शुक्रवार, 14 मई 2010

भाँग, भैया, भाटिन, भाभियाँ, गाजर घास ... तीन जोड़ी लबालब आँखें - 7

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स्मृतियों से भरा मन। एक के बाद एक कालखण्ड आ रहे हैं जा रहे हैं - नहीं एक दूसरे से मिल से गए हैं - स्याह रंगों के कई टिंट, कई शेड ... बड़की भौजी गईं ...
... सचिता भैया थोड़ा ऊँचा सुनते थे। गर्वीले । रेडियो पर फिल्मी गीतों के शौकीन। गाने-बजाने की पुरानी परम्परा के वाहक। ढोल, झाल एकदम टंच रखते। होली हो या जन्माष्टमी - उनका उत्साह देखते बनता, गवैये ऐसे ही खिंचे चले आते। अष्टमी के बहुत पहले से ही कोई मिला तो ठीक नहीं तो अकेले ही ढोल ले कीर्तन गायन - पारम्परिक, फिल्मी सभी धुनों पर। जिन्हें नापसन्द होता वे कुढ़ते - बहिर अदमी ! लेकिन सचिता भैया को क्या परवाह !
पीता, उनके पिताजी जिन्हें हम सभी पीता कहते हैं, अच्छे गवैये थे। जरा व्याधि के कारण अब नहीं गाते लेकिन गर्मी की कितनी ही रातें मुझे याद हैं । आसपास की छतों पर मजमा लग जाता और फरमाइशें, फरमाइशें ... सहज, बुलन्द, आत्मीय, ग्राम्य गिरा..रात के सन्नाटे में हमें तारों के संसार में ले जाते जमीनी स्वर.. जवान सीमा पर जा रहा है और माँ कह रही है:
"बबुआ लेहले जइह हमरो समान हो
पूछिहें जवान सुगना ssss"
भैया की शादी के बाद गवैये पिता ने गवैये बेटे को सीख दी थी:
" जब से बबुआ के हमरे बियाह भइल
भीतर सूतल रहें, कइसन बिहान भइल?" .. देर तक सोते बेटे को किसान पिता की झिड़की। नवेली भाभी ने पहली दफा सुना तो बहुत हँसीं थीं ...
..जन्माष्टमी के दिन सोहर के स्वरों में अपनी बेसुरी आवाज मिलाते सचिता भैया तनिक नहीं शर्माते। उनका उत्साह संक्रामक होता और ढोलक की आवाज़ से उनकी आवाज़ अजीब सी संगति बैठा लेती। सामान्यत: दूसरे बेसुरों को गवैये टोक देते लेकिन कुछ था बहरे भैया के स्वर में जो किसी को बुरा नहीं लगता था!       
..होली के दिन दक्खिन घर के लड़के सचिता भैया के नेतृत्त्व में निकलते - रंग, अबीर, वार्निश, जला मोबिल ऑयल, पेंट ..सब कुछ और गाँव में धमाल मच जाता। भाभियों को आज रंग नहीं लगा पाए तो कैसी मर्दानगी ! लेकिन मजाल क्या कि किसी ने कभी मर्यादा लाँघी हो !... होली इतनी घमासान होती कि छुइमुई टाइप की भाभियाँ बचने के उपाय जोहतीं। एक बार तो एक घर का मुख्य द्वार ही बन्द कर दिया गया - असामान्य था लेकिन हो गया। घर वाले से शिकायत पर उन्हों ने मौज लेने के अन्दाज में मर्दानगी दिखाने की चुनौती दे डाली। सचिता भैया और योगेश भैया मिलकर कहीं से बाँस की सीढ़ी उठा लाए। बाहर से लगा कर छत पर पहुँचे, छत से आँगन  में उतरे और भीतर से दरवाजा खोल दिया। किला फतह ! ...
... खपरैल का पुराना घर। ओसारे में होली खेलती भाभी ने हम लोगों को आते देख भाग कर दरवाजा बन्द कर लिया। हम सभी ने मिल कर दरवाजा उठाया और जाने कैसे दरवाजा निकल गया। भीतर उत्साह में वानरटोली घुस गई और वह हो गया जो अपेक्षित नहीं था। सचिता भैया द्वारा अनजाने में अनुज वधू का स्पर्श ! उन्हें ग़लती से भाभी समझ बैठे थे। घर वालों ने कुछ नहीं कहा लेकिन उन लोगों की निन्दा दृष्टि ! .. अक्षम्य घटना। हतप्रभ सचिता भैया को लौटते देख हम सभी लौट चले... उसके बाद कभी उस घर के भीतर होली खेलने हम लोग नहीं गए थे...
... गोरे सचिता भैया काले पड़ गए थे। दोनों गुर्दों ने काम करना बन्द कर दिया था। बड़की भौजी के विपरीत उन्हें सर्वोत्तम चिकित्सा सुविधाएँ भी मिलीं पर ....। बात ट्रांसप्लांटेसन तक आई लेकिन कुछ और ऐसी जटिलताएँ उत्पन्न हो गई थीं कि डाक्टर भी सफलता के प्रति सशंकित थे, बहुत देर हो चुकी थी। भैया को आखिरी दफे जीवित देखा था तो भाभी भी साथ थीं। तमाम सावधानियों और सफाई के बाद भी शरीर से आती वह दुर्गन्ध ! ऐसे जिन्दादिल मनुष्य की यह परिणति ? .. मृत्यु को समीप जान भाभी का हाथ पकड़ सचिता भैया बोलते रहते थे ....दोनों बेटियों को खूब पढ़ाना.... हमारे खानदान पर आज तक कोई धब्बा नहीं लगा है, देखना लाज रखना...  चूड़ियाँ पहनना बन्द न करना। चूड़ियों में ये हाथ अच्छे लगते हैं...। भाभी तो बस सूखी नदी सी ..दिलासा दें भी तो कैसे? किसे ? ..
गवैये बजैये मस्त निर्भीक पुरनियों की परम्परा के इस वाहक ने मृत्यु के साए में भी पुरातन संस्कारों की बात आगे बढ़ाने में कोई कोर कसर नहीं रखी।
... मृत शरीर दुवारे लिटाई गई थी। पीता ने रूँधे गले से मुझे और आनन्द भैया को इशारा किया था - अंतिम दर्शन ! .... पछाड़ खाती विलाप करती भाभी के एक हाथ को मैंने पकड़ा और दूसरे को आनन्द भैया ने .. घर में कोहराम मचा था तो बाहर पुरुष वर्ग आँखें पोंछ रहा था .. भाभी ने अंतिम दर्शन पाया और देह पर विलाप करने लगीं ..खींच कर वापस घर में हमलोग ले आए थे। आज याद नहीं आ रहा कि उनकी कलाइयों में चूड़ियाँ थीं या नहीं ?    
..मृत शरीर में जाने कितना जल तत्त्व था! चिता कई बार बुझी। सम्भवत: अग्नि को भी वह आहुति स्वीकार नहीं थी।
... बाद के वर्षों में योगेश भैया के नेतृत्त्व में हम लोग होली में निकलते रहे लेकिन कुछ खो गया था.. खाली खाली सा लगता था.... संक्रमण काल..शहर गाँव से जवानों को खींच कर निर्वात जन रहा था...
घर के भीतर बड़की भौजी नहीं बाहर सचिता भैया नहीं ...दक्खिन घर की होली बेरंग हो गई। पीता ने फिर कभी नहीं गाया। ...जवान उस सीमा जा चुका था जहाँ से उसे कभी लौट कर नहीं आना था। ... दीवार पर टँगे ढोल और झाल धूलधूसरित होते रहे, मकड़ों के जाल उन्हें कब लील गए, पता ही नहीं चला।
.. आज पीता की आवाज़ मन में गूँज रही है ".... कइसन बिहान भइल? .." (जारी) 

