शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

पीलिया

जनवरी के वे खास दिन चल रहे थे जब सुबह, दुपहर, शाम,रात सब ठंढ के मोमजामें में लिपटे ठिठुर रहे होते हैं और जगह जगह अलाव पीलिया जैसी बीमार सूरत लिये बुझे बुझे से नज़र आते हैं। उन्हें तापते ऐसा लगता है जैसे सीना रजाई में हो और पीठ पर फ्रिज खुला हो। उस दौरान कोहरा समय की बारिश से भीगता रहता है।
जैसा कि होना ही था, उस दिन भी कोहरा शाम से भीगा हुआ था। सब्जी लेकर बाज़ार से वह पैदल ही लौट रहा था। उसे ठंढ अधिक लगती है और इस समय तो वह यह हिसाब भी कर रहा था कि पिछ्ले दिनों के मुकाबले सौदे में कुल कितना लुटा, लिहाजा उसकी चाल उसकी टाँगों की लम्बाई के समानुपाती नहीं रह गई थी। अमूमन जब बोझ होता है तो आदमी तेज चलता है लेकिन अधिक रूपये गिनने के बावजूद झोला इतना भारी नहीं हुआ था कि उसका कोई प्रभाव बाहरी गणित पर पड़ता।
सड़क के उस खास टुकड़े पर वह रुका जिसके ठीक ऊपर सोडियम लाइट पीलिया उगल रही थी। उसे लगा कि सौ रूपये के धोखे में उसने सब्जी वाले को पाँच सौ का नोट पकड़ा दिया था और उस बेईमान ने उसे सिर्फ तीन रूपये वापस किये थे। उसका हाथ अपनी नाक पर गया जो इतनी ठंढी हो चुकी थी कि ठंढ में अलग सी ठंढी लग रही थी। उसे अपनी पत्नी की डाँट का ध्यान आने ही वाला था कि उससे रगड़ खाती सी एक स्कूटी आ रुकी।
उसने नज़रें उठाईं और मर्दाना और जनाना आवाजें एक साथ बोल पड़ीं - तुम! एक में आश्चर्य था तो दूसरी में परिचय और ...
समय ने पीछे हो कर उन्हें गुदगुदाया और दोनों एक साथ खिलखिला उठे। अकस्मात ही सोडियम लाइट बुझ गई। भिगो रही पीली शाम गायब हो गई और कोहरा सूख चला।
'तुम अब भी वैसे ही हो, बस चेहरा थोड़ा गोल हो गया है और नाक कुछ कम लम्बी।'
'हाँ, तुम गोल मटोल हो गई हो और कुछ छोटी भी। तुमने मुझे पहचान कैसे लिया?'
'ऐसी ठंढ में सिर्फ एक ही आदमी अपनी नाक की परवाह कर सकता है।'
हँसते हुए दोनों ने एक दूसरे के बारे में पूछा तो पता चला कि दोनों बस दो ब्लॉकों की दूरी पर थे और दोनों के दो दो बच्चे थे। उन्हें आश्चर्य भी हुआ कि वह पिछ्ले दो वर्षों से यहाँ रह रहा था और मुलाक़ात ही नहीं हुई!
'तुम रोज बाज़ार आती हो?'
'नहीं, कभी कभी। लेकिन समय यही होता है। कभी भाभी और बच्चों को लेकर आओ।'
'तुम भी कभी जीजा और बच्चों को लेकर आओ।'
भाभी! जीजा!! - दोनों फिर एक साथ खिलखिला उठे।
'कुछ खट्टी मिठ्ठी कर लें?'
वह शरमाई थी जिसे अन्धेरे में किसी ने नहीं देखा।
'तुम्हारी नाक अब भी अड़ती है।'
'तुम्हारे होठ अब भी कम पड़ते हैं।'  
हा, हा, ही, ही करती हुई सोडियम लाइट फिर से जल उठी।
'चलो तुम्हें घर छोड़ दूँ।'
स्कूटी पर पीछे बैठे उसे लग रहा था कि सीने  पर रजाई की गर्माई है और पीठ पर फ्रिज खुल गया है।
घर उसकी पत्नी ने पूछा – तुम्हारी  नाक कितनी लाल हो रही है! बाहर बहुत ठंढ थी?
'नहीं, बहुत गर्मी थी। ...कल से तुम सब्जी लाना।'
'अरे! इसमें मुँह फुलाने की क्या बात है? बाज़ार तो तुम्हें ही जाना होगा।'
उसने घड़ी की ओर देखा, समय को मन में बैठाया और अपनी पत्नी से बोला - महँगाई बहुत बढ़ गई है। कुछ चीजें कभी महँगी नहीं होतीं।
'जैसे?'
'जैसे  - ठंढ। कोहरा। सड़क के किनारे पीली लाइट।'
'आज कैसी बहकी बहकी बातें कर रहे हो?'
'मुझे लग रहा है कि मैं सौ के धोखे में पाँच सौ दे आया।'
उसकी पत्नी ने उसे कोसना शुरू कर दिया।...
औरत के घर पहुँचने पर जो हुआ, उसे कभी पता नहीं चला क्यों कि हर शाम सब्जी लाते रहने के बावजूद उनकी दुबारा मुलाकात नहीं हो पाई और मार्च में उसका ट्रांसफर हो गया।
वहाँ दूर दक्षिण में न ठंढ पड़ती है और न कोहरा। भीगने सूखने को कुछ नहीं और सड़कों पर सोडियम लाइटें पीलिया उगलती रहती हैं।
उसने सब्जी लाना छोड़ दिया है। कहता रहता है - महँगाई बहुत बढ़ गई है। उसे अब गर्मी भी बहुत लगने लगी है। गाहे बगाहे बीवी बच्चों से छिपा कर फ्रिज का दरवाजा खोल देता है और ठंढ से अपनी पीठ सेंक लेता है।
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चित्राभार: www.flickr.com, सम्पादन - स्वयं                      

