रविवार, 27 फ़रवरी 2011

दिल, नागिन और मूँछें

यह ऐसा आलेख है जिसके लिये टिप्पणी न करने की शपथ भी तोड़ी जा सकती है। परिवेश की बेहूदगियों पर झुँझलाते हुये 'आर्ट ऑफ लिविंग' में सिमटने या 'पॉलिटिकली करेक्ट' हो कर बेहूदगियों का समर्थन करने से अच्छा है कि हो हल्ले में दबा दिये गये, अनदेखे कर दिये गये और किये जा रहे तथ्यों पर लिखा जाय। 
इसे पढ़ते हुये जाने कितनी 'नर्कगामी' सचाइयाँ स्वर्ग की ओर कुलाचें मारने लगती हैं। मजे की बात यह है कि रम्यता भी बनी रहती है। ब्लॉगरी साहित्य को समृद्ध कर रही है, यह आलेख प्रमाण है। 
अधिक नहीं कहूँगा, स्वयं पढ़ कर देखिये: 

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

अच्छा जी

छत और दीवारों से रंग पपड़ियाँ लहराती उतरी हैं। हवा की नमी सोख गहराई भारी हैं और धसते फर्श की दरारों में हौले हौले सिमट गई हैं। मरमरी मेज पर धूल की एक बारीक पर्त है जो बीते काहिल दिनों के ठहराव से जमी है। जिस दिन से मेज से हवा में कुछ दूर टेढ़ी अटकी पारदर्शी सीमाओं में बन्द पानी के साथ साथ मछली मरी है, मैंने मेज को नहीं पोछा है। मुझे अब तक यह समझ में नहीं आया है कि पहले कौन मरा? पानी या मछली? दोनों साथ साथ मरे क्या?
पहली बार, पहली बार यह लगा है कि मैं तनहा हूँ और यह पहली बार भी कितना लम्बा हो गया है!
शब्द होठों से लीक हो जाते हैं और जब तक यह पता चलता है कि क्रियायें संज्ञाओं से आगे हो गई हैं, सामने वाला मुस्कुरा चुका होता है और मन की मसोस आँखों में खो जाती है। बात प्रलाप हो कर चुप हो जाती है।
घर के हर दरवाजे की चींचीं की अपनी शैली है। कोई लम्बी तानता है तो कोई रुक रुक कर। कोई फुसफुसाता है तो कोई क्रोध में गुर्राता है। अब सबकी चींचीं रोज नहीं सुनता, कई तो खुलते ही नहीं। रातों में जब फर्श और दरवाजे के बीच से गुजरती चुहिया की खटखट होती है, ठीक उसी समय घरघराता फ्रिज खट से बन्द होता है या ऑटो स्टार्ट होता है। ऐसा क्यों होता है? क्यों होता है कि तनहाई भीतर घुलने के बजाय बाहर टहल कर ऐसे वाकये इकठ्ठा करने लगती है? मुझे लगता है कि मैं धीरे धीरे पागल हो रहा हूँ और सुबह होते ही अपने लगने पर हँसी आती है। हँसी ऑफिस तक साथ आती है और तब और ह ह हो जाती है जब प्रोग्रामिंग लिखते हुये गूढ़ सबरूटींस को पहले से अधिक तेजी से फिट कर आगे बढ़ जाता हूँ। सामने वाला बिना बात ही ताना दुहराता है - इस जमाने में यह सब? सोर्स कोड लिक्खो अब! और मैं उसे झिड़कते कह देता हूँ सोचो तो अभी तुमने कितनी मूर्खता भरी बात कही है। जब उसकी यह आवाज कानों में पड़ती है कि मैंने तो कुछ कहा ही नहीं! तब, तब मुझे फिर तनहाई का अनुभव होता है।
