बुधवार, 29 दिसंबर 2010

स्त्री जीवन हाय...

टाइम्स ऑफ इंडिया के आज के फ्रंट पेज पर एक समाचार है: 
SC woman judge lists daughters as 'liabilities'. 
समाचार के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय की एक न्यायाधीश ने सर्वोच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर सम्पत्ति घोषणा करते हुए लायबिल्टी कॉलम के अंतर्गत 'दो विवाह योग्य पुत्रियाँ' भी दिखाया है। सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर इसे यहाँ देखा जा सकता है: 
वहाँ यह भी लिखा है: The above declaration of assets is purely on voluntary basis.

कल ही किसी से चैट पर मैं एक काल्पनिक स्थिति पर बात कर रहा था कि अगर कोई स्त्री मित्र साथ में हो, होटल में एक ही कमरा मिल रहा हो तो क्या उस कमरे में स्त्री मित्र के साथ रात उसी सहजता से बिताई जा सकती है जैसे पुरुष मित्र के साथ बिताई जा सकती थी? तब जब कि स्वयं स्त्री को कोई आपत्ति न हो? 
मुझे असहज सी स्थिति लगी और  नकार गया। चैट के दौरान ही यह स्पष्ट हुआ कि ऐसा इसलिए था कि 'भेद खुलने' पर समाज की स्त्री के प्रति प्रतिक्रिया और उसकी स्थिति के बारे में सोच कर मैं भयभीत था। 
इस समय मन में 'अबला जीवन हाय ...' नहीं 'स्त्री जीवन हाय...' आ रहा है।  

गुजर रही है जिन्दगी डरते डरते 
ये जीना भी कोई जीना है प्यारे? 

33 टिप्‍पणियां:

  1. सामाजिक स्थितियों को व्यक्त करने का तरीका भिन्न भिन्न है पर मर्म वही है।
    अबला जीवन....

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  2. इत्ता बड़ा सब्जैक्ट, और इत्ती सी पोस्ट? भोत नाईंसाफ़ी है....

    शाम को लौटकर देखते हैं लोगों के विचार

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  3. कुछ भी कहने पर दोनों तरफ से अवमानना का खतरा है.
    'मो सम कौन' की तरह शाम को देखेंगे.

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  4. एक बार मैं जयपुर गया था, वहाँ मेरे यूनिवर्सिटी की एक मित्र थी. मैं उसके घर नहीं ठहरना चाहता था. योजना बनी कि स्टेशन से सीधे कोइ होटल बुक कर सामन वहाँ रख-कर उसके घर जाएँगे. वो मुझे होटल दिलवाने साथ चली गयी थी. वहाँ जिस तरीके से देख रहे थे होटल वाले, बड़ा अजीब लग रहा था.. उलटे-सीधे कई प्रश्न पूछे उन्होंने... यह मानसिकता पता नहीं कब बदलेगी..
    और सुप्रीम कोर्ट के जज की संपत्ति घोषणा में मुझे कुछ भी गलत नहीं दिखता.. जज होने से पहले वो एक सामान्य नागरिक, इसी समाज का एक हिस्सा है.. बेटी का विवाह करना एक बोझ न हो यह एक आदर्श स्थिति है. लेकिन वर्तमान में तो यह एक हकीकत है.. जज होने से उनकी लड़की की शादी मुफ्त में तो नहीं हो जायेगी.. तो गलत क्या है सच्चाई को लिखने में.. और साथ में उन्होंने लड़कियों की पढाई के खर्च को भी इसमें शामिल किया है... लड़के होते तो उनका भी जिक्र करतीं वो लायबिलिटी में...

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  5. आज आपने एक पोस्ट नहीं लिखी अपितु विचार रखा है.....

    कुछ चीजें कभी नहीं बदलती......... खासकर भारतवर्ष में.....

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  6. उन जज महोदया ने तो खैर किसी ख़ास मकसद के तहत लड़कियों को liabilities बताया है. पर मेरी एक रिश्तेदार को पति की मृत्यु के बाद बैंक में नौकरी इसलिए नहीं मिली ( उनके पति बैंक में मैनेजर थे) क्यूंकि उनकी कोई liability नहीं थी...कोई लड़की नहीं थी,बस एक लड़का था. ३४ वर्ष की उम्र में अपने पति को खोने के बाद से ,उनकी ज़िन्दगी रुक सी गयी है.

