मंगलवार, 8 नवंबर 2011

...dedicated to the most wonderful girl on earth


Dedication Public License (DPL)

By downloading the archive, you confirm your agreement in this license.

I. Freeware
First of all, the reasons why Spybot-S&D is free:

I.a. Dedication
Spybot-S&D is dedicated to the most wonderful girl on earth :)

I.b. Binary
What do you get if you buy software? Lots of ones and zeros, nothing more. If they were distributed as art, I could understand paying it. But if the main goal of their order is to earn money - by fees or ads - I don't like it!

I.c. Conclusion
This means that I grant you the license to use Spybot-S&D as much as you like. But if you like it, I ask two things of you: say a prayer for me (and the most wonderful girl while you're at it ;) ) to your god - or whatever you believe - and wish us some luck….

...इस समर्पण को पढ़ना मुस्कान दे गया और विचार के लिये उकसा भी गया। कौन है यह भाग्यशाली, संसार की सबसे अद्भुत लड़की? क्या लगती होगी इस सॉफ्टवेयर के निर्माता की? बहन, मित्र, प्रेमिका, पत्नी, शिष्या, साथी, क्लासमेट? या कुछ भी नहीं? 
प्रेमिका ही होगी, क्यों कि पहले me के लिये प्रार्थना की बात करता है और फिर us के लिये आप से भाग्य का wish माँगता है। एक सौन्दर्यबोधी पगला है शायद जिसने समस्त स्नेहिल मानवीय भावनाओं को यूँ अभिव्यक्ति दे दी!

इसकी प्राथमिकता कला है। ऐसे जन जो सॉफ्टवेयर को बस 0 और 1 का खेल मान उससे धनार्जन को नापसन्द करें उन्हें सिरफिरा कहा जा सकता है लेकिन क्या वाकई ऐसा है? बात प्राथमिकता की है – सौन्दर्य और धन में से किसे? मुझे लगता है कि सही दृष्टि यही है कि सौन्दर्य को आगे रखा जाय।

यहाँ सौन्दर्य को सीमित संकीर्ण अर्थ में न ले कर जीने के व्यापक संस्कार के रूप में लें। किसी विचारक का कथन याद आया है – जिस देश का यौवन सपने न देखे और सौन्दर्य का पुजारी न हो, उस देश का पतन अवश्यम्भावी है।
सुदूर भूत से मैं सम्मोहित तो नहीं हूँ लेकिन लगता है कि एक समय ऐसा रहा होगा जिसके पश्चात इस देश की जवान पीढ़ी से ‘सौन्दर्यबोध’ छीजने लगा होगा। संतुलन और तारतम्य बिगड़े होंगे। शिक्षा से अर्जित या सभ्य परिवेश प्रदत्त विकसित सहज संस्कारिता लुप्त होने लगी होगी। आज उन्मुक्तता, व्यक्तिपरकता और अनुशासन के अभाव ने संकट गम्भीर किया है। हमें तेजी से बाहरी प्रभावों का अनुकूलन कर अपने यहाँ विकसित और समाज के लिये पथ्य जिन संस्कारों को और सुदृढ़ करना चाहिये, उन्हें दकियानूसी, प्रगतिविरोधी और एक दास समाज की मानसिकता मान कर हम त्यागते जा रहे हैं। अपनी सौन्दर्य परम्परा का अज्ञान और जड़ से कटाव बड़ी समस्यायें  हैं।

यौवन के साथ थोड़ी उच्छृंखलता स्वाभाविक सी मानी जाती है लेकिन साफ सुथरे स्थानों पर पीक मारना, लोगों के मुँह पर धुँआ उड़ाना, स्त्रियों के साथ जुगुप्सित छेड़खानी करना, ताजी बनी दीवार पर भद्दे नारे लिख मारना, सार्वजनिक स्थानों पर कूड़ा फेंकना आदि आदि सब को सौन्दर्यबोधी चेतना के अभाव से जोड़ा जा सकता है और अगर कोई बताने का प्रयास करे तो उस पर उखड़ जाना अमानवीयता से। 

