रविवार, 5 जून 2011

अण्णा, रामदेव और एक भूतपूर्व किशोर की बोर्ड परीक्षायें

जब मैंने हाईस्कूल और इंटर की बोर्ड परीक्षायें दीं, तब घनघोर नकल के भ्रष्टाचार का प्रचलन था (शायद आज भी है ;))। परीक्षा केन्द्र दूर किसी पराये विद्यालय में होते थे लेकिन अभिभावक, शिक्षक और विद्यार्थी सभी नकल कराने और करने में लिप्त रहते। कई केन्द्रों पर तो बाकायदा कांट्रैक्ट सिस्टम तक होता था। ऐसे में मेरे आदर्शवादी पिता की शपथ थी - मुझे नकल नहीं करनी थी। परीक्षाओं के दौरान मैं ऐसे एकमात्र छात्र के रूप में प्रसिद्ध हो गया जो नकल नहीं कर रहा था। शिक्षक, पर्यवेक्षक, निरीक्षक आदि दूसरे कक्षों से मुझे और मेरी उत्तर पुस्तिका देखने आते थे क्यों कि उस जमाने में ऐसी 'हरकत' एक 'आश्चर्यजनक' बात थी जो कौतुहल, सम्मान और निगरानी तक के भाव जगाती थी। कुछ घटनायें यूँ हुईं:
(1) हाईस्कूल की परीक्षा के दौरान जब पहली बार 'उड़ाका दल' (flying squad) आया तो पकड़े जाने पर रस्टिकेशन के भय से विद्यार्थी अन्धाधुन्ध अपने चिट, गाइड बुक और नकल सामग्रियों को फेंकने लगे। निरीक्षक महोदय मेरी सीट पर आये और यह कह कर कि तुम निश्चिंत लिखते रहो, मेरी सीट के आस पास के सभी चिट वगैरह स्वयं एकत्रित कर बाहर फेंकते रहे। ऐसा उन्हों ने बस मेरे साथ किया। ऐसा करते हुये उनके चेहरे पर छाया भाव मुझे आज तक याद है।     
(2) दूसरी बार उड़ाका दल शायद अंतिम दिन आया था। प्रश्नपत्र बहुत कठिन था और एक दुरूह प्रश्न (सम्भवत: 8 या 10 अंक का) के हल की एक कार्बन कॉपी से सभी परीक्षार्थी कॉपी कर रहे थे। इस बार के निरीक्षक महोदय ने वह कॉपी मेरी डेस्क के दराज में अनुरोधपूर्वक छिपा दी। उनका यह कहना था कि अगर दल उस कमरे में आया तो मेरी तलाशी नहीं होगी और बचे हुये बच्चों का भला(?) हो जायेगा। उनकी इस हरकत पर मैं कुनमुना कर रह गया।
वह प्रश्न मुझे नहीं आता था, छोड़ना ही पड़ा। उड़ाका दल के जाने के बाद जब निरीक्षक महोदय मेरी डेस्क से वह चिट निकाल रहे थे तो बगल के कक्ष  के निरीक्षक ने देख कर कहा - तो यह बच्चा भी लिप्त हो गया! मेरे कक्ष निरीक्षक ने उत्तर दिया - सिन्हा जी, कभी कभी आँखों देखा सच नहीं होता।
(3) इंटरमीडियेट में हमलोगों ने सी राजगोपालाचारी की लम्बी कविता 'भरत' पढ़ी थी। परीक्षा  के दौरान कक्ष निरीक्षक मौलवी साहब मेरे पीछे ही पड़ गये। तीन चार पंक्तियों का कोई क़ोटेशन था जिसके लिये वह ज़िद पर अड़े थे कि मुझे उसे अपने उत्तर में डालना ही चाहिये। उनका कहना था कि वह बस मेरे लिये लेकर आये थे और मेरे लिखते ही फाड़ कर फेंक देंगे ताकि दूसरे प्रयोग न कर सकें। मैंने इनकार कर दिया। जाने वह शुभेच्छा थी या परीक्षा या कुछ और?
(4) भौतिकी के एक प्रश्न  में चुम्बकीय क्षेत्र के भीतर एक कोण पर रखे धारावाही चालक पर लगने वाले बल के लिये सूत्र का डेरिवेशन करना था और एक आंकिक भी हल करना था। अपने ट्यूटर यादव जी के निर्देशों के मुताबिक मैंने बायें पृष्ठों पर पहले रफ डेरिवेशन और हल के ड्राफ्ट बनाये और फिर उन्हें पलट पलट कर दायें पृष्ठों पर फेयर करने लगा। निरीक्षक ने देखा तो झपट कर आये और मेरी कॉपी छीन उसे हवा में यूँ लहराने लगे जैसे किसी छिपे चिट को निकालना चाह रहे हों। उन्हें लगा था कि मैं कॉपी में चिट छिपा कर नकल कर रहा था। कुछ न मिलने पर झेंपी सूरत लिये उन्हों ने कहा - मैंने कुछ और समझ लिया था।
बाबा रामदेव के आन्दोलन के साथ घटित देख आज मुझे यह सब क्यों याद आ गये?
मैं बाबा के बारे में बहुत कम जानता हूँ। जी इतना अविश्वासी हो गया है कि हर उद्योग के पीछे षड़यंत्र छिपे लगते हैं। बाबा के ऊपर सम्पत्ति जमा करने, लोगों को बरगलाने और उनके एक प्रमुख सहयोगी के ऊपर हत्या करने तक के शक हैं लेकिन -
भ्रष्टाचार आज हमारे तंत्र की रग रग में पैठ चुका है क्या इस पर भी शक है?
क्या लाखो करोड़ काले धन की वास्तविकताओं और उन्हें कमाने वालों के अस्तित्त्व पर भी शक है?
इन मुद्दों को स्वतंत्र भारत में इस तरह से अब तक क्यों नहीं उठाया गया?
एयरपोर्ट पर मंत्रियों द्वारा स्वागत से लेकर अन्धेरी रात में बर्बर कार्रवाई के बाद एयरोप्लेन में बैठा कर तड़ीपार करने तक के पूरे सरकारी उपक्रम और उससे जुड़े लोग आप को किसी षड़यंत्र के अंग नहीं दिखते?
योगेश्वर कृष्ण ने कहा है - कर्म स्वभावत: दोषयुक्त होता है लेकिन इसलिये कर्म का त्याग नहीं करना चाहिये। समाज एक विचित्र समूह है। समूह स्वभावत: विचित्र होता है - भाँति भाँति के लोग! ऐसे में क्या किसी जन आन्दोलन के लिये यह सम्भव है कि उससे जुड़े सभी दूध के धुले हों?  नहीं है।
आन्दोलन के कथ्य, नीयत और नेतृत्त्व पर ध्यान होना चाहिये। अगर कोई अण्णा, कोई रामदेव इतने व्यापक कोढ़ के निवारण के लिये आगे आते हैं तो उनका दमन नहीं, उनसे सहयोग होना चाहिये लेकिन सरकारें तो वही करेंगी जो बनी बनाई व्यवस्था के हित में होगा। जनहित की निगहबानी तो जन को स्वयं करनी होगी।
कौतुहल, सम्मान, निगरानी और परीक्षायें (दमन भी)  ऊँचे आदर्शों को लेकर चलने वाले आन्दोलनों के लिये स्वाभाविक हैं, इस बात को बाबा रामदेव और अण्णा जैसे नेताओं को समझते हुये लक्ष्य पर दृष्टि रखनी चाहिये। यह संघर्ष बहुत लम्बा चलने वाला है और कोई संघर्ष सुखद नहीं होता। जनता अपनी सुविधाओं को छोड़ बहुत कठिनाई से सामने आती है। भारत में तो जाने कितने सेफ्टी वाल्व और लेमनचूस अंग्रेजों की विरासत से ही आ रहे हैं। यहाँ के बँटे समाज में तो यह और कठिन है। 
आवश्यक है कि जन भी यह समझे कि नरेगा की बोटियों और एयरकंडीशंड ऑफिसों के कॉफी मशीनों की टोटियों के रहते हुये और निरंतर बढ़ते हुये भी अगर कोई विद्रोही नेतृत्त्व सामने आया है तो वह मूल्यवान है। उससे सहयोग न करें तो कम से कम उसके दमन का समर्थन तो न करें। रही बात तर्कों की और शक़ की तो कथित ईश्वर भी इनसे नहीं बच पाया। अब यह न कहिये कि यह तो धनदोहन सिंग की 'सीजर की बीवी' वाली बात जैसी बात हो गई! नहीं सर, नहीं मैडम, उससे अंतर है। समझिये, कोशिश कीजिये। शब्द हर वक़्त मुफीद नहीं होते। यह किसी किशोर की बोर्ड परीक्षा नहीं कि एक आश्चर्य(!) पर संतुष्टि, प्रलोभन, मौकापरस्ती, सरपरस्ती, शक़ आदि की क्षुद्रता द्वारा निपटा दिया जाय। पूरी लोकशाही(अण्णा के मुख से लोकतंत्र के लिये लोकशाही सुनना अच्छा लगता है) की साख दाँव पर है।
मेरी इस पोस्ट का प्रिंट कोई बाबा रामदेव तक पहुँचायेगा क्या? मैं चाहता हूँ कि बाबा उसे टी वी पर ऐसे ही लहरायें जैसे वह कपाली बलबल एक पन्ने को कल लहरा रहा था। मुझे प्रसिद्धि की चाह नहीं, मेरा नाम न लें। मैं तो बस देखना चाहता हूँ।                        

