रविवार, 25 अप्रैल 2010

भाँग, भैया, भाटिन, भाभियाँ, गाजर घास ... तीन जोड़ी लबालब आँखें - 6

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आज होली है। हुड़दंग की प्रतीक्षा...। नौ बज चुके हैं और अचानक सन्नाटे को अनुभव करने लगता हूँ। बच्चे तो खेलने में लगे हुए हैं लेकिन बड़े ? क्या यह होली भी... ?
...दिन साफ है लेकिन मन के आकाश पर कारे बादर मँडराने लगे हैं, जाने कितनी स्मृतियाँ ! समय बन्धन टूट चला है, सब इकठ्ठी हो चली हैं। हर याद लगती है जैसे कल ही की बात हो ...
बड़की भाभी... साँवली, ऊँची और ऊँचे दाँतों वाली... उस दौर की भाभी जब 'भउजी' वाली आत्मीयता बनी हुई थी। 'भाभी' सम्बोधन का परिष्करण और दूरी नहीं थी। भउजी का सहज अपनापन..। ..अम्मा कहती थीं बड़की ग़जब रंगीली खेलाड़ी! होली में ओसे न अझुरहिअ जा! लेकिन मन माने तब न ! किशोर होता मैं गर्मी की छुट्टियों में गाँव जाता, जब तब टिठोली करता तो उस ओर से देवर को मिलता हास्य लिए हुए ट्रेड मार्का चुटीला जवाब..और एक दिन। "..तू का बतियइब? तोहार सगरी जोगाड़ देखले बानीं। अरे, हमरे मूँहे में मुतले बाड़ (..तुम क्या बात करोगे? तुम्हारे गुप्तांग तक मैं देखी हूँ। अरे, मेरे मुँह में पेशाब कर दिए थे!)
अम्मा से पूछा तो वह खिलखिला कर हँस पड़ीं।..
... बड़की को आए अधिक दिन नहीं बीते थे जब मेरा जन्म हुआ। वर्षों की तपस्या के बाद पत्थर पर दूब उपजी थी। कटु बँटवारे के बाद भी परिवार की नारियों में प्रेम बना हुआ था। अकेली अम्मा को काम से परेशान देख बड़की मुझे बझाने खेलाने उठा ले जाती थी। बड़की छोटकी देर तक दुलराती थीं। बड़की को मुझे नंगे खेलाने का शौक था। अंग अंग की मालिश। बबुआ बरियार होखें और फिर उसके बाद पेट पर बिठा कर देर तक बतियाना । बड़की दूसरी अम्मा सरीखी थी क्या ?
.. और एक दिन बड़की ने जाने किस तरह मुझ नंगे को दुलराया कि पेट पर बैठे बैठे मूत्र धार निकल चली- बच्चे से बतियाते, दुलराते सीधे बड़की के मुँह में ! ... अम्मा ने बताया, बड़की बड़ी फरछीन (सफाई पसन्द) थी, बेचारी दिन भर उबकाई लेती रही। उस दिन उसने कुछ नहीं खाया। बड़की माई (बड़की की सास) , अम्मा, चाची, छोटकी... वगैरह दिन भर हँसती रहीं...लइका के मुसरियो से केहू खेलेला ! (बच्चे के लिंग से भी कोई खेलता है भला !) ... दूसरे दिन फिर खेलाने पहुँच गई, अम्मा को हैरानी नहीं हुई थी ..
