रविवार, 30 जनवरी 2011

आत्मनिवेदन

आया कैसा ध्रुवप्रदेश?
सूरज पहने षटमास वेश।

खेलती ऊर्मियाँ पार
धुन्ध उठा रही भाप
पोर पोर बरजोर ताप
उर ऊर्मि छ्न्द अपार।
  
जानूँ जो है प्रीत सार
कह तो दूँ अपने विकार 
अधर काँपते शीत भार, 
देखूँ हिम योजन विस्तार।

दूरी वर्ष या वर्षप्रकाश? 
एकाकी विचरें आलाप
घटित सुलभ थिर प्रकाश
मिलना क्या? सब एकसार। 

नहीं! न कोई उदास आस
बस ठहरा भरता वायुप्राण।
हारे धुन्ध जग जाय ताप 
अधर न काँपे शीत साज। 

करना क्या बस कहना शेष 
जीना क्या बस रहना शेष। 

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

ढेला पत्ता

आज बाउ गाथा लिखने बैठा तो जाने क्यों भोजपुरी क्षेत्र की यह देहाती कथा याद आ गई। मैंने तो यही समझा कि अवचेतन की चुहुल है - मन में बहती दो एकदम भिन्न शैली की कथाओं 'प्रेमपत्र' और 'बाउ' को लेकर। सोचा आज देहाती बोध कथा को ही साझा कर दूँ। फोटो भी ऐसे ही लगा दिया है - दुपहरी फुरसत के कुछ क्षण। ऐसी कथायें ऐसे मौकों पर ही तो जन्म लेती हैं!    
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ढेले और पत्ते में बहुत मैत्री थी। खेत से गुजरती मन्द हवायें ढेले से धूल की बातें करतीं तो पत्ते से खड़खड़ की। दोनों की बातों में कुछ खास नहीं होता था लेकिन दोनों बिना बातें किये रह नहीं पाते थे। 
एक दिन हवा तेज हो गई। पत्ते ने खड़खड़ की - मैं उड़ जाऊँगा! 
ढेले ने उसे अपने नीचे दबा लिया और पत्ता गुम होने से बच गया। मैत्री बनी रही। 
एक दिन तेज वर्षा होने लगी। ढेले की धूल गलने लगी। ढेले की मौन घबराहट देख पत्ते ने उसे ढक लिया। ढेला गलने से बच गया। मैत्री बनी रही।    
एक दिन आँधी पानी दोनों साथ साथ आये। न ढेला पत्ते को बचा पाया और न पत्ता ढेले को। ढेला गल गया और पत्ता दह बिला गया। 
ऐसी मित्रता न हो वही ठीक। अगर हो जाय तो उससे अधिक आस न रखना।    
कथा समाप्त। 










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इस कहानी का पोडकास्ट श्री अनुराग शर्मा के स्वर में नीचे दिये लिंक पर उपलब्ध है: हिन्दयुग्म पर 'ढेला पत्ता'   

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

लेंठड़े का गाली विमर्श - अंतिम भाग

भाग- 1, 2 और 3 से आगे...
गालियाँ सीख कर उनका धड़ल्ले से प्रयोग कर लेने वाले भी समझते हैं कि गालियाँ संवाद की मुख्य धारा नहीं है। अधिकांश बाल बच्चेदार हो जाने के बाद गाली बकना अंतरंग मित्रों की बैठक के लिये सुरक्षित कर देते हैं। यह दर्शाता है कि परिवार के बाहर भी एक अलग सा रागात्मक परिवेश है जो एक दूसरे से इतना खुला है कि निषिद्ध सम्वाद भी बेहिचक कर लेता है। गालियाँ वहाँ सहज ही आती हैं चली जाती हैं। यह ‘निजी’ परिवेश परिवार इतना महत्त्वपूर्ण भले न हो, कम महत्त्व नहीं रखता। इस परिवेश में निराशायें, दुख, क्षोभ साझा किये जाते हैं और आगे के लिये महत्त्वपूर्ण बातें तय की जाती हैं। इस परिवेश से गालियाँ निकाल कर देखिये – औपचारिकता हाबी होने लगेगी।
हिन्दी साहित्यिक समाज छिछ्ला आत्ममुग्ध समाज है। अध्ययन, उदारता और आत्ममंथन का घोर अभाव है। मजे की बात यह है कि इससे जुड़े सभी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं लेकिन वे स्वयं छिछ्ले तर्कों और जुमलों का प्रयोग दूसरों के लिये करते हैं। समृद्ध परम्परा वाली भाषा बोलियों के स्थान पर एक नई भाषा खड़ी बोली को संस्कारित कर विकसित की गयी और देखते ही देखते सौ वर्षों से भी कम समय में इस पूरे क्षेत्र की सभ्य, असभ्य, औपचारिक, अनौपचारिक सब भाव की भाषा बन गई। यह चमत्कार नहीं था। इसकी सफलता के पीछे एक अंगड़ाई लेते समाज की आशायें थीं और कर्मयोगियों का श्रम था। लेकिन बाद की साहित्यिक पीढ़ी समाज से कटती चली गई। उसके कथित क्रांतिकारी साहित्य के पन्ने ‘दीवारी क्रांति’ तक सीमित रह गये। जनवाद की बातें तो खूब हुईं लेकिन उन्हें सुनने वाले जन कब ‘बतकही’ को छोड़ गए, पता ही नहीं चला।
आज हिन्दी समाज में सिनेमा और टी वी की पैठ साहित्य से अधिक है। पढ़े लिखे तबके में इंटरनेट का प्रयोग तेजी से फैल रहा है। हिन्दी क्षेत्र के बुद्धिजीवी वर्ग का बहुसंख्य अंग्रेजी में और अंग्रेजी को पढ़ता है। वह गम्भीर विमर्श अंग्रेजी में करता है। उसे अपने लिये अलग से न गढ़ना है और न अपनी भाषा को सक्षम बनाने का उद्योग करना है। इतनी बड़ी जनसंख्या होने के बाद भी नेट पर स्तरीय हिन्दी सामग्री का अकाल है। साहित्य और लक्षित पाठक में एक दूसरे से कटाव की स्थिति है। कोई आश्चर्य नहीं कि हिन्दी में ‘नया बेस्ट सेलर साहित्य’ नहीं के बराबर है। विश्वविद्यालयों में हिन्दी बची है तो उसका भी कमोबेश वही हाल है जो राज्य से आश्रय पाई ‘राजभाषा हिन्दी’ का है। अकादमिक गलियों में मेरिट के बजाय गोल और गोलबन्दी को आगे बढ़ाने का चलन है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि हिन्दी साहित्य से क्रांति नहीं हो सकती। दूसरी भाषाओं में भी साहित्यिक कृतियों के कारण क्रांति का कोई उदाहरण नहीं मिलता, हाँ वन्दे मातरम जैसे विरल उदाहरण अवश्य हैं जिन्हों ने क्रांति के जुनून को स्वर और सहारे दिये। यह साहित्य की शक्ति और सीमा दोनों है लेकिन हिन्दी की स्थिति में केवल सीमा ही सीमा है।
यहाँ साहित्य समाज को दिशा नहीं दे सकता लेकिन अपने समाज का दर्पण तो बन ही सकता है। जिस समाज में सड़क किनारे या हर उस जगह पर जो साफ, समतल और चिकनी हो, हगने का रिवाज हो, गालियों का चलन सीधे मनोवृत्ति से जुड़ता है। अब साहित्य अपने समाज की ही बात करेगा, दूसरे समाज की नहीं। दूसरे साहित्य में भी ऐसी प्रवृत्तियाँ हैं। जिनके यहाँ जैसी गालियाँ हैं, साहित्य में वैसी आती हैं। हिन्दी में भदेस और लैंगिक गालियाँ आनी कुछ अधिक ही स्वाभाविक हैं, जो समाज का सच हैं।
यह युग उदारीकरण के साथ साथ ध्रुवीकरण का भी युग है। जाति, लिंग, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्र आदि को लेकर नित नई गोलबन्दियाँ हो रही हैं। ऐसे में साहित्य की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाती है। क्या हिन्दी साहित्यिक समाज संवाद, संवेदना, सहानुभूति और उदात्त मानवीयता को स्वर देने को तैयार है? स्थापित साहित्यिक समाज सुविधापरस्त, भ्रष्ट और पाखंडी है और तकनीकी के कारण आम पढ़े लिखे लोगों को अभिव्यक्ति के जो नए प्लेटफॉर्म मिले हैं, उन पर हो रहे सृजन को देखकर भयभीत है। अनर्गल प्रलाप, जुमलेबाजी और आरोप शुरू हो गये हैं। ये सभी उनके छिछ्लेपन के प्रमाण हैं। वे यह भी भूल गये हैं कि काल की गति रोकना सम्भव नहीं।
साहित्य में गालियों के उन सीमित प्रयोगों पर हो हल्ला मचाना जो कि कथ्य को स्वाभाविकता और सम्वेदना से पूरित करती हैं, एक साजिश है और कुछ नहीं। पाठक वर्ग में तमीज थी और हमेशा रहेगी। उसे फुटपाथिये मस्तराम की गाली और ‘काशी का अस्सी’ की गाली में फर्क करना बखूबी आता है। साहित्यकारों से श्रम और ईमानदारी अपेक्षित है न कि एक दूजे का पीठ खुजाने की गोलबन्दी और सतही जुमलेबाजी। गालियाँ साहित्य से समाज में नहीं जातीं, समाज से साहित्य में आती हैं। समाज इतना संस्कारित हो जाय कि गाली बकना ही छोड़ दे, एक बहुत व्यापक फलक वाला विषय है और उसमें साहित्य का योगदान तो है लेकिन इतना भी नहीं कि उसे शुचितावादी होकर कृत्रिमता का चोला पहनने की आवश्यकता पड़े। (समाप्त)
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धूप खिल चुकी थी। लेंठड़े ने प्रवचन समाप्त करते हुये अपनी यह बात दुहराई कि उसे मानव समाज का बहुत कुछ समझ में नहीं आता। जानना एक बात है और समझना दूजी बात।
मुझे पढ़ने के लिये एक ब्लॉग लिंक देकर वह वापस लाइब्रेरी में चला गया।

