शनिवार, 19 नवंबर 2011

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ग्रेटर नोयडा। भारत के हर नगर को ऐसा ही होना चाहिये। सुनियोजित, स्वच्छ, सुन्दर और विहीनता के स्तर की जनसंख्या लेकिन चाई, फाई, ओमेगा जैसे ग्रीक अक्षर नामधारी खंड हृदय में शूल भोंकते हैं। डिजायनर जाति को भारतीय नाम ही न सूझे! अरे वृक्षों पर ही रख देते – अर्जुन, अमलतास, पाकड़, नीम आदि और उन खंडों में इनके वनखंड होते।  हम न भारतीय रहे और न आदर्श वैश्विक संस्कृति का प्रवेशपत्र ही पा सके। देश का सत्तर प्रतिशत देहात और बाकी तीस प्रतिशत का भी बहुलांश हाइवे, डिजाइनर स्पीड ब्रेकरों, डोलते पशुओं, थूकते मूतते मानुषों, गन्धाती बस्तियों, गड्ढों भरी सड़कों के किनारे चमकते अल्मुनियम कम्पोजिट से सजे चौंधा मारते मालों, सौन्दर्यबोध से हीन ईंट, कांक्रीट के मकानों, उनको जोड़ती सकुचाती सहमी सँकरी गलियों, उन पर सड़ते कूड़े के ढेरों, मुँह मारते कुकुर, गाय, नेताओं के भद्दे पोस्टरों, शीघ्रपतन का इलाज करने वाले हकीमों के विज्ञापनों, सस्ते चीनी मोबाइलों पर गला फाड़ जिलेबी बाई या मिस किस ... आदि आदि से पटा पड़ा है। मुझे कोफ्त होती है। एक मित्र कहता है – जा सकते हो तो चले जाओ लेकिन मेरे आगे कोसा न करो। उससे कहता हूँ जरा पश्चिम से आयातित तकनीकी को निकाल कर देखो, यह वर्णन बीस साल पहले भी ऐसा ही होता और आज भी ...क्या है यह सब? थूकने और मूतने तक की तमीज नहीं, हगने में सरनाम – The national smell of India!
वह कहता है – आबादी है और ग़रीबी है।
मैं कहता हूँ – कौन है इसका जिम्मेदार? आबादी और ग़रीबी तमीज और सफाई के साथ नहीं रह सकते क्या? पूरा देश ही अनुशासनहीन आत्माओं से पटा पड़ा है!
वह कहता है – you are immature और बात अटक कर सटक जाती है।
मैंने उससे कह दिया था – no taxi waxi for me. मैं अपने आप आ जाऊँगा। मैं बहुत कुछ देखना चाहता हूँ।  
एस एम एस आया है – सर! आप का फोन लग नहीं रहा। मेट्रो से नोयडा सिटी सेंटर तक आइये और वहाँ से ऑटो कर के परी चौक। मैं आप को कासना के लिये पिकअप कर लूँगा। Kasna is at walking distance.
यह है तकनीकी और प्रोग्रेस! जिसमें न ‘नीक’ है और न ‘ग्रेस’। मेट्रो के जमाने में मोबाइल नेटवर्क नहीं लगता और साई, फाई, काई में परी चौक जीवित है जब कि कासना गाँव मूड़ा जा चुका है। सड़क पर भैंसें और साँड़ नहीं दिखते। सामने मध्यकालीन यूरोप के वास्तुशिल्प की नकल पर विशाल, बहुत विशाल आवासीय, व्यापारिक और मनोरंजन संकुल बन रहा है। चढ़ता हुआ ढलवा रैम्प कितना ‘out of sync’ दिखता है! कौन *तिया है यहाँ का आर्किटेक्ट? साले को भारतीय वास्तु के तत्त्व नहीं ध्यान में आये और गोथिक/यूरोपीय वास्तु की भी ऐसी तैसी कर रहा है। प्रोफेसर मन में चीखें मार रहे हैं – architecture is about harmony. It is about gradual change and transformation, in case they are required. It is about fusion of senses, of aesthetics which develop gradually. मैं उनकी बात को दो शब्दों में संकुचित कर देता हूँ – सौन्दर्यबोधी संस्कार।
पूरे चार घंटे चिल्लाता रह जाता हूँ। Where are basics? प्रोग्रेस की वेदी पर गुणवत्ता की बलि न चढ़ाओ। काम बन्द। पहले चेक कराओ।
वापसी में नोयडा सिटी सेंटर मेट्रो में मन शांत हुआ है। रखरखाव में थोड़ी कमी है लेकिन सुन्दर है, व्यवस्थित है। सुन्दरता अनुशासन लाती है। लोग अनुशासित हैं। राजीव चौक और नई दिल्ली स्टेशनों पर फिर से जाहिल अनुशासनहीन भीड़ के दर्शन होते हैं। केवल सुन्दरता पर्याप्त नहीं है। उसके साथ डंडा भी आवश्यक है।
मेट्रो एयरपोर्ट एक्सप्रेस सेवा। अहा! ऐसा ही होना चाहिये। टोकेन टिकट ले कर घूमता हूँ – ओ! वही है। चश्मिस। कल्पना यथार्थ बन कर सामने आ जाय तो क्या हाल हो सकता है? पूरा परिवार साथ है। नहीं, यह सच नहीं है। एक्सप्रेस सेवा का रेल ट्रैक काँच के मूवेबल एंक्लोजर से घिरा है। यह है वर्ल्ड क्लास! उधार की तकनीकी। उधार के दिमाग, लेकिन है तो।
