रविवार, 18 अप्रैल 2010

भाँग, भैया, भाटिन, भाभियाँ, गाजर घास ... तीन जोड़ी लबालब आँखें - 5

पहला भाग
दूसरा भाग
तीसरा भाग 

चौथा भाग  
... मन में कचोट और वाणी पर उसे दबाती प्रगल्भता। भारी कदमों से मैं अपने जन्मस्थान से वापस होता हूँ। जाने फिर कब आना हो? जाने क्या रूप देखने को मिले? यह स्थान तो चिर जीवित रहेगा... या बस मेरी साँसों के जीवित रहने तक? ... इसका पुराना रूप बचपन सा खिलखिलाता रहेगा - जब तक मैं हूँ। 
... विदा खंडहर! तुम्हारे आँगन फूलता अनार छोड़ जा रहा हूँ...जो अज्ञात आने वाला है, उसे मेरी कथा सुनाना।...   
...संजय ! मुमताज मर खप गया होगा ... हाँ, यार बड़ी उम्मीद ले कर आया था ... मन नहीं मानता.. संजय, चरम आशावादी है। आशा जीवन का लक्षण है, डाक्टर साहब की कार में बैठते प्रस्थान करते छठी इन्द्रिय कुछ अस्पष्ट सा संकेत करती है - जीवित है। ...ऐसे क्षणों में जैसा होता है, चुप अगोरने लगता हूँ ....
.. बस चन्नरपुर तक ही पहुँचे हैं कि संजय का मोबाइल बजता है... हलो sss... अरे! कहाँ हो? .... आ जाओ आ जाओ... हम बस कुछ ही दूर आए हैं.... 
संजय के स्वर का उल्लास बता देता है - मुमताज का फोन है। इशारा करता हूँ - कार रुक जाती है। प्रतीक्षा, प्रतीक्षा... और दिखता है रामकोला का 'पथप्रेत' मुमताज़...संजय बाहर आ जाता है... मिलन के इन क्षणों की सान्द्रता को अपनी उपस्थिति से तनु नहीं करना चाहता, रियर वियू मिरर से देखता हूँ, बाहर नहीं आता...क्या संजय की आँखों के कोर भीगे होंगे ?...हाल चाल, शिकवे शिकायतें..जाने किन किन लोगों के ज़िन्दगीनामे सड़क किनारे खुल गए हैं ...क्षणिक बवंडर ने उन्हें ला पटका है...बवंडर में कहीं मैं भी हूँ, संजय मेरा परिचय कराता है..मैं अभिवादन का उत्तर देता हूँ लेकिन बाहर नहीं आता...कनखी से देखता हूँ.. मुमताज चिर युवा है..इकहरी काया , समय ने सिर और चेहरे पर सलवटों की जुताई कर चन्द चाँदी के तिनके रोपे हैं..बाकी साँवलापन वैसे ही है..मुमताज अनुरोध करता है.. रामकोला की हाट में बिकता मशहूर छोटी चिड़ियों का मांस... दावत पर बुलाता है..शाम घिर रही है..संजय इनकार करता है..उसकी घरवाली से फिर मिलने की बात करता है... ... दोनों बुलेट के बारे में ऐसे बात करते हैं जैसे किसी रिश्तेदार की बात कर रहे हों । 
दारू की बहक... अरे संजय बाबू, के बुलेट वाला बा पचास कोस में जे कहि दे कि मुमताज के बिना रहि लेई.. सच है रामकोला के गब्बर ! ... तुम कभी नहीं मरोगे..जब तक टंकियाँ फुल हैं, पेट की टंकी दारू से और बुलेट की टंकी पेट्रोल से ..तुम यूँ ही भागते रहोगे, पथप्रेत ! ...
 बुलेट को दगा दे मुमताज हीरो होंडा से आया है..बहकता हुआ तफशील देता है तो पता चलता है कि लखनऊ में ही किसी अधिकारी मंत्री वगैरह के यहाँ लगा हुआ है... सो टंकियाँ हमेशा फुल रहती हैं... दगाबाज! तुम भी भ्रष्टाचार के शिकार हो गए! बुलेट छोड़ दिए !! ..घाव सूख जाते हैं पर रिश्ते रिसते रह जाते हैं .. संजय उसे 100 का नोट देता है..घर मिठाई ले जाने के लिए ..सख्त चेतावनी! दारू न पी जाना।.. पी जाएगा संजय, मंत्री का संतरी होते ही आदमी बदल जाता है...वैसे भी दारूबाज का क्या भरोसा?... मुझे अपार खुशी है कि यह महामिलन घटित हुआ... मुमताज वापस जा रहा है और कार में हमलोगों की हँसी के बीच कहीं रुकी हुई है - दारू की गन्ध।
...एसी बन्द कर मैं खिड़की खोलता हूँ..निरुद्देश्य रियर वियू से देखता हूँ ... मुमताज चला गया... पचास कोस इलाके में जब किसी की बुलेट खराब होती है तो ...... 
... आज होलिका दहन है और गाँव से होलिका गायब है.. समय में पीछे जाता हूँ ...कढ़ुवार में, जहाँ से मिट्टी निकाल कर कभी भितऊ घर बनाए गए थे, घोरठ गाँव की होलिका सजती थी। आसपास के सारे टोलों से ऊँची। कितनी मंत्रणाएँ... उनका मचान उठाना है... फलनिया बहुत गोहरा (उपला) पाथले बा..एगो मँगलीं त नाहीं देहलसि..अरे! सगरी सम्हति मैया में झोंकाई...