बुधवार, 26 जनवरी 2011

गणतंत्र की बकरियाँ

कॉलोनी में खाली प्लॉट है
प्लॉट पर चहारदीवारी है
चहारदीवारी के घेरे में
बकरियाँ रहती हैं -
आधुनिक गणतंत्र की।

बकरियाँ रहती हैं
दलित शोषित वर्ग के एक परिवार के साथ
जिसने चुना है स्वयं शोषित होना
उसके शोषण के आगे 'कथित' शब्द लगाना
असंवैधानिक, असंसदीय और अवास्तविक होगा
(आप अपने रिस्क पर लगा सकते हैं)।

प्लॉट के मालिक रस्तोगी साहब
करते हैं बकरी व्यापार।
उनकी छनती है यादव जी से
जो सचिव हैं ठाकुर साहब मंत्री महोदय के
जो खासमखास हैं मुख्यमंत्री शुक्लाजी के।
सबसे नीचे से सबसे ऊपर तक
दलित-बनिया-अहिर-राजपूत-ब्राह्मण
पूरी वर्णव्यवस्था लगी है -
कुल गोत्र जातिहीन बकरियों के व्यापार में।

बहुत लाभदायी है यह व्यापार -
बकरियाँ कुछ भी खाकर जी लेती हैं
लेकिन बकरियों को खाने वाले
कुछ भी खा कर नहीं जी सकते -
उन्हें गोश्त चाहिये।

स्मृति, पुराण, संहितादि को परे ढकेल
प्रसाद, अम्बेडकर, कोई फर, कोई सर
कर महीनों टर्र टर्र
रचे एक और संहिता।
जाति, वर्ण, लिंग, सम्प्रदाय जैसे
आदमीयत के तमाम भेदों को
सुनहरे अक्षरों के नीचे दबा दिये।
लेकिन सोच भी नहीं पाये
उन कुल जातिविहीन बकरियों के बारे में
जिनकी आड़ में वर्णव्यवस्था में होता है एका -
गोश्त के व्यापार को।

कॉलोनी के भले मानुष जानते हैं
कि यह ग़ैरकानूनी है
लेकिन वे यह भी जानते हैं
- दलित कँटिया लगा वाशिंग मशीन चला सकता है।
- शोषित बाला पल भर में किसी की इज़्ज़त उतार सकती है।
- उनके एक मोबाइल काल पर पूरी मशीनरी आ सकती है
और
- लोकल सम्वाददाता के एन जी ओ रजिस्टर में
दलित परिवार शोषित है
(उसके कथित रजिस्टर में 'कथित' का कहीं ज़िक्र नहीं।)
लिहाजा बकरियों की बेसुरी बकबकाहट
वह सकपकाहट फैलाती है
जिससे
- आँखें दिव्यद्रष्टा हो जाती हैं
- कान सुरीले हो जाते हैं
- जुबान पर जोर जोर से चालीसा चलने लगता है
और खास अध्यात्म की खास अफीम खा
आत्मायें सो जाती हैं -
उनके सपनों में होते हैं - ठंडे ठंडे गोश्त -
उनके काँपते हाथों के
लड़खड़ाती चापलूसी करती जीभ के...
लिस्ट आप पूरी कर लें
(दिमाग तो है ही।)
मुझे इतना पता है
बकरी का गोश्त भले लोगों के लिये अखाद्य है
सो वे उसके सपने नहीं देखते।

इस तरह से -
वर्ण व्यवस्था बनी रहती है
(थोड़ा हेरफेर चलता है
वृत्त वही रहता है,
केन्द्र बदलते रहते हैं।)
सामाजिक समरसता बनी रहती है
आर्थिक प्रगति होती रहती है
और भले मानुष भले भी बने रहते हैं।

वे तब भी भले थे
जब नई संहिता बन रही थी।
वे अब भी भले हैं
जब कि नई संहिता पुरानी हो चली है
और उसकी धाराप्रवाह धारायें
उन्हें धराशायी कर चुकी हैं -
और वे लगे हैं
जमीन की कीच में इबारते बाँचने में।

बकरियाँ बकबकाती रहती हैं -
उनकी बकबकाहट में
मुझे सुनाई पड़ते हैं -
वेरायटी बोटीदार अट्टहास।
दलित के
ग ग ग ग
बनिया के
ण ण ण ण
अहिर के
त त त त
राजपूत् के
न न न न
ब्राह्मण के
तर तर तर तर...तर माल!

मैं भी उसी कॉलोनी में रहता हूँ
मुझे नगर निगम के नियम पढ़ने के बजाय
कविता ठेलना बेहतर लगता है -
गणतंत्र की बकरियाँ मेरे बहुत पास रहती हैं...
आप कल्पना तक नहीं कर सकते
उनकी बकबकाहट के दिव्य अट्टहास की।
आप को अंदाज हो इसलिये
यह सब अर्ज किया है।

फालतू बकबक से सिर में दर्द होने लगा है?
जाइये बाम लगा कर टी वी पर परेड देखिये -
आज के शुभ दिन मेरा गोश्त खाने का मन है।

जय हिन्द!
जय गणतंत्र!!

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

लेंठड़े का गाली विमर्श - 3


भाग- 1 और 2 से आगे... 

