सोमवार, 22 मार्च 2010

भाँग, भैया, भाटिन, भाभियाँ, गाजर घास ... तीन जोड़ी लबालब आँखें - 4

पहला भाग
दूसरा भाग
तीसरा भाग
लौटते हुए सोचता हूँ - सढ़ुआन का यह रिश्ता अभी एक पीढ़ी पहले तक गौण सा रिश्ता माना जाता था। बहनापा बना रहता था लेकिन साढ़ुओं में कहीं भाइचारे का ईर्ष्यालु पक्ष ही प्रबल रहता था। बढ़ते शहरीकरण ने परिवारों को केन्द्रिक बनाया है तो साथ ही परिवार में नारी का रसूख भी बढ़ा है। परिणाम यह हुआ है कि बहनापे ने अपने आगोश को बढ़ा कर साढ़ुओं में भाइचारा भी बढ़ा दिया है। आज यह रिश्ता विशिष्ट है, अलग ही महत्त्व रखता है।..
.. सूरज ढल रहा है और पडरौना में उत्सव पूर्व का सन्नाटा पसरता दिखाई देता है। उत्सव पर्व के दिन के उल्लास और चहल पहल इस सन्नाटे के ही कारण तो हो पाते हैं। बाद का सन्नाटा जीवन का सामान्य होता है लेकिन पर्व के बाद का दिन कितना उदास लगता है !..
हमलोग धर्मसमधा देवी दुर्गा के प्राचीन स्थान से गुजर रहे हैं। मिथक याद आता है - शापित राजा, विवाह के पश्चात बाघ द्वारा मृत्यु की भविष्यवाणी, चारो तरफ पोखरे से घिरे कोहबर कक्ष का निर्माण, हजामिन का उबटन की झिल्ली से बाघ बना कर राजा को डराने का हास्य उद्योग और उसका सचमुच बाघ हो जाना, राजा की मृत्यु और नवविवाहिता का सती हो जाना ... सती पूजन स्थल। कितना सच होता है इन कथाओं में? मनुष्य की आस्था जाने क्या क्या सिरजा देती है। देवी को मन ही मन प्रणाम करता हूँ - या देवी सर्वभूतेषु .. मेरा अस्तित्व तुम्हारे आशीर्वाद से भी जुड़ा हुआ है।
.. दुखिया को लेकर टाउन आता मास्टर। गर्भस्थ शिशु बैलगाड़ी के हिचकोलों से आड़ा हो गया। असहनीय पीड़ा। कोई उपाय न देख मास्टर ने स्वयं उदर पर हाथ फेरा था - मन में प्रार्थना के स्वर गूँज उठे थे। देवी धर्मसमधे ! क्या इस बार भी ? ..देवी ने प्रार्थना सुन ली। शिशु एक झटके से सीधा हो गया था ...
संजय को भी इस स्थान का महात्म्य पता है। रुकने को कहता है.. मैं किसी और दुनिया में हूँ। कुछ बहुत पवित्र सा भीतर घट रहा है, सम्भवत: जन्म के बाद शिशु का क्रन्दन। रुकना विघ्न होगा। मेरा मौन गाड़ी के शोर के साथ जारी रहता है। हम नहीं रुकते हैं ...
.. 'उसका' चचेरा भाई। संजय पता लगा लेता है। उसकी ससुराल गोपालगंज, बिहार में है। संजय हँसता है। पता भी चला तो ..मैं कहता हूँ, अबे! विवाहिता है। न तुम किशोर रहे और न ही वह किशोरी .. एक अनकही और अनघटी प्रेमकथा का अवसान..
संजय के बहाव के साथ अपने को छोड़ देता हूँ। बौराया सा वह घूमता है - थाने के भीतर, यहाँ हम लोग डेढ़ महीने रहे, यहाँ पिटाई होती थी, यहाँ जन्माष्टमी की सजावट होती थी...
मुमताज कहाँ है ? कहाँ मिलेगा? रामकोला की जानी पहचानी इस बुलेट सवार 'हस्ती' को मैंने भी बहुत दिनों से नहीं देखा। ग़जब का पियक्कड़ और एक बार मरण सेज तक पहुँच गया था। उम्रदराज हो ही गया था, मर वर गया होगा। मैं घोषित कर देता हूँ, लेकिन वाह रे संजय ! ऐसे कैसे मान ले ? उसे चौराहे पर तहकीकात करता छोड़ देता हूँ। कुछ मिनटों में ही वह ढीली परिचय कड़ियाँ इधर उधर उछाल देता है। जीवित होगा तो अवश्य बँधा आएगा। धन्य मोबाइल ! ...
संजय वहाँ भी जाता है जहाँ वे लोग रामकोला प्रवास के दौरान रहे थे। विशाल लौह गेट वैसे ही है लेकिन घर दरक रहा है। पुराने लोग चले गए। बँटवारे ने गेट के बगल में एक और पतला द्वार क्या खोला, घर की रौनक ही चली गई। सब कुछ छीज रहा है। घर उजड़ते हैं तो दूसरे बसते हैं। इस घर का बेटा एक प्रशासनिक अधिकारी है। कहीं घर ले लिया होगा, पुस्तैनी घर के द्वार तो बस स्मृतियों के प्रेत घूमते हैं और रखे हुए सामान ढूढने आते हैं.. सामान भी कैसे कैसे.. संजय को बताया जाता है अरे! तोहार बाबूजी हमरे बाबूजी के बहुत गरियावें, जीजा साला के रिश्ता मानत रहें.. संजय अपने मृत माता पिता की स्मृतियों को सहज ही जिए जा रहा है। वक्त ! जाने क्या क्या बताता जाता है..रामकोला में बस एक साल, वह भी बचपन में रहा शख्स.. इस समय सामने बैठे अधेड़ का चरम आत्मीय है और मैं, रामकोला का भी स्थायी निवासी, बस एक साक्षी ...मेरे गले में कुछ फंस रहा है, आँख भर रही है, आँसू रुकते हैं संजय की अब तक की बेचैनी को समझ रहे हैं ..