 कहते हैं कि ग़लत आदमी ग़लत शिक्षा का परिणाम होता है। गाँव और नगर दोनों स्तर पर हम कहीं चूकते चले आ रहे हैं, आज से नहीं सैकड़ो वर्षों से। कुछ है जिसे भूल गये हैं। वह कुछ है – व्यापक सौन्दर्यबोधी चेतना। हमारी आज की शिक्षा पद्धति उदात्तीकरण और परिष्करण में उतनी सफल नहीं है जितनी होनी चाहिये। शिक्षा को मात्र शालेय शिक्षा में संकुचित न कर , परिवार, परिवेश और समाज की समेकित शिक्षा की व्यापकता से समझें। सौन्दर्यबोध की अभिव्यक्ति संगीत, नृत्य, उत्सवधर्मिता में होती रही है। भारतीय समाज के विभिन्न भौगोलिक घटकों को देखें तो जिन क्षेत्रों में यह पक्ष अधिक मुखर है और जहाँ ऐसे कला कार्यव्यापारों की पैठ घरेलू जीवन और परिवार के स्तर तक है, वहाँ स्त्रियों के विरुद्ध अपराध भी कम हैं और वे अधिक सहज स्वतंत्र रूप से दैनिक और अन्य कार्यव्यापारों को अंजाम देती हैं। 
 पुरुष की प्रवृत्ति अपने वंश के विस्तार की होती है, जिसके साथ शक्तिसंचय, प्रदर्शन और सुन्दरतम के उपभोग की अंत:धारा भी जुड़ती है। उसके विकृत होने पर वह आक्रामक, असभ्य और अपराधी बनता है। स्त्री गर्भकाल के कष्ट और मातृत्त्व के वरदान के उपरांत शिशु के लालन पालन की नैसर्गिक आवश्यकता के कारण स्वाभाविक रूप से संकोची होती है। सभ्यता और संस्कारिता का तकाजा है कि सृजन से जुड़े कोमल अस्तित्त्वों और भावों का आदर हो, उनका पोषण हो। आधी जनसंख्या इसकी अधिकारी है और यह शासन के दंड या कथित विकास की सर्वग्रासी धनदोहू मानसिकता के प्रसार मात्र से सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। प्रतिक्रियावश स्त्री पुरुष सरीखी व्यवहार करने लगे या त्याज्य आक्रामकता को अपना ले तो किंचित सुधार तो दिखेगा लेकिन उससे होने वाली हानियाँ समाज के लिये दूरगामी घातक प्रभाव लेकर आयेंगी।

तो वह शिक्षा कैसी हो जिससे बचपन से ही सौन्दर्यबोध के बीज पड़ने लगें? इसके लिये बाहर नहीं, अपनी परम्परा में ही हल ढूँढ़ने की आवश्यकता है। एक लोकप्रिय श्लोक याद आया है:    
विद्या ददाति विनयम्, विनयात्यातपात्रताम्।
पात्रताम् धनम् आप्नोति, धनात् धर्म: तत: सुखम्॥
इसे ‘विद्या से विनय, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख’ अर्थ में लिया जाता है। मेरे विचार से क्रम में रहस्य है। गति देखिये:
विद्या की सार्थकता विनय प्रदान करने में है।
विनय की सार्थकता पात्रता अर्जन में है।
पात्रता की सार्थकता धनार्जन में है।
धन की सार्थकता धर्म (मानव के लिये धारणीय कार्य व्यापार) रत रहने में है।
.... ‘सुख’ इनके बाद आता है। ...
ध्यातव्य है कि विद्या और पात्रता के बीच विनय है यानि अनुशासन। हम किधर?
धन और सुख के बीच धर्म है यानि एक धारणीय कार्य व्यापार। हम किधर?
और, इस पूरे क्रम में कथित स्वर्ग निवासी ईश्वर कहीं नहीं है। विकसित देशों में आम स्तर पर इस श्लोक को जीवन में कमोबेश उतार लिया गया है। जन हमसे बहुत अधिक सुखी है और वहाँ ‘सौन्दर्य’ है, तीसरे या कथित विकासशील देशों से अधिक है, बहुत अधिक।
उनके यहाँ most wonderful girl on earth के पाये जाने की सम्भावना हमसे बहुत अधिक है...
... बात एक सिरफिरे सॉफ्टवेयर डेवलपर की प्रेमिका से प्रारम्भ हो कर जाने कहाँ आ पहुँची! मैं सोच रहा हूँ कि कल को भारत में कोई सॉफ्टवेयर डेवलपर बाला हो जो अपने किसी सॉफ्टवेयर के DPL में यह लिखे कि dedicated to the most wonderful boy on earth :), तो कैसा हो?
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चलते चलते बी एस पाबला, रतन सिंह शेखावत, रवि रतलामी, ई पंडित और राहुल प्रताप सिंह राठौड़ जैसे हिन्दी के उन ब्लॉगरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना चाहूँगा जो कम्प्यूटर आधारित उत्कृष्ट सामग्री उपलब्ध कराते रहते हैं।  असल में यह पोस्ट उपजी ही पाबला जी द्वारा सुझाये गये सॉफ्टवेयर को इंस्टाल करते हुये लाइसेंस को पढ़ने के कारण J

9 टिप्‍पणियां:

  1. readers are requested to prayforUS
    Irequest that she must not la bela dame sence mercy MEANS SHE MUSTbe
    abeautifulllady with mercy

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  2. एक से एक सिरफ़िरे हैं और इनका दुनिया में अलग ही स्थान है।