43 टिप्‍पणियां:

  1. मेरी इस पोस्ट का प्रिंट कोई बाबा रामदेव तक पहुँचायेगा क्या? मैं चाहता हूँ कि बाबा उसे टी वी पर ऐसे ही लहरायें जैसे वह कपाली बलबल एक पन्ने को कल लहरा रहा था। मुझे प्रसिद्धि की चाह नहीं, मेरा नाम न लें। मैं तो बस देखना चाहता हूँ।

    jai baba banaras.......

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  2. जी ।।। कहने को कुछ सूझता भी नहीं - और चुप रहा जाता भी नहीं | :(
    आखिर कलियुग है - क्या ईमानदारी जीतेगी?

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  3. इस माहौल में परीक्षा देना वाकई कठिन काम है। चिट रखने का आरोप आसानी से लगाया जा सकता है। फंसाया जा सकता है। फंसा ही दिया नक्कालों ने। घोर निंदनीय घटना। रावण का चेहरा दिखता तो है मगर जनता के ज़ख्म इतने गहरे हैं, जिंदगी इतनी दुरूह की समय बीतते ही भूल जाती है। जनता की याददाश्त बड़ी कमजोर होती है। बार-बार देखे रावणी चेहरे भी विस्मृत हो जाते हैं जेहन से।
    अभी अत्याचार के खिलाफ यू0पी0 में मुखर हुए राहुल बाबा कहीं दिखाई नहीं देते मेरे कान तो उन्हीं की प्रतिक्रिया सुनने के लिए बेताब हैं।

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  4. बाबा से मूलगामी परिवर्तन - रेडिकल चेंज - की उम्मीद नहीं कर सकता , सिवाय इसके कि भ्रष्टाचार को लेकर और कुछ मुद्दों को लेकर मास का कन्सर्न होगा। दूसरी बात बाबा के पास अन्ना जैसा चरित्र बल भी नहीं जिसका एक प्रमाण पत्र-प्रकरण है।और इस मास कन्सर्न को लेकर ही सरकार भयभीत हो गयी, और इस भर्त्सनीय काम पर उतर आयी !

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  5. @ अभी अत्याचार के खिलाफ यू0पी0 में मुखर हुए राहुल बाबा कहीं दिखाई नहीं देते मेरे कान तो उन्हीं की प्रतिक्रिया सुनने के लिए बेताब हैं।
    -----------------

    देवेन्द्र जी, जब कभी भी इस तरह का कार्य किया जाता है तो शीर्ष नेतृत्व का सौम्य चेहरा हमेशा ही पर्दे के पीछे रहता है, सामने नहीं आता या आता भी है तो जो कुछ कहना चाहता है अपने मातहतों के उपर ओढ़ा देता है। यह पुरानी परिपाटी है और अब फिर वही होगा। यदि राहुल आएंगे, कुछ कहेंगे भी तो सरकार और उसके कारिंदों पर ओढाते हुए कहेंगे।

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  6. गिरिजेश जी,
    इस पोस्ट के लिये प्रणाम स्वीकार करें(बेशक इस प्रणाम\सहमति से अनेक वरिष्ठ ब्लॉगर्स को ब्लॉगजगत में विचार प्रदूषण के ख़तरे दिखें)

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  7. @पूरी लोकशाही की साख दाँव पर है

    क्या अभी ये समझने को बाकि है की इस महान लोकशाही की कोई साख है ........ मेरे ख्याल से इस 'महान' राजपरिवार में गिरवी रखी हुई है

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  8. रात से जागकर सारे घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हूँ -साफ़ लगता है बड़े अपराध को छुपाने की नीयत से नैतिकता खो चुके लोगों और व्यवस्था के पिट्ठुओं ने वह कर दिखाया है जो किसी भी लोकतंत्र में मान्य नहीं है...
    बर्बरता की ऐसी मिसालें आजाद लोकतांत्रिक देशों में कम ही देखने को मिलती हैं
    मैं भी बाबा को नहीं जनता था ..लालू किसी दिन बोले थे कि वे अहीर जाति के हैं उन्हें दूध बेचने का अपने पैत्रिक धंधे पर लौट जाना चाहिए ....मगर बाबा जन्मना भले ही अहीर हों सही अर्थों में मुझे यह व्यक्ति एक द्विज लगता है .....उसकी जो मुहिम है वह देश के उन महापापियों के विरुद्ध है जिन्होंने गरीब से गरीबतर होते इस देश की अरबों की संपत्ति विदेशों में जमा कर रखी है..
    अब उसे उजागर करने का कोई इतना बड़ा सत्याग्रह मूर्त रूप ले रहा हो और उसे नृशंसता से कुचलने की कार्यवाही की जाय तो इसके क्या निहितार्थ और यथार्थ हैं?
    क्या जो लोग यह दमनात्मक कार्य कर रहे हैं वे ही कुछ छुपाने पर या किसी महापापी को बचाने पर तो उतारू नहीं हैं ?
    यह जवाब जनता लेकर रहेगी अब -

