बुधवार, 1 जून 2011

लोटलोहारी–shit, प्रक्षालन पात्र और 'ताज़ी बनी सँड़सी'

lote
मेरा एक बिहारी मित्र है। हम लोगों की रोटी एक ही धन्धे से चलती है। उसकी आदत है कि काम बिगड़ने पर कहता है - लोट्टा हो गया!
मिला तो बातों के दौरान किसी goof up पर बोला - ओ तो बड़का लोट्टा हो गया। मुझसे न रहा गया तो पूछ पड़ा - अबे, यह तो बता दो कि हर गड़बड़ पर लोट्टा कह कर तुम क्या जताना चाहते हो? उसने उत्तर दिया - कोई कांवेंटिया shit बोलता तो तुम न पूछते। लोटा कहना उससे सभ्य है - गन्दगी नहीं, उसके प्रक्षालन पात्र (जी, उसने यह शब्द कहा था) के माध्यम से गड़बड़ी जताना बेहतर है।
मैंने बात जोड़ी कि बड़का लोट्टा माने हैंडल वाला लोटा। ऐसी गड़बड़ी कि प्रक्षालन पात्र को घर तक टाँग कर ले जाना पड़े। साइट पर भी shit और उसके कारण घर पर भी shit। उसने बस यह कहा - हो तो लखनऊ के लेकिन तुम्हें लोट्टा कहने की तमीज नहीं है। उसने तमीज, लोटे और लखनऊ के सम्बन्ध का उद्घाटन नहीं किया। अगली बार इस बावत पटनिया टेशन पर तपास कर लूँगा।
 इंस्पेक्शन के बाद वापस लौटते एक क़स्बे की दुकान पर ढेर सारे लोटे, टाँगा जा सकने वाला बड़ा पात्र एक साथ दिखे तो फोटो हींच लिया। बाद में गौर किया तो देखा कि टँगने के ऊपर 'शुभ लाभ' और नीचे 'अर्पण' दिख रहे थे। अब इतने सारे लोट्टे एक टँगने के साथ शुभ लाभ किसे अर्पित कर रहे हैं?
सब खाली हैं यार! इहाँ त कउनो गड़बड़ नायँ?
lohar राह में ही रामजियावन लोहार की दुकान दिख गई। यह बताने पर कि वे सड़क के राइट ऑफ वे में लौहकब्जा किये बैठे हैं, उन्हों ने सिर उठाया और कहा - सबै भूमि गोपाल की।
आँख के इशारे और अपनी बेस्त बात से उन्हों ने सँड़सी, पास बैठे अगोरते ग्राहक दादा और कोयले की आग की महँगाई सब जता दिया साथ ही यह सन्देश भी दे दिया - मुझे तुम्हारी बकवास से कुछ नहीं लेना देना। देखते नहीं, लोहे का ताव ठंडा हो रहा है। पहिया घुमावन चेले ने बात की तस्दीक की तो हम खिसक लिये।
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भारत में अभी भी लोटा विराजमान है और 'ताज़ी बनी सँड़सी' की डिमांड है। लोग उसके लिये अगोरने तक को तैयार हैं।  Village Industry - सँड़सी made to order & demand. 

अपन तो आजकल रोज लोट्टायमान हो रहे हैं। हालत पतली हो गई है।
हर बात में ठोंकना! 
कितना टैम है तुम्हरे पास जी? रस्ता नापो अपना। 


पुनश्च: 
एक बात बताना भूल गया था कि फोटो में रामजियावन चरकट्टी मशीन के गँड़ासे की धार तेज कर रहे हैं लेकिन दद्दा सँड़सी के लिये ही बैठे थे। भुनभुना रहे थे कि उनका काम रोक कर रामजियावन ऐसे गहकी का काम कर रहे थे जो नपत्ता था। रामजियावन उस काम को प्राथमिकता इस लिये दे रहे थे कि नपत्ता गहकी के बैल और गोरू चारा अगोर रहे थे - गँड़ासा टनाटन हो कर आये, चारा कटे तो जीमें। मतबल ये कि मनई के अगोरन से गोरू गोथार की अगोरन उस समय अधिक  महत्त्वपूर्ण थी। दद्दा जो झुठहू ये कह देते कि घर में बहुरिया को अकाज हो रहा है तो रामजियावन शायद सँड़सी को ही प्राथमिकता देते। लेकिन क्या है कि कुछ लोगों से न झूठ बोला जाता है और न घर की बात बहरे कहा पाती है। 
न कह पाये तो झेलो दद्दा!        
    

24 टिप्‍पणियां:

  1. कई दिनों से एक शेर सुनाने के लिए जी कुलबुला रहा था था पर एक शब्द का सही विकल्प नहीं मिल पा रहा था, पर आज आपने उसके लिए लोटा शब्द देकर उपकार सा कर दिया लग रहा है | शेर है:

    ग़ालिब की शादी में उसने पीली शराब, वाह वाह !!
    ग़ालिब की शादी में हमने पीली शराब
    फिर जो हुयी तबियत खराब
    .
    .
    दे लोटा दे पेशाब
    दे लोटा दे पेशाब

    हंऽऽ न्यूरोन हल्का सा हो गया है इसे सुनाकर | ;-)

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  2. लाभ का अर्पण
    हानि का तर्पण...
    लोट्टा ही लोट्टा ..हो गया सब

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  3. यह लोटा तो हमे भी लोटा कर गया, कल आऊंगा समझने के लिये... शुभरात्रि

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  4. `रोचक' पर क्लिक लगा दिया हूं! यानी रोचक ! लोट्टायमान !