स्त्री पुरुष का आपसी आकर्षण, जिसकी चरम परिणति दैहिक समागम और संतति मे होती है, संसार का सबसे बड़ा सच है। नियमन की प्रक्रिया में समाज ने समागम को निकृष्ट कर्म बना दिया जिसका पार्श्व प्रभाव गालियाँ थी। विवाह स्त्री पुरुष सम्बन्ध को एक नैतिक और स्वीकार्य धरातल देता है लेकिन इसके बाद बहुसंख्य समाज सेक्स शिक्षा का कोई आयोजन नहीं करता। स्त्री को यह शिक्षा माँ और सहेलियों से मिलती है तो पुरुष को अंतरंग मित्रों से। सही गलत की बात नहीं, जो है सो है। विवाह के मांगलिक अवसर पर निकट सम्बन्धों का आलम्बन ले कर होने वाला गाली गायन नई पीढ़ी को परम्परा के माध्यम से स्त्री पुरुष सम्बन्धों के निकृष्ट न होने का सूक्ष्म संकेत होता है। नई पीढ़ी मैथुन क्रिया का आलम्बन ले घृणित गालियाँ रोज कहती सुनती रहती है। क्रिया आधारित जुगुप्सित गालियों के बजाय सम्बन्ध आधारित सरस गालियों का सबसे महत्त्वपूर्ण संस्कार अनुष्ठान में आवश्यक अंग बनना मस्तिष्क के भीतर की उस स्वाभाविक रागात्मकता को स्वास्थ्य प्रदान करता है जिसे दैनन्दिन निषेध रोग की तरह घोषित किये रहते हैं।
वैवाहिक अनुष्ठान में ‘माटिकोड़वा’ के अवसर पर केवल स्त्रियाँ होती हैं। बुआ या बहन मिट्टी खोद कर गड्ढा बनाती है जिसमें पानी भर कर सिक्के डाल दिये जाते हैं और उन्हें ढूढ़ने के कौतुक होते हैं। सिक्के रत्नगर्भा की क्षमता के प्रतीक होते हैं जिसका दोहन नया परिवार बसाने जाते दम्पति को करना होता है। इस अवसर पर बेहिचक और बिन्दास लैंगिक गालीगलौज होता है। मैथुन के प्रत्यक्ष सन्दर्भ वाली गालियाँ भी खूब चलती हैं। कृषि के पुरुषकेन्द्रित होते जाने और पैतृक भूमि सम्पत्ति से स्त्री को बेदखल कर दिये जाने के प्रति यह कहीं स्त्री का विरोध प्रदर्शन तो नहीं? ठीक वैसे ही जैसे आम पुरुष हताशा में गाली बक कर, नपुंसक ही सही, प्रतिरोध का संतोष कर लेता है और आगे के संघर्ष के लिये तैयार हो जाता है। यह क्रिया इतनी स्वाभाविक है कि पुरुष व्यक्तित्त्व का अंग सी हो गई है। घर में केन्द्रित स्त्री या कृषि कर्म में सहयोगी लेकिन उपेक्षिता स्त्री को अपने लिये सम्भवत: विरोध प्रदर्शन का यही अवसर मिला।
विवाह के बाद, जब कि एक नया परिवार बनता है, स्त्री धरती माँ की तरह ही बीज को गर्भ में सहेज सृजन करती है। स्त्री के लिये धरती से बेहतर अपनापन क्या हो सकता है? विवाहोपरांत स्त्री पैतृक भूमि अधिकार से वंचित होकर ससुराल की भू सम्पत्ति में भागीदार बनती है। कहीं गालीबाजी विरोध प्रदर्शन के साथ नई सम्भावना के लिये उल्लास प्रदर्शन तो नहीं? प्रश्न उठता है कि गाली ही क्यों? किसी और कथ्य में कठोरता से नियमित समागम क्रिया केन्द्रित गालियों जैसी तीव्रता कहाँ? वह भी पुरुष केन्द्रित समाज में जहाँ गाली बकना पौरुष का प्रतीक माना जाता हो और गाली देना स्त्री के लिये एक निहायत ही गलीज निकृष्ट कर्म।
ऐसी प्रथायें नगरीकरण के साथ साथ ‘सभ्यता’ के तकाजे को ध्यान में रखते हुए लुप्त हो रही हैं – अप्रासंगिक हो गई हैं। कुंठा और आक्रोश अभिव्यक्ति के तमाम साधन उपलब्ध हैं। हिंसक प्रमोद का अपना आनन्द है। स्त्री बराबरी के प्लेटफॉर्म पर उतनी ही बर्बर या क्रूर हो रही है जितना पुरुष। यहाँ के नियम और विधियाँ अलग हैं।
 निकट सम्बन्धों जैसे देवर भाभी में गालीबाजी मनोविनोद का साधन तो है ही, समाज द्वारा इसकी स्वीकृति एक तरह से सम्भावित विपत्ति से निपटने की परोक्ष व्यवस्था भी। यह मनोविनोद पारिवारिक दायरे के भीतर एक अलग सी रागात्मक निकटता गढ़ता है। देवर शब्द से ही दूसरा पति ध्वनित होता है। ऐसी तमाम घटनायें हैं जहाँ अकाल मृत्यु की स्थिति में समाज ने स्त्री को देवर से विवाह की अनुमति दे दी। कई मामलों में तो स्त्री संतानवती भी थी।
 कोई आवश्यक नहीं कि दैनन्दिन गाली बकने वाला स्त्री जाति के प्रति अनादर का भाव रखता हो। जैसा कि पहले कहा, यह क्रिया उसके संस्कारों और परिवेश से अनुकूलित मस्तिष्क में स्वचालित सी आती है और अप्रत्यक्ष रूप से अवसाद या क्रोध का निवारण कर उसे आगे के संघर्ष के लिये तैयार कर देती है। अपने परिवार के और दीगर स्त्रियों के प्रति वह आदर, अनादर या तटस्थता का वही भाव रखता है जो पुरुषों के लिये रखता है।
अब सवाल यह कि स्त्रियाँ गाली क्यों बकती हैं? पुरुष केन्द्रित समाज में अगर पुरुष को झटका देना है या उसके ऊपर ‘विजय’ प्राप्त करनी है तो उन्हीं अस्त्रों का प्रयोग क्यों नहीं जिनका प्रयोग वह स्त्री को पीड़ित करने के लिये करता है? बहुधा स्त्री के मुँह से लैंगिक गालियाँ निरर्थक लगती हैं लेकिन पुरुष के लिये स्त्री की यह ‘निर्लज्जता’ एक जोरदार झटका होती है, साथ ही समागम क्रिया में पुरुष वर्चस्व को चुनौती भी – फक यू! चोद तुम ही नहीं मैं भी सकती हूँ, तुम्हें आनन्द आता है तो मुझे भी आता है। ऐसी स्त्री प्रतिद्वन्द्वी को मानसिक रूप से हीन भाव ग्रसित कर देती है। लड़ाई में शत्रु का यही हाल होना चाहिये न। परिणाम देखो, अपनाया गया मार्ग नहीं।
गाँव गिराम में तो ऐसी स्त्रियाँ हमेशा से रही हैं, महानगरीय संस्कृति में उच्च शिक्षित प्रोफेशनल स्त्री तबके में भी इस प्रवृत्ति का अवतरण सबको चौंका रहा है।  इसमें चौंकने जैसी कोई बात नहीं है। स्त्री पुरुष से कन्धा मिला कर साथ चल रही है। उसे भी उन्हीं चुनौतियों और निराशाओं का सामना करना है जिनका सामना पुरुष करता रहा है। अपने लिये कुछ नया ढूँढने की उसे कहाँ फुरसत? गाली दे देना अच्छा है या घुटते हुये मनोरोगी होना? बहुतेरी के लिये तो यह स्वाभाविक बात है, ठीक पुरुषों की तरह वे इसके बारे में सोचती भी नहीं। हाँ, यह प्रवृत्ति बहुधा इतनी स्वस्थ मनोवृत्ति को नहीं दर्शाती। इसका उल्टा कुछ अधिक ही सच है। लेकिन ऐसा स्त्री पुरुष दोनों के लिये है। अभी संक्रमण काल है, आगे बदलाव होंगे। परिवेश का ‘लिंग्वा फ्रैंका’ ऐसी कामकाजी स्त्रियों का भी है। सामाजिक वर्गानुसार संस्कृत और प्राकृत सम्वाद विभेद साहित्य में चल सकता है, दैनिक जीवन में नहीं।   
 गालियों को लेकर सारी चिंतायें मध्य वर्ग की ही हैं। निम्न और उच्च वर्ग इनसे अधिक हलकान नहीं होते। मध्य वर्ग ने सारी अच्छाइयों का ठीका जो ले रखा है! प्रश्न यह है कि समाज या साहित्य में गालीबाजी क्या एक चिंतनीय विषय है? हिन्दी पट्टी के परिप्रेक्ष्य में गालियों का साहित्य में उतरना कहाँ तक उसके छिछलेपन से जुड़ता है? कहीं यह महज उसकी निराशाओं और यथार्थ को चित्रित करने की एक विधि तो नहीं? हम किसी साहित्य का क्या याद रखते हैं – गालियाँ या उनसे जुड़ी सम्वेदनशीलता? गालियों के बिना भी साहित्य रचा जा सकता है लेकिन क्या बस इसे न मानने के कारण कोई साहित्य या साहित्यकार छिछ्ला और त्याज्य हो जाता है? ...(अगला भाग) 
लेंठड़े की पुरानी बातें:

शनिवार, 22 जनवरी 2011

लेंठड़े का गाली विमर्श - 2

पहले भाग से आगे...
लेंठड़े ने मुझे पार्क के किनारे पेंड़ के नीचे बुला लिया। पूछ बैठा – यह किसका पेंड़ है? मुझे प्रश्न से आश्चर्य हुआ। मंतव्य न समझते हुए भी मैंने बता दिया,“आम का।“
“कभी आम के पेंड़ पर चढ़े हो?”
मैं जोश में आ गया – जाने कितनी ही बार चढ़ा हूँ!
“बड़े चूतिये हो!”
सुबह सुबह किसी केंकड़े से ऐसा सुन कर मैं हैरान भौंचक्का रह गया! उसने अपने पंजे कड़कड़ाये और कहा – सिर्फ मनुष्य ही गालियाँ बकते हैं क्यों कि उनके पास भाषा है, यह एक अज्ञानी का तर्क है।...
चूतांकुरा स्वादकषायकंठ:... चूत माने आम का वृक्ष। इसका एक अर्थ गुदा या गुह्यांग भी होता है। दूसरे अर्थ की उपेक्षा कर अगर मैं ‘आम’ अर्थ का आश्रय ले, वह भी एक अप्रचलित भाषा से, किसी को यह गाली देने के बाद उसे बहलाने का प्रयास करूँ कि मैंने आम के पेंड़ पर चढ़ने वाले के लिये कहा तो मेरे कुतर्क और बलात-कुविद्या को वह मानेगा या मुझे मारने दौड़ेगा?... गायत्री मंत्र के प्रेरित अर्थ वाले ‘चोद’ और मैथुन की शारीरिक धकेल को व्यक्त करने वाले गाली की ‘चोद’ में अंतर है। कहने वाले की भावना देखी जाती है, शब्द नहीं। ‘साले’ में मित्रों का प्रेम भी है और किसी अजनबी के प्रति प्राथमिक गाली भी। असल में तुम मनुष्यों की बहुत सी बातें मुझे समझ में नहीं आतीं। मैं बात करते गोबर..नहीं हिन्दी पट्टी पर केन्द्रित रहूँगा। ठीक है न?
... मेरा मन ऐसा हो गया जैसे सुबह सुबह किसी ने जबरिया ब्लैक कॉफी पिला दी हो, वह भी बिना शक्कर की! उसने अपनी बकवास को आगे बढ़ाया...
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प्रहार शारीरिक और मानसिक दोनों होते हैं। जिस सम्बन्ध या वस्तु के प्रति जितना अधिक सम्मान और अपनत्त्व का भाव होता है, वह प्रहार के लिये उतनी ही उपयुक्त होती है। किसी को कष्ट पहुँचाना हो तो उसके लिये जो परम आदरणीय है, उसका परम अनादर कर दो गालियों के पीछे यह मानसिकता काम करती है। आश्चर्य नहीं कि माँ की गाली सबसे तीखी और खराब मानी जाती है। अंतरंग मित्र जो बिना गालियों के एक दूजे से एक वाक्य भी नहीं बोल पाते, वे भी इससे परहेज करते हैं। बहुतेरे ऐसे हैं जो कोई भी गाली सह लेते हैं लेकिन माँ की गाली मिलते ही क्रोधोन्मत्त हो जाते हैं। न्यूनाधिक रूप में ऐसा पिता केन्द्रित गाली के साथ भी होता है। ऐसा क्यों है?
भावनायें अपनी जगह हैं लेकिन उसके पीछे वर्चस्व और प्रतिष्ठा की मानसिकता काम करती है। माँ की गाली देने वाला यह जताता है कि देखो इस नपुंसक को! इसके सबसे प्रिय व्यक्ति को मैंने गाली दे दी। उसे गाली दी जो इसे इस संसार में ले आई। यह पुरुष प्रधान समाज में सम्पत्ति और भावना के जटिल मिश्रण वाले सबसे प्रिय स्त्री सम्बन्ध पर प्रहार कर सामने वाले को मानसिक रूप से पीड़ित करने का उद्योग होता है। गाली देने वाला अपनी जान सामने वाले की प्रतिष्ठा को क्षतिग्रस्त कर रहा होता है। प्रतिष्ठा में जो महाप्राण है, उसमें बहुत ठसक है। इतनी ठसक है कि बहुत बार भाव को स्थानच्युत और ठरका देता है लेकिन समझते ही कितने हैं? आक्रामकता को दर्शाते और सराहते हुये प्रतिष्ठा का मूल स्थान ही खिसक जाता है। गाली देते हुए वह अपनी जननी को भी कहीं आक्षेपित कर रहा होता है, यह उसकी समझ में नहीं आता।
लेकिन उन गालियों का क्या जो लोकभाषाओं का अंग हो गई हैं? वास्तव में बहुधा इन गालियों में उन सभी पुरानी लुप्तप्राय भाषाओं के अंश सुरक्षित रह जाते हैं जिनसे लोकभाषा विकसित हुई संस्कृत के चूत या चोद उदाहरण हैं।
यह उल्लेखनीय है कि संस्कृत संस्कृतभाषा साहित्य में कहीं भी लैंगिक, यौनांगों या यौन सम्बन्ध आख्यानक गालियाँ नहीं हैं। व्यक्ति के बजाय उसके सम्बन्धियों पर प्रहार करती गालियाँ भी नहीं पायी जातीं। प्रताड़ित करने के लिये व्यक्ति केन्द्रित अपशब्द भर मिलते हैं जैसे पामर, नीच, कुलटा, दुष्ट, दुर्मति, लंपट आदि आदि। संस्कृत में लोकभाषा के लिये तिरस्कार का भी भाव मिलता है। उसे ग्राम्याकह कर उपेक्षित किया गया है। परवर्ती नाटकों में ग्रामीण, अशिक्षित या निम्न वर्ग के सम्वादों के लिए प्राकृत या पाली का प्रयोग हुआ है और नागर या सुशिक्षित व्यक्ति सम्वादों के लिये संस्कृत का। प्रश्न यह है कि समाज की वास्तविक स्थिति से परहेज क्यों? इसके कई कारण हैं - समाज को संस्कारशील बनाये रखने के लिये एक मानक की आवश्यकता (नाटकों में हत्या, चुम्बन आदि मंच पर दिखाने पर निषेध); श्रेष्ठताबोध और नागर दम्भ; भाषा को पवित्र और अति विकसित देवसभ्यता से जोड़ा जाना आदि आदि। यह प्रवृत्ति संसार की अन्य प्राचीन भाषाओं में भी पायी जाती है।
हिन्दी के समूचे भक्ति साहित्य में भी लैंगिक या यौन सम्बन्धों वाली गालियाँ नहीं हैं, अपशब्द भले हों। रीतिकाल में भी कमोबेश ऐसा ही है। इन सबके पीछे शुचिता की यह अवधारणा कि साहित्य समाज को संस्कारित करने वाला होना चाहिये, काम करती रही लेकिन साहित्य में नागर, शिक्षित और अभिजात्य वर्ग का पाखंड भी प्रवेश कर गया। परिणामत: यौन सम्बन्धों, अवैध सम्बन्धों आदि के चमत्कारिक और जुगुप्सा की हद तक जा कर ग्राफिक वर्णन हुए। स्त्री पुरुष सम्बन्धों की उद्दाम रागात्मकता और रोगी मनोवृत्ति के बीच के अंतर को भुला दिया गया। साहित्य सरस्वती धनपशुओं की चेरी हो गई। ग्राम्याकी उपेक्षा की अगली परिणति हुई आम जन जीवन की उपेक्षा, तब जब कि रचनाभाषा ग्राम्याही थी। साहित्य में संस्कार उड़ेनले वाले संत व्यक्तित्त्व तो रहे नहीं, साहित्य समाज को दिशा क्या देता, उसका दर्पण भी नहीं रहा और उससे कट गया।
एक बात अनुकूलन पर भी। स्त्री को लालित्य का प्रतीक माना गया। प्रकृति-पुरुष द्वय में कोमल भाव की वाहिका स्त्री रही। इसे शिशु पालन की नैसर्गिक मातृ/ममत्त्ववृत्ति का तार्किक विकास मानना चाहिये। साहित्य, संगीत, कलादि को स्त्री तत्त्व से जोड़ दिया गया। लोककथाओं में भले मिल जाय लेकिन इस सभ्यसमाज में विद्या की देवी ही मिलेगी, देवता नहीं। यह सब जनमानस में इतना पैठ गया कि अनुकूलित हो सोच, समझ, व्यवहार, बोली आदि का अंग हो गया और बहुतेरे इससे इतर सोच ही नहीं सकते। स्त्री केन्द्रित गालियाँ उस सोच का विस्तार हैं जो सुसंस्कृत व्यवहार को पुरुष प्रधान समाज में स्त्रैण और निष्प्रभावी मानती है और भद्दे, कटु, जुगुप्सित बोली व्यवहार को पुंसत्त्व (फलत: प्रभावी) का प्रतीक। विवादों की स्थिति में ऐसी गालियाँ प्रतिद्वन्द्वी के सामने चुनौती रखती हैं है मर्दानगी तुममें? और सामने वाला अपने पौरुष को दर्शाने के लिये विरोधी की माँ बहन ...करने लगता है। ऐसा करते हुये वह अपने भीतर की कथित स्त्रैणतासे उबर रहा होता है। बहुधा विवाद इस शक्ति प्रदर्शनके आगे नहीं जाते। उनका यूँ शमित हो जाना गालियों के विधेयात्मक पक्ष को उजागर करता है लेकिन सामाजिक सोच के ठहराव को भी दिखाता है और स्त्री तत्त्व के प्रति अनादर भाव को भी। सोच और व्यवहार में स्त्री-पुरुष तत्त्व का असंतुलन सीमित प्रभाव नहीं रखता बल्कि हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ता है। पौरुष की भ्रामक अवधारणा को महिमामंडित कर पुरुष प्रधान समाज की गति और प्रगति दोनों को पंगु बनाता है।
वर्तमान समय तेज परिवर्तन का समय है। गालियाँ के कई प्रकार हो गये हैं। गालियों के अलावा गाली देने वाले/वालियों पर भी ध्यान देना होगा। कई बाते हैं गाली बकने वाले क्या इतना सोचते हैं? इसकी आवश्यकता भी है? गालियाँ की स्वीकार्यता और उनसे घृणा, जुगुप्सा किस स्तर की है? क्या गाली देने वाले के मन में वाकई स्त्री या स्त्रीजाति के प्रति अनादर का भाव ही होता है? क्या स्त्री वाकई अनादर का अनुभव कर याद रखती है या लैंगिक संकेतों पर मुँह बिचका कर उपेक्षित करते हुए भूल जाती है? स्त्री का गाली पर इतना सम्वेदनशील होना उचित है क्या, तब जब कि वह स्वयं बकती है? यह सम्वेदनशीलतापुरुष प्रधान समाज में अपने पैर जमाती स्त्री के बराबरी के दावे से कितनी और कैसे जुड़ती है? गालियों के प्रयोग का विरोध करने वाले पुरुष स्त्रैण हैं? क्या गालियाँ इतनी आवश्यक हैं कि उनके बिना काम ही नहीं चल सकता? क्या यह समाज गालीबाज समाज है? ऐसा क्यों है कि परिवार बन्धन में बँधने के बाद बहुसंख्य जन गाली बकना अत्यल्प कर उसे अंतरंग मित्रों की बैठकी के लिये सुरक्षित कर देते हैं? गालियाँ रागात्मकता और मित्रवत प्रेम से क्यों जुड़ती हैं? कुछ निकट सम्बन्धों में गालियाँ स्वीकार्य क्यों हैं? वैवाहिक अनुष्ठानों में कुछ अवसर गालियों के कर्मकांड के लिये सुरक्षित क्यों हैं? धीरे धीरे वे लुप्त क्यों हो रहे हैं? गालियाँ सार्वकालिक और सार्वदेशिक क्यों हैं? सिनेमा, टीवी, इंटरनेट के जमाने में साहित्य में गालियों का प्रयोग समाज को कितना दूषित कर सकता है? गालियों को सहेजने की साहित्य की प्रवृत्ति समाज की स्थिति और सोच को कितना दर्शा रही है और उन्हें कितना बदल सकती है? इस युग में साहित्य समाज को दिशा देने और सामाजिक परिवर्तन करने में क्या वाकई सक्षम है?   (अगला भाग)
लेंठड़े की पुरानी बातें:

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

लेंठड़े का गाली विमर्श - 1

आज सुबह लेंठड़े से मुलाकात हुई। वातानुकूलित लाइब्रेरी से बाहर आ कर सर्दी में काँप रहा था। पंजे कड़कड़ा रहा था। वह जगदीश्वर चतुर्वेदी, मृणाल पाण्डेय, अरविन्द मिश्रादि के गाली विषयक लेख पढ़ कर  विमर्शी मुद्रा में था। दुखी भी था कि एक ओर वादी लोग 'भोजपुरी के पथभ्रष्टक दुअर्थी विशारद बलेसर 'के महिमा गायन में लगे हैं तो दूसरी  ओर गालियों से परहेज करने की सलाह दे रहे हैं। गुड़ खाओ और गुलगुल्ले से .... हाँ कुछ वैसा ही जैसे कृष्ण करें तो लीला हम करें तो व्यभिचार! 
लंठ केंकड़े के साथ विमर्श क्या होता, वह अपनी ही हाँकता चला गया। सोचा कि साझा कर दूँ। आप इसे पढ़ें तो अपने पूर्वग्रहों को ताख पर रख कर चुभलाते हुए पढ़ें ताकि रस परिपाक हो सके। पहले बताना ठीक होता है ताकि बाद में यह कह कर कि बताया नहीं, आप _रियाने न लगें। मैं अज्ञानी मन्दमति हूँ, बस उसकी बात कह रहा हूँ। मुझे वाकई इस विषय में कुछ नहीं पता। हाँ, गालियाँ दे लेता हूँ।  
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आम समझ में गाली का अर्थ यौनांगों और यौन सम्बन्धों से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी उस अभिव्यक्ति से लिया जाता है जो लक्षित व्यक्ति की प्रतिष्ठा, आत्मविश्वास या आत्मबल पर सीधा असभ्य सा प्रहार करती है। यह प्रहार लैंगिक, सामाजिक आदि पक्षों के अतिसम्वेदनशील मार्मिक बिन्दुओं पर होता है, परिणामत: शारीरिक प्रहार से भी भयानक हो जाता है।
पुरुष प्रधान समाज में स्त्री के जननी स्वरूप का बहुत आदर है। स्त्री प्रधान समाज में भी होता लेकिन        शायद उतना नहीं होता। उस स्थिति में पुरुष के जनक स्वरूप का अधिक आदर होता। यहाँ ‘प्रधान’ से ‘शासित’ का भी अर्थ समझें। समाज का नारी अर्धांश कहीं पुरुष के स्वामित्त्व के दम्भ से जुड़ता है और घर परिवार के नारी सम्बन्ध जैसे माँ, पत्नी, बहन, बेटी आदि अकथित सम्पत्ति की श्रेणी में आ जाते हैं। किसी को यदि अपने प्रतिद्वन्द्वी को चोट पहुँचानी है तो उसकी एक विधि सम्पत्ति पर प्रहार है। अकथित सम्पत्ति का सबसे सम्वेदनशील पहलू उसका जननी होना है जो अति आदृत भी है। वह सम्पत्ति निर्जीव नहीं, सजीव है। उसके साथ तमाम भावनायें भी जुड़ी हैं। पशुओं की तरह उसका व्यापार नहीं होता (मैं अपवादों की बात नहीं कर रहा)। चोट पहुँचाने के लिये इससे उपयुक्त क्या ‘चीज’ हो सकती है? 
चूँकि स्त्री समान रूप से सोचने समझने की और भावनामयी शक्तियाँ रखती है इसलिये उसे भी इस प्रहार से अपार चोट पहुँचती है। इसके कारण प्रहार का प्रभाव कई गुना हो जाता है। गाली देने में किसी तरह के शारीरिक उद्योग की भी आवश्यकता नहीं लिहाजा तत्काल निकल आती है, बाद में भले उसके कारण हत्या तक हो जाय!
हजारो वर्षों से हो रहे अनुबन्धन या अनुकूलन के कारण स्त्रियाँ भी वह गालियाँ देती हैं जो स्वयं स्त्री जाति के लिये अनादरसूचक और हिंस्र होती हैं। इसे पुरुष सत्ता का प्रभाव भी कहा जा सकता है और नौ महीने सबकी दृष्टि में गर्भ भार ढोने को लेकर अवचेतन में बैठे हीन भाव का प्रभाव भी। यौन सम्बन्धों के नियमन की प्रक्रिया में उन सम्बन्धों को गोपनीय, गुह्य, अवांछनीय और पापमूलक संज्ञायें दे दी गईं। पुरुष तो शुक्राणु देकर निश्चिंत हो जाता है लेकिन स्त्री उस ‘पापक्रिया’ के भार को तीन चौथाई वर्ष तक झेलती है और बाद में प्रसव प्रक्रिया को भी जो उसके यौनांग और पूरे शरीर को क्षत भी करती है। स्त्री ‘पापक्रिया’ की प्रत्यक्ष वाहिका होने के कारण पुरुष प्रधान समाज में घृणा का केन्द्र हो जाती है। सृष्टि चलती रहे इसके लिये गर्भ ढोना गर्भाधान से अधिक महत्त्वपूर्ण है। जो सृजन स्त्री को मातृत्त्व की गरिमा और आदर से अलंकृत करता है, वही उसके लिये घोर अनादर का कारण भी बन जाता है। इस अनादर के पीछे पुरुष अवचेतन का यह हीन भाव भी है कि स्त्री का दाय उस सृष्टि को जारी रखने में उससे बहुत अधिक है जिसका वह स्वामी बना बैठा है। सम्पत्ति न हो तो स्वामी कैसा? हीन भाव हिंसा को जन्म देता है। विवादों और असहमतियों की स्थिति में गालियाँ छिपे हुए इस हिंस्र भाव की अभिव्यक्ति हो जाती हैं।
गालियों से और भी पहलू जुड़े हैं। (अगला भाग) 
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लेंठड़े की पुरानी बातें: 

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

लंठ महाचर्चा: बाउ और नेबुआ के झाँखी - 9

मेरे पात्र बैताल की तरह
चढ़ जाते हैं सिर और कंधे पर, पूछते हैं हजार सवाल।
मुझमें इतना कहाँ विक्रम जो दे सकूं जवाब
...रोज़ मेरा सिर हजार टुकड़े होता है।

भाग–1, भाग-2, भाग–3भाग-4, भाग-5, भाग-6, भाग-7, भाग-8  से आगे...
तिजहर के बाद दिनबुड़ान का समय निकट था और रामसनेही सिंघ के यहाँ मजमा लगा था। गाजे बाजे के बाद आ जुटे पट्टीदारों का स्वागत गुड़ दही के रस से किया जा रहा था। सग्गर और रामसनेही दोनों खदेरन पंडित के ज्ञान की प्रशंसा में लगे थे और बाकी जन उनके ग़ायब होने को मन में दबाये हाँ, हूँ कर रहे थे कि फेंकरनी की माई ने दुआर पर कदम रखा। पहुँचते ही वह जुग्गुल लंगड़े पर पिल पड़ी – गालियाँ।
“हरे मुतपियना, लवँड़ा के पूत लंगड़ा! हमरे धिया के पेटे पर काहे मरले रे! एगो नेबुआ खातिर?” (गालियाँ, लंगड़े मेरी बेटी के पेट पर क्यों मारे? एक नीबू के लिये?)
जिस समाज के लिये फेंकरनी का प्रसव एक अघटना और मौज का सामान था, वह समाज सन्न रह गया। कहते हैं जब तक बरही न बीत जाय, नवजात को जीव नहीं मानते। नीबू तोड़ा और अब गालियाँ! वह भी इस समय!! भरी सभा में अपमान! – पहले से ही खार खाये रामसनेही अनहोनी की आशंका से दहल उठे। माई के कर्कश स्वर में आँसू और शिकायत घुल गए। उनकी ओर मुखातिब होकर अपनी बात कहने लगी। गालियाँ वैसे ही जारी रहीं। रामसनेही तड़प उठे – चुप्प!
“हरे बुढ़वा! कहाँ ले अपने लंगड़ा के धरियइबे, हमहीं के चुपवावतले? बनमरद हउवे का? हमरे मूते से मोछि बनवा ले।“ (रे बुढ्ढे! कहाँ तो तुम्हें इस लंगड़े को दंडित करना था, कहाँ मुझे ही चुप कराने लगे? कैसे मर्द हो? मेरे मूत से अपनी मूछ मुड़वा लो।)
चमइन के मूत से ठाकुर की मूँछ मुड़ायेगी? तमतमाये रामसनेही खड़े हो गये – “चुप्प भों....”
जीवन भर जिसने किसी की गाली न सुनी हो और न किसी को दी हो, उसके लिए यह सब बहुत भारी पड़ा। जैसे कोई गला घोंटने लगा, पूरे शरीर में सूइयाँ उभर आईं और चेहरा पीला पड़ गया – चौकी पर घम्म से बैठ गये। माई भागी। जुग्गुल माई को पकड़ने को लपका लेकिन एक हाथ से सग्गर का सहारा लेते रामसनेही ने उसका हाथ पकड़ लिया। वह चौकी पर वहीं ढेर हो गये – उद्दंड खड़जंगी(षड़यंत्रकारी) को प्रश्रय देने का दंड। उधर खदेरन के दुआरे पेड़ों पर ढेर सारे कौवे काँव काँव करने लगे।
आँगन में मतवा को वही पुरानी चिर परिचित कर्कश पुकार सुनाई दी – कहाँ बाड़ू हो? खदेरन पंडित लौट आए थे।
मन ही मन सारे देव देवियों को अपनी कृतज्ञता बताते मतवा गागर भर पानी लिये बाहर निकलीं। कृशकाय पति को देखा और गागर का पानी जमीन पर रख आँसुओं से पैर पखारने लगीं कि पूरब दिशा से पहले धीमे रोदन और उसके बाद रोने पीटने के स्वर आने लगे – जुग्गुल का स्वर दूर से भी अलग पहचाना जा सकता था। खदेरन ने चारो ओर चिल्लाते कौओं पर दृष्टि दौड़ाई – यह कैसा स्वागत? उसी समय गोंयड़े के खेत से तेज चीख सुनाई दी। हतप्रभ से दोनों उधर भागे।
भौंचक्के से उन्हों ने देखा - फेंकरनी का आधा ऊपरी धड़ पलानी से बाहर था। उसकी उल्टी साँसें चल रही थीं। पास बैठी अपने केश नोचती माई अपने आपे में नहीं थी। यह सब मेरे खेत में कैसे? खदेरन कुछ समझे, कुछ नहीं समझे। उनके लिये यह एक जन्म का आघात था। मतवा ने हाथ पकड़ रोका लेकिन डूबते सूरज के लाल गोले में अटके खदेरन कहीं और थे - तुम अपने पीछे जिनके लिए जो रच आये हो उसे भोगना उनकी नियति है और अपने रचे ध्वंस को सामने घटित देखना तुम्हारी नियति। ...माँ! इतना शीघ्र? ... ललाट लाल गोल तिलक... घटित देखना तुम्हारी नियति...काँव, काँव...
नीम के कोटर में गुड़ेरवा रात की तैयारी में लगा था।
 खदेरन फेंकरनी के सिरहाने जा खड़े हुए – सुभगा, नहीं फेंकरनी, नहीं माँ, नहीं त्रिपुर सुन्दरी, नहीं, नहीं...भीतर गड़गड़ाते स्वर ... कान फट जायेंगे। हाथ कान तक पहुँचने को थे कि फेंकरनी ने एक हाथ पकड़ लिया – पंडित हो! तोहरे आस...आँखें उलट गईं। प्राण पखेरू उड़ गए।
काठ हो चुके खदेरन के मन में श्मशान की स्मृति अर्धरात्रि घिर आई – हुआँ, हुआँ, फेंकरनी, खेंखरि... जिन्दा पुजल ह कि मुर्दा?... हमार कार करे के परी नाहीं त सब भरस्ट हो जाई। (जीवित की पूजा किये कि मृत की? ... मेरा काम करना पड़ेगा नहीं तो सब भ्रष्ट हो जायेगा।)  पगली! भ्रष्ट हुआ कि नाश? 
मतवा सब समझ गईं। माई धिया की चुप्पी! गाँव में फैला प्रवाद – सच, एकदम सच। भीतर से पियरी में लिपटे शिशु को लाकर खदेरन के हाथों में दे दिया।
...फेंकरनी! साँवर कन्हैया मिलेगा तुम्हें। ...अथ च इच्छेत्पुत्रो मे श्यामो लोहिताक्षो जायेत... ॐ ह्रीं स्त्रीं तारायै हुं ॐ फट् स्वाहा।... माई पंडित के पैर पकड़ घिघियाने लगी – हमरे धिया? कवन करनवा ये पंडित! काहें हो? (मेरी ही बेटी, किस कारण पंडित? क्यों?)...खदेरन के पास न उत्तर थे और न प्रश्न।  
...नींबू श्मशान में दो टटके प्रेत नाच उठे - जमुना पहुँचहूँ न पवलीं, घड़िलओ न भरलीं महल मुरली बाजे हो। झूलहु हो लाल झूलहु कन्हैया जी के पालन हो। ...पंडित हो! चन्दन गाछ पर झुलाओ।
(जारी)