ट्रमिनल 1 डी। विशाल स्ट्रक्चरल तकनीकी। त्रिभुजाकार ट्रस। पिन कनेक्शन। आँखें सीलिंग पर अटकी हैं। जहाँ ट्रस का एलीमेंट सीलिंग को भेदता है, वहाँ सीलिंग को भद्दे तरीके से काट दिया गया है। एक, दो, तीन ... हर जगह वही किया गया है। कुछ तो भारतीय लगना चाहिये। पब्लिक वाइ फाइ इंटरनेट बस कहने के लिये है। एयरटेल मोबाइल नम्बर माँगता है, पास कोड भेजने के लिये। बाद में मेरा मोबाइल नम्बर विज्ञापनबाजों को बेंच कर खर्च निकाल लेगा। विनायल पर डिसप्ले के सन्देश और चिह्न लगाये जा रहे हैं। अंग्रेजी ऊपर है और हिन्दी नीचे – राजभाषा क्रियान्वयन के सांसद यहाँ से गुजरेंगे। किसी को कुछ न दिखेगा और कहीं किसी विभाग की समीक्षा में बस इस पर हो हल्ला मच जायेगा कि फाइल पर नागरी में OK क्यों नहीं लिखा? हताश मन सोचता है - कुछ भी, हम कुछ भी ठीक से नहीं कर सकते।
कुछ दिन पहले की किसी से चैट याद आई है।
 ‘डे ऑफ्टर टुमारो’ फिल्म देखने के बाद मन में आया था कि क्या ऐसी फिल्म हिन्दी में बन सकती है? मेरा मतलब विचार और क्रियान्वयन में नवोन्मेष से था, नकल या उधार की तकनीकी से नहीं। नहीं बन सकती। This is a degenerating civilization. कोई हादसा होना चाहिये, बहुत भयानक ताकि कम से कम दो तिहाई जनसंख्या समाप्त हो जाय। बाकी बचों को तमीज आयेगी। मन की रौ – अगर टिहरी बाँध टूट जाय तो क्या हो? उत्तराखंड से लेकर बंगाली समुद्र तक विनाश ही विनाश। समूची गांगेय सभ्यता तहस नहस। कितनी विविधता है गंगा-किनारे की बसावट में!
अरे! मुझे स्टीवेन स्पीलबर्ग का ई मेल आइ डी तो दो, मैं उसे आइडिया मेल कर देता हूँ। इस पर बहुत बढ़िया फिल्म बनेगी। तकनीकी और मानवीयता दोनों के उदात्त, निकृष्ट, हर तरह के पहलू सेलुलाइड पर उतर सकेंगे। भारत में कौन बनायेगा ऐसी फिल्म? किसमें इतना दम है? ले दे के ‘राम तेरी गंगा मैली’ और फुस्स! गान्धी पर फिल्म बनी भी तो एक अंग्रेज ने बनाई। उस फिल्म के मानकों को हम आज तक पार नहीं कर सके। न हमसे ढंग से प्रेम हो पाता है और न घृणा। न पूजा हो पाती है और न निर्मम आलोचना। हम सहमे हुये, ठिठके हुये सुरक्षित जन हैं।
हाँ, सही है। आप इंजीनियर हुये, यह उसका प्रमाण है।    
देखिये, मेरा एक दोस्त कहता है अमेरिका में इस तरह के रचनात्मक काम अधिकतर यहूदी ही करते हैं। होलोकास्ट में survival of fittest का फंडा लगाइये तो कहा जा सकता है कि यहूदियों में जो बेस्ट था वही बचा रह पया। पुरखों ने संहार देखा और नई पीढ़ी सृजन की विराटता को समझ पा रही है।
उसने कहा है – ऐसी फिल्मों में हर कोई अपने तरीके से मैनहट्टन को तबाह कर देता है। मैं सोचता हूँ कि क्या भारत के पास कोई मैनहट्टन है? मन में उत्तर कौंधता है – मुम्बई। समुद्र का जलस्तर भयानक स्तर तक उठ जाय तो तबाही ही तबाही। किसी जबरदस्त फिल्म लायक मसाला है लेकिन ... बस वही लेकिन।
...वह मेरे साथ ही फ्लाइट पर सवार हुई है। उसकी बातें मैं सुन सकता हूँ। हाँ, वही है। वह ऐसी ही है माने कल्पना नहीं यथार्थ है। संसार बहुत बड़ा है। इसमें सबके लिये जगह है। उसने किसी बात पर किसी को बुद्धू कहा है। मुड़ कर देखना नहीं रोक पाया हूँ। भीतर वात्सल्य उमड़ पड़ा है। समय कभी कभी वही हो जाता है जो आप चाहते हैं लेकिन आप वही नहीं रह पाते (बीस साल पुराना बहुत होता है)। दिल्ली कभी निराश नहीं करती, सीधे मार देती है – जी सको तो जी लो भरपूर...इतना सोचने और इस अचानक साक्षात्कार के बाद भी मैं भरपूर जी पाऊँगा? वह सब कुछ लिख पाऊँगा जो सोच रखा है?
एयरपोर्ट पर उतरते बाहर होते मन में यही प्रश्न हैं। उसे देख सकता हूँ, किसी बात पर उसे रोना आया है, आँखें पोंछ रही हैं। सम्भवत: लेने आया अधेड़ उसका कोई बहुत प्रिय है। कुछ याद आया है ... करम के लिखलका हो बेटा, दुनिया में कोइ ना मेटाई!
… Induced genetic defect dear! Neurons are destroyed before being charged.                             

