गन्ना खाओगे? संजय हँसता है - बंगाल तो नहीं यह धरती, चाय खाबो, पानी खाबो ! यहाँ गन्ना चूसने को गन्ना खाना कहते हैं। सरेह गन्ने से खाली हो चुका है। कहीं कहीं खेत दिख रहे हैं जो शायद बीज के लिए छोड़े गए हैं। दो लड़कियाँ छील रही हैं, भैया उनसे मँगाते हैं। तीन गन्ने - तीन लौंडे। भाभी का फोन आता है और संजय हाल बताता है - गन्ना चूस रहा हूँ। गन्ने का शहरी अर्थशास्त्र - गाजीपुर वासी को उधर से बताया जाता है लखनऊ में तीस रूपए में एक बिकता है। हमारे हाथ नब्बे रूपयों की सम्पदा है - फोकट में। मैं मना करता हूँ - बचपन में खाते हुए मुँह चिरा जाता था, जबड़ा दुखने लगता था। मिठास पाने को उस यातना से दुबारा गुजरने का मेरा कोई मूड नहीं है।
 .. खेत खाली हैं, जाने फिर कब इस सरेह का गन्ना खाने को मिलेगा ! मूड की ऐसी तैसी। मैं माँगता हूँ.. खाना शुरू करता हूँ। शुद्ध प्राकृतिक मिठास - भाटिन के फूलों की गन्ध सी दौड़ जाती है, जीभ से मस्तिष्क तक .. मीठी गन्ध ..भाटिन तुम दिखती क्यों नहीं? .. हम मुड़ते हैं और ..और मोथा, दूब, भाँग के बीच भाटिन की बेसूल साल की पंक्तियाँ दिख जाती हैं, मन आह्लादित हो उठता है। उन बेडौल अनाकर्षक पत्तियों के बीच कलियाँ सीना ताने आसमान की ओर देख रही हैं। फूलने की तैयारी है - इस बार होली जल्दी आ गई है। भाटिन ! तुम्हारे फूल नहीं दिखेंगे।..
 संजय भाँग और भाटिन को देख कर मेरी बच्चों जैसी बकवास से शायद चिढ़ कर पूछता है, अच्छा बताओ, वह क्या है ? मुझे नाम भूल गया है। भैया को भी याद नहीं। विजयी अन्दाज में बताता है - भँगरइया। भाटिन, भाँग, भँगरइया - वनस्पतियों का किसानी परिवार। मजदूरों के भेभन लपेटे अधनंगे गन्धाते बच्चे - भँगरइया जैसे। पिताजी मना करने पर भी गोद में उठा कर उन्हें दुलरा दिया करते थे, अब रोगी हैं, काम के समय खेतिहर सुलभ श्रम उनके बस का नहीं रहा - आह सी उठती है।   ... अनगढ़ कुरूप सी भाटिन खेतों में रोपनी करती औरतों की याद दिलाती है। बज्र दुपहरी में गमछे में रोटी बाँधे मेंड़ पर पनपियाव की तैयारी करती धनिया की याद दिलाती है। कोई क्यारी नहीं, कोई माली नहीं लेकिन बैगनी रंग के केन्द्रक लिए भाटिन के शुभ्र फूल मेड़ों पर फूलते रहे हैं। जब फूलती है तो सरेह गमक उठता है - अनूठी सी सुगन्ध कुछ अधिक ही देहाती सी। मुझे एलर्जी है लेकिन भाटिन के फूलों से कभी नहीं उपटी .. भाँग सरीखा किसान क्यों न अकड़े ! ..
अचानक वह दिखती है जिसकी कत्तई कल्पना नहीं की थी। ... गोहरे को घेरे भाँग से गुथ्थमगुथ्था गाजर घास! यहाँ तक पहुँच गई !! ... पेट, भूख जो न करा दें। भारत की मनुष्य जनित भूख से ही तो निपटना था जो इन्दिरा गान्धी ने मेक्सिकन गेहूँ मँगाया था और साथ में आई थी गाजर घास ... वह घास जो सभी खर पतवारों पर भारी पड़ी। ऐसी वनस्पति जिसमें कोई गुण नहीं - सर्वग्रासी भुक्खड़ रोगदायिनी। क्या कर रहे थे उस समय हमारे वनस्पतिशास्त्री? इन्दिरा तूने एक बार तो उस गेहूँ का परीक्षण करा लिया होता ! ...
 मैं बड़ा खुश रहता था और उस क्षण तक था कि मेरे सरेह में गाजर घास नहीं! गिरिजेश! कब तक बँचेंगे सरेह? यह तो होना ही था ... देखता हूँ गाजर घास अपने बचपन में बहुत सुन्दर दिखती है - गाजर के पत्तों सी, सुन्दरता भाँग की पत्तियों से किसी मामले में कम नहीं। मूर्तिमान छलना, बहुरुपिया सी - लगता ही नहीं कि बिदेसी है लेकिन धीरे धीरे जब सिर उठाती है तो बस सब चट कर जाती है, कभी सात समन्दर पार से आए गोरों की तरह.. सफेद छोटे छोटे फूल दमे के मरीजों के लिए शूल .. वयस्क गाजर घास पौधे ऐसे दिखते हैं जैसे अनावृत्त कंकाल खड़े हों...
शहर भी गाँव में कभी ऐसे ही आया होगा। सुन्दर सा गाजर घास के पत्तों जैसा और धीरे धीरे उजड़ते गए नाद, घोठ्ठे, भुसौले, पीपल के नीचे की बैठकें, गाय, भैंस, बैल सब गायब होते चले गए। आज शहर में दूध गाँव की तुलना में सुगमता से मिल जाता है।  .. गाँव से जवान गायब होने लगे, शहर उन्हें लीलने लगा, लीले जा रहा है...गाजर घास! क्या मैं वाकई भूतकाल को जिए जा रहा हूँ, बेकार ही भावुक रोमान हो रहा हूँ ?.. तुम वाकई बहुत कमीनी हो, भूख की सहोदर.. (जारी)      

