रविवार, 14 मार्च 2010

भाँग, भैया, भाटिन, भाभियाँ, गाजर घास ... तीन जोड़ी लबालब आँखें - 3

... सरेह में दूर दिखते हैं - पोखरे के किनारे । नंगे हैं। वह घनापन गायब है जो कभी सिहरा देता था - पोखरा पर के बाबा अब नहीं रहे । गाजर घास को देखते हुए दीठ ठहर जाती है - कोलतार की सड़क पर दूब की पंक्ति उग आई है लम्बी - दूर तक । दूब - बचपन में कभी सुना था बारह बरस तक चील की पीठ पर रह कर भी अगर धरती पर गिर जाय तो फिर से जी उठती है, पसर जाती है।
.. सड़क में कोलतार की परत का दुबलापन भ्रष्टाचार की मोटाई के समानुपाती होता है। सत्ता के विकेन्द्रीकरण के तहत पूँजी और सामग्री का समतामूलक बँटवारा हुआ।भ्रष्टाचार के जाने कितने केन्द्र बन गए। जो जितना नालायक हो सकता था हुआ। ठीकेदार ने तो पहले ही अपना कट काट लिया था। बचे में से किसी दबंग ने घर के स्लैब के लिए रातो रात गिट्टी उठवा ली तो आम रियाया ने कोलतार की ढोवान की - सूपा, घर के दरवाजे, खाँची, चेचरा ... जिस किसी चीज पर कालिख पुत सकती थी, पुत गई। बच गया तो बस आदमी का मुँह - गाँव में मूँहे करिख्खा लगना मतलब बहुत बेइज्जती होना। इसमें कैसी बेइज्जती -ठीकेदार बैनचो को ही अकले कैसे माल उड़ाने दे सकते थे ?नतीजा यह हुआ कि सड़क पर कोलतार की परत बहुत दुबरा गई...
दूब पसरनी ही थी सो पसरी !  इतनी सी जबरी को बेधने के लिए थेथरई का गुण जरूरी नहीं है। ... हमलोग कांक्रीट की सड़क पर मुड़ जाते हैं। इसकी ढलाई होते मैंने देखा था। कहते हैं कि, मुझे इस तरह नहीं कहना चाहिए आखिर विद्वान सिविल इंजीनियर हूँ, ढंग के कांक्रीट की उम्र 75 साल होती है। यह सड़क दस साल भी चल जाय तो मुझे खुश होना पड़ेगा।
मिडिल स्कूल का विशाल मैदान ताजा भरान की सफाई लिए दिखता है। भैया बताते हैं कि क्रिकेट टूर्नामेंट हुआ था, भूतपूर्व सांसद जी उद्घाटन करने आए थे। धन्य नरेगा, रेगा रेगा .. पग घुँघरू बाँध मीरा नाची थी, नाची थी... सब नाच रहे हैं। मिट्टी की माया, पैसा रुपया हाथ का मैल। मिट्टी, मैल, माया ... भैया घपले का आँकड़ा कूतने लगते हैं और मुझे दिखते हैं - बरम बाबा और काली माई के स्थानों के गड्ढे। थोड़ा भ्रष्ट मिट्टी का छिड़काव वहाँ भी करवा दिया होता हरामखोरों ! ..पुण्य मिलता।
.. योगी, पाप क्या है? चित्रलेखा तुम्हारे प्रश्न यहाँ ?
.. मैदान के आगे किसी कर्मठ युवक की छोटी सी गुमटी है। बन्द है। सामने की बेंच को साइकिल की टूटी चेन द्वारा गुमटी से बाँध कर ताला जड़ दिया गया है। चोरी और होलिका में उठा ले जाने का डर है। फोटो लेते सोचता हूँ अगर पाँच छ: जुट जाँय तो गुमटी और बेंच दोनों होलिका में पहुँच जाँय - फिर भी गुमटी मालिक ने अपने चैन को टूटी चेन के भरोसे रख छोड़ा है। .. 