रविवार, 16 जनवरी 2011

लंठ महाचर्चा: बाउ और नेबुआ के झाँखी - 8

मेरे पात्र बैताल की तरह
चढ़ जाते हैं सिर और कंधे पर, पूछते हैं हजार सवाल।
मुझमें इतना कहाँ विक्रम जो दे सकूं जवाब
...रोज़ मेरा सिर हजार टुकड़े होता है।

भाग–1, भाग-2, भाग–3भाग-4, भाग-5, भाग-6, भाग-7  से आगे...
हिमालय के पास की तिलस्मी धरती से तराई से लगे इलाके में आने के बाद खदेरन को लगा कि तिलस्म वहाँ नहीं उनके गाँव में था। एक ऐसी धुंध गाँव में बसती थी जिसका घेरा इलाके के लोगों को एक अलग तरह की समझ देता था। उसे समझने के लिए उस धुन्ध से बाहर आना जरूरी था लेकिन जाने कितनी ही पीढ़ियाँ बिना इलाके से बाहर गए ही मर खप गईं और बाकी दुनिया से कटे हुए इलाके का एक अलग ही व्यक्तित्त्व विकसित हो गया। जिन्दगी एक नाबदान की तरह थी और अच्छे बुरे लोग उसमें बजबजाते कीड़े।
(ज)
खदेरन के जाने के बाद कुछ दिन बाद जब मतवा चरम अवसाद से उबरीं तो ध्यान उस अग्निशाला पर गया जिसमें अब कोई देवता नहीं थे। मंत्र तो आते नहीं थे लेकिन उन्हों ने कुंड में दुबारा आग जलायी और उसे जीवित रखा। सुबह शाम बस कुछ पल आँसुओं की जलांजलि दे जाती थीं। जब फेंकरनी को लेकर माधव और उनके पति के ऊपर आक्षेप लगने और फैलने शुरू हुए तब उनका हाल फिर खराब हो गया। पति की विद्या उन्हें पता थी और मन था कि शंका को उभरने के पहले ही दबा देता था। उनका ऐसे गायब होना शंका को उभारता ही रहता और उसे जीवित रखने को आँसू बहते रहते।
फेंकरनी चुप रहती और उसकी माई तो सामने पड़ते ऐसी चुप होती कि शंका दुगुनी हो जाती। चमाइनें मुँह से आग पानी झराझर बरसाने के लिए जानी जाती थीं। उनकी चुप्पी रहस्य को गहराती ही थी। फिर भी मतवा ने उन्हें गोयड़ें के खेत में बसे रहने दिया और कभी कभार खाने पीने को कुछ देती भी रहीं - विधना का लेख कौन टार पाया, अपने से खराबी क्यों करें?
गर्भ की अंतिम अवस्था में जब कि आज बिहान कब नहान सी स्थिति रहती है, एक दिन दोनों माई धिया नींबू के पास से गुजरीं और फेंकरनी नीबू के फल को देख वहीं ठिठक कर खड़ी हो गई। उसे अरुई के पत्ते का खटलोस चोखा खाने का मन हो आया।
“माई रे! नेबुअवा तूर लीं? केहू देखत नइखे। तोरे हाथे के पत्ता के चोखा खाये के मन करता।“(माँ! नींबू तोड्फ़् लूँ? कोई नहीं देख रहा। तुम्हारे हाथ का पत्ते का चोखा खाने को मन कर रहा है।)
“सब दिन पूर गइल, अब छिनरो बीजन खइहें! मुहझौंसी सगरी तमाशा तोरिये कइल हे तब्बो कहतले कि नेबुअवा तूर लीं? कपरा पर कौनो चुरइल बइठल बा का? देखतनी गाँवे में केहू इहाँ मिलि जा त बना देब। लेकिन ई नेबुआ जनि छुइहे।” (सारा समय बीत गया और छिनार को अब व्यंजन खाने की सूझ रही है। कलमुही! सारा तमाशा तुम्हारा किया धरा है। तब भी यह पूछ रही हो कि नींबू तोड़ लूँ? सिर पर कोई चुड़ैल सवार है क्या? देखती हूँ गाँव में किसी के यहाँ मिलता है तो बना दूँगी। लेकिन तुम इस नीबू को छूना भी मत।)
अजीब संयोग माई को गाँव भर में नेबुआ कहीं नहीं मिला-हुमचावन के यहाँ भी नहीं। मतवा से अमचूर माँग उसने चोखा बनाया जिसे जीभ पर रखते ही फेंकरनी ने मुँह बिचका दिया – ई त करसी के तरे लागता रे माई! (यह तो सूखे गोबर की तरह लग रहा है!)
“हँ बुजरो तोहरा खातिर महराज बोलाईं?” (हाँ बुजरी! तुम्हारे लिये महाराज बुलाऊँ क्या?)
फेंकरनी की जुबान ऐंठ कर रह गई।
अगले ही दिन सुबह सुबह सग्गर बाबू हाँफते खदेरन के गोंयड़े खड़े थे – चलु रे माई! जल्दी चलु, बहुरिया प्रसव पीड़ा से त्रस्त हो रही थी। फेंकरनी भी साथ जाने की ज़िद में पड़ गई और दोनों के मना करने के बावजूद साथ चल दी। माई जब पहुँची तो भीतर से करुण चीखें रह रह कर आ रही थीं। रामसनेही बेचैन से दुआरे टहल रहे थे। जुग्गुल जंत्री सिंघ के साथ बतिया रहा था। उसे देखते ही माई के भीतर घिरना (घृणा) की बाढ़ उमड़ आई लेकिन उस समय घर के भीतर की पीर सब पर भारी थी।
भीतर का दृश्य हृदयविदारक था। बच्चा पेट में आड़ा था और सग्गर बहू का चेहरा इतनी ही देर में बेनूर लाश की तरह हो चला था जिस पर जीवन के चिह्न ऐंठन और चीख के साथ आते और उनके साथ ही चले जाते। फेंकरनी ने ऐसा बहुत देखा सुना था लेकिन सग्गर बहू को देख कर इस बार उसे अपनी कोख की सुध आई और एक डर भीतर पैसता चला गया। उसके मुँह का स्वाद किसी ने सोख लिया और देह पानी पानी हो गई – बारिश में चँवर। देह का भारीपन मन पर सवार हो गया। उसने माई से जाने की अनुमति माँगी। माई उस समय क्या करती? – जा बच्चा! धीरे धीरे जइह (जाओ बच्ची! धीरे धीरे जाना) – उसने पहली बार फेंकरनी को बच्चा कहा था। दूर कहीं अदृश्य नक्षत्रों के बीच कुछ कानाफूसी हुई और नियति का चक्का तेजी से घूम उठा।
दुआर से जाने के बजाय फेंकरनी ने खिरकी का रास्ता पकड़ा और उस बेस्वाद मुँह वाली को सामने नींबू का फल दिखा। उसने झपट कर उसे तोड़ कर आँचल में छिपा लिया। उसे पता ही नहीं चला कि पेशाब करने आ रहे जुग्गुल ने उसे देख लिया था। कुछ ही कदम चली होगी कि गालियों की बौछार के साथ पेट पर तेज लात पड़ी और एक साथ दो जन जमीन पर थे। जुग्गुल संतुलन बिगड़ने के कारण गिरा था तो फेंकरनी आघात से। नींबू दूर छटक गया। भयानक दर्द के बीच उसने जुग्गुल को देखा जो अभी सँभल रहा था। आदिम भय और आने वाली संतान की सुरक्षा की भावना ने उसके पैरों में जैसे पंख लगा दिये। दर्द दब गया। भागती हुई अपने पलानी में जब पहुँची तो जैसे देह से पानी का सोता फूट रहा था। उसे प्रसव पीड़ा शुरू हो गई।
उस समय मतवा अग्निशाला में आग को जीवन दे पूजा वाली पियरी (पीली धोती) सहेज रही थीं। उन्हें ध्यान आया कि गोंयड़े से सुबह से कोई दिखा नहीं! पलानी के पास पहुँची तो भीतर से कराहने के स्वर आ रहे थे। वह समझ गईं। पुकारने पर किसी तरह फेंकरनी ने बताया कि माई सग्गर सिंघ के यहाँ थी। मतवा ने एक लड़के को पकड़ कर माई को बताने को दौड़ाया लेकिन जुग्गुल ने उसे दुआर से ही चलता कर दिया। वापस आये लड़के को रोक कर मतवा ने कुछ पल सोचा और चमटोली में बिघना बहू के लिये सन्देशा भेजा। लड़का जब फिर से वैसे ही लौट आया, तब मतवा खुद चमटोली गईं और गिरधरिया मेठ के इनकार से ठकुआ कर रह गईं। समय नहीं था और उस नराधम के आगे और कहना बेकार था। मतवा निराश लगभग भागते वापस आईं तो फेंकरनी की पीड़ा बढ़ चली थी।
भीतर से टूटती आवाज़ आई – मतवा, कुछु करीं... पेटे में राछस किकोरता... राउर एहसान जनम भर राखब।(मतवा! कुछ कीजिए... पेट में राक्षस छील रहा है...आप का एहसान आजन्म मानूँगी।) मतवा को अस्पृश्यता का ध्यान क्षण भर को आया लेकिन वाह रे ममता! उसकी एक लहर गाय और भैंसों के प्रसव का ध्यान दिला गई। जब पशुओं के लिये छूतछात की परवाह नहीं तो मानुख के लिये क्यों? मतवा ने चिपरी (एक तरह का उपला) के कुछ टुकड़े उठाये और अग्निशाला के पास आकर फिर से ठिठक गईं। पति खदेरन का कहा ध्यान में आया – अग्नि कभी अपवित्र नहीं होती, सब पवित्र कर देती है। उनके ऊपर लगा लांछ्न भी ध्यान में आया और उनका बिना बताये गायब होना भी। आँखें भर आईं, मन में जाने कितने भाव आये और चले गए।
दहकती समिधा के कुछ टुकड़े चिपरी पर सज गये और पियरी सँभाले मतवा ने चमइन के प्रसूति गृह में प्रवेश किया। उधर उस समय जुग्गुल ने रामसनेही के हाथों में नींबू सौंपा और सारी बात कह सुनाई। अभी पोता गर्भ से बाहर आने को संघर्ष कर रहा था और कुलटा चमइन पहला फल ही तोड़ गई! अनर्थ की आशंका से रामसनेही सिंघ का खून खौल उठा। कान लाल हो उठे, कुछ न कह कर नींबू गमछे में गठिया लिये और बेचैन से टहलने लगे। जुग्गुल सिर पर हाथ रखे अवसादग्रस्त सोचता रहा – एतना अबेर काहें होता? (इतनी देर क्यों हो रही है?)
प्रतीक्षा की लम्बी घड़ियाँ सिमटीं, बाहर आकर माई ने थाली बजाते हुए पोते के आगमन की सूचना दी और थाली को दुआर पर ही पटक कर अपने पलानी की ओर भाग चली। उसे लग रहा था कि हो न हो फेंकरनी भी...
...हाँफती माई को पलानी के भीतर पियरी में लिपटे साँवले बच्चे को लिये मतवा मिलीं। भौंचक्की चमइन को कुछ नहीं सूझा। मतवा के पैर पकड़ फूट फूट रो पड़ी – कवनो एहसान नाहीं बचल हो मतवा! कवनो नाहीं। (कोई एहसान नहीं बचा मतवा! कोई नहीं)
मतवा उदास भाव से मुस्कुराईं – माई रे! सोहर गाउ, सोहर ...कोसिला से भेजलें पियरिया हो राजाss।
... यह पियरी नैहर की है। तोर ससुरा कहाँ रे छिनरी फेंकरनी? ...माई को कन्हैया बलराम ध्यान में आये - एक भैया साँवर एक भैया गोर...झूलहु हो लाल झूलहु लेकिन झुलाने वाली फेंकरनी तो निढाल पड़ी हुई थी और चन्दन गाछ? नपत्ता! 
फेंकरनी के चेहरे पर मुक्ति के तोष का अता पता नहीं था - सारा रक्त निचुड़ गया था! साँसें आँखों में अटकी थीं – जाने किसकी प्रतीक्षा थी? मतवा बाहर हो गईं। फेंकरनी ने माई का हाथ पकड़ पास बैठा लिया।...
यह काण्ड सुनने के बाद लगभग अन्धे हो चले जलपा(बहुत बूढ़े) महामहोपाध्याय पंडित चंडीदत्त शुक्ल निकृष्ट कर्म कर चुकी ब्राह्मणी के लिये मनु, याज्ञवल्क्य, गर्गादि की वाणी में दंड विधान के मानसिक अन्वेषण में लग गए।
...माई रे! लागता पेटवा में लंगड़ा के लात धइल बा।(माँ! लग रहा है कि पेट में लंगड़े का पैर रखा हुआ है।) जुग्गुल की करनी सुन कर क्रोधोन्मत्त माई हिसाब किताब करने चल दी – सहना बहुत हुआ, अब लड़ा जा सकता था। (जारी) 