19 टिप्‍पणियां:

  1. आप जब मन से लग कर लिखते हैं तो न जाने कितने ऐसे दृश्य साकार हो उठते हैं जिनमें हम अपने को पाते हैं -
    और लेखन भी क्या? संगमरमर के रंगबिरंगे स्याह दानों को लिए हुए बहुरंगी -जिसे जो रुचे निहारता ही जाय बस !

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  2. शहर भी गाँव में कभी ऐसे ही आया होगा---हम तो इस पंक्ति में अटक गये...गजब भाई...जारी रहें.

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  3. आप ने गांव की अनुपम सैर करा दी। जिस से हम कस्बे में पैदा होने वाले लोग कभी कभी ही दो-चार हुए हैं।

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  4. आज बहुत दुखी हूँ.... इस आभासी दुनिया में कभी रिश्ते नहीं बनाने चाहिए... कई रिश्ते दर्द देते हैं.... बहुत दर्द देते हैं... ऐसा दर्द जो नासूर बन जाता है...

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  5. हम तो पढ़ते पढ़ते टेंजेंशियल चले गये। अपनी नानी कें कोंरा में बैठ कमोरी में गरम किया गाढ़ा डूंड़ी भैंस का दूध पीना याद आ गया। बस पचास साल पहले की बात है!

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  6. गिरिजेश सर, कभी हमें भी ले चलिये अपने गांव। मुझे बहुत शौक है ग्राम्य जीवन का और संभावना है कि अगले माह से मैं एक गांव में ही रहने लगूं।

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  7. @ मो सम कौन
    हो गए न रोमानी :)
    बहुत कठिन है डगर पनघट की :)

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  8. इस पर तो कुछो कहने का नहीं बचा... लिखते रहिये. चना-सरसों के खेत की तरफ नहीं गए क्या? डूब के लिखा है आपने, हम भी डूबे जा रहे हैं. जल्दी-जल्दी लिखिए...