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  9. बहुत सुलझी हुई पोस्ट, अन्याय के खिलाफ लड रहे लोगों के तरीके, उनके मोटिवेशन भिन्न हो सकते हैं परंतु अगर उद्देश्य सही है तो उसका समर्थन होना ही चाहिये। उस पर कल जैसा दमन? सोते आबाल-वृद्ध पर अश्रुगैस, लाठी चलाने के बाद यह आरोप कि उनके द्वारा ईंट पत्थर फेंकने पर कार्यवाही की गयी। एक तरफ कहते हैं कि बाबा अपनी मर्ज़ी से अनशन स्थल छोड गये तो गिरफ्तारी की वजह? कौन मानेगा ऐसी लीपापोती को। अब तो हालत ऐसी है कि दिग्विजय सिंह जैसा थर्ड्क्लास प्राणी जिस किसी का भी विरोध करे उस पर विश्वास करने को दिल करा है।

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  10. गिरिजेश जी मैं दिल से आपको धन्यवाद करता हूँ की आप ने इस मुद्दे पर अपने विचार रखे वर्ना इस जगत के अधिकांश लोग जिनकी सारी कसरत खुद को संवेदनशील घोषित करने की होती है ऐसे संवेदनशील मामलों पर अपनी जबान में ताला जड़े मूक बने रहते हैं.


    पुराने स्थापित ब्लोग्गेर्स में से रचना जी, अली साहब, डाक्टर अमर कुमार जी और अरविन्द मिश्र जी को छोड़ कर मुझे कोई ऐसा व्यक्ति अभी तक नहीं दिखा है जो सही या गलत ठहराए जाने का भय त्यागकर संवेदनशील मुद्दे पर अपनी बेबाक राय व्यक्त करने का साहस रखता हो.


    मैं शुरू में ही कह दूँ की कल रात को सरकार द्वारा की गयी कार्यवाही का मैं दिल से, सच में दिल से, कड़ा विरोध करता हूँ. जब भी कभी कहीं कोई सत्तासीन ताकत आम जन जीवन को प्रभावित किये बिना शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे निर्दोष स्त्री पुरुषों पर यूँ अत्याचार ढहाती है तो मुझे बरबस ही उत्तरखंड आन्दोलन के संघर्ष के दौरान सरकारी तंत्र द्वारा किया गया रामपुर तिराहा कांड याद आ जाता है जो जाने क्यों मेरी दुखती रग है.


    कल रात की सरकारी कार्यवाही अनुचित थी पर इससे ज्यादा अनुचित बाबा रामदेव का सत्याग्रह था जो की अपनी शुरुवात से ही फिक्स्ड था. रामदेव जी ने अपने आम समर्थकों को ठगा, भ्रष्टचार के खिलाफ चल रहे आन्दोलन को अपनी गलत बयानी से ठेस पहुचाई और निर्दोष स्त्री पुरुषों को अधि रात को पिटवा दिया.


    संसार को त्याग चुके एक सन्यासी को मौत का इतना भय की वो दो घंटे तक एक कौने में खुद को बचने के लिए छिपा रहा वो भी उस वक्त जब उसके अनुयायी पुलिस की लाठियों से पीटे जा रहे थे. ऐसे सन्यासी के जीवन पर धिक्कार है.


    वैसे अब मैं बाबाजी के प्राणायाम कार्यक्रम पर भी अपने गंभीर विचार सभी के सामने प्रस्तुत कर ही दूँ.


    बाबा रामदेव एक बहुत उचे दर्जे के तमाशेबाज हैं. उन्होंने योगासनों और प्राणायाम की शुरुवाती स्वांस क्रियाओं को भारतीय आम लोगों के मध्य एक चमत्कारिक दर्जा दिलवा दिया है. ये आसन और स्वांस क्रियाएं सैकड़ों वर्षों से हमारे देश में विद्यमान थी परन्तु किसी भी योग गुरु ने इन्हें एक जादू के रूप में आम इन्सान के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया क्योंकि उन्हें इनकी वास्तविक सीमा का पता था. पर बाबा रामदेव ने एक आम तमाशेबाज की तरह से प्राणायाम को भोलेभाले लोगों के समक्ष हर रोग की रामबाण औषधि के रूप में प्रस्तुत कर अपना एक ब्रांड स्थापित कर लिया. ये सब कुछ वैसा ही है जैसे की लोगों को गोरा बनाने वाली क्रीम बेचने वाली कम्पनियाँ करती हैं या फिर केश्वर्धक तेल बेचने वाली कम्पनियाँ लोगों को काले घने लम्बे केश का सपना बेच कर करती हैं.


    इसलिए मैं कहूँगा की बाबा रामदेव जी भ्रटाचार जैसे गंभीर आन्दोलन के नेतृत्व के लिए सही व्यक्ति नहीं हैं. उन्हें हरिद्वार में ही रह कर अपने जमे जमाये धंधे पर ध्यान देना चाहिए.


    फ़िलहाल खुद को इतने में ही समेत रहा हूँ. धन्यवाद.