..नई पीढ़ी में पहला विवाह। सइनोह सचिता भैया (गर्वीले सच्चिदानन्द भैया) का। स्वाभाविक था कि हँसी मजाक बढ़ गए थे। बड़की भउजी सबकी चहेती। जाहिर था उमगे भैया उनसे ही भिड़ते रहते थे। एक दिन आँगन में मसाला पीसती बड़की भउजी को सचिता भैया छेड़े जा रहे थे। आँगन गुलचौर था। चाची(सचिता भैया की माँ) हँसते हुए उन्हें मना कर रही थीं - जनि अझुरा !(उसे मत छेड़ो)। भैया कहाँ मानने वाले ! पास में बैठ कर धीमे आवाज में कुछ कुछ कहने लगे कि उनके पाजामे की ओर इशारा करते हुए बड़की का स्वर गूँजा," ... जौन आवतिया ऊ का करि ई त हम नाहीं जानतनी लेकिन हइ जौन छुट्टा साँड़ झाँकता, मान में न आवे त बताव, हमहिं नाथि देब... " (... जो आने वाली है वह क्या करेगी ये तो मुझे नहीं पता लेकिन पाजामे से यह जो छुट्टा साँड़ झाँक रहा है, अगर नियंत्रण में न आ रहा हो तो बताओ, मैं इसे नाथ दूँगी..) .. मुझे अभी भी याद हैं भैया के चेहरे के भाव..रंगीली भउजी ने रंग दिखा दिया था.. आँगन में मौसी, चाची, छोटकी भाभी...सब ठठा ठठा कर हँसने लगी थीं। भैया अभी उबरे भी नहीं थे कि पिसा हुआ सारा गीला मसाला उनके चेहरे पर पुत चुका था और उनका पाजामा खोलने को उद्यत बड़की भउजी कछाड़ा बाँधे उन्हें लपेट में ले चुकीं थीं। जैसे तैसे छुड़ा कर भागते भैया दुआरे से आते काका के सामने पड़ गए थे। आजन्म ब्रह्मचारी पहलवान, बाउ की पीढ़ी जैसे गुणों को समेटे काका.. मुँह में गमछा लगा हँसते उल्टे पाँव लौट गए थे। ...
.. बड़की भउजी से क्या होली होती थी! सचिता भैया, योगेश भैया, आनन्द भैया, मैं, त्रिभुवन और छोटे सब मिल कर भी उन्हें छका नहीं पाते थे। मजा कई गुना हो जाता जब छोटकी भउजी भी आ जुटतीं...
... मरण सेज पर रक्त कैंसर से पीड़ित बड़की भउजी। गरीब भैया ने कोई जतन नहीं छोड़ा। कहाँ कहाँ नहीं इलाज करवाया - लेकिन ... भउजी। भउजी की पीड़ा से पूरा घर ग़मगीन था। पेट काठ हो गया था। दबाए नहीं दबता था। पता चलने पर रामकोला से मैं उन्हें देखने गया था। लालटेन के प्रकाश में उनके पैरों के पास बैठा तो असह्य पीड़ा से जूझती भउजी ने हाथ पकड़ अपनी ओर खींच मेरा हाथ अपने पेट पर रख दिया था। लगा कि जैसे भउजी अपने बच्चे देवर को फिर से खेलाना चाह रही थीं। कमरे में उन्हें घेरे बच्चे जोर जोर से रो रहे थे। पूरे घर में पसर चुकी आसन्न मृत्यु की शांति को चीरते रूदन। मेरी सूखी आँखें दीवार पर टँगे ॐ की पृष्ठभूमि में मुस्कुराते राम पर टँग सी गई थीं। ... जाने कितने मिनट बीत गए। जितनी प्रार्थनाएँ आती थीं, मन में उमड़ती रहीं।..
अत्यधिक पीड़ा कुछ देर के बाद राहत दे दे देती है ताकि पुन: उठ कर सता सके। जाने मेरे हाथ के स्पर्श का प्रभाव था या पीड़ा की लम्बी अवधि का- भउजी  सो गई थीं। बच्चे अब सिसकियों पर आ गए थे। चुपचाप मैं कमरे से बाहर आया और न चाहते हुए भी अगले दिन रामकोला वापस आ गया। शाम को सूचना मिली थी - बड़को मरि गइली (बड़ी बहू गुजर गई) छिपा कर आँख पोंछते अम्मा को देखा था। लेकिन मेरी आँखें सूखी ही रहीं... नास्तिकता की नींव पड़ चुकी थी।
(जारी)

