सोमवार, 16 मई 2011

टोटका

पूनम के एक दिन पहले रात की बात।
चन्द्र किरणों को पकड़ आँगन की ग्रिल जाली से स्वयं को खंड खंड करता वह उतरा है। डाइनिंग टेबल के पास खड़ा बस मुझे घूरे जा रहा है। 
इस अन्धेरे में सिर्फ स्क्रीन की रोशनी में लिखने को आतुर मेरी अंगुलियों को उसकी दृष्टि भेदती है। मुझे खीझ होती है, वैसी ही खीझ जो कल्पित प्रेमिका के कुंतल केश रचते समय पत्नी की बाल झड़ने की शिकायतों से होती है - अरे बाबा! यही समय मिला है? केश इतने दिन कायम रहे यही क्या कम है? तुम्हारी रसोई के भोजन से नहीं, माँ के दुलार से नहीं; इन्हें रोज खिंचते रहने के कारण मजबूती मिली। अब उन कसाइयों को इन्हें खींचने में मज़ा नहीं आता। उन्हें नई उम्र के होनहार वीरवान मिल गये हैं जिनके केशों से पसीना नहीं लाल पानी टपकता है। खींचना छोड़ दिया तो इनकी मजबूती भी जाती रही। अब तो गिरने ही हैं।
 नहीं, बाप का नाम न लेना, वह तो पैदाइशी खल्वाट था। 
मुझे अपनी खीझ पर हँसी आती है। इस अन्धेरे में अंगुलियों से उसकी दृष्टि की राह का पता कैसे चला? हर राह उजली नहीं होती और आँगन में उतरती हर धूप में ब्राउनियन नन्हें धूल लल्ले लुकाछिपी नहीं खेलते। 
परदे की झलझल के पीछे वह खड़ा मेरे ऊपर मुस्कुरा रहा है क्या? चाँदनी रात में धूप की बातें करता है! 
सुनो! आज तुम्हारे ऑफिस में फिर एक हत्या हुई - स्वामीनाथन ने उस पेपर पर दस्तखत कर दिये। अब उसके दिल से टपकते लहू से सैकड़ो रक्तबीज पैदा होंगे जो तुम जैसे बिलबिलाते नपुंसकों का डिनर करेंगे। 
सुनो! आज फिर बलात्कार हुआ। बगल के ऑफिस में वह श्यामजी है न? उसकी बॉस, अरे वही तुम्हारी लंच टाइमपास वाली, ने उसके करिअर पर रेड लगा दिया। अब तीन साल तक कोई आस नहीं। नौकरी भी नहीं छोड़ सकता। क्या जाता उसकी बीवी का जो बॉस की बात मान लेता? उसका भी कुछ नहीं बिगड़ता। अच्छी भली तो है उसकी बॉस - महँगे परफ्यूम, गोरा नूरेचश्म चेहरा और स्लिम भी।...उसकी बकबक से अधिक जहरीली उसकी मुस्कान है। दाँत अन्धेरे में चमकते हैं।  
मैं उसे गाँ_ गाली कहते झपटा हूँ। असल में मैं ऐसी गाली दे ही नहीं पाता जिसमें स्त्री की मर्यादा,चाहे वह कितनी ही कल्पित दूर के रिश्ते वाली ही क्यों न हो, लांछित होती हो। 
पक्के मर्दवादी हो तुम! बलात्कार के मायने ही बदल दिये! 
संस्कृत पढ़ो बच्चे! संस्कृत।
देखो, आजकल मैं बहुत कष्ट में हूँ।
क्यों बवासीर टभक रही है क्या? सरदार वाला जोक सुनाऊँ क्या? 
चोप्प! जाने कितने डेसिबल का शोर हुआ है! 
भक्क! ट्यूब लाइट भक्क से जल गई है। 
सो क्यों नहीं जाते? इतनी रात गये ऐसे चिल्ला रहे हो! ऐसा तो शराबी भी नहीं करते। 
मैं फुसफुसाया हूँ - धीरे बोलो। लॉन के बोगेनबिलिया के पीछे सिमटी पँड़ुकी जाग जायेगी। तुम्हारा पानी रखने का सारा पुण्य़ सुर्रss से चन्दा की ओर चला जायेगा।
पत्नी ने उसे देख लिया है। उसकी आँखें फट गई हैं। झाँकती सफेदी नीली पुतलियों को घेरे में ले चुकी है। किसी हॉरर फिल्म की चुड़ैल सी है यह औरत! नीली आँखें नींद का सुकून नहीं देतीं। हमेशा उजाले की खोज में रहती हैं। लो हो गईं न सफेद अब। अब तो जाओ मेरी अम्मा! 
उसके होठों से लहू टपक रहा है। होठ दाँतों से घायल कर ली है या किसी का ...लेकिन इसके केनाइन दाँत तो हैं ही नहीं! जाओ, सो जाओ मेरी अम्मा! उजाले में अभी बहुत देर है। 
उसने मेरी पत्नी का आँचल खींचा है। 
हरामखोर! क्या कर रहा है बे? 
मैं तुमसे अलग नहीं, तुम ही हूँ। 
खटाक! 
पत्नी ने बेडरूम में घुस कर दरवाजा बन्द कर लिया है। उसकी हाँफ से लैपी की स्क्रीन तक काँप रही है।    
मेरी ओर देखो! 
रुको, लाइट तो बन्द कर दूँ।
खट्ट! धुप्प! अन्धेरा। धुप्प नहीं, चाँदनीबाज अन्धेरा।
जैसा कि मैंने कहा, मैं तुम ही हूँ। 
मुझे सीजोफ्रेनिया का मरीज समझा है क्या? 
नहीं स्प्लिट पर्सनॉलिटी - उसकी बरौनियाँ नीली सी झलक दे रही व्यंग्य टीप रही हैं। 
ये लिखना, पढ़ना छोड़ दो। 
क्यों? 
मुझे डर है कि तुम्हारी एक दिन फिर से हत्या हो जायेगी। अधूरा कहा - बलात्कार के बाद से हत्या हो जायेगी। 
फिर से? 
हाँ, फिर से। तुमने लिखना कब शुरू किया था? अपनी हत्या के अगले ही दिन न? क्या लिखा था तूने पहली बार? हवाओं पर रेंगती आवाजों की दास्तान। तब जब कि तुम्हारी ही आवाज दफन कर दी गई थी। 
तुम्हारे दिल को तन्दूर में तब तक रोस्ट किया गया था जब तक कि उसकी धड़कनों के सारे निशान उनके नथुनों में खुशबू बन कर नहीं समा गये। 
कायर हो तुम! अपने को उस फाइल के क्लिपों में उलझा कर सील नहीं किये होते तो यूँ बकवासें टाइप करने की जरूरत न होती। 
कहना क्या चाहते हो तुम? हत्या के बाद मैं कर भी क्या सकता था? 
वही जो अब कर रहे हो। 