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  11. मैंने फेसबुक पर यह लिखा - आज के परिदृश्य में हमें भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास को ध्यान से सम्पूर्ण रूप में पढ़ना चाहिये।
    इस कांड के बाद कांग्रेसियों की हरकतें तो आप देख सुन ही रहे होंगे और साथ ही अन्य पार्टियों की नौटंकियाँ भी ...सच को काट कर नहीं देखा सुना जा सकता। व्यक्ति रामदेव में खामियाँ हो सकती हैं लेकिन जिस मुद्दे को लेकर वह सामने आये हैं, उसमें खामी नहीं, उसकी चपेट में बहुत नामचीन आने वाले हैं। मुद्दे और आन्दोलन अमूर्त होते हैं, स्वयं नहीं उठ/चल सकते। उसके लिये मनुष्य़ नेतृत्त्व आवश्यक होता है। कल कोई और बेहतर नेतृत्त्व आयेगा तो उसे समर्थन देंगे। फिलहाल तो रामदेव ही हैं। अगर समय रामदेव को खोटा सिद्ध करता है तो वह अपने आप मिट जायेंगे। सशक्त आन्दोलन कई धाराओं से बनता है। धारायें उगती हैं, जुड़ती हैं, मिटती हैं और अंतत: कुछ नया सामने आता है। अभी पहले ही कदम पर लानतें मैं नहीं भेज सकता। ऐसा करना उन दम्भी भेंड़ियों को सशक्त करना होगा जो सत्ता के मद में नंगे नाच रहे हैं।
    @ रामदेव का सत्याग्रह था जो की अपनी शुरुवात से ही फिक्स्ड था - मुझे इसका नहीं पता :) अगर आप उस पत्र पर कह रहे हैं जिसे बलबल दिखा रहा था तो यही कहूँगा कि बोर्ड रूम और राजनीति का नेपथ्य आम जन की समझ के बाहर होते हैं। बाबा हिम्मती हैं जो समझने का बीड़ा उठाया। गिरना, उठना, गिरना...इसी में सीख जायेंगे।
    @ प्राणायाम आदि - हर आयुर्विज्ञान विद्या का जानकार ऐसे दावे करता है जब कि सीमायें उसे भी पता होती हैं। मनुष्य़ स्वस्थ होते हैं या केस बिगड़ जाता है। जो ठीक हो जाते हैं, वे गुण गाते हैं। जो नहीं होते वे गालियाँ देते दूसरी राह पकड़ते हैं। बाबा का योग प्रारम्भिक शारीरिक क्रियायें ही हैं लेकिन आम जन से उससे आगे का हो ही नहीं पायेगा और वह शरीर केन्द्रित भी नहीं।
    @ तमाशेबाज - साँप, संन्यासी और नटों के इस देश को बाजीगरी देखने में आनन्द आता है। यहाँ की राजनीति बिना तमाशे के नहीं हो सकती। गान्धी बाबा ने भी तमाशे किये। रामदेव ने राजनीतिक इच्छायें नहीं छिपाईं हैं,मैं इसे शुभ मानता हूँ।
    @ जमा जमाया धन्धा - :) धन्धे के डायवर्सीफिकेशन की स्वतंत्रता तो सबको है। बेचारे बाबा को क्यों वंचित रहना चाहिये?
    @ मौत का इतना भय की वो दो घंटे तक... - कालयवन और जरासन्ध के सामने कृष्ण भाग खड़े हो गये थे। राजधानी तक दूसरी बसा लिये। रणछोड़ों की परम्परा रही है। बाबा को भी थोड़ी छूट मिलनी ही चाहिये :) गम्भीर कहूँ तो धुप्प रात में 60000 जनों की उपस्थिति में क्या परिस्थितियाँ थीं, यह मुझे नहीं पता। समर्थक पिटें और नेता न पिटने पाये तो कोई आवश्यक नहीं कि वह दोषी ही हो। समर्थक भीड़ शरीफ थी वरना हमलोग किसी और विषय पर बतकूचन कर रहे होते। ...लब्बो लुआब यह कि मुद्दा बहुत महत्त्वपूर्ण है और बाबा को थोड़ा और समय देने में कोई बुराई नहीं। 64 वर्ष से कमीनों को झेलते आ रहे हैं, एक और सही। क्या पता यह व्यक्ति किसी बड़े परिवर्तन की भूमिका हो?

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  12. @ जो सही या गलत ठहराए जाने का भय त्यागकर संवेदनशील मुद्दे पर अपनी बेबाक राय व्यक्त करने का साहस रखता हो.

    विचार शून्य,
    असहमति भी बेबाक हो सकती है, यह समझना कई बार मुश्किल होता है। बेबाक राय बहुत सी आ रही हैं। उपरोक्त आलेख भी बेबाक राय का एक ईमानदार उदाहरण है और अधिकांश टिप्पणियाँ भी।

    धन्यवाद गिरिजेश! भ्रष्टों की औकात दिखाने की बधाई बाबा! अगला कदम क्या है?

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  13. लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति को शांतिपूर्ण असहमति जताने का संवैधानिक हक़ है ... शांतिपूर्ण सभा में सोये हुए लोगों पर आधी रात में लाठी भंजन, आंसूं गैस के गोले छोड़ना ,अंग्रेजी सरकार का बर्बरतापूर्ण रवैया सिर्फ पढ़ा था इतिहास की किताबों में , अब देख भी लिया ...

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  14. गिरिजेश जी, मैं तो कायल हो गया आपकी स्पष्ठ सोच और सत्यपरक निष्कर्ष देखकर।
    बाबा को क्रियाशील देखकर परिणाम के पूर्व ही लोगों में यह बैचेनी क्यों है? क्यों नेतृत्व नहीं कर सकता एक सन्यासी?

    आज जब लोकतंत्र के पहरूए सभी स्तम्भों से आशाएँ समाप्त प्राय है, सभी भ्रष्टाचार में लिप्त है, एक सन्यासी को अपने प्रयास में सफल होना ही चाहिए भले भूमिका मात्र के प्रयास हो, सन्यासी की सफलता ही शायद अन्तिम आशा है।

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  15. प्रभु इस बार मेरी टिप्पणी थोड़ी लम्बी हो गयी है और टिपण्णी बॉक्स कहता है की ४००० शब्दों से ज्यादा सहन हैं होते इसलिए छोटे छोटे टुकड़ों में झेलें.


    " आज के परिदृश्य में हमें भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास को ध्यान से सम्पूर्ण रूप में पढ़ना चाहिये।"

    @ इस बारे में मैं विनती करता हूँ की इस विषय में अपने विचारों से हमारा भी ज्ञानवर्धन करें.


    @"व्यक्ति रामदेव में खामियाँ हो सकती हैं लेकिन जिस मुद्दे को लेकर वह सामने आये हैं, उसमें खामी नहीं, उसकी चपेट में बहुत नामचीन आने वाले हैं।"


    मैं इससे सहमत नहीं हूँ. जिस व्यक्ति में खामियां हों जानते भुझाते हुए उसका नेतृत्व स्वीकार करना उसे गलती करते रहने का अभयदान देना है. व्यवस्था में बदलाव गलतियों से बचने के लिए किया जा रहा है न की उन्हें साथ घसीटने के लिए.


    @ मुद्दे और आन्दोलन अमूर्त होते हैं, स्वयं नहीं उठ/चल सकते। उसके लिये मनुष्य़ नेतृत्त्व आवश्यक होता है। कल कोई और बेहतर नेतृत्त्व आयेगा तो उसे समर्थन देंगे। फिलहाल तो रामदेव ही हैं। अगर समय रामदेव को खोटा सिद्ध करता है तो वह अपने आप मिट जायेंगे।


    ......यहाँ भी असमति. ये सत्याग्रह. ये व्यवस्था को बदलने की इच्छा, ये भ्रष्ट सरकार को उखड फैकने का साहस सब मिश्र के आन्दोलन से प्रेरित हैं . जरा बताएं वहां कौन सा नेतृत्व था.

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  16. @ रामदेव का सत्याग्रह था जो की अपनी शुरुवात से ही फिक्स्ड था - मुझे इसका नहीं पता :) अगर आप उस पत्र पर कह रहे हैं जिसे बलबल दिखा रहा था तो यही कहूँगा कि बोर्ड रूम और राजनीति का नेपथ्य आम जन की समझ के बाहर होते हैं। बाबा हिम्मती हैं जो समझने का बीड़ा उठाया। गिरना, उठना, गिरना...इसी में सीख जायेंगे।

    .....क्या देश बाबा के लिए ट्रेनिग का अखाडा है. और अगर किसी को देश चलने का प्रशिक्षण ही दिया जाना है तो तो बाबा क्यों, बहुत से अच्छे लोग तैयार बैठे हैं. आइये किरण बेदी जी से आग्रह करते हैं.