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

सुजान साँप

हमारी मुलाकात पंसारी की एक दुकान पर हुई। जिस जगह मेरा स्थानांतरण हुआ था, वहाँ मकानों की भारी कमी थी जब कि घर बसते जा रहे थे। बसना कहना शायद ठीक नहीं, 'हाल्ट लेना' कहना चाहिए। हर तरफ महँगाई की मार। टैक्स हॉलीडे होने के कारण अचानक ही जंगलों में वनवासियों की जमीनों के दाम आसमान छूने लगे थे और अजीब अजीब नामों वाली कम्पनियाँ उन पर चहारदीवारियाँ बना कर स्थापित होने लगी थीं। अधिकांश में प्रोडक्शन के नाम पर कुछ नहीं होता। बम्बई से बना बनाया माल आता और वहाँ केवल पैकिंग होती। सरकारी विभागों की सँकरी खिड़कियों से तफरीह कर के आते चालान पैक सामानों को उन बोगियों तक पहुँचा देते जिन्हें विश्व की सबसे नकारा रेल पटरियों पर चलते हुए उन्हें पूरे देश में बिखेर देना होता था।

बस तीन घंटों की दूरी पर तीन हजार रुपये महीने के फ्लैट में रहने वाले मैं राम को जब पन्द्रह हजार महीने की बातें सुनने को मिलीं तो मेरे होश उड़ गए। आम धारणा के विपरीत यहाँ के लोग सीधे साधे हरगिज नहीं थे। उन्हें मजबूरी की नब्ज़ से खून सोखना बखूबी आता था। मेरे पास बस सात दिनों का समय था। उस बीच अपनी छत ढूँढ़ मुफ्त का सरकारी गेस्ट हाउस खाली कर देना था। दलालों से दो दिनों में ही निराश होकर रोज रात को सड़कों पर देर तक घूमने लगा। देखता कि किन फ्लैटों में लाइट नहीं जल रही और गार्ड से जा कर बात करता। गार्ड मेरी समस्या समझ कर बस दाँत निपोर देते और कहते कि साहब यहाँ तो बस ऐसे ही है। मैंने दुकानों पर भी पता लगाना शुरू कर दिया। 
ऐसे ही एक दिन मैं किसी दुकान पर पूछताछ कर रहा था। दुकानदार मेरे ऊपर अधिक ध्यान नहीं दे रहा था। उसी समय हमारी बातों में किसी आवाज ने पीछे से टँगड़ी भिड़ाई - मोटे भाई! मेरे साथ बात करोगे?
दुकानदार ने राहत की साँस ली। मेरे चेहरे पर कंफ्यूजन भरी सहमति देख उस अजनबी ने मेरा हाथ पकड़ा और पास के छोटे से पार्क में घुस गया। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी, नहीं उसने बढ़ा रखी थी और आँखों से चालाकी टपक रही थी। उसने सिगरेट सुलगाई और शुरू हो गया - मेरा नाम सुजान है। सुजान भाई हर्षद भाई पटेल। गुजराती हूँ - एक प्राइवेट कम्पनी में स्टोर ऑफिसर। दो बेडरूम के फ्लैट में अकेले रहता हूँ। औरतों में मेरी दिलचस्पी बस माँ तक है जो बड़ौदा में रहती है। मुझे मास मच्छी से परहेज नहीं। हमारी कम्पनी यहाँ बहुत पहले ही आ गई थी और फ्लैट भी यहाँ के हिसाब से सस्ते में मिल गया - छ: हजार रूपये महीना, मेंटेनेंस चार्ज मिला कर। एक और आदमी शेयर करने लगे तो मुझे भाड़ा पोसाने लगे, अभी तो हालत खराब है। 
मुझे मामला अजीब सा लगा। एक अजनबी के पास ऐसा प्रस्ताव एक चालाक मनुष्य़ ही रख सकता था, यह मान कर मैंने उस पर भरोसा कर लिया हालाँकि यह कोई तर्क नहीं था। मेरे पास उसका प्रस्ताव मानने के अलावा और कोई चारा भी नहीं था। मैंने मन ही मन हिसाब लगाया और तय किया कि परिवार को पुराने स्थान पर ही रहने दूँगा। बेटे का स्कूल फ्लैट के सामने ही था इसलिये अंजू को भी अधिक परेशानी नहीं होनी थी। सोचा कि छुट्टियों में आता जाता रहूँगा। प्रोजेक्ट के अठ्ठारह बीस महीने गुजर जायेंगे। फिर स्थानांतरण होगा तो देखी जाएगी।
मैंने हामी भर दी। 
उसके चेहरे पर यातना से उबरने के चिह्न उभरे और लुप्त हो गए। उसने कहा - देखो, फ्लैट थोड़े वीराने में है। डरने की बात नहीं, बीसों परिवार रहते हैं। मेरी कुछ शर्ते हैं - दिन में फ्लैट पर न तुम आओगे और न मैं। अगर मैं शहर में हूँ तो तुम मेरे साथ ही शाम को फ्लैट में घुसोगे। छुट्टियों के दिन अगर यहाँ रहोगे तो साथ साथ घूमेंगे। यहाँ देखने के लिये बहुत कुछ है और मेरे पास स्कूटर है। और भी शर्ते हैं लेकिन कोई खास नहीं। धीरे धीरे जान जाओगे।  
मैं डरा। मकान मालिक की शर्तें तो सुनी थीं लेकिन रूम पार्टनर की शर्तें? मैंने सिर को झटका - कौन इस पागल के साथ छुट्टी के दिन यहाँ रहेगा? मैं तो अपने परिवार से मिलने चला जाया करूँगा। मैंने उसे अपना परिचय दिया और हम दोनों गेस्ट हाउस से सामान फ्लैट में ले आये। 
फ्लैट में घुसते ही उसने जीभ को तलवों पर चटका कर आवाज निकालना शुरू कर दिया। ऐसा करते और सीटी बजाते हुए वह घूमता रहा और मेरे सामान को यहाँ वहाँ करीने से सजाता रहा। उसने फ्लैट को ऐसे व्यवस्थित रखा था जैसे उसमें कोई परिवार रहता हो। यह देख अपने आलस और लापरवाही को सोच मैं परेशान हुआ।
सोने के पहले उसने कहा - बेडरूम का दरवाजा खुला रखना और तीन हजार रुपये अभी मेरे हवाले करो। रुपये पैसे के मामले अगले दिन के लिए नहीं छोड़ने चाहिए। 
इतने से साथ में ही मैं उसका अभ्यस्त सा हो गया था। मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगा। रुपये गिन दिये और गुड नाइट बोला जिस पर उसने जय श्रीकृष्ण कहा। 
पहली रात चैन से बीती। हमारे बेडरूम अलग अलग थे। हमें न तो एक दूसरे की पाद झेलनी थी और न खर्राटे। बस एक खास बात मेरे ध्यान में आई - रसोई से और रद्दी पेपर रखे स्टोर से रेंगने की आहट सी आती और फिर उसकी सीटी की आवाज। मैंने उसे नई जगह का भ्रम समझा। 
सुबह उठा तो सुजान भाई ने बेड टी बगल में रख दिया और पास बैठ कर मटर छीलने लगा - तुम शादीशुदा हो, तुमसे किचेन का काम नहीं होगा। जो खाने का मन हो बता दिया करना, मैं सब बना दूँगा। उस डायरी में हिसाब है। जो कोई भी सामान लायेगा, उसमें अपने नाम से लिख देगा। महीने के अंत में आधा आधा।
मुफ्त में कुक भी मिल गया! मुझे अपने भाग्य पर नाज हो आया। मैंने उससे बस इतना कहा - सब्जी और दाल में चीनी मत डालना। इस पर वह हँसा और एकाएक चुप हो कर सीटी बजाने और चटके की आवाज निकालने लगा।
उसने एकदम से पूछा - घरवाली से अलग इतने दिन अकेले कभी रहे हो? मेरे नहीं कहने पर उसने आँख मारी - कोई माल चाहिए तो बता देना, जंगली चीज का मजा ही और है। मुझे कोई अनुभव नहीं, मेरे साथ वाले बताते हैं।
मेरे मुँह में उबकाई भर आई, तय किया कि अंजू को इस फ्लैट पर कभी नहीं लाऊँगा और प्रत्यक्ष में बोल पड़ा - सुजान भाई! मुझे भी सुजान रहने दो। मुझे इधर उधर मुँह मारने में दिलचस्पी नहीं। उसकी सीटी की बोलती बन्द हो गई और ओठ सामान्य हो गए। 