14 टिप्‍पणियां:

  1. पहली बार बाऊ को जाना तो लेखक को नहीं जानता था मगर मन में एक छवि बनी एक अनुभवी बुज़ुर्ग की. फिर गिरिजेश को जाना तो गर्व हुआ अपने को ऐसे प्रतिभाशाली युवा का अग्रज समझने में. लेकिन जितना ज़्यादा पढता हूँ, उतना ही यकीन आता जाता है कि पहचान से पहले वाली छवि ही सच्ची है.

    पढने में भी तकलीफ होती है और टिप्पणी लिखने में भी. यही ताकत है गिरिजेश की कलम की - पाठक को इतनी ताकत देनी कि वह उसे छू सके, महसूस कर सके, जी सके जो लेखक के मन में है.

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  2. मैं अपने को इस कथा का पाठक नहीं बल्कि एक पात्र जैसा महसूस कर रहा हूँ; जैसे- उसी होली की हुड़दंगी टोली का एक सदस्य।

    आप जो दृश्य रचते हैं उसमें समा जाने को मन करता है। वाह।

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  3. ओह.....काफी मर्मस्पर्शी पोस्ट।

    और इस पोस्ट को तो अब पढ़ पा रहा हूँ.....न जाने कैसे छूट गई।

    आपका सिरियसनेस वाला असमंजस अब समझ में आया।

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  4. भाई साहब आपकी कुछ पोस्ट पर समझ में नहीं आता क्या टिपियाएँ !

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  5. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. ओह !
    [ मेरी मिलाकर आपको नवाजी ओहों की संख्या = ३ {:)} ]
    ओझा निर्णय नहीं ले पाए नहीं तो चौथी ओह होती यह !

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  7. @ ऐसे जिन्दादिल मनुष्य की यह परिणति ?...
    बहुत दुखद ....आपके माध्यम से जुडाव हो गया था सचिता भैया से ...और उनकी यह परिणति दुखद रही मगर ये दुखद पल हमें हर पल एहसास दिलाते हैं कि जग में कुछ भी स्थाई नहीं ...फिर ये मार काट ...मैं तू ...क्यों ...??

    देर से पढ़ पायी ...बिजली रानी ने बड़ा सताया है इन दिनों ...

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  8. सुबह पौने पांच का समय है ! ब्रह्म मुहूर्त में यह ब्राह्मण गलदश्रु हो चला है !
    सब महसूस करा दिया आपने ! जार - जार हूँ !

    बाऊ , एक माफी मांग रहा हूँ , इसके आगे नहीं कह सकूंगा ... ...

    खुद को धिक्कार रहा हूँ कि इस प्रविष्टि पर मैं 'ओहों' की संख्या
    गिनने आया था ! कान पकड़ रहा हूँ कि आज के बाद किसी भी
    प्रविष्टि को बिना पूर्णरूपेण पढ़े , टीप की एक बिंदु तक नहीं रखूंगा !

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