    @ प्राणायाम आदि - हर आयुर्विज्ञान विद्या का जानकार ऐसे दावे करता है जब कि सीमायें उसे भी पता होती हैं। मनुष्य़ स्वस्थ होते हैं या केस बिगड़ जाता है। जो ठीक हो जाते हैं, वे गुण गाते हैं। जो नहीं होते वे गालियाँ देते दूसरी राह पकड़ते हैं। बाबा का योग प्रारम्भिक शारीरिक क्रियायें ही हैं लेकिन आम जन से उससे आगे का हो ही नहीं पायेगा और वह शरीर केन्द्रित भी नहीं।


    ...... प्रभु आयुर्वेद और प्राणायाम में बहुत अंतर है. आयुर्वेद खुद तरह तरह की बिमारियों को ठीक करने के उपाय देता है . यानि की आयुर्वेद पर विशवास रखने वाला अपने साहित्य के जरिये से ये कह सकता है की फलानी बीमारी फलने तरीके से ठीक हो जाएगी. प्राणायाम के किसी ग्रन्थ में प्राणायाम के द्वारा उन सभी बिमारियों के ठीक होने के दावे कहीं नहीं किये गए हैं जिनका जिक्र रामदेव जी करते हैं. यानि की जिसने प्राणायाम की तकनीक को रचा उसने खुद ही कभी ये नहीं कहा की प्राणायाम की शुरुवाती स्वांस क्रियाये इन सब रोगों में वैसा चमत्कारिक लाभ देती हैं जैसे गुरु रामदेव जी ने आम जनता को बरगलाया. अब सिर्फ अपने लाभ के लिए बिना किसी आधार के आम जनता को बरगलाने का दुस्साहस करने वाले गुरु जी को आप देश चलने की ताकत देना चाहते हैं. जरा सोचिये ये व्यक्ति सत्ता में आने पर क्या कुछ नहीं कर देगा.

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  17. @ तमाशेबाज - साँप, संन्यासी और नटों के इस देश को बाजीगरी देखने में आनन्द आता है। यहाँ की राजनीति बिना तमाशे के नहीं हो सकती। गान्धी बाबा ने भी तमाशे किये। रामदेव ने राजनीतिक इच्छायें नहीं छिपाईं हैं,मैं इसे शुभ मानता हूँ।


    ...... क्या कह रहे है जनाब.. बाबा शुरू से ये कहते आ रहे हैं की वो राजनीती नहीं करेंगे पर उनका हर कदम चालबाजी भरा रहा है. मैं पूछता हूँ की क्या सत्य पर से एक सन्यासी का विशवास डिग गया है जो उन्होंने सरकार को मुर्ख बनाने की कोशिश की (कल रात उनके एक समर्थक का बरखा दत्त के प्रोग्राम में उनके सरकार को दिए लिखित आश्वासन के बारे में यही बयां था )



    @ जमा जमाया धन्धा - :) धन्धे के डायवर्सीफिकेशन की स्वतंत्रता तो सबको है। बेचारे बाबा को क्यों वंचित रहना चाहिये?


    ........बिलकुल साहब धन्धे के डायवर्सीफिकेशन की स्वतंत्रता तो सबको है। जब उन्होंने आस्था चेनेल ख़रीदा तो किसने विरोध किया था. पर देश चलाना धंधा नहीं माना जा सकता.

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  18. @ मौत का इतना भय की वो दो घंटे तक... - कालयवन और जरासन्ध के सामने कृष्ण भाग खड़े हो गये थे। राजधानी तक दूसरी बसा लिये। रणछोड़ों की परम्परा रही है। बाबा को भी थोड़ी छूट मिलनी ही चाहिये :) गम्भीर कहूँ तो धुप्प रात में 60000 जनों की उपस्थिति में क्या परिस्थितियाँ थीं, यह मुझे नहीं पता। समर्थक पिटें और नेता न पिटने पाये तो कोई आवश्यक नहीं कि वह दोषी ही हो। समर्थक भीड़ शरीफ थी वरना हमलोग किसी और विषय पर बतकूचन कर रहे होते। ...लब्बो लुआब यह कि मुद्दा बहुत महत्त्वपूर्ण है और बाबा को थोड़ा और समय देने में कोई बुराई नहीं। 64 वर्ष से कमीनों को झेलते आ रहे हैं, एक और सही। क्या पता यह व्यक्ति किसी बड़े परिवर्तन की भूमिका हो?


    .......कृष्ण भी भाग खड़े हुए थे क्योंकि उनकी जान पर वास्तविक खतरा था. यहाँ बाबाजी को पुलिस संरक्षण में उनके घर तक पहुचाया गया है. बाबाजी दो घंटे तक छिपे रहने के बाद खुद ही बच कर नहीं निकले हैं बल्कि उस पुलिस के संरक्षण में देहरादून तक सुरक्षित पहुचाये गए हैं जिस पर वो अपनी हत्या करने के लिए उतारू होने की बात कर आम जनता की सहानभूति बटोर रहे हैं. जिस वक्त उनके समर्थक लाठियां झेल रहे थे तो गुरूजी छुपे रहे ताकि उनकी गिरफ़्तारी ना हो. अरे उन्हें गिरफ्तार कर ही कौन रहा था. पुलिस का उद्देश्य तो उन्हें सिर्फ अनशन करने का नाटक करने से रोकना था.


    गिरिजेश जी अगर कारगिल के युद्ध में सेना के नेतृत्व ने भी यूँ ही छुपे रहने की रणनीति अपनाई होती तो वो युद्ध हम कभी नहीं जीतते. कारगिल में शहीद होने वालों में ओफ्फिसरों की संख्या बहुत जयादा थी जिन्होंने स्वयं आगे बढ़कर युद्ध का नेतृत्व किया था. जरा ममता बेनजी को की उस हालत को याद करें जब पुलिस ने उनके शरीर को बुरी तरह से तोड़ डाला था. ये होती हैं नेतृत्व क्षमता और हमें ऐसे ही नेता चाहिए. भारतीय स्वतंत्र आन्दोलन में सभी प्रमुख नेताओं ने आगे रहकर ही आन्दोलन का नेतृत्व किया था. बाबा राम देव उस श्रेणी के नहीं हैं. इन्हें तो बस शहीदों की छोटी छोटी तस्वीरों के बिच अपना बड़ा सा फोटो लगाव कर शहीद कहलवाने की आदत है.

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  19. @ 64 वर्ष से कमीनों को झेलते आ रहे हैं, एक और सही।


    हजूर ये बात सही नहीं... आम जनता भूख हड़ताल करे, लाठियां खाए और नेता लोग छुपे रहें फिर उसके बाद एक और कमीना मिले... ये मानसिकता कतई ठीक नहीं और सिर्फ इसी मानसिकता का विरोध करने के लिए मैंने आपकी हर बात का जवाब दिया है.


    मुझे मालूम है की मेरी बातों का प्रतिउत्तर आसानी से दिया जा सकता है इसलिए मैं इस पर ज्यादा विचार नहीं रखूँगा बस यही कहूँगा की भ्रष्ट सरकार को बदलने के लिए दागदार दामन वाले लोगों का सहारा क्यों लिया जाय.


    बाकि हर व्यक्ति का अपना नजरिया है जिसे जो रुचे वही ले जाय.