    अब पोस्ट के दूसरे हिस्से की बात.... चैट के दौरान ही यह स्पष्ट हुआ कि ऐसा इसलिए था कि 'भेद खुलने' पर समाज की स्त्री के प्रति प्रतिक्रिया और उसकी स्थिति के बारे में सोच कर मैं भयभीत था।
    क्या यह पूरा सच है?? अगर वो स्त्री उस शहर के लिए बिलकुल अपरिचित होती, उसकी बदनामी का कोई डर नहीं होता तब भी क्या पुरुष उसके साथ एक कमरे में... ( अलग सोफे पर ही सही ) रात बिताने को तैयार होते?? उन्हें अपने दामन पर छींटो की कोई परवाह नहीं होती??
    क्यूँ पुरुष हमेशा "महानता का चोला पहने " स्त्री के savior का इमेज प्रस्तुत करने को आतुर रहता है??
    यहाँ "पुरुष जीवन हाय "...भी उतना ही सार्थक है

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  7. रश्मि दी की बात से सहमत हूँ.
    कल्पना की गयी वस्तुस्थिति में यह निर्णय अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग हो सकता है, पर इसे औरतों की सामाजिक प्रतिष्ठा से नहीं जोड़ा जाना चाहिए. पुरुष को अपनी भी उतनी ही चिंता होती है. ये सच है कि एक भला व्यक्ति अपनी महिला-मित्र के विषय में सोचेगा क्योंकि समाज की व्यवस्था ऐसी है कि इसमें औरतों के दामन पर दाग जल्दी लगता है. पर अगर काल्पनिक स्थिति की परिस्थितियाँ वैसी हो, जैसी कि रश्मि दी ने बतायी तो बदनामी के डर जैसी कोई बात नहीं होगी...

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  8. भाई गिरिजेश जी यदि आपको इस विषय पर लिखना ही था तो थोड़ा विश्लेषण करके कुछ विस्तार से लिखते। ये तो एक चलताऊ सा पोस्ट है जो तस्वीर के कई पहलुओं मे से सिर्फ़ एक ही दिखा रहा है।

    अब हम क्या कहें, दूसरों के विचार पर हम भी नज़र रखे हैं।

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  9. 1. अपनी संपत्ति को जस्टीफ़ाई करने के लिये न्यायाधीश महोदया ने लायबिल्टी कॉलम के अंतर्गत 'दो विवाह योग्य पुत्रियाँ' भी दिखाया हो सकता है। रही अखबारों की बात तो पहले भी एकाधिक जगहों पर बता चुका हूँ कि इसी अखबार ने एक गर्भवती महिला विशेष के अस्पताल में एडमिट होने पर डेली अपडेट के लिये एक कालम नियत कर दिया था।
    सनसनीखेज खबरें ही ज्यादा बिकाऊ हैं।
    केवल खबरें देने वाले जनसत्ता, इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबारों का हश्र देख लीजिये।

    २. अब इसे कोई ’मैन्ज़ शिवलरी’ माने या कुछ और, लेकिन ऐसी स्थिति आने पर हम भी असहज ही महसूस करेंगे। बेशक बात अपने शहर की हो, उसके शहर की हो या किसी तीसरे शहर की। लोकापवाद हमारे जैसे लोगों के लिये मायने रखता है। छींटे सिर्फ़ खुद पर ही पड़्ते हों तो एकबारगी सोचा भी जा सकता है लेकिन यदि अपने कारण किसी दूसरे के दामन पर छींटे आने की संभावना हो और वो भी किसी महिला के, तो ऐसी स्थिति से दो चार होने पर अपन पुराने जमाने के हीरो(बेसक आज के जीरो) की तरह तकिया चादर लेकर बाहर बालकनी में रात गुजारना पसंद करेंगे।

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  10. पोस्ट के पूर्वार्ध में आपने जो कहा...मुझे उसमे कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगता...बहुतायत में वास्तविकता आज भी यही है कि अविवाहित पुत्रियाँ लायबिलिटीज ही होती हैं..

    मेरी माँ भी थी,मैं भी थी और मेरी बेटी भी रहेगी..शायद हो सकता है उसकी बेटी न रहे...

    उतरार्ध में जो आपने कहा,उससे शब्दशः सहमत हूँ..