18 टिप्‍पणियां:

  1. गिरिजेश भाई,
    आज आपने भावुक कर दिया।
    आगे कुछ कह न सकुंगा।

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  2. बड़ा सजीव चित्रण किया है आपने। देहाती समाज में यौन आधारित मजाक खुले आम होते रहते हैं। अब तो यह कल्पनातीत हो गया है। यदि उस शैली में आजकल की आधुनिक भाभियों से बात करें तो पिटना तय है। :)

    आखिरी हिस्से ने रुला दिया। ग्रामीण पिछडेपन में बहुत सी साधारण बीमारियाँ समय से इलाज के अभाव में विकराल रूप ले लेती हैं और जानलेवा साबित होती हैं।

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  3. गिरिजेश सर,
    कैसा लगा होगा आपको फ़िर से इन स्मृतियों से होकर गुजरना। पहले कहा करता था कि आपके अगले लेख का इंतज़ार रहेगा, अब समझ पा रहा हूं शायद इस गैप का अंतर।
    अच्छी याद्दाश्त होना वरदान है या अभिशाप?

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  4. लेकिन मेरी आँखें सूखी ही रहीं... नास्तिकता की नींव पड़ चुकी थी।........
    अब इस भाव को क्या कहें,अंत में पूरा प्रसंग ही मार्मिक हो गया,बेहतरीन श्रृंखला ---जारी रहें.....

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  5. सिद्धार्थ भाई वाली बात ही कहूंगा।
    अच्छा पड़ाव। अगले का इंतजार।

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  6. धारावाहिक की इस कड़ी में उल्लिखित प्रसंगों और आपके नामकरण में कोई सम्बन्ध भी है क्या ? उत्तर आप जो भी दें कथा परिचित सी लगती है !

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  7. हंसा-हंसा कर रुलाना इसी को कहते हैं क्या!

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  8. ओह !
    बहुत ही मार्मिक...
    मन व्यथित है...
    अभी कुछ नहीं कह पाउंगी ...आपके लेखन के बारे में....

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  9. लेकिन मेरी आँखें सूखी ही रहीं... नास्तिकता की नींव पड़ चुकी थी।...

    मार्मिक...

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  10. ओह तन मन सिहर /काँप उठा ....क्या कहूं ?

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  11. इस श्रृंखला की हर पोस्ट की तरह इस पोस्ट को पढ़ते हुए भी कई चित्र उभरे मन में.... काश ! आखिर के पैराग्राफ ना होते. कुछ लोग इतने करीब होते हैं जीवन में.... क्या लिखूं कुछ समझ में नहीं आ रहा.

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  12. .. नास्तिकता की नींव पड़ चुकी थी।...

    A lot being said in the above line...

    Iss duniya mein pyar karne wale bhi hain, aur Pyar ki kadrr karne wale bhi..

    Zaroorat hai aise hi logon ki.

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  13. चेहरे पर धरा चस्मा उतार दिया , आँखें मुंदी रहीं , उंगलियाँ
    फिरती रहीं इन आँखों पर !

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  14. ..घाव सूख जाते हैं पर रिश्ते रिसते रह जाते हैं ..

    अत्यधिक पीड़ा कुछ देर के बाद राहत दे दे देती है ताकि पुन: उठ कर सता सके।

    :(
    so true ...

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  15. नींव तो पड़ी ही होती है गिरिजेश जी , बीज होता ही है अन्दर | वो उस अंक में आपने कहा ना - गेंहू के साथ गाजरघास - वैसा ही है | दोनों बीज साथ हैं, और अपनों का या अपना दर्द इस नास्तिकता के बीज को पूरा पेड़ बनाने में एक दिन का भी समय नहीं लेता | जबकि आस्तिकता की फसल उगने में कई बरस लग जाते हैं | ये दोनों ही - आस्तिक मन और नास्तिक मन - हम सबके भीतर होते हैं | कभी यह वाला जीतता है, कभी वह वाला हार जाता है |

    और फिर बेचारी गाजरघास को भी क्यों कोसना, क्या सिर्फ इसलिए कि वह हमारे (मनुष्य के) किसी काम नहीं आती - उस बेचारी को जीने का हक नहीं? क्या किसी के जीवन का मोल सिर्फ इससे है कि वह हमारे कितने काम आये? आज पत्नी खाना बना रही है, बच्चे सम्हाल रही है, पति कमा रहा है , खिला रहा है | कल किसी कारण ना हो पाए - वह किसी काम के न रहें - तो ? उन्हें गाजरघास सा मान लिया जाए? उपेक्षित? अनचाही?आज गाय दूध देती है तो गौमाता - और कल बुढा गयी तो बीफ?

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