12 टिप्‍पणियां:

  1. अद्भुत लेखन...एक एक शब्द हथोड़े की तरह दिमाग में बजता है...घन घन घन...बखिया उधेड़ कर रख दी है आपने...वाह...दो बार इसे पढ़ चुका हूँ अभी और पढूंगा...

    नीरज

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  2. Yeh to greater delhi or greater noida ka ek traler hi dekha hai tab yeh haal hai..agar kuch ghanto ke prawas main yeh haal hai ......

    jai baba banaras............

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  3. snowballing व percolating down, ये दो बढ़िया शब्द गढ़ लिए हैं देश के कर्णधारों के आर्थिक सलाहकारों ने. इसी के चलते सब देश को भगवान-भरोसे छोड़ अपने-अपने उल्लू सीधे करने में जुट गए हैं... सब अपने आप ही ठीक हो जाएगा कह कर...

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  4. विचार स्फुलिंगों को जन्म देती पोस्ट -अब सभी स्टीव जाब्स नहीं हैं न कि सौन्दर्यबोध और प्रौद्योगिकी का समेकन कर पायें! बाकी भी बहुत बिन्दुओं को उकेरा है आपने ..सोच रहा हूँ !

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  5. सब रिस रहा है, सब टपक रहा है,
    कुछ तो हृदय में, कुछ अटक रहा है,
    कोई समझाये, हम तो थेथर हैं,
    जब इतना है तो कौन गटक रहा है।

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  6. सौन्दर्य बोध के मामले में हम भारतीय न जाने क्यों थोड़ा कमतर हैं औरों से। यह आभास अक्सर होता है जब देखता हूं कि मशीनों से लेकर भवन निर्माण तक में जरा सी हेर फेर से मशीन आकर्षक हो उठती याकि सीढ़ियों की रेलिंग-संरचना में थोड़ा सा भी बदलाव उसे अलग तरह का लुक देता लेकिन नहीं। पुराना घिसपिट्ट चालू।

    यहां तक कि थियेटरों में, सिनेमा घरों में अक्सर देखा गया है कि एंट्रेंस चकाचक रहेगा लेकिन पिक्चर खत्म होने के बाद जब निकलना होगा तो संकरी सीढ़ियों से, पीछे के रास्ते ऐसे निकाला जायगा जैसे चोरी करके निकल रहे हों। जबकि बाहर जाने का रास्ता भी उतनी खूबसूरती की दरकार रखता है जितना एंट्रेंस ताकि लोग जाते जाते अपना मूड बनाये रखें और फिर लौटकर उसी सिनेमाघर में आयें।

    जहां तक पेड़ों के नाम ग्रीक शैली में रखने का सवाल है,भारतीय नाम अपने आप में इतने आकर्षक हैं कि उन्हें लोग मन से पढ़ेंगे जबकि ग्रीक नाम देखकर आगे बढ़ जाएंगे।

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  7. सोच रहा था क्या लिखूँ कि दिखा कोई साधारण पर भी क्लिक कर गया है ! और अब मस्त हंसी आ रही है। :)

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  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  9. 'समय कभी कभी वही हो जाता है जो आप चाहते हैं लेकिन आप वही नहीं रह पाते'
    कई सूक्ति वाक्यों को समेटे हुए सुंदर लेखन!

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  10. बहुत सही! आराम बड़ी चीज़ है, मुँह ढंक के सोइये - गन्ध की तीव्रता भी कम रहेगी, बन्द आँखों से सौन्दर्य भी निखरकर आयेगा।

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  11. मेरे पास टीपने को भी एक ही शब्द (? नहीं चिह्न ) है
    ???

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