दिन के दस से उपर हो चुके हैं। दु:खद यादें बीत चुके कई सालों की शहरी
औपचारिकता सी होली की टीसों से जुड़ कर और भारी हो चली हैं। बैठा नहीं जाता। कनखी
से संजय को देखता हूँ। एक अपरिचित ज़गह पर परिचितों का साथ - वह बेलाग सा बैठा है।
क्या आज वह भी निराश होगा ? नहीं ! कुछ झटक देता हूँ।
मन की झटक का असर देह को झँझोड़ उठा देता है - चलो होली खेल आया जाय।
पिताजी पूछते हैं - अभी ? अच्छा जाओ।
"रंग तो ले लो।"
"नहीं, अबीर है।"
गेट को पार करता हूँ। औपचारिकता अभी भी साथ साथ है लेकिन सहमी हुई है।
सामने हमारा पुराना घर।
शुरुआत यहीं से।
त्रिभुवन का भी घर है। साथ हो लेता है। सगी मौसी जो सगी चाची भी हैं। चाची।
लाला। भैया। भाभियाँ.... रिश्ते ही रिश्ते ! कितने करीब के !! लेकिन भूत की घटनाओं
के दु:ख रिसते रहे हैं। कटुता काठ हो चली है। औपचारिकता ऐसे अवसरों पर भरपूर
अभिव्यक्ति पाती रही है। यह होली भी ... एकाएक निर्णय लेता हूँ - नहीं आज नहीं ।
आज सब टूटेगा। वैसी ही होली होगी जैसी कभी होती थी..
अपने से बस 24 दिन बड़े भैया वाली भाभी
को पुकारता घर में घुसता हूँ। मौसी आवाज़ देती हैं,
"अरे कहाँ बाड़ू हो ? देख गिरिजेश
आइल बाडें।" मौसी का स्वर - स्नेह है, आस है, उल्लास की प्रतीक्षा है। देखता हूँ - सभी कोरे हैं। जैसे आज भी आम दिन हो।
भाभी को पकड़ पूरे चेहरे पर गुलाल मल देता हूँ। निमंत्रित करता सा प्रतिरोध
- अरे बाबू, मुहँवा पर दाना निकलि
जाई।
"न डेरा भाभी, ए अबीर में केमिकल
नाहीं बा।"
छोटकी - छोटी भौजी को भनक लग जाती है। माता सरीखी उमर की बिहारी भाभी। ग़जब
लड़ाकू !
"ए बबुआ ! अइसेही चलि जइब?"
" अरे केहू लगाई तब न !"
चुनौती ! छोटकी की आँखें चमक उठती हैं। सचिता भैया वाली भाभी को पुकारती
हैं, " अरे आव हो,
रंग ले आव।"
लड़ाकू भाभियाँ - भागो!
संजय तो लाला के पास कुर्सी पर बैठा है। त्रिभुवन और भैया उससे परिचयात्मक
बातों में लगे हैं। अकेला घिर जाता हूँ। कोई प्रतिरोध नहीं - तीन तीन भाभियाँ।
गुलाबी गुलाबी रंग। पूरे चेहरे पर रंग पुत जाता है। एक भाभी दौड़ा लेती हैं - भैया
भाग कर कोठरी में बन्द हो जाते हैं। दरवाज़ा पीटा जा रहा है। त्रिभुवन पर बाकी दो
भिड़ गई हैं।
संजय की बारी है। तीन तीन भाभियाँ ऊँचे शरीर को घेर उसे सूखे, गीले रंगों से सराबोर कर देती हैं।
बेचारा ! मारे संकोच के दोनो हाथ उपर किए हँस रहा है, चिल्ला
रहा है कि बरज रहा है ? चाची मुँह दबा आँचर ढकी हँसी हँसे जा
रही हैं। बेचारा त्रिभुवन बन्दर बना दिया गया है। यह तो एकतरफा हो गया !
अभी भी कुछ अधूरा है। देखता हूँ - भाभी का चेहरा तो कोरा है। एक झोंका सा
आता है - नवेली भाभी के कमरे में जाते संकोच होता तो मौसी टोक देतीं थी। "अरे
देवर त आधा मरद होला। कैसन लाज ?"
.. भाभी कोरी है। नहीं, रह गईं तो होली अधूरी
रह जाएगी। क्या करूँ, रंग तो लाया ही नहीं !
और अचानक ध्यान आता है - मेरे चेहरे पर तो ढेर सारा सूखा रंग लगा है। भाभी
को पकड़ लेता हूँ और उनके गालों से अपने गाल रगड़ने लगता हूँ। जोर जोर से - देर तक, पूरी लगन से। भाभी रंग जाती हैं -
गुलाबी गुलाबी। हक्की बक्की। सभी हक्के बक्के - अप्रत्याशित कर्म - गिरिजेश से तो
कत्तई यह उम्मीद नहीं थी !