कुछ दिन गुजरे। वह मुझे बहुत मासूम लगने लगा। मैं एकाध छुट्टियों में रुक गया तो उसने बहुत खयाल किया। स्कूटर से हमदोनों जंगलों में घूमते रहते। किसी वनवासी की झोंपड़ी में जा कर मुर्गा पसन्द कर लेते और लौटने के बाद उसकी दावत होती। वह मिर्च अधिक ही डालता। जाने क्यों मुझे चिकेन खाने के बाद सी सी करना अच्छा लगने लगा। उसने मुझे सीटी बजाना भी सिखा दिया और कहा - बजाते रहा करो। झुर्रियाँ देर से पड़ती हैं। यह नुस्खा मैंने न सुना था और न ही दुबारा कभी किसी के मुँह से सुना। सीटी बजाना सीखने के अगले ही दिन उसने फ्लैट की डुप्लीकेट चाभी मुझे सौंप दी। अब मैं कभी भी फ्लैट में आ जा सकता था। 
हेड क़्वार्टर ने कम्प्यूटर भेज दिया - इस निर्देश के साथ कि जब तक साइट पर स्थिति ठीक नहीं हो जाती, घर पर रखो और हर सप्ताह प्रोग्रेस डाटा फ्लॉपी में भेज दिया करो। प्रोजेक्ट प्राइमावेरा सॉफ्टवेयर से मॉनिटर होना था। वह पहला अवसर था जब मैं फ्लैट में अकेले दिन में घुसा। गाड़ी वाला दरवाजे तक पैकिंग रख कर चला गया। मैंने सीटी बजाते हुए फ्लैट का दरवाजा खोला और सामने मोजैक फर्श पर नागराज विराजमान थे। खिड़रिचिया गेहुअन साँप! 
साँप फन काढ़े अपनी पूरी गरिमा के साथ मुझे घूरे जा रहा था। सीटी सटक गई। पहली रात की रेंगने की आहट याद आई, सुजान भाई की सीटी याद आई और यह पाठ याद आया कि साँप बहरा होता है। सुजान भाई मासूम के बजाय जल्लाद लगने लगा जो इस साँप के लिए शिकार तैयार कर रहा था। 
मुझे लगा कि हो न हो यह साँप फ्लैट में हमेशा रहता है या आता जाता रहता है। यह भी ध्यान में आया कि सुजान भाई ने किचेन सँभाल रखा था। 
क्या यह साँप किचेन में रहता है और रात में घूमता रहता है? मैं पसीने पसीने हो गया। शायद मेरी चेतना कुछ देर के लिये कुन्द हो गई थी क्यों कि साँप कब ग़ायब हो गया, मुझे पता ही नहीं चला। डरते डरते मैंने कम्प्यूटर के डिब्बे फ्लैट में रखे, ताला लगाया और सुजान भाई की फैक्ट्री के लिए ऑटो पकड़ लिया।
सुजान भाई ने पूरा हाल ऐसे सुना जैसे सुहाने दिनों में लोग रेडिय़ो पर मौसम की सूचनायें सुनी अनसुनी करते हैं। वह मुस्कुराया और बोला मैंने तुम्हें नहीं बताया वरना तुम कभी राजी नहीं होते। डरने की जरूरत नहीं, वह साँप मेरा दोस्त है। दोस्त का दोस्त दोस्त होता है। तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचायेगा, बस सीटी बजाते रहना।
स्तब्ध मन से मैंने मन ही मन उसे वह सारी त्रिविमीय गालियाँ दे डालीं जो कॉलेज रैगिंग में सीखी थीं। उनका वह पहला मौन प्रयोग था। मैंने उससे कहा - तुम्हें पता है? साँप हवा से होकर आती आवाज नहीं सुन सकता। बहरा होता है।
उसने कहा - वे नादान हैं जो ऐसा कहते हैं कि साँप बहरा होता है। साँप कुछ भी कर सकता है। मेरी बात पर भरोसा रखो। साँप से तुम्हें डरने की जरूरत नहीं।
'अन्धविश्वासी हो तुम! तुम्हारे बीवी बच्चे तो हैं नहीं! तुम्हें अपनी जान की क्या परवाह? एकदम सनकी हो। लेकिन मुझे कुछ हुआ तो सुजान भाई! मेरी बीवी और बच्चे का क्या होगा? मुझे आज ही फ्लैट खाली कर देना है।'
'कर दो खाली। फुटपाथ पर रहना।' 
वह थोड़ी देर रुका और बोला - मैंने कब कहा कि मेरे बीवी बच्चे नहीं हैं? छोड़ गए सब मुझे। इसी फ्लैट में हमलोग साथ साथ रहते थे। उस अहमक औरत पर पता नहीं कौन सा फितूर सवार था? हमेशा लड़ती रहती थी। एक दिन दोनों बच्चों को लेकर जाने कहाँ गायब हो गई?  साँप तो उनके जाने के बाद आया। किचेन में घरवाली नहीं साँप रहता है। इस इकलौते के माँ बाप को गुजरे जमाना बीत गया। 
...फ्लैट किराये का नहीं, मेरा अपना है। ...तुम भी छोड़ कर चले जाओगे?' - सुजान भाई फूट फूट कर रो पड़ा। स्तब्ध सा मैं बस उसका सिर सहलाता रहा। उस क्षण कुछ घटित हुआ और मैंने तय किया कि फ्लैट खाली नहीं करूँगा। सतर्क रह कर जिया जा सकता था। आखिर सुजान भाई इतने दिन से रह ही रहा था। साइट पर भी साँप होंगे ही, अनहोनी तो कहीं भी हो सकती थी। सुजान भाई ने न तो दुबारा कभी किराया माँगा और न मैंने दिया। 

सुजान भाई के साथ बीस महीने रहने के बाद वह दिन भी आया जब मुझे मेरे अपने प्रदेश में टर्मिनल बनाने के लिए ट्रांसफर कर दिया गया। पहले बम्बई में रिपोर्ट करना था। मुझे ट्रेन पर चढ़ाते हुए सुजान भाई बस रोता रहा। ट्रेन सरकने लगी तो उसने मेरे हाथ में लिफाफा पकड़ा दिया। लिफाफे पर एक रूपये का सिक्का चिपका था। अन्दर तीन हजार रूपये थे। उसने कहा - मोटे भाई! रख लो। ...जय श्रीकृष्ण।  
बम्बई में सात आठ दिन रहने के बाद एक फाइनल बिल में समस्या होने के कारण उसे सुलझाने मुझे वापस जाना पड़ा। वह दिन छुट्टी का था और मैंने सोचा सुजान भाई से मिलता चलूँ। 
अपार्टमेंट के गार्ड ने बताया - साब! सुजान भाई ने तो खुदकुशी कर ली। बड़ी खराब मौत रही होगी, पूरी देह नीली पड़ गई थी। 
मेरे हाथ से ब्रीफकेस गिर पड़ा और मैं चिल्लाया - आत्महत्या नहीं उसे साँप ने काटा होगा। 
'नहीं साब! जहर की शीशी बगल में पड़ी थी और आप को साँप की बात कैसे पता?' 
'बस ऐसे ही। क्यों क्या हुआ?' 
'साब! एक साँप पंखे से लटका मरा पाया गया।' 
'साँप पंखे तक कैसे पहुँचा?' - सोचते हुए मैं वहीं जमीन पर बैठ गया। 
आज लिखते हुए सुजान भाई की बात याद आ रही है - वे नादान हैं जो ऐसा कहते हैं कि साँप बहरा होता है। साँप कुछ भी कर सकता है। ... 
अब मुझे साँपों से डर नहीं लगता।
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इस कहानी का पोडकास्ट श्री अनुराग शर्मा के स्वर में नीचे दिये लिंक पर उपलब्ध है: 
हिन्दयुग्म पर 'सुजान साँप'