    एक कमरे में एक स्त्री पुरुष यदि रात गुजार कर निकलें और भगवान् भी आकर गवाही दें कि ऐसा वैसा कुछ भी अप्पतिजनक नहीं दोनों के बीच,कोई नहीं मानेगा..पुरुष फिर भी बच निकले पर स्त्री को कोई माफी नहीं मिलेगी...

    स्थिति इधर कुछ वर्षों में बदल जाए,लगता भी नहीं...

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  11. पहले भाग पर कुछ भी कहना असम्भव सा लग रहा है. उनके क्या विचार रहे होंगे यह मैं नहीं जानता.. हाँ, आज भी बिहार के पढे लिखे समाज में जब कोई अपनी बेटी ब्याहने जाता है तो यह देखता है कि उस लड़के की (भावी वर) कोई लाइबिलिटी तो नहीं.. और बहुत खुश होते हैं अगर पता चलता है कि उसकी सभी बहनों का ब्याह हो गया है. लाइबिलिटी फ्री लड़के बहुत डिमाण्ड में होते हैं...
    दूसरे भाग पर सिर्फ एक जवाब कि यह एक परिपक्व मस्तिष्क की सोच पर निर्भर है. एक घटना जो शायद खुश्वंत सिंह ने कभी लिखी थी. हो सकता है कुछ अंतर हो. वे और नरगिस दत्त एक साथ सांसद थे. नर्गिस जी दिल्ली आई थीं एक दिन के लिये, शायद सेशन में भाग लेने. खुशवंत सिंह की वो मेहमान रहीं एक रात के लिये और उन्हें सोने के लिये उन्होंने अपना बेड ऑफर किया था. उन्होंने कहा कि आप मेरी मेहमान बन सकती हैं, एक शर्त पर कि आपको कल सबसे यह कहना होगा कि कल रात आपने मेरे बिस्तर में बिताई. और नरगिस दत्त मुस्कुरा दीं.
    (यह घटना बहुत क्षीण सी याद है मुझे, इसलिये कोई इस बात पर संदर्भ, लिंक, उद्धरण आदि प्रस्तुत करने को न कहे, अन्यथा मुझे कहना होगा कि इस घटना के पात्र व स्थान काल्पनिक है, किंतु प्रश्न का उत्तर देने के लिये इस घटना का उल्लेख वांछित था, अतः लिखना पड़ा)

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  12. भाई मैं तो अपनी इमेज को लेकर बहुत हलकान रहता हूँ इसलिए कई मधुर रिश्तों को भी न चाहते हुए भी तिलांजलि देनी पडी -
    मुझे लगता है पुरुष ही ज्यादा डरपोक /कायर होता है -नारी बेचारी नाहक बदनाम है......

    और माननीया न्यायाधीश महोदया ने अपनी जिम्मेदारियों में लड़कियों की शादी दिखाई है तो इसमें इतना चिहुंकने की क्या बात हैं? यह भारतीय समाजार्थिकी की एक कडवी सच्चाई है !

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  13. सच में बहुत गलत बात है. ये जज लोग भी बड़ी सफाई बात पलट देते हैं. मामला था आपने assets घोषित करने का और घोषित कर दिए liabilities. जरा इन महोदय से पूछना था इनके लडके या बिहार की सच्ची सामाजिक भाषा में कहें ब्लेंक चेक कितने हैं इनके पास ... क्यों ठीक है ना. :)



    और साथ में ये पूछना चाहूँगा की आज के ज़माने में क्या आप बिना किसी हिचक के किसी पुरुष के साथ बिस्तर शेयर कर सकते हैं :))

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  14. मेरे कमेन्ट में महोदय को महोदया पढ़े. वो जज साहिबा थी जिन्हें अपनी लड़कियां liability लगी थी. हाय रे अबला तेरी यही कहानी.....

