शनिवार, 19 जून 2010

रोज रोज की

हमारे क्युबिकल्स के बीच एक मौन खिंचा हैकीबोर्ड की किटकिटाहटें, ग्राहकों से की गई बातें और    इंटरकॉम की सौम्य कुनमुनाहटें रूटीन हैं, 'मौन' में शामिल हैं। कितनी बार लगा कि मैं चुप तुमसे कुछ कह जाता हूँ। कितनी बार अनुभव हुआ कि तुमने मुझे सुना है। कितनी बार लगा कि मॉनिटर को बेध तुम्हारी दृष्टि मेरा एक्स रे बिम्ब सोख रही है !पर नज़र मिलते ही वही चिर परिचित औपचारिक मुद्रा और रुक्षता हमें धारण कर कह उठते हैं," यू सी ! बड़ा प्रेसर है। मुझे तो यही कहना है तुम्हारी वज़ह से टार्गेट पूरे नहीं हुए।" हममें होड़ है - कौन इसे पहले कह जाता है। क्या इससे कुछ अन्तर पड़ता है?
उस आबनूसी किवाड़ के पीछे का मौन हमारी होड़ की रत्ती भर परवा नहीं करता। "यू बोथ आर यूजलेश ! इन फैक्ट यू आल आर यूजलेश!!" और हम बिना कुछ कहे यूँ ही बाहर आ जाते हैं। होड़ अपने हाड़ का इलाज़ कराने भाग जाती है - कल फिर आने के लिए। बाहर आते ही मुझे लगता है कि ऑफिस एअर कंडीशण्ड है और गरदन से चिपके तुम्हारे केश लहलहा उठने को पसीना झिटक रहे होते हैं। खुलता है थोड़ा सा, बारीक सा तुम्हारा मौन ! एक कंजूस मुस्कान । परफ्यूम स्वेद गन्ध से मिल कुछ अधिक तीखी हो जाती है और मैं सोच उठता हूँ कि ऑफिस ब्वाय रोज नहीं नहाता !
डोर क्लोजर की चीं चीं को गलियारे में ढकेल नींबू पानी के दो गिलास आते हैं और देखता हूँ कि तुम्हारी आँखों के नीचे काले घेरे बढ़ने लगे हैं। नींबू पानी पी कर बाथ रूम । बाहर आते ही काले घेरे ग़ायब। छि: ऐसे भी कोई फॉलो करता है ? ऑफिस ब्वाय की नज़र मेरी नज़र को पकड़ कुछ सन्देशा ले उसके होठों पर आती है और वह दाँत निपोर देता है - साब ! कॉफी पियेंगे ?   मैडम आप ?
"नो" । उसकी खिसियाहट देख मैं मुस्कुरा देता हूँ - कंजूस !  
ऊब को उछाल तुम घड़ी को देखती हो। नज़रें बीते घंटों और आने वाले घंटों की सीधी उल्टी गिनती दिमाग को सौंप सुस्ताने को सामने की कुर्सी पर चिपकती हैं। वहाँ एक आगंतुक आ बैठा है। अचानक तुम्हारा सारा वज़ूद लहलहा उठता है और मुझे वेनिशन ब्लाइण्ड के पार लटक आई लता पर बैठा गिरगिट दिख जाता है। एक बेहूदा सा सवाल,"नर कि मादा?" तुम्हारी शुद्ध, प्रोफेशनल अंग्रेजी अपने पूरे शबाब पर है और आगंतुक आतंकित होने के कगार पर है कि ओठलाली पुते होठों से निकलता है,"भाई साहब ! यह नहीं हो सकता। सॉरी।" कंजूस मुस्कान। धक्के से उबरने की कोशिश करता भी वह निहाल हो उठ जाता है। नहीं कहने के तरीके और ज़गहों पर जुबान से कुछ अधिक ही होते हैं।