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  20. भ्रष्टाचार को कोढ़ सबको छू सकता है, भ्रष्टाचारियों को भी।

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  21. गिरिजेश जी, अफ़सोस है आज ऑफ़िस से छुट्टी नहीं कर सकता।

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  22. वाणी जी - अँगरेज़ सरकार? नहीं - यह ब्रिटिश महारानी का नहीं - इटली की महारानी का ज़माना है ... माफ़ कीजियेगा ....

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  23. मित्रों कक्षा 11 में एक पाठ पढ़ा था की उसूलों के पक्के भीष्म का नाम भी कालचक्र के नीचे दब गया पर वादा करके भी युद्ध में चक्र उठाकर वादाखिलाफी करने वाले कृष्ण को अवतार माना गया |

    ई पाठ मैं ने हम पर बहुत प्रभाव किया | हम सोचते हैं कि समाज हित के लिए खुद को एक पल के लिए गलत भी होना पड़े तो का बुराई है | बल्कि ये अपने खुद के उसूलों में सूक्ष्म रूप से छिपे दुर्जेय अहंकार को चोटिल करने का अच्छा तरीका है क्योंकि नास्तिक भी उतना ही कट्टर है जितना आस्तिक | और कट्टरता दोनों तरफ से बुरी है |
    निश्चय ही मुझे रामदेव से ज्यादा सहानुभूति न हो पर पिछले कुछ दिनों में जो हुआ उसको कैसे भूल जाऊं ? पिछले 60 सालों में जो शाही गुंडों ने किया उसको कैसे भूल जाऊं ? आज तो राष्ट्र हित के लिए एक-दो उसूलों को छोड़ना भी पड़े तो मैं छोड़ने को तैयार हूँ |
    @"भ्रष्ट सरकार को बदलने के लिए दागदार दामन वाले लोगों का सहारा क्यों लिया जाय."
    लेकिन प्रिय शठे शाठ्यम समाचरेत भी कोई चीज़ होती है | गुंडा होगा पर मुझे वास्तविकता में रामदेव इतना बड़ा गुंडा तो नहीं लगता की उसकी तुलना शाही गुंडों से करी जा सके | और रक्षा आम आदमी कर भी नहीं सकता सिवाय चौपाल पर जुगाली करने के, ताकतवर से ताकतवर ही भीड़ सकता है | क्या सहन करना ही हमारी नियति बन गयी है, अगर सांसारिक हैं और राग-द्वेष से अछुते नहीं है तो कभी-कभी गुस्सा भी आना चाहिए | अन्यथा न लें पर हर समय सदाचार और साक्षी के साथ तटस्थ होने वाला आदमी सिर्फ गौतम बुद्ध जैसा दोष रहित महान निर्मल व्यक्ति होना चाहिए | लगता है मैत्रेय को शरीर मिल गया है कहाँ हैं ये चरण मैं ऐसों के चरणों में जरूर लोटना चाहूँगा | ;-)

    मित्र अभिषेक आर्जव ने कल कहा, मैं भी वही कहूँगा,
    कि छोडो यार बहुत कह-सुन लिया, लानत-मलानत की भी एक सीमा होती है अब तो यही कहने को जी करता है
    "सोनिया गाँधी मुर्दाबाद"
    "मनमोहन मुर्दाबाद"
    "कातिल सिम्बल मुर्दाबाद"
    "काँग्रेस मुर्दाबाद"
    "सिसली के माफिओं भारत छोडो"

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  24. एक बार फिर शिव त्रिनेत्र को,प्रलय रूप खुल जाने दो
    एक बार फिर महाकाल बन इन कुत्तों को तो मिटाने दो..
    एक बार रघुपति राघव छोड़ , सावरकर को गाने दो...
    एक बार फिर रामदेव को, दुर्वासा बन जाने दो...

    "आशुतोष नाथ तिवारी"

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  25. विचार शून्य जी....
    कल रात सपने में देखा कि बाबा जेल में हैं औऱ भ्रष्टाचार की लड़ाई का नेतृत्व कसाव जी कर रहे हैं! अधिक समाचार देखने और आदरणीयों के भाषण सुनने का दुष्परिणाम भुगतना पड़ा।
    आज सोचा समाचार नहीं देखूंगा ब्लॉग ही पढ़ुंगा। आपके तर्क पढ़े ....देखें नींद आती है या नहीं!

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  26. @ विचार शून्य बन्धु:
    ---------------
    सबसे पहले तो ये जान लें कि रामपुर तिराहा कांड आपकी अकेले की दुखती रग नहीं है, ऐसी घटनायें हम सबकी दुखती रग हैं।

    @ जिस व्यक्ति में खामियां हों जानते भुझाते हुए उसका नेतृत्व स्वीकार करना उसे गलती करते रहने का अभयदान देना है - व्यक्ति और खामियाँ एक दूसरे के पूरक हैं। अनुभव बहुत तो नहीं है, लेकिन बीस साल से पब्लिक डीलिंग में हूँ, ऐसे च्यक्ति का दर्शन अभी तक नहीं हुआ जिसमें खामियाँ न हों। शायद मुझे परिवार, दफ़्तर, समाज में किसी का नेतृत्व स्वीकार नहीं करना चाहिये था।

    @ आइये किरण बेदी जी से आग्रह करते हैं - हम तैयार हैं। आशान्वित हो न कि उनमें कोई खामी नहीं होगी?

    @ देश चलाना धंधा नहीं माना जा सकता - आंशिक सहमति\असहमति। धंधा माना जाना चाहिये लेकिन चुनिंदा लोगों के अलावा किसी और को ऐसा ख्वाब देखने का भी हक नहीं होना चाहिये।

    @ स्वतंत्रता संग्राम के सभी अग्रणी लीडर? - हमने तो सिर्फ़ दो के ही बारे में पढ़ा है - राष्ट्र पिता और चाचा। कोर्स की किताबों में तो नहीं लेकिन इधर उधर ताक झांक करते हुये एक डायरी पर नजर पड़ी थी जिसमें उन्हें जेल में दिये जाने वा्ली खुराक का जिक्र था, जाने कितने किशमिश, कितने बादाम - खाने में एकदम नपी तुली डाईट, लाठियाँ\गोलियाँ कितनी इन अग्रणी लीडरों ने खाईं थी, इस पर पता नहीं क्यों कोई तफ़सील नहीं पढ़ने को मिली।

    कारगिल, ममता बैनर्जी, लोगों को बरगलाया जाना आदि आदि पर ज्यादा विस्तार में जाना, यानि व्यक्तिगत स्तर पर उतरना होगा। मुझे सिर्फ़ बुरे लोगों में से एक को चुनना होगा तो जो कम बुरा है उसे ही चुनूँगा।

    आपकी टिप्पणी की आखिरी पंक्ति हमारी भी फ़ेवरेट है - "बाकि हर व्यक्ति का अपना नजरिया है जिसे जो रुचे वही ले जाय"

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  27. आपकी पोस्ट पर टिपण्णी में जो कहना चाह रही थी,शब्दशः आपने अपनी टिपण्णी में कह दी....