paakheeखलिहान आ गया है और दिखते हैं दो ऐतिहासिक पाकड़ पेंड़। ऐतिहासिक इसलिए कि यह वही खलिहान है जहाँ कभी हजार की बारात रुकी थी। सम्भवत: ये पेंड़ तब जवान रहे होंगे या नए नए लगाए होंगे  लेकिन रहे होंगे जरूर । खलिहान उदास सा लगता है। शायद खिली धूप और पृष्ठभूमि के बागीचों का उजड़ जाना इसके कारण हों। एक पेंड़ की नई फुनगियों ने उसे अलग ही रंगत दे दी है जब कि दूसरा अभी पतझड़ को ही सहेजे हुए है। ऐसा क्यों? क्या दूसरा मर रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि एक ने दूसरे को लुभाने के लिए सुनहरी चादर ओढ़ ली है ! चित्र लेता हूँ और पाता हूँ कि कॉंक्रीट की सड़क ने भूदृश्य के पुराने रहस्य और सम्मोहन को खत्म कर दिया है। बाउ तुम्हारे प्रेत, ब्रह्मराक्षस, आधी रात में पोखरे पर नाचती लपटें ... सब जाने कभी के गायब हो चुके हैं, मैं क्यों उस भूत के सम्मोहन को ढूढ़ता सा रहता हूँ जिसे बस सुना भर देखा कभी नहीं ?    
.. वापस घर। बड़े साढ़ू ने गाड़ी भेजी है। दोनों साले, सलहजें वही हैं, नई बनी मकान में होली की जुटान है। साढ़ू भैया डाक्टर हैं और पडरौना में रहते हुए भी लन्दन के सपने देखते हैं और सर्जते भी हैं। बच्चे देहरादून और ग्वालियर में पढ़ते हैं । मकान ऐसी आधुनिक बनी है कि पडरौना में वैसी मकान आज नहीं है। संजय के साथ चल देता हूँ। वह मगन है - 'उसका' पता मिलेगा, मुमताज मिलेगा, आचार्य जी मिलेंगे, थाने पर घूमेंगे, जाने क्या क्या ...   
पडरौना में बने उस आधुनिक घर में प्रवेश करते मुझे वह दिन याद आता है जब सामने की जमीन पर हॉस्पिटल की स्लैब पड़ी थी। सपनों के साथ चलते पैरों में दम हो तो देर भले हो जाय उन्हें हक़ीकत बनना ही होता है। ड्रॉइंग हाल का इंटीरियर मिनिमलिस्ट सुरुचि से साक्षात्कार कराता है। मेरी दृष्टि पॉलिश किए गए संगमरमरी फर्श पर अटक जाती है। बहुत दिनों बाद अच्छी पॉलिश देखी है - टू द बेस्ट स्पेसिफिकेशन। इंजीनियर मन प्रसन्न होता है। एक जगह लाल धब्बा सा दिखता है। पूछने पर पता चलता है कि पूजा के दिन की रोली है। मैं सलाह दे डालता हूँ - इस पत्थर में सोखने का गुण होता है। धब्बे वर्षों तक नहीं जाते। गृही और गृहिणी के चेहरों के भाव से सांत्वना मिलती है - गीले रंग तो यहाँ अब नहीं पड़ने वाले। किसी लोकल संवाददाता का फोन आता है और डाक्टर साहब गीले और रासायनिक रंगों के हजार दोष गिना जाते हैं। नए घर के प्रेम से उत्पन्न उत्साह ने उनके स्वर में और शक्ति भर दिया है।..
छोटे साले की शादी के अलबम देखते देखते बात भ्रुण हत्या पर आ जाती है। डाक्टर साहब बताते हैं कि अनधिकृत रिपोर्टों के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश में लिंग अनुपात 750 से 800 के बीच रह गया है। भ्रुण हत्या के गुप्त कारोबार पर प्रकाश डालते हैं और भी बहुत कुछ पता चलता है जिसे लिख नहीं सकता। ...
तीन बहनें - एक का 'पुरुषार्थ' सामने है, जी हाँ यह घर, वह हॉस्पिटल सब के निर्माण के पीछे मेरी सढ़ुवाइन का उतना ही श्रम लगा है जितना साढ़ू का। इंटीरियर के लिए इनकी लखनऊ यात्राओं का मैं साक्षी रहा हूँ। हॉस्पिटल से लेकर घर और बच्चों की शिक्षा सबका प्रबन्धन इनके हाथ में है। कभी डाक्टर भैया को मैंने सलाह दी थी कि एक प्रबन्धक रख लीजिए। सढ़ुवाइन की सामर्थ्य को नहीं जानता था। दूसरी बहन मेरे जैसे महाआलसी और टालू व्यक्ति के साथ रहते हुए घर को सँभाले है - चलता फिरता स्तम्भ। तीसरी के अर्थ-प्रबन्धन का लोहा सभी मानते हैं।.. नारी इतनी अवांछित क्यों है? लोग इतने अन्धे क्यों हैं? ..क्या केवल दहेज के कारण? या जाति व्यवस्था के कारण या उस मानसिकता के कारण जो नारी को 'इज्जत' मानती है, दूसरी जाति में बेटी नहीं देनी और न लेनी। उलझ कर रह जाता हूँ। यह उलझाव नारी ही तोड़ेगी।..
डाक्टर भैया बताते हैं कि भ्रुण हत्या का सारा खेल झोला छाप या सन्दिग्ध डिग्री धारक डाक्टरों के रैकेट का है।  भ्रुण हत्या के विरोध में पडरौना में डाक्टरों ने मिल कर जुलूस निकलवाया था। अब उन लोगों को सम्मानित करने की तैयारी है जिन्हों ने स्वेच्छा से एक या दो बेटियों के बाद ही परिवार नियोजन अपना लिया था। ऐसे लोग मिलेंगे? ..
.. प्रकृति का बदला शुरू हो चुका है। एक आँधी सी आ रही है जिसे कोई रोक नहीं सकता। नारी पूरी शक्ति से और कभी कभी प्रतिक्रियावादी हो कर भी इस सड़े गले सामाजिक संगठन को चिन्दी चिन्दी कर उड़ा देने को तैयार है, लगी भी हुई है। मुझे लगता है कि हमारे जीवन काल में ही क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाएगा जब लड़की के पंख लगेंगे, उड़ेगी चिड़िया चहचह नील आकाश के नीचे बिना किसी की परवाह किए ...
.. छोटी सलहज अभी नवेली है। एच आर इक्जेक्यूटिव है । एक संकोच रोक सा है। शायद मैं कुछ अधिक ही एक्स्ट्रापोलेट कर रहा हूँ। बड़ी सलहज बहुत सहज है। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनकी उमंगें इतनी निर्दोष और स्वाभाविक होती हैं कि संक्रामक हो जाती हैं।..
  गीले रंगों से तो मुक्ति थी लेकिन अबीर गुलाल तो लगने ही थे। जम कर धमाल होता है- कई दफा किश्तों में। संजय भी रंग जाता है।
SS
ड्राइवर को होली की पूर्व सन्ध्या पर ही घर चले जाना है इसलिए हमलोग बिना विलम्ब किए रामकोला की ओर चल पड़ते हैं। संजय तो बस इतना प्रगल्भ कि पूछिए मत! बचपन और कैशोर्य कितने लपेटू होते है ! वर्षों बाद भी लिपटे रहते हैं । (जारी)