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  3. @ ramu

    आप ने जाने अनजाने एक अलग पहलू पर रोशनी डाली है। अमेरिकी संस्कृति के फैन और उससे चिढ़ने वाले दोनों तरह के लोगों में बहुतों को उनकी साम्राज्यवादी हस्तक्षेपी नीतियाँ और क्रूर हरकतें पसन्द नहीं आतीं। वहाँ lady को girl कहने का भी चलन है। तो girl का सन्दर्भ अमेरिका के सबसे दर्शनीय प्रतीकों में से एक statue of liberty से लें जिसे equality, liberty and fraternity वाले फ्रांसिसियों ने भेंट किया था। us को US भी समझ लें ;)
    और प्रार्थना करें कि उसमें mercy की भावना आये। अच्छी बात है। धन्यवाद लेकिन इस पोस्ट के मायने अलग हैं।
    ... संयोग ही है कि आजकल कीट्स को पढ़ रहा हूँ। फ्रेंच शीर्षक La Belle Dame sans Merci (the beautiful lady without mercy)से उसने एक बैले लिखा था जिसका विषय मोहजाल में फाँसने वाली सुन्दर स्त्री का था जो राजपुरुषों को बरबाद कर देती थी, उसकी आँखों में पशुवत चमक थी। अमेरिका के नकारात्मक चरित्र का इससे अच्छा प्रतीक नहीं हो सकता लेकिन यहाँ बात विधेयात्मक पक्ष की है और उसका अमेरिका से कुछ नहीं लेना देना।

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  4. यह है वह बैले:
    WHAT can ail thee, knight-at-arms,
    Alone and palely loitering?
    The sedge has wither’d from the lake,
    And no birds sing.

    what can ail thee, knight-at-arms!
    So haggard and so woe-begone?
    The squirrel’s granary is full,
    And the harvest’s done.

    I see a lily on thy brow
    With anguish moist and fever dew,
    And on thy cheeks a fading rose
    Fast withereth too.

    I met a lady in the meads,
    Full beautiful—a faery’s child,
    Her hair was long, her foot was light,
    And her eyes were wild.

    I made a garland for her head,
    And bracelets too, and fragrant zone;
    She look’d at me as she did love,
    And made sweet moan.

    I set her on my pacing steed,
    And nothing else saw all day long,
    For sidelong would she bend, and sing
    A faery’s song.

    She found me roots of relish sweet,
    And honey wild, and manna dew,
    And sure in language strange she said—
    “I love thee true.”

    She took me to her elfin grot,
    And there she wept, and sigh’d fill sore,
    And there I shut her wild wild eyes
    With kisses four.

    And there she lulled me asleep,
    And there I dream’d—Ah! woe betide!
    The latest dream I ever dream’d
    On the cold hill’s side.

    I saw pale kings and princes too,
    Pale warriors, death-pale were they all;
    They cried—“La Belle Dame sans Merci
    Hath thee in thrall!”

    I saw their starved lips in the gloam,
    With horrid warning gaped wide,
    And I awoke and found me here,
    On the cold hill’s side.

    And this is why I sojourn here,
    Alone and palely loitering,
    Though the sedge is wither’d from the lake,
    And no birds sing.

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  5. एक अच्छे विषय के प्रवर्तन और संवहन के लिए आंग्ल भाषा के यथोक्त संदर्भ का आगाज अनुचित अनावश्यक लगा ...
    मैं ही नहीं और भी पाठक संभ्रमित होंगे .....
    आजकल निर्वाचन की तैयारियों में DPL डेजीगनैटेड फोटोग्रैफी लोकेशन है ..मैं तो समझा इस पर कुछ मामला है :)
    सौन्दर्यबोध की छीजन पर आपने बढियां लिखा है और कई उचित हिदायतें भी दी हैं ! ध्यान रखूंगा !आभार !

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  6. ० और १ के इस खेल में सौन्दर्य जैसी न नापे जा सकने वाले गुण कैसे खपेंगे।

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  7. @ प्रवीण पाण्डेय

    लेख का ही एक वाक्य है:

    यहाँ सौन्दर्य को सीमित संकीर्ण अर्थ में न ले कर जीने के व्यापक संस्कार के रूप में लें।

    सॉफ्टवेयर की लाइसेंस भाषा में थोड़े खिलन्दड़पन के साथ उस संस्कार i.e. culturing के दर्शन होते हैं।

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  8. @ अरविन्द मिश्र

    जिस दिन किसी सॉफ्टवेयर का हिन्दी में लिखा ऐसा लाइसेंस दिखेगा उस दिन एक पोस्ट और लिखूँगा। वादा रहा कि वह इसकी तुलना में बहुत धाँसू होगा ... गोबर पट्टी और उसकी भाषा को 'शुद्ध दूध' के सम्मोहन से मुक्त होकर उस मुकाम तक पहुँचने में अभी बहुत समय लगने वाला है ;) तब तक मुझ सरीखे जाने कितने गोबर दर्ज-ए-जहन्नुम हो चुके होंगे।

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  9. ओरिजिनल लेख कितना प्यारा था. टिप्पणियों में पूरा बदल ही गया - कहाँ से कहाँ पहुँच गया !! :(

    :)

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