    मैं भी यही कहना चाहती हूँ की
    आन्दोलन के कथ्य, नीयत और नेतृत्त्व पर ध्यान होना चाहिये। लेकिन अगर कोई अण्णा, कोई रामदेव (चाहे व्यक्तिगत जीवन में वे पूर्णतः साफ़ , संत न भी हों,बहुत बुरे हों ) इतने व्यापक कोढ़ के निवारण के लिये आगे आते हैं तो उनका दमन नहीं, उनसे सहयोग होना चाहिये ......सिर्फ और सिर्फ सहयोग...

    इनका विकल्प अभी तो और कोई मुझे नहीं दीखता....
    यूँ भ्रष्टाचार रूपी इस महादानव के नाश का आह्वान करने जो भी आगे आएगा, कोई दावा कर सकता है की सत्ता उसके चरित्र के चीथड़े उड़ाने और फहराने का प्रयास नहीं करेगी...????

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  28. यहाँ का विवेचन देख संजय दृष्टि प्राप्त हो गयी :)

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  29. काफी बातें हो गईं :)
    दीप जी! अंत से प्रारम्भ करते हैं कि क्यों कि बस उसी कारण आप ने हर बात का उत्तर दिया है :) अच्छा है न कि बातें और साफ हुईं। जब मैंने 'कमीने' शब्द का प्रयोग किया तो व्यंजना के तौर पर किया - आप की बाबा के बारे में स्थापनायें देख कर। पहले कहा है - सच को काट कर नहीं देखना चाहिये। बाबा को इतना शीघ्र इस स्टेज पर खारिज कर देना ठीक नहीं। जैसा कि पहले कहा - कोई नहीं जानता कि यह व्यक्ति किसी बड़े बदलाव की भूमिका हो(जो बाद में बदल भी दी जाय)।
    दागदार व्यक्ति के विकल्प/प्रतिस्थापन के रूप में आप ने बेदी और ममता का नाम लिया है। क्या ये लोग आप को पाक साफ लगते हैं? चरित्र हनन मेरा उद्देश्य नहीं लेकिन ऐसे बहुत बहुत कम जन हैं जो दागदार न हों। बेदी के बारे में यहाँ देखिये: http://kamalji.sulekha.com/blog/post/2007/08/kiran-bedi-some-strange-facts.htm और अण्णा के बारे में यहाँ http://yswe.wordpress.com/2011/04/25/anna-hazare/। ममता ने रेलवे का जो हाल कर रखा है, छिपा नहीं है। कम से कम मुझे तो कोई शुभ परिवर्तन नहीं दिखा। तृणमूल में क्या भ्रष्टाचारी नहीं हैं? ममता ने उन्हें क्यों पाल रखा है? इसे भूल जाइये, स्वतंत्रता आन्दोलन के शीर्ष व्यक्तित्त्वों को देखिये - बहुसंख्य दागदार मिलेंगे और उन दागदारों के बिना आन्दोलन कहीं नहीं होता।
    हम कहाँ से ईश्वरों को ले आयें जो हमारा नेतृत्त्व करें? ऐसी सोच आत्मघाती है। व्यक्ति नहीं मुद्दा देखिये। जिसने उठाया है अभी तो वही नेता है। मिस्र की स्थिति की तुलना भारत की स्थिति से करना ठीक नहीं। कोई मेल ही नहीं है। अगर मान ही लें कि वहाँ का आन्दोलन बिना नेतृत्त्व के था तो उससे इस आन्दोलन को क्या लेना, देना या करना? हर जगह, हर परिस्थिति में एक ही तरह से नहीं चला जा सकता। आप ने बदलाव की बात स्वीकारी है। कोई कर रहा है तो उसे थोड़ी देर परखने में क्या हर्ज है? भारत ही नहीं विश्व इतिहास भी देखिये - परिवर्तन न तो एक व्यक्ति ने किये हैं और न ही रातो रात आ कर फरिश्तों ने। कहीं से कोई चिनगारी उठती है और सँजोया हुआ असंतोष भभक उठता है।
    आप ने कारगिल की बात की है। पुन: कहूँगा कि कोई तुलना नहीं है। बाबा का बड़बोलापन, अपरिपक्वता, अनरिफाइंड होना, कुटिल भेंड़ियों की माँद को योग शिविर केन्द्र जैसा समझने की भूल, सलाहकारों की अदूरदर्शिता, हतप्रभ होने की स्थिति में उस बयानबाजी को आजमाना जिसकी कोई समझ नहीं, रोना आदि आदि तमाम पहलू हैं जो मुझे भी खटकते हैं लेकिन वही बात कि सीखने में समय लगेगा। आप का यह कहना कि यह देश ट्रेनिंग का आखाड़ा नहीं, हँसी लाता है। जो देश इतना भी सहने को तैयार नहीं उसे परिवर्तन की बात सोचनी तक नहीं चाहिये।
    योग और आयुर्वेद के संयोग से बहुत लोगों को लाभ भी तो हुआ है। इस व्यक्ति ने बिना किसी गोपन के एक विकल्प प्रस्तुत किया। उसमें लाभ हानि दोनो हुये हैं। अगर इसे बरगलाना कहेंगे तो बहुत से प्रयोगों और उपक्रमों को बन्द करना पड़ेगा।
    रही बात पलायन की तो मैं तो यह सोच रहा हूँ कि क्या होता अगर बाबा भेष बदल कर चेलियों के साथ(ऐसा ही कई जगहों पर लोगों ने लिखा है।) पुलिस के हत्थे आने से बच गया होता? ऐसी परिस्थितियों में कोई निर्णय लेना होता है। बाबा ने एक निर्णय लिया। अगर वह इतना मूर्ख है कि उसे यह समझ में नहीं आया कि इस हरकत से वह हीरो से ज़ीरो बन जायेगा तो - मन्दमति विनश्यति।
    अगर व्यवस्था परिवर्तन होना है तो ऐसे बहुत से 'तमाशे और तमाशेबाज' झेलने होंगे। बाबा की उपलब्धि यह है कि उसने काले धन के छिपे कैंसर घाव को इतना प्रचारित कर दिया है कि अब यह मुद्दा रहने वाला है। इस देश में किनका राज रहा है और किनकी काली कमाई विदेशों में है, किसी से छिपा नहीं है।
    इस समय मैं सोना गिनियों, धनदोहनों, कपालियों, जनमर्दनों और कुकर्मियों के पक्ष में अपने को खड़ा नहीं देख सकता और तटस्थ तो नहीं ही रह सकता। बाकी समय पर छोड़ते हैं। देशों के भाग्यकाल चन्द नश्वरों के जीवन से बहुत आगे पीछे तक फैले होते हैं लेकिन भाग्य लिखते भी नश्वर ही हैं।..एक बात और कोलाहल के बीच से संगीत स्वरों को छान कर सुनिये। काम की बहुत सी बातें मिलेंगी। कल को अनशन का तमाशा खत्म भी होगा तो उस समय तमाशे पर नहीं मुद्दे पर ध्यान रखियेगा। कठिन नहीं है। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान गान्धी के तमाम अनशनों, उनके टूटने, असहमतियों और आरोप-प्रत्यारोपों के बीच स्वतंत्रता का मुद्दा ओझल नहीं हुआ।...नहीं, मैं रामदेव की तुलना गान्धी से नहीं कर रहा (वैसा होने के लिये बाबा को तमाशेबाजी और स्वयं दोनों को बहुत साधना होगा, नहीं करेगा तो टाँय टाँय फिस्स और हम सब लोग खुश्श! अमन चैन बहाल), बस एक उदाहरण दे रहा हूँ।

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  30. सुज्ञ जी की बात को अपनी बात बनाता हूँ...