और फिर एक साथ फूटते हैं कई हास - सहज, निर्मल, उत्सवी। काठ मन भीग भीग बाग
बाग हो उठता है।
देखता हूँ - मौसी ठठा कर हँस रही हैं। गिरिजेश, तुम्हारा आना सफल हुआ !
... गाँव की ओर चार जनों का काफिला निकल पड़ता है। सचिता
भैया का छोटा भाई त्रिभुवन बताता है - भैया ! आठ वर्षों के बाद इस घर में ऐसी होली
हुई है। ... सचिता भैया! बड़की भौजी !! खुश हो रहे हैं न आप दोनों ?
...
.. कढ़ुवार के किनारे बकरे हलाल हो रहे हैं। मीट का कम,
उसके साथ के दारू का अधिक खयाल है - चन्द भाई लोग जो कभी हुलास
हुल्लड़ के लिए जाने जाते थे, चुपचाप अगोर रहे हैं। इस गाँव
की उत्सवी खुशियों को दारू पी गई ! ...
दूसरे घर में घुसते संजय को बताता हूँ - यहाँ भाभी तुम्हारे इतनी लम्बी हैं, बला की सुन्दर और बला की खिलाड़ी !
लेकिन, भाभी चुपचाप आ खड़ी होती हैं - तबियत खराब है। सही या
झूठ। ओढ़ी गई गम्भीरता झूठ को उघाड़ देती है। अबीर लगा हमलोग चुपचाप वापस हो लेते
हैं। बाकी घरों में भी कमोबेश यही हाल। औपचारिकता, नाटक,
बहाना ... कहाँ गया वह उल्लास जो भुला देता था - आँखों के नीचे की
कालिमा, कमर का दर्द, नालायक पति,
बीमार बच्चे, दरिद्रता ...और एक दिन, बस एक दिन के लिए हर भाभी उल्लास की देवी बन जाती थी! ... मन फिर काठ होने
लगता है।
हमलोग उत्तर पट्टी के विशाल दालान वाले बड़े घर में प्रवेश कर ही रहे हैं
कि ठिठक जाते हैं ... दूसरा अप्रत्याशित। यहाँ गौरवर्णा सामान्यतया अति गम्भीरा
भाभी श्यामा बनी अकेले पाँच जनों के साथ होली खेल रही हैं। गुलाबी, लाल, हरा,
पीला, नीला ... सब रंग मिल उन्हें श्यामा बनाय
दिए हैं। इतना सहज उल्लास ! संजय मूर्तिवत हो चला है।
मोरि भरि द गगरिया हो श्याम कहें ब्रजनारी ... यहाँ तो ब्रजनारी स्वयं
श्याम बनी हुई है।
"अरे बबुआ! असो रउरहू आइल बानीं ? इहाँ के के हईं?" संजय का परिचय देता हूँ तो
भाभी किसी के उपर रंग उड़ेलते शिकायत करती हैं - पहले बताना था। पता लगवा देती कि
होली कैसी होती है !
मैं बस देखे जा रहा हूँ। दुखिया भाभी इस रूप में ! ... सब कुछ नहीं मरा रे!
अभी बहुत कुछ जीवित है। मैं बेसाख्ता हुड़दंग में सम्मिलित हो जाता हूँ। छीना झपटी, लिपटा लपटी, पोता
पोती, पटका पटकी ...सब होता है। संजय बस देखता ही रह जाता
है। और मैं ? बस सौन्दर्य की प्रशंसा में क्षण भर को मगन हो
जाता हूँ। इतने छोटे क्षणों में क्या क्या नहीं आ जाते हैं, चले
जाते हैं ? समय का मापन सचमुच जड़ है। भाभी के शरीर से चिपकी
हुई साड़ी सुन्दर देहयष्टि को ... । भरी पुरी शरीर। आयु का कोई प्रभाव नहीं।
श्यामा! नाचे श्यामा !! दिव्याम्बरा, प्रगल्भा, मर्यादित। भाभी के इस नारी रूप को देखना था ! सुफला गाँव आना !!
हँसी, सुन्दर श्वेत दंतावली।
रंग को नहीं सहन हुआ। जाने कहाँ से गुलाबी रंग अधराश्रय ले मुँह में - दाँत हुए
गुलाबी गुलाबी । भाभी ! ...
संजय के साथ मुझको भी निमंत्रण मिलता है - अगले साल ज़रूर आना। होली खूब
जमेगी। अभिभूत संजय। कुछ देर चुप रहने के बाद बहुत कुछ कह जाता है। मैं बस एक शब्द
में समेट रहा हूँ - अद्भुत। भाभी अद्भुत लगीं।
कैमरा हर ज़गह साथ नहीं होना चाहिए। सब कुछ साझा तो नहीं किया जा सकता !