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  15. @ विचार शून्य जी,
    इस तरह की घोषणा में Asset और Liability दोनों होते हैं। फॉर्मेट ही ऐसा होता है। मेरे विचार से उन्हों ने कुछ ग़लत नहीं किया। अगर पढ़ें तो अखबार ने भी political correctness का मुद्दा ही उठाया है। Voluntary declaration उन्हों ने जैसा उचित समझा, किया।
    @
    जरा इन महोदय से पूछना था इनके लडके या बिहार की सच्ची सामाजिक भाषा में कहें ब्लेंक चेक कितने हैं इनके पास ... क्यों ठीक है ना. :)

    नहीं, टिप्पणी के इस भाग से मैं सहमत नहीं। अनुमान/संकेत आधारित यह प्रश्न ही अनुचित है।

    @
    और साथ में ये पूछना चाहूँगा की आज के ज़माने में क्या आप बिना किसी हिचक के किसी पुरुष के साथ बिस्तर शेयर कर सकते हैं :))

    कोई समस्या नहीं बशर्ते उसे खर्राटे न आते हों, हाथ पैर न फेंकता हो, नींद में न चलता हो, रजाइयाँ अलग अलग हों, लाइट जला कर न सोता हो ... संक्षेप में ऐसी अनेक समस्याएँ हैं जिनके कारण अवायड ही करूँगा लेकिन इतनी गहन नहीं हैं जितनी एक स्त्री पुरुष मित्र की स्थिति में होतीं।

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  16. भेद खुलने के डर से? वरना किसी अन्य शहर मे अगर अलग अलग कमरे भी सोय़े तो कोन मानेगा? लोग तो बाते तब भी करेगे,

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  17. @ मो सम कौन और सोमेश जी,
    वाकई बहुत बड़ा विषय है और देखने पर लगता है कि चलताऊ ढंग से निपटा दिया। घटनाओं और गल्पों के माध्यम से विमर्श की परम्परा रही है जैसे पंचतंत्र या विक्रम बेताल। यहाँ आप लोगों के सामने रख कर कुरेद दिया ताकि दूजों की सुन सकूँ। कभी कभी सुनाने से अच्छा सुनना रहता है। है कि नहीं?
    @ सतीश चन्द्र सत्यार्थी जी,
    आप ने एक वर्तमान स्थिति की ओर बहुत सुलझे ढंग से अपनी बात रखी है। वाह! वाकई शिक्षा या शादी चाहे संतान लड़की हो या लड़का, माता पिता के लिए समान रूप से liability हो गए हैं। लेकिन ऐसी स्थिति रहे ही क्यों जो वयस्क संतानों की शिक्षा या विवाह liability हों?
    जयपुर जैसी घटना शेयर करने के लिए आभार।

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  18. @ रश्मि जी और मुक्ति जी,
    आप दोनों ने बुलन्दी के साथ अपनी बात रखी है। प्रतिपक्ष भी परवर्ती टिप्पणी करने वालों ने बताये हैं। ऐसी परिस्थिति एक पुरानी फिल्म में देखी थी जिसमें स्त्री पात्र ने पूछा था - जब मुझे कोई समस्या नहीं तो तुम्हें क्यों है? समाज के अत्याधुनिक हिस्से में कोई बात नहीं लेकिन बहुसंख्य भारत के साथ समस्या है। सामाजिक स्थिति और कंडीशनिंग ऐसी है कि पुरुष ऐसी परिस्थिति में स्त्री के भविष्य के बारे में सोचेगा। savior नहीं caring अधिक उपयुक्त होगा। ऐसा होना भी समाज की एक वास्तविकता को ही दर्शाता है। रही बात पुरुष के दामन पर छींटों की तो लोग उसके मामले में भूल भी जायेंगे लेकिन स्त्री के लिए यादें सँजो कर, मसाला लगा कर बढ़ाते रहेंगे। अभी भी कुछ खास नहीं बदला।

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  19. @ सलिल जी
    :) धन्यवाद साझा करने के लिए।

    @ अरविन्द जी,
    आप की बात बहुसंख्य समाज के एक भद्र पुरुष का पक्ष है। सहमत हूँ।

    @ भाटिया जी,
    आप ने समय के उस पक्ष की ओर संकेत किया है जहाँ ठहराव कुछ अधिक ही है।

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  20. @ मो सम कौन
    प्रेस के सनसनी फैलाने वाले पक्ष की ओर अच्छा इशारा किया आप ने। ...संक्रमण काल है और इस तरह की बातें हमें बताती हैं कि अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। प्वाइंट नं 2 में आप ने बहुत स्पष्टता के साथ अपनी बात रखी है।
    .....