चुप सा वह कुर्सी खींच मेरे पास खिसक आता है और अब अंग्रेजी बोलने की मेरी बारी है। मेरा मोबाइल बजता है। मैं जोर जोर से खोखली बातें शुरू कर देता हूँ जैसे सामने आदमी नहीं हवा का पुतला बैठा हो जो नज़र ही नहीं आ रहा  लेकिन उसे मुझे अपने आप को दिखाना है, बताना है कि सामने कुर्सी खाली नहीं है।
"हाउ कैन यू कैल्कुलेट विदाउट अपडेटिंग सी ए जी आर?" सी ए जी आर तेज बोलता हूँ , रुकता हूँ - सामने वाले पर क्या प्रभाव पड़ा ? वह बंडल से निकल प्रिंटर में घुसते ए फोर पेपर जैसा कोरा है - दोनों तरफ । जी में आता है पीछे जा कर एक लात लगाऊँ - तुम्हें अभी तक पसीना क्यों नहीं आया, यू थिक स्किंड रास्कल ! 
"...आर यू सेन ? व्हाइ आर यू शाउटिंग?" दूसरी तरफ मोबाइल पर जी एम है। मेरी पेशानी पर चुहचुहाअट खुजली करने लगती है। तुम्हारी कनखियाँ मुस्कुरा रही हैं। आगंतुक मेरी उड़ गई रंगत को देख उठ खड़ा होता है। आज काम नहीं होगा। कत्तई नहीं।  हरगिज नहीं। 
मुझसे ऐसी चूक हुई कैसे ?
मैंने अपनी समझ तुम्हारे क्युबिकल में गिरवी रख छोड़ी है।  तुमसे कभी कुछ उधार लिया था क्या? तुम्हारा इंटरकॉम कुनमुना उठता है। हड़बड़ा कर तुम उठती हो। आबनूसी किवाड़ में तुम्हारे धसने से बने खालीपन को चीरती एक आवाज़ मेरे सिर पर धौल जमा जाती है," तुम्हें सुनाई नहीं दिया ? निमंत्रण पत्र प्रेषित करूँ क्या?" डोर स्टॉपर लगा दिया क्या? हे हे हे , ही ही ही 
जुगलबन्दी हँसी - फँसा कि फँसी ? 
निमंत्रण पत्र ??
प्रेषित???
मेरा इंटरकॉम बजा क्यों नहीं? आबनूसी रंग का औज़ार । तेजी से उठने के बहाने पटक देता हूँ। फर्श पर टुकड़े नाच रहे हैं - चिप, स्प्रिंग, की बोर्ड...। एक क्षण के लिए किसी एनीमेशन फिल्म के दृश्य आँखों में घुस आते हैं। उफ, ज़िन्दगी निर्जीव चीज़ों की  !
" यू आर लेट डियर! रोज़ा ने मुझे सब समझा दिया है। यू नो , हमें कस्टमर्स से इंटीमेसी डेवलप करनी होगी। उनसे हिन्दी में बात किया करो। आइ थिंक यू हैव अंडरस्टुड ?"
"धड़ाम !" चैम्बर की किवाड़ में तो हाइड्रॉलिक क्लोजर लगा है। फिर यह आवाज़ ?
"रामसिंघ ! क्लोजर चेक करो। गेट इट रिपेयर्ड ऑर चेन्ज्ड ।"
" साब! वह तो ठीक है।" तुम फिर मुस्कुरा रही हो। शायद कुछ गुनगुना भी रही हो।
" तो ये क्युबिकल्स के बीच का काँच हटा कर बोर्ड लगवा दो। आर पार कुछ भी नहीं दिखना चाहिए।"
"जी। पेमेंट तो हो जाएगा न ?"
"अबे! फोकट में काम करता है क्या ?" हिन्दी। इनफॉर्मल ? नहीं । रस्टिक हिन्दी।
ऑफिस ब्वाय को न बुला कर खुद फर्श पर बिखरे इंटरकॉम को डस्टबिन में डालता हूँ। मुझे काँच सरकता नज़र आता है। तुम्हारे चेहरे पर हवाइयाँ क्यों उड़ रही हैं ? आबनूसी किवाड़ बन्द है लेकिन भीतर से भेदती आँखें मैं महसूस कर रहा हूँ। भीतर कोई ज़ोर ज़ोर से मुस्कुरा रहा है।