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  9. गाजर घास का जिक्र आपकी ओर खीच लाया| भारतीयों ने अब गाजर घास के उपयोग खोजने शुरू कर दिए हैं| गाजर घास के डायबीटीज में प्रयोग के शोध-पत्र भी प्रकाशित हो गए हैं| गाजर घास से दवा बनाए जाने की संभावना पर इस शुक्रवार को मैसूर में मेरा अतिथि व्याख्यान है| जहां से गाजर घास आयी वहां इसका औषधीय उपयोग होता है पर हमारे पारंपरिक चिकित्सक उनसे एक कदम आगे निकल रहे हैं|

    वैसे हम-आप के जमाने में लाये गए गेंहूं के साथ दसों खरपतवार आ गए हैं जो पहले भारत में नहीं थे| पवार साहब की मेहरबानी से| भुवनेश्वर के वैज्ञानिकों ने कुछ के फैलाव पर रपट छापी है| खरपतवारनाशी बनाने वाली कंपनियों की तो निकल पडी है| अब सालों तक हमारे वैज्ञानिक इन्हें मारने के रसायनों की खोज करते रहेंगे और दवा कंपनी वाले चांदी काटते रहेंगे|

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  10. @अवधिया जी,
    अद्यतन करने के लिए धन्यवाद।
    लगता है कि भारत में खाद्यान्न आयात के पहले आयातित अन्न के वैज्ञानिक परीक्षण का कोई तंत्र नहीं है। दु:ख होता है कि गाजर घास से कोई सबक नहीं लिया गया। अब पवार के जमाने में भी वही भूल !

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  11. ससुराल जाने का मन कर आया!
    बस ब्याह कर लूं!
    हा हा हा

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  12. अम्मा , चूल्हा , गन्ने , हैंडपंप ...
    भूला बिसरा पीछे छूटा गाँव याद आ गया ...

    रोचक संस्मरण ...!!

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  13. गांव का ऐसा सजीव चित्रण आपके सिवाय दूसरा कौन कर सकता है । गांव जाकर घूमने में इतना मजा नहीं है जितना कि आपका यह लेख पढ़ने में ।

    कृषी दर्शन होगया अपना तो ।

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  14. आप भाग्यशाली है कि आज भी खेत, खलिहान, गांव से जुड़े हैं। पुरखों के पुण्यकर्मों के सहभागी हैं आप। पुण्यकामी भी होंगे ही। इस थाती को सुरक्षित सहेज रखें।

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  15. यहाँ शहर में आदमी के बोल भी सुनने की फिकिर नहीं है लोगों को और वहाँ
    लोग पक्षियों तक के बोलने को सुन रहे हैं , गुन रहे हैं ! शहर ने तो प्रकृति से
    काटा ही है , कटान प्रकृति से होकर मानव - कटान तक जा रही है !
    इंदिरा पर ऐसे ही बाबा नागार्जुन ने नहीं लिखा था - '' इंदिरा जी , इंदिरा जी क्या
    हुआ है आपको ? ''
    जब से पढ़ा हूँ , इस यूआरएल पर जाकर गाजर घास ही देख रहा हूँ ---
    http://ecoport.org/ep?SearchType=pdb&Subject=parthenium&Author=oudhia&SubjectWild=CO&Thumbnails=Only&AuthorWild=CO

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  16. @बहुत कठिन है डगर पनघट की :)

    लावनी (कटाई) के समय जब गेहूं के भूसे की गर्द लोगों के सर पर बैठ जाती है तो बेटा बोला निकलता है भूत:

    और उस समय रिश्ते का भाई बोला हाँ, बेटा इंसान तो शहरों में रहते हैं, गाँव में तो भूत रहते हैं."

    उन भैया की व्यथा और कटाक्ष समझ गया था.

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