... चकबन्दी आई और कुछ लोगों ने घोषित कर दिया कि ग्राम समाज का वह गढ्ढा अब उनका था। मछली पालन होगा, कोई होलिका अब वहाँ नहीं सजेगी। गाँव का मौन आक्रोश ! उस साल किसी ने होलिका सजाने के उपक्रम नहीं किए। लोकापवाद के भय से अंतिम दिन तिराहे पर आनन फानन में होलिका सजवा कर उन लोगों ने जलवाई थी। ... याद है, सड़क किनारे खड़े हो दक्षिण की तरफ मुँह कर किसी ने शाप दिया था... बोरिंग, जाल, रखवाली..लाख जतन हुए लेकिन कढ़ुवार में मछली पालन नहीं हो पाया तो नहीं हो पाया। शाप फलित हुआ, पिताजी कहते हैं, इस जमाने में वरदान नहीं लेकिन शाप फलित होते हैं, अनेको उदाहरण हैं। ... मेरे देखते देखते समय कितना बदल गया! अब शाप भी नहीं फलते। ...शाप को घटित कहूँ या फलित? ...
... जगह उचट गई थी, अब दुबारा वहाँ ? शान के खिलाफ...होलिका स्थान बदलती रही लेकिन गालियों के मन्त्र पाठ, युवकों के ईंधन अभिचार ऐसे खत्म हुए कि दुबारा शुरू नहीं हुए..... 
आज भी यही स्थिति है। एक भैया से पूछता हूँ तो रहस्य उद्घाटित होता है - कागज में अभी भी कढ़ुवार ग्राम सभा की सम्पत्ति है, सबकी सम्पत्ति। तब क्यों....? मेरी आँखों के प्रश्न उनकी उदास मुस्कान में उत्तर ढूँढ़ लेते हैं। संजय उबटन के बारे में, गाँव की होलिका के बारे में पूछता है। क्या बताऊँ? .... आत्माएँ मैली हो गई हैं रे ! शरीर की मैल छुड़ा कर होली में क्या जलाना ? ...
इस दिन अम्माँ खीझती रहती हैं - मलेछवा कुल सम्हतियो नाहीं गड़ले ..दुसरे गाँव झिल्ली जाई? .. गृहिणी का आक्रोश.. कोई उबटन नहीं... मैल जलने दूसरे गाँव थोड़े जाएगी?...
अम्माँ! तुम ठीक कहती हो, अपनी मैल अपने गाँव ही जलानी होती है।  लेकिन आग कौन लगाए?कुछ लोग तो दूसरे गाँव ही फेंक आए हैं, परम्परा को जिलाए जो रखना है .. 
..रात के 10:30। उसी भैया का फोन आता है। होलिका दहन का निमंत्रण। कहाँ? बताते हैं कि हमलोगों के बागीचे से सटे। अपराधबोध ने इस साल भी परम्परा कायम रखी है।..
संजय के साथ पहुँचता हूँ.. दस बारह लोग .. मन रो देता है। वह उल्लास कहाँ गया? पूरा पुरुष समाज इकठ्ठा रहता था। पटनिया एम बी बी एस डाक्टर चाचा जब कबीरे जोगीरे गाते थे तो लगता था कि कान उड़ जाँएगे... 'सभ्य' टाइप के लोग शर्माते थे। .. लगता है क्या कि यह डाक्टर है? ... समय की मार। डाक्टर चाचा आज भी खड़े तीन चार युवकों को उकसा रहे हैं - गाव कुल ! कोई नहीं गाता। उन्हें तीन हार्ट अटैक हो चुके हैं ,और भी परेशानियाँ हैं। गा नहीं सकते। ... कोई नहीं गाता। मुझे न आता है और न ही उदासी खुलने देती है कि किसी से कहूँ ... तीन युवकों की मंडली रतौनी के मरीज बाबा की गाली सुन कर आई है। बता रही है। परम्परा है यह कि इस दिन होलिका दहन के पहले किसी को इतना तंग करो कि गालियाँ मिलें । मेरी ही तरह बाकी लोग भी हँसी के पीछे टीस को छिपा रहे हैं... आग कौन लगाए? .. आखिरकार पतहर जोड़ कर दूर से लुत्ती लगा दी जाती है...मन में ब्रह्मशंकर व्यास का साम गायन उमड़ता है - यज्ञा यज्ञा ..अग्नये..गिरा गिरा..गच्छ... यज्ञाग्नि - होलिका; गिरा, मंत्र - गाली और आहुति - मैल - ये दो ग़ायब रहेंगे ...गच्छ गच्छ प्रज्ज्वल प्रज्ज्वल ...  
.. परम्परा को निरर्थक बनाती सी मैल विहीन होलिका जल रही है। मैल तो हर घर में जमा पूँजी की तरह रखी हुई है। लोगों ने इसे अपने अस्तित्त्व से लपेट रखा है, छूटने की कोई आशंका नहीं, इच्छा तो दूर की बात है।  ... कल होली है।......  मैली देहों पर रंग चढ़ेगा।...     चढ़ेगा ? 
(जारी)

14 टिप्‍पणियां:

  1. हर बार चमत्कृत करती है आपकी लेखनी .....कितने गहन विविध भावों को एक साथ लेकर च्गालते हैं जैसे यादों का भावो का जुलूस हो कोई -मछली पलवाने की चुनौती मत दीजिये ...