    गिरिजेश जी, मैं तो कायल हो गया आपकी स्पष्ठ सोच और सत्यपरक निष्कर्ष देखकर।

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  31. अमा छोडो भी यार, अब मैं तो बार-बार यही कहूँगा,
    "सोनिया गाँधी मुर्दाबाद"
    "मनमोहन मुर्दाबाद"
    "कातिल सिम्बल मुर्दाबाद"
    "काँग्रेस मुर्दाबाद"
    "सिसली के माफिओं भारत छोडो"

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  32. ab desh ke jo haalat hain ..kisi par bhi vishwas nahi hota . na vyakti par na party par. janta bevkoof banti aa rahi hai...banti rahegi.

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  33. बोर्ड परीक्षा में इतनी धुंआधार नक़ल तो नहीं होती थी पर हमें भी किस्सा याद आया... लेकिन इस पोस्ट पर कहने का कोई मतलब नहीं तो फिर कभी !
    बाकी असहमति जैसा कुछ दिखा नहीं. बहुत दिनों के बाद लेटकर देर रात तक भारतीय न्यूज़ चैनल देखता रहा और अब गर्दन टेढ़ी हो गयी है :)

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  34. @ अभिषेक ओझा
    आप सुधरे जमाने के ब्रिलिएंट बच्चे हैं। :)

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  35. " हम कहाँ से ईश्वरों को ले आयें जो हमारा नेतृत्त्व करें? ऐसी सोच आत्मघाती है। व्यक्ति नहीं मुद्दा देखिये। जिसने उठाया है अभी तो वही नेता है। "

    बिलकुल.....

    आपकी लेखनी ,आपके सोच के कायल तो हम सदा से हैं,लेकिन इस मुद्दे पर आपके परिपक्व और स्पष्ट सोच ने और नतमस्तक कर दिया...

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  36. मैं २ दिन से पढ़ रहा हूँ गिरिजेश जी, और सच को सचमुच काट कर नहीं देखा जा सकता।
    एक भी शब्द से असहमत होने का प्रश्न ही नहीं उठता।

    और हाँ, वो किशोर की २ और ३ नंबर की बातों से एक और किशोर याद आया।
    सादर

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  37. "हम कहाँ से ईश्वरों को ले आयें जो हमारा नेतृत्त्व करें? ऐसी सोच आत्मघाती है। व्यक्ति नहीं मुद्दा देखिये। जिसने उठाया है अभी तो वही नेता है। मिस्र की स्थिति की तुलना भारत की स्थिति से करना ठीक नहीं। कोई मेल ही नहीं है। " - bilkul sahi ...

    क्या किया जाए - ब्लॉग और टिप्पणी लिखने वाले भी तो व्यक्ति ही हैं ना - ईश्वर तो नहीं .. कि उनकी बात सर्वमान्य हो जाए [वैसे रामायण और महाभारत पढ़ें, या यीशु या मुहम्मद की कथाएँ , तो लगता है - जिसे ईश्वर मान भी लिया जाए - उसकी ही कौन सी बात हम मान लेते हैं? ] अब हम लोग हर ब्लॉग पर यह बात कर रहे हैं - एक महीने तक बिका हुआ मीडिया रामदेव की बात को या तो दिखायेगा नहीं -और यदि दिखायेगा भी तो इस तरह से कि "आधी रात रामदेव को यह ड्रामा करने की क्या ज़रुरत थी ?" - कि नाटक रामदेव ने किया था क्या? बालकृष्ण "नेपाली है" कि उनके पिता जी नेपाली थे - तो

    सोनिया हिन्दुस्तानी हैं तो बालकृष्ण क्यों नहीं??

    तो में यह कह रही हूँ कि कुछ बिके हुए मीडिया की लीपा पोती और कुछ हमारी जल्दी भूल जाने की आदत - बात को आई गयी कर देगी - कितने लोगोंको याद है कि रामदेव पिछले पांच दिनों से भूखे हैं - अन्ना के बारे में तो मीडिया बोल भी रहा था - अभी तो यह बात ही नहीं हो रही - क्या रामदेव अमर हैं कि इस बहसा बहसी में सब यह भूल ही गए हैं????

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  38. अगर रामदेव जी आसानी से गिरफ़्तार हो जाते तो कोई आक्षेप नहीं लगने वाला था न?
    कहीं पढ़ा कि ऐसे बाबा पर क्या भरोसा करना जिसे नारायणदत्त तिवारी का समर्थन या प्रायोजन जाने क्या है, एक दूसरा कमेंट देखा है कि हरिद्वार में लाठीचार्ज नहीं होगा क्योंकि वहाँ निशंक की सरकार है। ध्वनि ऐसी लग रही है कि ’......, हम न हुये’ सच में बहुत अफ़सोस की बात है। लेकिन रास्ता है न, अनुभवी सरकार है, विधानसभा भंग करवा कर निशंक की जगह समर्थ, सबल सरकार बनवा देनी चाहिये।

    आपकी पोस्ट से अपने को किसी किशोर की तो नहीं याद आई लेकिन अपने एक उच्चाधिकारी की बात याद आ गई। विवाद होने पर अकेले में बिठाकर हमें समझाया गया, पुचकारा गया कि ’सत्ता एक मदमस्त हाथी है, इसके सामने मत खड़े होवो। येन केन प्रकारेण इस पर सवारी गांठो और ऐश करो।’

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  39. बहुत सुंदर..... बहुत अलग और शानदार तरीके से आपने अपनी बात रखी। बधाई दी जा सकती है।
    हमीं पर जुल्म ढाया जा रहा है और हमीं को मुजरिम बताया जा रहा है, जिन्हें मर कर भी जलना नहीं था उन्हें जिंदा जलाया जा रहा है।

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  40. भारत में तो जाने कितने सेफ्टी वाल्व और लेमनचूस अंग्रेजों की विरासत से ही आ रहे हैं। यहाँ के बँटे समाज में तो यह और कठिन है।
    =======================
    "अच्छे और बुरे लोगों के बीच रस्साकशी कल भी थी, आज भी है और आगे भी रहेगी। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।"
    =====================
    "भूतकाल में सत्ता हथियाने के चक्र और कुचक्र महिमा-मंडित हो कर धर्म का रूप ले लेते हैं। वह क्रिया जब वर्तमान में दोहरायी जाती है तो राजनीति कहलाती है।"
    =====================
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी
    =====================

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  41. "भूतकाल में सत्ता हथियाने के चक्र और कुचक्र महिमा-मंडित हो कर धर्म का रूप ले लेते हैं। वह क्रिया जब वर्तमान में दोहरायी जाती है तो राजनीति कहलाती है।"
    -डंडा लखनवी

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  42. डंडा जी(क्या नाम है! :))

    धर्म और राजनीति समकालीन अवधारणायें हैं।

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  43. What about the English invent football championship?

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