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर! साली या बड़सास के लिए सढ़ुआइन शब्द अच्छा खोज निकाला है। इस पैरा का व्यंग्य बहुत दमदार है-
    ठीकेदार ने तो पहले ही अपना कट काट लिया था। बचे में से किसी दबंग ने घर के स्लैब के लिए रातो रात गिट्टी उठवा ली तो आम रियाया ने कोलतार की ढोवान की - सूपा, घर के दरवाजे, खाँची, चेचरा ... जिस किसी चीज पर कालिख पुत सकती थी, पुत गई। बच गया तो बस आदमी का मुँह - गाँव में मूँहे करिख्खा लगना मतलब बहुत बेइज्जती होना। इसमें कैसी बेइज्जती -ठीकेदार बैनचो को ही अकले कैसे माल उड़ाने दे सकते थे ?नतीजा यह हुआ कि सड़क पर कोलतार की परत बहुत दुबरा गई.

    उस पर ये तो पलीता ही है....
    भैया घपले का आँकड़ा कूतने लगते हैं और मुझे दिखते हैं - बरम बाबा और काली माई के स्थानों के गड्ढे। थोड़ा भ्रष्ट मिट्टी का छिड़काव वहाँ भी करवा दिया होता हरामखोरों ! ..पुण्य मिलता।

    उत्तर देंहटाएं
  2. मुमताज मिलेगा,?मिलेगी न ?
    सब रस से सराबोर सुन्दर चेहरे सुन्दर लोग सुन्दर विमर्श !कौन कहता है ब्लॉगजगत में साहित्य का तोता है !
    रामकोला की होली बार बार हो और अपने नख क्षत स्मृति चिह्न छोड़ जाय !