19 टिप्‍पणियां:

  1. ओवरआल गुड लगा. कहीं-कहीं लिटल मुशकैल्टी हुई!

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  2. अड़े वड़ी सांई......अड़े बाबा चड़िया हो गया क्या.....ऑफिस में ये सब करने को जाता है क्या....सुट्टो सांई....सुट्टो.....।

    ये बंदा तो गया काम से....लिख के ले लो....तेलगी का स्टेंप बाजू में करो....ये असली स्टांम्प पेपर पे लिख के ले लो....ये छोरा तो गया काम से.....वड़ी चड़िया हो गया है एकदम चड़िया।

    कविता लिखता है....धुत्त...वाली और इधर लपड़ झपड़ करता है बाहर वाली से....उसको देखता है...ऑब्जर्व करता है....वड़ी तुम काम कभी करता है.....आज से ये मेरा सिंधी सेठ का चिंदी निकाल के रहेगा ये ....एकदम चिंदी बना के छोडेगा ये:)

    ऑफिस में ये सब ऑब्जर्वेशन जाने अनजाने होते रहते हैं....लेकिन कभी ऑफिस वालों को अपना ब्लॉग पढ़ने आमंत्रित मत करना....वरना बॉस के कान में ऐसा मंत्रित करेंगे कि .....बस :)

    वैसे एक सेफ पैसेज ये है कि बॉस को भी ब्लॉगिंग में खींच लाओ :)


    मस्त पोस्ट है। एकदम रापचीक।

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  3. @गिरिजेश जी, भीतर भेदने वाली ऑंखें तो ठीक ...पर भीतर मुस्कराने वाला काम ज़रा खतरनाक लग रहा है !

    @ वह बंडल से निकल प्रिंटर में घुसते ए फोर पेपर जैसा कोरा है - दोनों तरफ :)

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  4. भौंचक कर दिये हैं जी आज आप।
    बसंत और फ़ागुन का मौसम लंबा खिच गया दीखता है, ग्लोबल वार्मिंग है या ब्लॉगल वार्निंग?
    जो भी है, है मजेदार। कई ब्लॉग्स के शटर गिरने वाले हैं :))

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  5. चित्रण तो जोरदार है भइया--कोई शक नहीं.

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  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 20.06.10 की चर्चा मंच (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  7. ये "आबनूसी किवाड़" सबके लिये बहुत बड़ी समस्या है और अगर हम खुद इसके पीछे हों तो दूसरों के लिये हम बड़ी समस्या हैं।

    बहुत ही अच्छा लिखा है, बस ऑफ़िस वाले न पढ़ लें ..।

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  8. वह ऑफिस मैने देखा है।
    यह सब कैसे हो गया जी...? मैंने तो सबकुछ कूल-कूल देखा था...!!

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  9. @ सिद्धार्थ
    अरे भाई, यह कहानी है, संस्मरण नहीं :)ऑफिस वातावरण में सहकर्मियों, बॉस और ग्राहक इन तीन की आपसी केमिस्ट्री को सहेजने का एक प्रयास है।

    मेरे ऑफिस में अभी भी सब कूल कूल है। मेरे जैसा हॉट जो बैठा है। ;)

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  10. अब स्पष्टीकरण से मामला संदेहास्पद हो चला है !,,,,, :)

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  11. दफ्तरी चरित्र का खाका खिंच गया आँखों के सामने ...अच्छा ...ये सब होता है ऑफिस में ...!!

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  12. सीन दर सीन मन में उतर गयी...अगर कुछ बेहतरीन पोस्टे चुननी हो तो इसे उनमे रखूँगा ......एक स्क्रीन कंप्यूटर पर उभरा ओर सीन दर सीन.पिक्चर ...कुछ पंक्तिया लिखने की निरंतरता ...ओर लेखक की समझ को दर्शाती है ....
    हमारे क्युबिकल्स के बीच एक मौन खिंचा है।इंटरकॉम की सौम्य कुनमुनाहटें रूटीन हैं, 'मौन' में शामिल .....
    बाहर आते ही काले घेरे ग़ायब। छि: ऐसे भी कोई फॉलो करता है ? ऑफिस ब्वाय की नज़र मेरी नज़र को पकड़ कुछ सन्देशा ले उसके होठों पर आती है और वह दाँत निपोर देता है - साब ! कॉफी पियेंगे ? मैडम आप ?
    छोटे छोटे वाक्य आदमी के भीतर की कई कहानी कह देते है तुम्हारे भीतर एक लेखक छुपा है ....जिसे बहुतो तक पहुंचना चाहिए ....शानदार !!!!!

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  13. हम्म... तो ऑफिस में यही सब ओबजर्व करते हैं आप. हाँ ये कहानी ही है लेकिन इतनी 'सच' कहानी बिना ओबजर्वेशन के कैसे लिखी जा सकती है?

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  14. तो क्या ऐसा होता है? अच्छा ? बडिया पोस्ट आभार।

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  15. आज पहली बार यहाँ आया तो देखा हमारे ऑफिस का दृश्य पसरा पड़ा है... फिर जब “मैं” लिखा देखा आपकी तरफ से, तो लगा गलती से आपके ऑफिस में घुस आया हूँ... मज़ा आ गया कहा तो मज़ा नहीं आएगा...आपकी कथा के लिए ये शब्द बौने हैं... मील के पत्थर है आप, सुनाहै... आज देखा तो सुस्ता कर बैठ गया... शीतल छाया मिली!!!

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