कड़वी कॉफी का मेज पर रखा जाना उदास कर जाता है। झाग के ऊपर पाउडर तैरता है। नीचे की गर्म भाप पाउडर को धकियाती एरोमा को हवा में हिल हिला देती है और मुझे गर्मी में उड़ती धूल पर मेह फुहार का छौंका सुँघाई देता है। कितनी तनहा होती हैं ये सोंधी गन्धें! वाह, वाह और चाह सब चन्द घूँटों में खत्म। हवा में डायलूट हो जीती रह जाती हैं। अब तक कितने सिप लिये होंगे?
कितनी बार? कितनी बार टूट कर चाहा है कि कभी घर में एक चिड़िया रहे! एक आई भी थी। बाद में एक और भी आया। घोंसला बना। अंडा आया और जाने किस बात पर दोनों लड़ पड़े। अंडा जमीन पर गिरा और गमगम से घर गमक उठा। इतनी बू! बाप रे!! दोनों चले गये और फिर नहीं आये। जाने कितनी कहानियों के ड्राफ्ट ऐसे ही मन में दफन हो गये।
कोई केवल रोटी, छत और कपड़े से जी सकता है भला? क्यों नहीं? मैं जी तो रहा हूँ। कइयों ने कहा कि शादी बना लो। जाने क्यों मुझे उसे बनाने का खयाल ही नहीं आता? मुझे पता है कि पीठ पीछे कुछ वाहियात कहते सुनते हैं। हक़ीकत यह है कि मुझे इंसानों में दिलचस्प जैसा कुछ दिखता ही नहीं। इंसान ही क्यों किसी चीज में नहीं दिखता। चौबिस घंटे अपनी ही रची सूइयों पर लटक कर उन्हें चलने से रोकने की कोशिश करना मुझे मूर्खता ही नहीं अपराध भी लगता है। अब ऐसे से शादी कौन बनाएगा? शाद बनाने वाली चीज होती है क्या? 
गैस पर सब्जी फदक रही है। उसका रंग आश्चर्यजनक रूप से दीवार और छत की पपड़ियों जैसा लगता है। नहीं यह बाहर की रोशनी और भीतर की रोशनी के संयोग के कारण है। सब्जी खा लूँगा लेकिन रोशनियाँ तो बच रहेंगी और पपड़ियाँ ऐसे ही गिरती रहेंगी। मकानमालिक से कहता हूँ कि पेंटिंग करा दे और फर्श भी ठीक करा दे। केवल मरमरी मेज रखना काफी नहीं। मछली और पानी के लिये तनहाई ठीक नहीं होती।
तो तुम्हारी तनहाई बस पेंटिंग और फर्श के कारण है? नहीं, ऐसा नहीं है। उनके  कारण लगने लगती है। क्या उस समय तुम्हारे मन में शादी बनाने का खयाल आता है? नहीं। इस समय आ रहा है? नहीं। तुम पागल नहीं, पकाऊ इंसान हो। तुम्हारे लिये बेहतर होगा कि जैसे हो वैसे ही रहो।
उफ्फ! ये तनहाई खुद से बात करने पर भी नहीं जाती। डाक्टर से मिलना ही पड़ेगा। क्यों, इसमें डाक्टर क्या करेगा?  पता नहीं। कुछ तो करेगा ही। नाड़ी देखेगा। मुँह खोलो! आँख। जीभ निकालो! हाथ झटको। मुस्कुरायेगा। कहेगा - घर जाओ। आराम करो।
जानते हो उसे फीस में क्या दूँगा? क्या? यह रुक्का। वह मानेगा? पता नहीं लेकिन आज तक किसी ने किसी डाक्टर को ऐसी चीज फीस में नहीं दी होगी। वह तुम्हें पक्का पागलखाने में भेज देगा। फिर तो मैं उसे पागल कहूँगा। की फरक?  
मकानमालिक घर किसी और को उठा देगा। पपड़ियाँ वैसे ही लहराती उतरेंगी, धसते फर्श की दरारों में सिमटेंगी लेकिन घर में शायद कोई तनहा नहीं होगा। उनका लहराना और सिमटना देखा भी नहीं जायेगा।
अच्छा है जी, अब बस भी करो। अच्छा जी।  