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  5. फोटो हींच लिया :सतीश प्रभाव ! :)

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  6. सबै भूमि गोपाल की।

    बाकि महानगरों मं लोटा प्रचालन से बाहर हो गया है :)

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  7. गधा उदासा क्यों?
    राही प्यासा क्यों?
    लोटा न था?

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  8. 'ले लोट्टा'... shit बोलने से तो ज्यादा बढ़िया लगता है... सही बोले.. :)

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  9. ओह! लोट्टा!

    इतनी बढ़िया पोस्टें बनने लगीं हिन्दी ब्लॉगरी में तो मुझे अपना आकलन रिवाइज़ करना पड़ेगा!

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  10. रोचक. उस 'टाँगे जा सकने वाले पात्र' को हमारे यहाँ डोलुआ कहते हैं.

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  11. (Smart Indian)अनुराग जी की दी हुई इस कहावत को हमने इस प्रकार पढ़ा था -

    पान सड़ा क्यों?
    घोड़ा अड़ा क्यों?
    मुसाफ़ि़र प्यासा क्यों ?
    -(लोटा न था)

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  12. प्रतिभा सक्सेना जी

    आपने दो पहेली को सम्मलित कर दिया है।
    गधा उदासा क्यों?
    राही प्यासा क्यों?
    (=लोटा न था)

    और

    पान सड़ा क्यों?
    घोड़ा अड़ा क्यों?
    रोटी जली क्यो?
    विद्या विस्मृत क्यों?
    (= फ़ेरा नहीं गया)

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  13. लोटे को बिजलेरी के बोतल ने तेजी से रिप्लेस किया है :)

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  14. सुज्ञ जी ,
    वे तीन बातें लोटे में बैठ जाती हैं - पान के पत्ते लौटना-पौटना,जिसमें सड़े नहीं, घोड़ा- ज़मीन पर लोट लगाए बिना रिलैक्स नहीं होता और मुसाफिर लोटे(डोरीसहित)बिना कुएँ से पानी कैसे निकाले !

    वैसे हर जगह रूप बदल भी जाते हैं .

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  15. लोट्टा की बात होते-होते कमंडल हो गया.

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  16. और हमारी तरफ उस लटकाए जा सकें वाले लोटे को 'डोली' कहते हैं | जो मुख्यत: दूध लाने और घी डालने के काम में लिया जाता है |

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  17. कोई कांवेंटिया shit बोलता तो तुम न पूछते। लोटा कहना उससे सभ्य है - गन्दगी नहीं, उसके प्रक्षालन पात्र के माध्यम से गड़बड़ी जताना बेहतर है।

    bahut sahi kaha aapne

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  18. सबै भूमि गोपाल की।
    गोपाल के नाम कब लिख रहे हैं? तेरा तुझको अर्पण ...

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  19. पहले यात्रा पर निकलने वाले लोटा और डोरी जरूर साथ रखते थे।
    लोटा केवल शौच-प्रक्षालन के काम ही नहीं आता था। उसे तीन बार माज कर उसी से स्नान करने और फिर सू्र्यदेवता को जल अर्पित करने के काम भी आता था, अब भी आता है। पूजा करते समय जल भरकर कलश के रूप में भी रखा जाता है। गौरी-गणेश की पूजा भी इसके बिना नहीं होती। भोजन के साथ पेयजल भी इसी पात्र में रखा जाता है।

    इन सभी पवित्र कार्यों में सम्मिलित होने के बावजूद यदि इसका प्रयोग shit के विकल्प के रूप में वे बिहारी बाबू कर रहे हैं तो मैं उन्हें लानत भेजता हूँ।

    वैसे भी अब लोटा लेकर खेत की ओर जाने वाले गाँव में भी नहीं मिलते। मोबिल का खाली डिब्बा, बिस्लेरी की बोतल, इत्यादि ने उस कार्य के लिए लोटे को रिप्लेस कर दिया है; क्योंकि प्रयोग के बाद लोटा माजने का झंझट अब कोई नहीं पालना चाहता। ग्रामीण घरों में अब शौचालय भी बनने लगे हैं। सरकार इस काम के लिए अनुदान भी देती है।

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  20. मेरी पत्नी बता रही हैं कि जब घर में नयी नवेली दुल्हन आती है तो एक लोटे में अक्षत भरकर घर के प्रवेश द्वार पर रखा जाता है जिसे पैर से लुढ़काकर वह घर में लक्ष्मी स्वरूप में प्रवेश करती है। इसे लोटा मारकर आना कहते हैं।

    अस्तु, पुनः लानत उक्त प्रयोग के लिए। :)

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