पंडित टोला चलने का निमंत्रण संजय ठुकरा देता है। चाणक बाबा के होली गायन
का लालच देता हूँ लेकिन वह थकान का बहाना बनाता है। समझ रहा हूँ, वह उन क्षणों को तनु नहीं करना
चाहता। देख लिया, अब क्या सुनना !
...एकदम भरे हुए, परिपूरित हमलोग घर
वापस आ जाते हैं। दुपहर में गवैये गा रहे हैं -
"जब से हो लटकन गिर गयो नींद नहिं आयो " मैं
बुदबुदाता हूँ - नहीं लटकन गिरा नहीं रे अभी सलामत है।
...तिजहर। औपचारिक अबीर मिलन। हमलोग तो रंग अबीर सब दिन में
ही कर चुके हैं। पिताजी के साथ दुआरे बैठे हैं। अब लड़कियाँ निकली हैं। गोरी,
काली, सुन्दर, कुरूप,
धनी. निर्धन ... चहकती छोरियाँ। बाबुल के आँगन की शोभा बढ़ाती
छोरियाँ। खिलखिलाती। खुश। रंग बिरंगी तितलियाँ। पिताजी गिनते हैं - दू, तीन, सात.... अधियरा पट्टी में बाइस। अपनी पट्टी -
सोलह। उत्तर पट्टी - बीस... संजय को बताता हूँ - गन्ने की उपज का एक बड़ा हिस्सा
इनके ब्याह में लग जाएगा। पिताजी बताते हैं - लड़कों की तुलना में अपने गाँव में
लड़कियों की संख्या करीब एक तिहाई भाग जितनी अधिक है। कहीं गहरे संतोष होता है।
लिंगानुपात 1333। इस 'विपरीत लैंगिक
अस्ंतुलन' के कारण ?
ग़रीबी - गर्भ परीक्षण खर्चीला है। पिछड़ापन - सब भगवान की देन है। ...
चाहे जो हो, कम से कम इस गाँव में तो
मामला अलग है।
रात घिर आई है। अचानक कोलाहल। बाहर आता हूँ। सामने कोई छ्त से कूद पड़ता
है। ग़नीमत है - छप्पर पर गिरा। अधिक चोट नहीं आई। भीड़ घिर आई है। पियक्कड़ कूदा
क्यों?
अम्मा राज़ की बात बताती हैं - माँ को अपने इस छोटे बेटे से गहरी शिकायत
है। घर में बँटवारा करा दिया। दारू पीता है। दो वर्षों से माँ ने अपने इस बेटे से
बात तक नहीं की। आज होली के दिन बेटे ने माँ को मनाने की ठानी। खाना बनवाया और उसे
खिलाने की ज़िद कर बैठा। कुछ माँ की बेरुखी और कुछ दारू का नशा - कूद गया।
... लटकन गिर गयो । इस गाँव में लटकन गिरते रहेंगे। मन में
किसी पुरनिया का आक्रोश भरा स्वर उठता है - विनाश होगा। चन्देलों की संतान जब
मद्यप होगी तो विनाश होगा। ... चुप हूँ। कुछ समझ में नहीं आ रहा। माँ ठीक है कि
बेटा? पुरनिये क्या सही थे? क्या दारू
वाकई खराब होती है ?
... गाने वाले को लटकन गिरने से नींद नहीं आती थी लेकिन मुझे
नींद आ रही है ... लटकन, भाभी, दिव्याम्बरा,
गुलाबी दाँत, रंग, हँसी,
बबुआ अगले बरिस फेरि अइह, भाभी ! ... सब
मिथ्या है। बस तुम ही हो। तुम सच हो। ...मोरि भरि द गगरिया ... श्यामा... भाभी !
... अगला दिन। दो मोटरसाइकिलों पर पीछे लदे मैं और संजय
गोरखपुर को चल पड़ते हैं। मैं पीछे मुड़ कर नहीं देखता। पता है घर के पिछवाड़े
चबूतरे पर से दो जोड़ी लबलबाई आँखें जाते बेटे की पीठ को सहला रही होंगी। उचक उचक
कर देख रही होंगी। मोटरसाइकिल के पीछे एक जोड़ी आँखें और डबडबा जाती हैं। पानी उफन
आया है। सड़क के किनारे किनारे पानी भरी आँखों में जैसे भाग रहे हैं -मेंड़ पर
लहलहाती भाँग, भाटिन... गाँव में भैया, भाभियाँ... दिवंगत सचिता भइया और बड़की भउजी, छोटकी,
अम्मा, पिताजी, पीता,
काका, चाचा, चाची,
मौसी... (समाप्त)