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

शिलालेखों में अक्षर नहीं होते।

राजोद्यान में घूमते घूमते एक दिन राजकुमारी को बाहरी संसार देखने का मन हुआ और उसने रथ को गाँवों की ओर चला दिया। चलते चलते उसके कानों में वेणु के स्वर पड़े। वह मोहित सी उसे बजाते चरवाहे के पास बैठ कर सुनती रही। आसपास का समूचा संसार भी चुप हो उन दोनों को देखता सुनता रहा। प्रेम का प्रस्फुटन कभी कभी ही तो दिख पाता है! चरवाहे ने जब वादन समाप्त किया तो गायें घर की ओर दौड़ पड़ीं और उड़ती हुई धूल के पीछे लाज से लाल हुआ कोई छिप गया।
राजकुमारी ने चरवाहे को राजोद्यान में निमंत्रित किया। चरवाहा बोला – ना बाबा ना! वहाँ तो प्रहरी होंगे। मेरे स्वर भयग्रस्त हो जायेंगे। वेणु ठीक से नहीं बजेगी।
राजकुमारी ने कहा – वहाँ प्रहरी नहीं होते। महल के प्रहरियों से मुझे भय लगता है इसलिये पिता से कह कर उद्यान को प्रहरियों से मुक्त रखा है।
चरवाहा हँसा – विचित्र बात है! वहाँ राजकुमारी के भय से प्रजाजन नहीं जाते और राजकुमारी वहाँ इसलिये जाती है कि उसे महल के प्रहरियों से भय लगता है। विचित्र बात है!
अगले दिन चरवाहा उद्यान में पहुँचा। वहाँ सचमुच प्रहरी नहीं थे। चरवाहा वहाँ की शोभा देख मुग्ध हुआ और फिर कुछ कमी को जानकर उदास भी। वहाँ कुछ अतिरिक्त भी था जिसके कारण स्वाभाविकता दूर भागती थी। दोनों एक पत्थर पर खिले हुये फूलों के बीच बैठ गये। चरवाहा वेणु बजाने ही वाला था कि उसे फूल तोड़ती मालिन दिखाई दी। यह सोच कर कि अदृश्य ईश्वर के बजाय फूल को राज्य की सबसे दर्शनीय बाला को अर्पित होना चाहिये, चरवाहे ने सबसे सुन्दर फूल लोढ़ लिया और उसे राजकुमारी को दे कर वेणु बजाना प्रारम्भ किया।
उसके स्वरों में रँभाती गायें थीं, इठलाते कूदते बछड़े थे, मित्रों की आपसी छेड़छाड़ थी, लड़ाइयाँ थीं, पास के खेतों में की गई चोरियाँ थीं और कँटीले पेड़ों को दी गई गालियाँ भी थीं। बरसता भादो था, तपता जेठ था और फागुनी हवायें भी थीं। राजकन्या और मुग्ध हो गई। स्वाभाविकता आने लगी और वह कुछ अतिरिक्त जाने को हुआ कि मालिन को सुध आई। वह भागते हुये महल में गई और राजा को सब कुछ कह सुनाया। महल से भय चल पड़ा। अनजान राजकुमारी मुग्ध सी वेणु सुनती रही और चरवाहा नये सुरों से हवा को भरता रहा। उदासी दूर होती रही कि भय आ पहुँचा।
प्रहरियों ने चरवाहे को राजा के सामने प्रस्तुत किया। राजा ने सब कुछ सुन कर उसे दण्डाधिकारी को सौंप दिया। दण्डाधिकारी ने पूरा विधिशास्त्र ढूँढ़ डाला लेकिन न अपराध की पहचान हुई और न दण्ड की। अचानक ही उसकी दृष्टि विधिशास्त्र के अंतिम अनुच्छेद पर पड़ी और वह मुस्कुरा उठा।
“तुमने फूल तोड़ कर सुन्दरता को भंग किया है, राजकुमारी के दिव्य सौन्दर्य को भ्रमित किया है, भयग्रस्त किया है और राज्य के अनुशासन को तोड़ा है। यह राजद्रोह है, जिसका दण्ड बीस वर्षों का सश्रम कारावास है।“
चरवाहे ने कहा – आप की बातों में सच कितना है यह तो आप को भी पता है लेकिन मुझे भयग्रस्त करने के आरोप पर आपत्ति है। उसकी एक न सुनी गई और कारागार में बन्दी बना दिया गया।