जी रहे हो-अक्षरों की दुनिया में। ये जो रोज रोज लिख कर जाने किनके लिये भेज देते हो, उससे क्या हासिल? पहले की तरह जियो न। हत्या तो इसलिये हुई कि तुमने मान ली। आज इनकार कर दो तो फिर जी उठोगे। 
तुम मुझे उलझा रहे हो। जीने का अर्थ है - मृत्यु के लिये तैयार होना। 
वही तो कह रहा हूँ। मर कर भी तुम पर क़त्ल हो जाने का खतरा है। ईमान छोड़ देने पर भी बलात्कार का खतरा है। तो वापस पहले जैसे ही क्यों नहीं हो जाते? 
तुम क्या सचमुच में मैं ही हूँ? 
हाँ।
तो क्या करना चाहिये? 
कल पूनम है। जागो। कमरे में नहीं, छत पर। चाँदनी के नीचे। नीचे विट्रीफाइड सफेदी में पीलाई होगी। अन्धेरे आकाश से नीलाई झाँकेगी जिसे देखने को आँखें फाड़नी पड़ेंगी। आसमान कभी फटता तो नहीं लेकिन उसके पीछे नूर दिखेगा - चुड़ैल नहीं। अपने को उसके हवाले कर देना। ऐसे भी तुम्हारे पास बचा ही क्या है? उसके जैसी थेथर बेहया है जो तुम्हारा साथ निभाये जा रही है। 
कुछ समझ में नहीं आया...केश तो तब भी झरते रहेंगे। 
जब अपना न चलता हो तो कभी दूसरों का भी चला लेना चाहिये। तुम जैसे टोटके से ही ठीक होते हैं। टोटका है यह - तुम्हें सौ टका टकाटक करने के लिये। उसके बाद मुझे इस तरह खुद को ग्रिल से काट कर और बीमार किरणों की मवादी मदद ले तुमसे मिलने नहीं आना पड़ेगा। 
क्यों? 
"तुम जी उठे रहोगे।" 
टोटके से? 
नहीं...जान कर क्या कर लोगे?      

12 टिप्‍पणियां:

  1. बड़ी हौलनाक दास्ताँ है -इन दिनों पेंडुकियों की बड़ी चर्चा है !
    कहानी बहुत अमूर्त है और बहुत ही वैयक्तिक सोच -विचार लिए ...

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  2. मुझे भी अरविंद जी की तरह लग रहा है कि कहानी में अमूर्त तत्व ज्यादा है। बाकि तो यह अलग तरह की लेखन शैली तो है ही।

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  3. दो रोगों के बीच अंतर को स्‍पष्‍ट करते हुए सूत्रधार यह भूल जाता है कि जब वह उसे जी रहा है तब वह संशय कर सकता है, लेकिन स्‍पष्‍ट रूप से दोनों में अंतर नहीं कर सकता। अगर इतनी इंसाइट बची हुई है तो वह 49 प्रतिशत वाले हिस्‍से की ओर से 51 प्रतिशत होने पर ही रोगियों में शुमार होगा। तभी दिखेगी स्प्लिट पर्सनेलिटी....


    खैर जो समझ पाया...

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  4. शायद क्रिकेट का बाउंसर शब्द इस परिस्थिति के लिए बना है इस रचना को पढने के बाद आने वाले मेरे उदगार के लिए..

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  5. अकेले रहते हैं तो कोई दूसरा व्यक्तित्व रह रह उछलता है, रोज उसको रगड़े रहते हैं।

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  6. मेरा मुझ में किछ नहीं, जो किछ है सो तेरा, जो किछ है सो तेरा!

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  7. बेहतरीन....शुरू से आखिर तक पढ़ता चला आया और चेहरे के हाव-भाव कैसे-कैसे बदलते रहे बाद में जाकर ध्यान आया.....
    -शक्ति प्रताप सिंह विशेन

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