अपने पारिवारिक मित्र डाक्टर साहब से मिलता हूँ। आत्मीयता के दौर में ढेर सारी बनती मिठाइयाँ उदरस्थ कर लेता हूँ। समय कम है फिर भी हम आचार्य जी से मिलने पहुँच जाते हैं। आचार्य जी इतने वर्षों के बाद भी वैसे ही दिखते हैं। बस केश श्वेत हो गए हैं। दुनियादार राजनैतिक मनुष्य हैं। एक और सज्जन साथ बैठे हैं। तमाम सत्कारों और आत्मीयता प्रदर्शन के बावजूद मुझे उस ऊष्मा का अनुभव नहीं होता जो डाक्टर साहब के यहाँ हुआ था.. यह कैसा संप्रेषण है जो अनकही को भी समझा देता है ? छठी इन्द्रिय के तार कैसे कहाँ कहाँ ?..
सामने वैद्य जी की विशाल मकान है और लगे हुए वे क्वार्टर हैं जिनमें से एक में मेरा जन्म हुआ था। वैद्य जी का घर सूना है। वैद्य जी की अधेड़ संतानें एक एक कर असाध्य बीमारियों से मर चुकी हैं। संजय का हाथ पकड़े उधर को चल देता हूँ। पहुँच कर मुड़ते ही ठिठक जाता हूँ - सामने क़्वार्टरों की पंक्ति खंडहर हो चुकी है !
janmsthan भारी कदमों से उस जगह पहुँचता हूँ जहाँ हमलोग रहे थे ... खंडहर ! एक तरफ के खंडहर क़्वार्टर में कुछ मज़दूर रह रहे हैं। बाकी के करीब ..गिनने की कोशिश करता हूँ .. नहीं हो पाती, सब खंडहर हो चुके हैं। किससे पूछूँ ? क्या पूछूँ संजय क्या ? दुमंजिली छत से दो लड़कियाँ झाँक रही हैं, उनसे पूछूँ ? क्या ? ...
.. बगल के क़्वार्टर में हँसमुख कामदार सुपरवाइजर रहते थे। बीच की अधूरी दीवार पर एक बल्ब लटकता था। प्रकाश के साथ उन भले लोगों की आपसी चुहुल भी घर में आती थी । दोनों घरों के लिए एक बल्ब काफी था । क्या दिन थे ! ..
ओसारे की चौकी पर जाने कितने शिष्यों को अनवरत चलती मुफ्त अंग्रेजी शिक्षा से लाभ हुआ था । कितने ही बच्चों का जन्म इस क़्वार्टर में हुआ। जटिल से जटिल मरीज ठीक हो कर गए । दक्षिणमुखी गरीब क़्वार्टर में रहता मास्टर कौन सी विद्या जानता था – लोग लाद कर लाए गए, अपने पैरों चल कर गए। कोई नहीं मरा – मास्टरनी के अक्षय पात्र में अमृत था शायद ।..
याद आता है बिना जात पात की परवाह किए अम्मा का पढ़ने आते शिष्यों के सिर पर कड़ुवे तेल की चम्पू मालिश और उनकी माताओं के लिए ढेर सारी नसीहतें । क्या वे घर जा कर बताते होंगे ? आश्चर्य नहीं कि आज भी मास्टर को सड़क पर रोक कोई अपरिचित चरण स्पर्श करता है, अपना परिचय देता है, तृप्त हो चला जाता है और मास्टर को कुछ याद नहीं आता !..
समय ठहर गया है। नहीं, अपनी चाल भूल गया है । जाने कितनी घटनाएँ, कितनी बातें सारी सीमाएँ सारे बन्धन तोड़ कर इकठ्ठे हो आए हैं – तवे पर उल्टा रेंगता करैत साँप, सामने के खेतों में रहता अजगर, वह गूलर का पेंड़ जिसके दूध से आँव का इलाज होता था, गुप्ता जी के सामने का अमरूद पेंड़, एक बार चढ़ कर हमलोगों ने गाँव से आए चाचा को नाम ले बुलाया था – राम जी, राम जी । बाद में बहुत पिटाई हुई थी। ... नए घर में जाने से पहले जर्जर दीवार से पैर मार कर प्लास्टर गिराता मैं और पिताजी का झापड़ ! इस घर में मैंने अपने स्वर्णिम वर्ष बिताए, यहाँ तुम्हारा जन्म हुआ और तुम.. ?
.. आँसू अब छ्लक आए हैं । संजय ! इस जगह को खरीद लूँ ? किससे खरीदूँ – इस विवादित टुकड़े को ! ...
सहन में सफाई हुई दिखती है । एक अनार किसी ने कभी रोप दिया होगा । उस पर फूल आए हैं । हमारे स्वागत में ? संजय! किसी को पता था क्या कि हम लोग आ रहे हैं ? सारे प्रश्न घुट कर रह जाते हैं..
.. पीड़ा को दबा कर हास्य का पुट दे कहता हूँ हिन्दी से जुड़े महापुरुषों के जन्मस्थान खंडहर होने को अभिशप्त हैं । हिन्दी के एक महान ब्लॉगर की जन्मधरा भिन्न कैसे हो सकती है? आज से पचासएक वर्षों के बाद लोग आएँगे – हिन्दी के महान ब्लॉगर का जन्म स्थान देखने और यह अनार का पेंड़ उनका स्वागत करेगा। अनार कितने वर्ष जी सकता है ?..
शायद कुछ नहीं मिलेगा जिसे पहचाना भी जा सके। शायद कोई नहीं आएगा । शायद वह ब्लॉगर इतना महान भी नहीं होगा ... (जारी)