कारागार पहाड़ियों में बना था और जिस क्षेत्र में चरवाहे को पत्थर तोड़ने का काम सौंपा गया था वहाँ दूजी वनस्पतियाँ क्या घास तक नहीं थी। चरवाहे की वेणु राजकोषागार में जमा थी। उसने उसे पाने के लिये मिन्नतें कीं तो उसका अनुरोध राजा तक पहुँचाया गया। राजा मान गया लेकिन दण्डाधिकारी ने कहा कि उसके वेणुवादन से वहाँ हरियाली फैलने का भय है, चिड़ियाँ चहकने का भय है और पत्थर के पिघलने का भय है; इसलिये नहीं दी जा सकती।
राजा पुत्री की स्थिति से पहले ही बहुत निर्बल हो चुका था, दु:खी था – कुछ कर न सका। चरवाहा पत्थर तोड़ने लगा। जब थकता तो राजकुमारी को याद करता और आँसू बहाता। एक दिन उसने देखा कि जहाँ प्रतिदिन बैठकर वह आँसू टपकाता था, वहाँ की भूमि पर दूब उग आई है। उसने बिना वेणु के संगीत का अनुभव किया और मारे प्रसन्नता के नाच उठा।
अगले दिनों में पत्थर तोड़ तोड़ कर उसने एक सोता ढूँढ़ निकाला। फिर क्या था! हरियाली फैलने लगी, पत्थर पिघलने लगे और कुछ वर्षों में ही किशोर पेड़ों पर चिड़ियाँ भी चहकने लगीं। बन्दीगृहप्रमुख पत्थरों से ऊब चुका था। उसने दूर राजधानी तक यह समाचार पहुँचने नहीं दिया। कर्मचारियों को दिखाने के लिये चरवाहे पर श्रमभार बढ़ाता रहा। चरवाहा हरियाली फैलाता रहा और अपनी वेणु के लिये उपयुक्त सरकंडा ढूँढ़ता रहा। जिस दिन उसे वह सरकंडा मिला उसी दिन बीस वर्ष पूरे हुये और उसे मुक्त कर दिया गया। कारागार से बाहर आते उसे सबने देखा और पाया कि चरवाहे के चिर युवा चेहरे पर पत्थर की अनेक लकीरें गहराई तक जम चुकी थीं, वह दुबला हो गया था लेकिन उसके होठ भर आये थे। कुछ ने इसे कारागार की यातना के कारण बताया तो कुछ ने वेणु न बजा पाने के कारण बताया।
दण्डाधिकारी ने उसे कुटिल मुस्कुराहट के साथ बताया – वेणु को दीमक चट कर गये। इस बार चरवाहे ने कोई आपत्ति नहीं जताई और प्रणाम कर उद्यान की ओर चल पड़ा।
उद्यान उजड़ गया था। चारो ओर कँटीली झाड़ियाँ फैल गई थीं। एक आह भर कर उसने उद्यान में कुछ ढूँढ़ना शुरू किया और पुराने स्थान पर पहुँच कर ठिठक गया। राजकुमारी पत्थर की प्रतिमा बनी बैठी थी। उसकी आँखें भर आईं। उसने देखा कि राजकुमारी के हाथ में फूल अभी भी था और वह कुम्हलाया नहीं था। गमछे में जुगनू सहेज चाँदनी में चरवाहा रात भर सरकंडे को भाँति भाँति विधियों से पत्थर पर घिसता रहा।
प्रात हुई और वेणु के स्वर उजड़े उद्यान में गूँज उठे। जहाँ तक स्वर पहुँचे, सब कुछ स्तब्ध हो गया, थम गया। उस प्रात चिड़ियाँ नहीं चहकीं, फूल नहीं खिले, भौंरे नहीं गुनगुनाये। जब स्वर थमे तब चरवाहा घूमा और राजकुमारी जीवित हो उठी। दोनों आलिंगन में कसे और फिर गाँव की ओर भाग पड़े।
राजा ने यह सब सुना और बहुत पछताया। उसने दूर दूर तक अपने प्रहरी दौड़ाये लेकिन उनका पता नहीं चला।
राजा ने समूचे विधिशास्त्र को निरस्त कर दिया। दण्डाधिकारी को प्रस्तर कारागार भेज दिया लेकिन यह सूचना मिलने पर कि वहाँ तोड़ने के लिये पत्थर बचे ही नहीं थे, उसे सोते ढूँढ़ने के काम पर लगा दिया। राजा ने पूरे राज्य में बड़े बड़े शिलालेख लगवाये जिन पर केवल यह लिखा था – प्रेम।
कुछ नासमझ लोग आज भी यह कहते हैं कि सोतों के खलखल कुछ नहीं, दण्डाधिकारी के पछ्तावे हैं और प्रात:काल चिड़ियों की चहचह कुछ नहीं, शिलालेखों को पढ़ने के बाद चरवाहे  और राजकुमारी की खिलखिलाहटें हैं। चरवाहे के चेहरे की लकीरें हर पत्थर पर हैं जो उन्हें तोड़ने की राह देती हैं और शिलालेखों में अक्षर नहीं होते।                                        