    आखिर में आप सब को धन्यवाद, आभार। स्त्री अबला न है और न रहेगी। क्रमश: समाज समता की ओर बढ़ रहा है। सब अच्छा ही होगा।

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  21. विचारणीय लेख हैं गिरिजेश भाई ! हार्दिक शुभकामनायें

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  22. गिरिजेश जी,
    मेरा कहना सिर्फ इतना था कि पुरुष को अपनी इज्जत की भी परवाह होती है,सिर्फ स्त्री की बदनामी की आशंका ही नहीं होती.
    उसमे caring की भावना है,इसका अर्थ है, वह सभ्य और शिष्ट है. तो उसे अपनी महिला मित्र की बदनामी की चिंता के साथ-साथ अपनी इज्जत की भी उतनी ही फ़िक्र होगी.

    पुरुष के दामन पर छींटो पर समाज की प्रतिक्रिया की बात तो बाद में आती है...पहले वह इन छींटो के लिए तैयार होगा ?
    मुझे सिर्फ इस सोच पर आपत्ति थी कि लोग सोच लेते हैं....ऐसा वह स्त्री के बचाव के लिए कर रहे हैं जबकि वह खुद भी अंदर से डरे हुए होते हैं और अपनी इमेज की भी उतनी ही चिंता होती है.

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  23. @सलिल जी,
    नर्गिस और खुशवंत सिंह के बीच संवाद वाला वह किस्सा शायद मैने आपके बाद पढ़ा होगा,इसलिए मुझे पूरा याद है. दरअसल नर्गिस जी के बच्चे उन दिनों हॉस्टल में थे और वहाँ कोई ढंग का होटल नहीं था पर खुशवंत सिंह का बंगला था, वहाँ. नर्गिस जब बच्चो से मिलने जातीं तो ठहरने की समस्या आती.
    दोनों राज्यसभा के सदस्य थे,जब बातो बातो में नर्गिस जी ने ये समस्या बतायी तो खुशवंत सिंह ने अपना बंगला ऑफर किया पर उसी शर्त के साथ, जिसका जिक्र आपने किया है.

    लीजिये हमने ताकीद कर दी कि आपको क्षीण सी पर सही घटना ही याद थी...:).इसे काल्पनिक कहने की जरूरत नहीं,अब.

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  24. बहुत ही सार्थक चर्चा का पठन हुआ।

    गिरिजेश जी, आभार!!

    भय चाहे स्त्री की बदनामी का हो या पुरुष की स्वयं की बदनामी का। यदि कहीं भी चरित्र-भीरूता है तो प्रशंसनीय है। स्वयं के लिये हो या परवाह न करने वाले के लिये हो।

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  25. अमिताभ बच्चन ने कहा था अभिषेक की शादी के बाद अब जल्दी से पोता हो जाए और मीडिया / अख़बार की सुर्ख़ियों मे खबर थी पोता चाहिये पोती नहीं ?!!
    बेटी और बेटे मे चाहत आज भी बेटे की इसीलिये ज्यादा हैं क्यूनी उसके ऊपर जो खर्च होता हैं वो कहीं बाहर नहीं जाएगा । उसकी शादी पर मिलेगा { मांगना जरुरी नहीं हैं जी लड़की वाले देंगे }
    लड़की कितना भी पढ़ी लिखी क्यूँ ना हो उसकी आमदनी माता पिता को नहीं चाहिये
    जज महोदय ने सही लिखा हैं जिस घर मे भी बेटी होती हैं माँ उसके लिए गहने कपड़े जोड़ना शुरू करदेती ही हैं ।

    बात मे फरक सिर्फ इतना हैं की उन्होने शादी योग्य बेटी की शादी को लायाबिल्टी माना हैं ना की बेटी
    लोग उसको कैसे पढ़े उनकी अपनी समझ हैं
    अभिभावकों के लिये शादी एक लायाबिल्टी ही होती हैं
    अगर आप को याद हो अल आ ई से को अपना एक विज्ञापन बदलना पडा था जिस मे उन्होंने बेटे की पढाई और बेटी की शादी को "जिम्मेदारी " माना था । बाद मे उसको बच्चे कहा गया था ।

    liability is marriage of a marriageable daughter and not the daughter , but in coloumn its not possible to distinguish it so

    we/media have to understand this and stop finding problems where there are none

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  26. stree mitr ke pratee samaj ki partikriya
    to aap ke mutabik sahaj hai magar gharwalo ka aap ke pratee kya prtikriya
    hogi jnaab.