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  2. परम्परा को निरर्थक बनाती सी मैल विहीन होलिका जल रही है। मैल तो हर घर में जमा पूँजी की तरह रखी हुई है। ...

    क्या गज़ब है....

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  3. टिप्पणी लिखने के लिये भी शब्द नहीं मिल रहे हैं।

    हाजिरी लगा ली जाये, प्रेज़ेंट सर!

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  4. गजब ही कर डालें हैं आप तो... बार बार पढ़े जा रहे हैं।

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  5. रामकोला से गुजरा हूं - मात्र एक रेल अधिकारी की तरह।
    लगता है अनुभूति को गांधी की तरह पदयात्रायें करनी चाहियें।

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  6. यह स्थान तो चिर जीवित रहेगा... या बस मेरी साँसों के जीवित रहने तक?
    जान है तो जहान है
    (अपना तर्जुमा - जान गयी तो जहान भी गया)

    छोटी चिड़ियों का मांस... दावत पर बुलाता है
    ...और इहाँ लोगबाग परेशान हैं कि गिद्ध गए तो गए ई ससुर सब गौरय्याँ आखिर कहाँ गयीं?


    घाव सूख जाते हैं पर रिश्ते रिसते रह जाते हैं .. .
    शाप को घटित कहूँ या फलित?

    छूटने की कोई आशंका नहीं, इच्छा तो दूर की बात है।

    क्या बात कही है!

    वैसे सुनने में रामकोला किसी पूंजीवादी पेय जैसा लगता है.

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  7. ८०% से ज्यादा तो देखा सुना ही है... पथप्रेत वाली बात भी अक्सर ऐसी ही निकल जाती है !

    आज की कड़ी से २ लाइनें... याद रहेंगी. दूसरी पर तो सोचना ही पड़ेगा...
    १. ...कढ़ुवार में, जहाँ से मिट्टी निकाल कर कभी भितऊ घर बनाए गए थे, घोरठ गाँव की होलिका सजती थी। आसपास के सारे टोलों से ऊँची। कितनी मंत्रणाएँ... उनका मचान उठाना है... फलनिया बहुत गोहरा (उपला) पाथले बा..एगो मँगलीं त नाहीं देहलसि..अरे! सगरी सम्हति मैया में झोंकाई..

    २. 'इस जमाने में वरदान नहीं लेकिन शाप फलित होते हैं'

    ,

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  8. लोगों ने इसे अपने अस्तित्त्व से लपेट रखा है, छूटने की कोई आशंका नहीं, इच्छा तो दूर की बात है...
    ज्यू की त्यूं धर दीनि चदरिया ..कहाँ हर किसी के वश की बात है ...
    अद्भुत कथा- शिल्प संस्मरण की रोचकता बनाये रखता है ...

    मगर जिस भाभी के बारे में जानने की उत्सुकता है ...उनका जिक्र हर कड़ी में और दूर होता जा रहा है ...

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  9. @ वाणी जी!
    भाभी नहीं भाभियाँ...जाने कैसे उनका निर्वाह इस लेखमाला में हो पाएगा ?
    संजय की ज़िद है कि जल्दी पूरी करो लेकिन मेरे लिए लिखना भूत को दुबारा जीने जैसा है। एक निश्चित मन:स्थिति की आवश्यकता होती है। ..ऐसे ही थोड़े 'निबाह' होता है !

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  10. ऐसी कई प्रविष्टियाँ दबा कर रखता हूँ कि मन को उतार कर लिखूँगा..वैसा ही जैसा महसूस किया है इस मन ने पढ़ते वक्त इन प्रविष्टियों को !
    पर बात रह जाती है !
    अभी तो पढ़ते जाना ही ठीक है !

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  11. संजय , मुमताज , दारू और फिर समय की मार में न टिक
    सकने वाला अतीत जीवन्मृत सा ! होलिका और अपराधबोध भी !
    बोध क्षणिक या स्थायी ! सोचने के लिए कितना कम समय मिलता है , यह
    किसी त्रासदी से कम नहीं ! न तो परम्पराओं पर सोच पा रहे हैं और
    न ही इंज्वाय कर पा रहे हैं ! '' डासत ही गयी निसा सिरानी ! '' जीवन-केलि
    का समय कहाँ है !

    सच ही कहा है ज्ञान जी ने कि ' अनुभूतियों को गांधी यात्रा करनी होगी ' !

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