बुधवार, 23 नवंबर 2011

बचा ही कितना?

ज़िन्दगी शेयर बाज़ार है। बाज़ार में सबकुछ शेयर्ड है जब कि सीने से लगा कर रखा पोर्टफोलियो घटता बढ़ता  हुआ प्राइवेट है, बहुत ही प्राइवेट, ऐसा प्राइवेट जिसकी कीमत सटोरिये और भावनायें तय करती हैं जो सबके लिये खुले हैं – खुल्ला खेल, देख तमाशा।
जो पास है, मूल्यवान है लेकिन न दिया जा सकता और न बेचा जा सकता है, उसकी कीमत अभी कम है। जब तक बढ़ेगी तब तक वक़्त किसी और मुल्क में होगा जहाँ इस करेंसी की कीमत सड़क पर उड़ते आवारा कागज जितनी भी नहीं होगी। कोई जनता जमादार आ कर पूछेगा – इसे कूड़ेदान में डाल दो, उठा ले जाऊँ वरना बाद में लोगों के रास्ते गन्दे करोगे। यह भी हो सकता है कि जिसे करेंसी समझ सीने से लगा रखा है वह कभी का आना पाई की गति पा चुका हो और मुझे खबर तक नहीं।
कल ही फुटपाथ पर जो भिखारी मरा पाया गया, उसके ‘सामान’ से लाखों निकले। पूँजी बचाये दर दर भटकता भीख माँगता जाने किसकी तलाश में था? उसका वह भगवान उसे सुकून बख्शे जिसके नाम से वह माँगता गाँठ पूरी करने के ख्वाब में रोज मरता रहा।
एक और महीना बीतने जा रहा है। अगर प्रलय नहीं हुआ तो इसी सप्ताह एक रकम खाते में जमा हो जायेगी। ज़िन्दगी एक महीने और कम हो जायेगी और रकम आगे उड़ाने बचाने के लिये कुछ दिनों तक निश्चिंत कर जायेगी। निश्चिंतता से खामखयाली उपजती है। अक्षयपात्र कभी खाली नहीं होता – इस बात के साथ बहुत से पुछल्ले जुड़े हैं जो तभी दिखते हैं जब अक्षय पात्र अचानक ही क्षयग्रस्त हो जाता है।
इस बार न उसने मुझे सन्देश भेजा और न मैंने उसे। हम दोनों का जन्मदिन एक है। अरसे बाद कल मिला तो सहमता हुआ। बड़े लोगों के गिरोह में था। आभिजात्य की एक पारदर्शी चादर हमारे बीच तनी थी। मैंने बुलाया, अभी आया कह कर वह नहीं आया। पास जा कर मैंने उसकी पीठ पर एक धौल जमा दी। धौल में दोस्ती नहीं, धुलाई थी। चादर कुछ और पारदर्शी हो गई और मुझे अपने ‘क्लास’ का और अच्छे से आभास हुआ। आधा दिन बाकी था। मैं पूरा करने, मिलने नहीं गया। अगली बार जब हम मिलेंगे तो बड़े-छोटे होंगे, बॉस-मातहत होंगे और हमारे सम्वादों से वह ‘साला’ ग़ायब होगा जो हम दोनों में रिश्ता जोड़ता था। देसी ज़िन्दगी ऐसी ही है, अभी उस मल्टीनेशनल लेवल तक नहीं आई जिसमें बुलाया नाम से जाता है और पीठ का चाकू काम आता है।
सत्रह धन नौ बराबर छब्बीस, छब्बीस बार कल मैंने फोन लगाया, दूसरी छोर से नहीं उठाया गया जब कि बीच में इनगेज होने के संकेत भी सुनाई दिये। मैं जिस संसार में जीता हूँ, दूजे का उससे अलग है। सबकी दुनिया अलग होती है और सबके तरीके भी। कष्ट तब होता है जब दूजे के पैमाने से अपना मापन किया जाता है। मैं बातों में संतुष्टि पा लेता हूँ जब कि उसे खनक प्यारी है। गाहे बगाहे वह खनक सुना कर मुझे बताता रहता है। मैं बहुत शीघ्र भूलता हूँ और उसे याद दिलाने की बड़ी खराब आदत है।    
सच कहें तो मैं चुक चला हूँ। गये युग का हो गया हूँ जब बात मुँह पर कह देने वाले के लिये सम्मान का एक कतरा बचा होता था। अब ऐसे जन ‘यूज’ होते हैं। अनजाने ही उन खामोशियों के भोंपू बन जाते हैं जो सबसे पहले उन्हें ही बहरा बनाती हैं। एक दिन यूज करने वाला चीख चीख कर बताता है और लड़ते भिंड़ते आधा दिन निकल जाता है। रिश्ते फिर वही नहीं रह जाते। पीठ में भोंकने को नज़रें पीछा करने लगती हैं। बेवजह भुनभुनाया जाने लगता है। अन्धे कुयें में धकेलते कलाकारी दिखाई जाती है और हाथ झाड़ते उफ से सम्वेदना ग़ायब होती है।
मैं फिर से इश्क में हूँ। कल किसी का फोन आया और उसने बताया कि बारह साल की उमर में 31 दिसम्बर के बाद के खाली दो पन्नों पर मैंने 'साल का सारांश' लिखा था। उसमें बहुत निराशाजनक बातें थीं। उसने बताया कि तुम रत्ती भर भी नहीं बदले जिसका नतीजा यूँ पैर काट कर पहले चलने और अब ठहर कर घाव बाँचने में हुआ है। मैंने बस इतना कहा अंतिम पन्ने के दाहिने नीचे कोई निशान है क्या? उसे ध्यान से देखो, किसी के लिये है। मेरे लिये यही पर्याप्त है कि मैं उस कच्ची उमर में भी कर सकता था और अब भी कर सकता हूँ। उसका कोई नाम नहीं है। मेरा संसार अलग है, बहुत अलग! बचा ही कितना?                        

4 टिप्‍पणियां:

  1. ईश्वर आपको एक नहीं ऐसे कई इश्कियां अनुभवों से गुलजार करे ,जन्नत की हूरें भी बख्शे!
    और बकिया मजमून पर केवल रत्ती भर यह कहना है कि मानवीय सम्बन्धों के आगे सब कुछ गौण होना चाहिए मगर बहुत से लोग इस बात को मृत्यु
    शैया पर ही जाकर समझते हैं !

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  2. चाहूँ तो भी, लोभ संवरण होता नहीं :)

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  3. और भले ही मोल भाव करें आपका, आप अपने लिये अमूल्य हैं। और भी अमूल्य वे हैं जिन्हे आप अमूल्य समझते हैं।

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  4. सबकी दुनिया अलग होती है और सबके तरीके भी। कष्ट तब होता है जब दूजे के पैमाने से अपना मापन किया जाता है।

    jai baba banaras....

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