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  27. यह liability तो उत्तरदायित्व का हीं दूसरा नाम है... ;)
    अब मै यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि जज साहिबा गलत कहाँ हैं? बेटा हो या बेटी, उनको पालना तो अपना दायित्व बनता है...और शादी-व्याह तो लालन -पालन का हिस्सा कह लीजिये, परिणति कह लीजिये, है. और यह पूर्णरूपेण politicaly correct है, अगर इत्ती सी बात पर कुछ मगज मूढ़ अखबारनवीस हल्ला मचा रहे हैं तो उनपर तरस खाने के सिवा और कुछ नहीं किया जा सकता है.
    बहुत पहले, जब दूरदर्शन का भी एक हीं चैनल हुआ करता था, के पी सक्सेना जी एक बार किसी प्रोग्राम में एक कविता सुनाये थे..."का करूं सजनी, आये ना बालम" सारांश कि उनके कोई पडोसी दिन-रात यही गाना गुनगुनाते थे और अपने सक्सेना साब सोंचते थे कि क्या जमाना आ गया है... आज कल मर्द भी बालम को बुलाने लगे हैं... और एक दिन उन्हों ने अपने पडोसी से पूछ ह़ी दिया और उनके पडोसी ने कुछ यूँ जवाब दिया...'सक्सेना साब, मेरा बालम है मेरे बच्चों की फीस, मेरा बालम है मेरी बीवी की दवाई का पैसा, बिटिया की दहेज़ आदित्यादि... मतलब यह है लाइबिलिटी रूपी सजनी के लिए एस्सेट रूपी बालम का जुगाड़ तो करना पड़ता है, चाहें वह जज साहिबा हों या सक्सेना साब के पडोसी. :)))

    अब ज़रा देखा जाए दूसरे विन्दु को भी:
    यह तो तय है कि यह पूरी पूरी मानसिकता वाली बात है, और जहां तक मैं समझता हूँ, यह मानसिकता एक दिन में नहीं बनी है. इतिहास कि बात इतिहास हीं जानें लेकिन मेरा मानना यह है कि संबंधों में सार्थकता तभी तक रहती है जब तक दोनों पक्षों में सहजता रहती है. सहजता ख़त्म और वह सम्बन्ध अपनी मौत से पहले मरने के लिए मजबूर हो जाता है. वह चाहें एक स्त्री -पुरुष का सम्बन्ध हो, पुरुष-पुरुष का या कि स्त्री-स्त्री का.

    भारत में तो उतना नहीं दिखा लेकिन US और Europe में ऐसी असहज स्थितियों का ख़ास तौर पर स्त्रियाँ और विपक्ष अच्छा खासा फायदा उठा ले जाते हैं... जुलियन अस्सांज, फनेश मूर्ति और बोरिस बकर इत्यादि इत्यादि का उदहारण सामने है. और यह देखते हुए मैं रश्मि जी से सहमत होते हुए कहूंगा कि "पुरुष जीवन हाय ...." हीं सत्य है.......

    और अंत में, लड़कियों को लाइबिलिटी मानने वाले लोग सिर्फ भारत में ह़ी नहीं या सिर्फ दक्षिणी एशिया में ह़ी नहीं है बल्कि फ्रांस, बेल्जियम, जापान और सिंगापोर जैसे विकसित देशों में भी पाए जाते हैं. फ्रांस में मेरे एक परिचित को एक ह़ी बेटी है और अब उनको चिंता सता रही है कि उनकी सारी संपत्ति और फैमिली शातौ जो है वह किसी और फैमिली ट्री में चला जाएगा क्यों कि बिटिया किसी ना किसी से शादी तो करेगी हीं और जब शादी करेगी तो अपना फैमिली नाम भी बदलेगी और ...... बाकी सब भविष्य के गर्त में है.....

    और अंततः, अगर गलती से मेरे विचारों, शब्दों, आदित्यादि से दुःख हो किसी को, तो करबद्ध हूँ, माफ़ी मांगता हूँ

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  28. आपको नव वर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनायें ...स्वीकार करें

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  29. मैं तो अरविन्द जी की हल्कानियत से हलकान हूं :)

    ये तो माना कि पोस्ट में उठाये गए सवालों पर अपनी भी कुछ धारणाएं हैं पर नए साल में कुछ दिन तो अमन चैन से बीतने दीजिए !

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