10 टिप्‍पणियां:

  1. अनार कितने वर्ष जी सकता है ?..
    शायद कुछ नहीं मिलेगा जिसे पहचाना भी जा सके। शायद कोई नहीं आएगा । शायद वह ब्लॉगर इतना महान भी नहीं होगा ...
    शब्दों और भावों से खेलना तो आपसे सीख रहा हूँ....धन्यवाद.

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  2. बँटवारे ने गेट के बगल में एक और पतला द्वार क्या खोला, घर की रौनक ही चली गई।
    पुस्तैनी घर के द्वार तो बस स्मृतियों के प्रेत घूमते है।

    बस यही हो रहा है हर जगह्।
    कभी मैं भी हमारी पुरानी हवेली को
    देखकर यही सोचता हुं।
    एक बंटवारे के साथ सब कुछ बंट गया।

    बहुत अच्छी पोस्ट-आभार

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  3. मैं अभिभूत हुआ ,अनिर्वचनीय अनुभूति से परिपूरित मगर दक्षिण को जा रहा हूँ वत्स, लौट कर टिप्पणी करूंगा!तब तक पांचवीं लिख डालना !

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  4. खंडहर हो गया है हमारा भी घर गांव में। एक जमाना था उसमें डेढ़ दो सौ की रसोई साथ बनती थी।
    कैसे जिया जाये उस स्मृति के साथ!

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  5. पोस्ट पढ कर न सिर्फ समझ सकता हूँ बल्कि बखूबी महसूस भी कर सकता हूँ कि गंवई मन में उस वक्त क्या क्या चल रहा होगा....कभी कभी मैं भी पुन्ने घर जाते ही इस दौर से गुजरता हूँ ......पर ज्यादा देर ऐसी जगहों पर नहीं रूकता....कोर भीगने लगते हैं।

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  6. पोस्ट पढ़ते हुए कितनी बातें दिमाग में चलीं... कितनी बातें भावुक कर गयी. ऐसी पोस्ट्स पर टिपण्णी करना बस हाजिरी है ताकि अगली पोस्ट जल्दी आये.

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  7. अतीत के खंडहरों में शायद हम सब अपने व्यक्तित्व के बिखरे अंशों को ढूंढ रहे हैं. यह भावनात्मक श्रंखला पढ़कर बरेली के कवि ग्रिंद लाल जी की कविता की लाइन याद आ गयी -
    ये राख है इस राख में मिल जाएगा बन्दे!

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  8. नहीं रोक पा रहा हूँ अपने को , अंतिम की जिस पंक्ति पर स्तब्ध रह गया
    उस पर इस पोस्ट की पहली ही टीप का यह वाक्य - '' शब्दों और भावों से खेलना तो
    आपसे सीख रहा हूँ '' - बड़ा अटपटा लगा .. कोई बुरा हो या नहीं पर मेरी ग्रहण
    शक्ति इतनी बुरी भी नहीं है ! .. बाऊ , मैं इसे 'खेल' नहीं कहूंगा ..

    हाँ संवेदना यहाँ दिखी - '' कैसे जिया जाये उस स्मृति के साथ! ''

    अब अगली पर बढ़ता हूँ !

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