    उत्तर देंहटाएं
  3. @ मुमताज
    मुझे भी अजीब लगता है। यह एक पुरुष का नाम है जिसने संजय को बुलेट चलाना सिखाया। उसका जिक्र आगे आएगा। सोचा न था कि यह शृंखला इतनी लम्बी हो जाएगी।

    उत्तर देंहटाएं
  4. .
    .
    .
    आदरणीय गिरिजेश जी,

    क्या खूब लिखते हैं आप...

    ... सड़क में कोलतार की परत का दुबलापन भ्रष्टाचार की मोटाई के समानुपाती होता है।... और शायद हम लोगों की खाल की मोटाई के भी, गैंडे जैसी हो गई है जो...

    ...प्रकृति का बदला शुरू हो चुका है। एक आँधी सी आ रही है जिसे कोई रोक नहीं सकता। नारी पूरी शक्ति और कभी कभी प्रतिक्रियावादी हो कर भी इस सड़े गले सामाजिक संगठन को चिन्दी चिन्दी कर उड़ा देने को तैयार है, लगी भी हुई है। मुझे लगता है कि हमारे जीवन काल में ही क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाएगा जब लड़की के पंख लगेंगे, उड़ेगी चिड़िया चहचह नील आकाश के नीचे बिना किसी की परवाह किए ...
    यह तो होकर रहेगा और हमारे जीवन काल में ही, मुझे बहुत खुशी है इस बात की, अपनी बिटिया के लिये और अपने लिये भी...

    आभार, लिखते रहिये...बाँचना जारी है...

    उत्तर देंहटाएं
  5. kamaal hai, teesri kist aa gayee aur mujhe khabar tak na huee. Aaj dusri aur teesri donon kisten ek saath padh kar to laga ki ek baar apne gaon ho hee aaoon.

    har cheez bakayda narrate ki gayee hai. bahut apnapan sa lag raha hai.

    उत्तर देंहटाएं
  6. बस सब जैसे का तैसा देखा-सुना है... पढ़ कर फील होता है. आँखों के सामने फ्रेम दर फ्रेम. इतना डूब कर ब्लॉग जगत में कहीं किसी की पोस्ट नहीं पढता. इमानदारी से कह रहा हूँ ! और इस श्रृंखला को तो लम्बी मत कहिये... चलने दीजिये.

    उत्तर देंहटाएं
  7. प्रणाम

    का कमाल का लिखे हैं ........
    बिहार की भाषा में कहूँ ----
    "गर्दा उडा दिए हैं.....सब हिला के रख दिए हैं "


    अगली प्रस्तुती की प्रतीक्षा है

    उत्तर देंहटाएं
  8. वर्ड्प्रेस पर टिप्पणी:

    वाह! जबरदस्त लेखन….
    बस इतना ही कहूँगा …………. “सुपर्ब”

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपने भ्रूण हत्या के बारे में अच्छा लिखा. मेरे एक ही बेटी है जो विवाह योग्य है और उसकी शादी में ये प्रश्न बार बार उठ रहा है कि भाई नहीं है.

    उत्तर देंहटाएं
  10. वाह ! कहाँ ठहरा दिया एकाएक ! एक करुना का भाव क्यों है
    सभी प्रविष्टियों में , शायद 'नरक के रास्ते ' में कुछ 'डिकोड' हो
    सके ! करुना सर्जना के उपयोगी पक्ष की परिचायिका है ! साधिका भी !

    आपकी हर होली ऐसे ही रंग-रंगी-पगी बीते ! हरियर इस्माइल तौ
    जबरदस्त लागति अहै !
    अब चल रहा हूँ , कुछ देर के लिए आवारा गर्दी करने जा रहा हूँ , रोड पर !
    फिर आउंगा , एक कहानी को पढने जैसा अनुभव हो रहा है !

    उत्तर देंहटाएं

कृपया विषय से सम्बन्धित टिप्पणी करें और सभ्याचरण बनाये रखें।
साइट प्रचार के उद्देश्य से की गयी या व्यापार सम्बन्धित सामग्री वाली टिप्पणियाँ स्वत: स्पैम में चली जाती हैं, जिनका उद्धार सम्भव नहीं क्यों कि उनसे दूसरी समस्यायें भी जन्म लेती हैं। अग्रिम धन्यवाद।