24 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल ताजी लगती है यह कहानी। सब्जी की महंगाई, कड़ी ठंड, कोहरा और रजाई की गर्मी। लेकिन यह मार्च का ट्रांसफर अभिए बता दिए? उससे बोलिए मुहल्ले का घर-घर देख आएगा। जीजा और बच्चों से भी मिलना हो जाएगा।

    ओह, हम भी कैसी सत्यकथा बूझने लगे। यही तो रचनात्मकता है। पाठक यह सोच ही नहीं पाये कि यह फिक्शन भी हो सकता है- खालिस कल्पना। आप बहुत गुरू हैं।

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  2. ये जनवरी का पीलिया बहुत जानलेवा होता है। लेकिन आचार्य ट्रांसफ़र तो मई में ड्यू है:)

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  3. कहानी तो मस्त है ही, मैं मुग्ध हूँ इन दोनों चित्रों को देखकर, क्या सही टाइम पर उपयोग किया गया है। पढ़ते समय एक बार जरूर यह लगा कि ये चित्र खास इसी कहानी के लिये ही बने हैं।

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  4. सीना रजाई में और पीठ पर फ्रिज जैसी कोई साधना भी बताई जाती है, जिसमें ठंड की रात में सामने जलती आग तापते, नदी के किनारे खुली पीठ बैठना होता है.

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  5. @ राहुल सिंह जी,
    धन्यवाद। मुझे यह बात नहीं पता थी लेकिन देखिये यूँ ही आ गई।
    ...पिछले जन्म का कोई भ्रष्ट साधक हूँ शायद ;)

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  6. आपकी कहानियों में लिखित तो कम होता है पर अलिखित बहुत कुछ होता है। अधूरेपन में भी एक ज़ायका है।

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  7. बहुत अच्छी नहीं लगी यह कहानी।
    ..सीने पर रजाई की गर्माई है और पीठ पर फ्रिज खुल गया है।..यह पंक्ति अच्छी है मगर दो बार प्रयोग होने से सौंदर्य कम हुआ है। नाक लंम्बी और होंठ छोटी पढ़ने पर उत्तेजना बढ़ती है लेकिन अंत टांय-टांय फिस्स!

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  8. दक्षिण स्थानान्तरण हो गया। क्या महाराज जी, हमको भी शक के घेरे में लपेट रहे हैं।

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  9. देवेन्द्र जी से असहमति.. मुझे तो लगता है दो बार प्रयोग होने से ही उस पंक्ति का मूल भाव और सौंदर्य उभर कर आता है...

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  10. यह रचना भी एक चमत्कार लिए है. आभार.

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  11. ज्यादा ठण्ड हो तो थोड़ी देर के बाद नाक फील नहीं होती. छू के देखना पड़ता है कई बार.

    चाल और टांगों की लम्बाई से अपने एक मित्र नवीन पर्वत की याद आई. असली नाम नवीन गिरी था लेकिन 'नवीन पर्वत' लिखवा दिया था हमने स्कूल में भी :) जब हम कहीं बैठे होते और वो चल के आता तो हम कहते... 'ओए होए क्या चाल है एकदम चाल बराबर दूरी बटे समय'.
    बाकी कहानी तो बढ़िया है ही. महंगाई की मार ने कहानी को भी नहीं छोड़ा है.

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  12. @खट्टी मिठ्ठी
    वाह जी, इतनी सर्दी में जायका बदल दिया...... दिमाग का....

    @भाभी! जीजा!! -
    दोनों फिर एक साथ खिलखिला उठे...

    शब्दों के साथ चित्रों का सुंदर संयोजन .......... आप शब्दों को भावनाओं से कोकटेल करना जानते हैं और जो सरूर आता है..... वो इस कहानी में नज़र आ रहा है

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  13. बहुत सुंदर जी, आप की यह कहानी सच सी लगती हे

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  14. दोस्तों
    आपनी पोस्ट सोमवार(10-1-2011) के चर्चामंच पर देखिये ..........कल वक्त नहीं मिलेगा इसलिए आज ही बता रही हूँ ...........सोमवार को चर्चामंच पर आकर अपने विचारों से अवगत कराएँगे तो हार्दिक ख़ुशी होगी और हमारा हौसला भी बढेगा.
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  15. इश्वार ने नाइंसाफी की है मेरे साथ...आँख दी के आपकी पोस्ट पढ़ सकूँ...दिल दिया के उसे समझ सकूँ...लेकिन शब्द नहीं दिए जिस से आपकी प्रशंशा कर सकूं...लाजवाब लेखन...रजाई और फ्रिज की तुलना से तो कमाल कर दिया है...
    नीरज

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  16. हूं!
    शब्दचिह्न : कहानी की बजाय शब्दचिह्न : ऑटोबायोग्राफी ज्यादा जमता। नहीं?

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  17. .
    .
    .
    कुल मिला कर कहानी में माहौल अच्छा बना था... लेकिन सच कहूँ तो अंत कमजोर है...



    ...

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  18. भाभी जी और जीजा जी के संबंधों पर आ टिकना एक किस्म का पीलिया ही माना जाएगा ! सामाजिक मान्यतायें भी अलाव जैसी होती जिनके सामने , हम पीठ दिखाने वाली शर्मिंदगी से बचने के नाम पर भाभी और जीजा जी वाला चेहरा / सीना तान देते हैं !

    [ पक्के तौर कह नहीं सकता कि मेरी टिप्पणी मनु /उर्मि को संबोधित है ]

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