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

लाल विश्वविद्यालय में नीली फिल्म


एक विश्वविद्यालय था। उसके भवन लाल ईंटों से बने थे। अब आप कहेंगे कि ईंटें तो लाल ही होती हैं, अलग से कहने की क्या आवश्यकता? असल में ईंटों को लाल रंग से रंगने के बाद प्रयोग में लाया गया था। नींव से लेकर शीर्ष तक केवल रंगी हुई लाल ईंटें काम में लाई गई थीं। स्थापकों का सपना था कि वहाँ पढ़े लिखे युवा लोग समूचे संसार में लाली फैलायेंगे - लाली जीवन का प्रतीक होती है क्यों कि खून का रंग लाल होता है। सपने देखने की अद्वितीय स्थापनाओं के कारण विश्वविद्यालय का नाम फैलता रहा और शीघ्र ही देश के प्रतिष्ठित शिक्षा केन्द्रों में गिना जाने लगा।
परिसर में प्रवेश करते ही चारो ओर की लाली आगंतुक के ऊपर विराट प्रभाव छोड़ती थी। उस विश्वविद्यालय में युवा आते, लाल सपने देखना सीखते, अध्ययन करते और निकलने के बाद अधिकांश लाली को भूल सांसारिक काली में उलझ कर रह जाते। एकाध उस श्रेणी में आ जाते जिसे बाहरी संसार सामान्येतर कहता। वे लाली फैलाने के लिये, जिसे वे लाल क्रांति भी कहते थे, कुछ काम भी करते लेकिन जैसा कि पहले से भी होता आया है उनकी कोशिशों के बावज़ूद संसार बहुरंगी बना रहता।
लाली को मानने वाले अपने को वाममार्गी कहते थे। वे हमेशा सारे काम बायें हाथ से करते, सड़क पर बाईं ओर चलते और केसरिया रंग से नफरत करते थे क्यों कि उसे मानने वाले दक्षिणमार्गी कहलाते थे जो दाईं ओर चलते थे और सारे काम दायें हाथ से करते थे। वाममार्गी उन्हें फासीवादी भी कहते थे जो जनता को स्वार्थों के लिये फाँसी पर चढ़ाने में यकीन रखते हैं। यह बात और थी कि संसार में ऐसे काम करने वालों में वाममार्गी सत्ताधारी  भी अग्रणी थे।
शुरू में दक्षिणमार्गियों की संख्या कम थी लेकिन संतुलन बनाये रखने की प्राकृतिक व्यवस्था के तहत कालान्तर में अच्छी खासी हो गई। वाममार्गियों और दक्षिणमार्गियों में विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा यही था कि क्रांति का रंग लाल होता है या केसरिया? क्रांति इन दोनों रंगों से बाहर भी या रंगहीन भी हो सकती है, ऐसी बात उनके विराट विचारक्षेत्र में दूर दूर तक नहीं थी। कभी कभी वे ज्वलंत विषयों पर आपस में बहस भी करते जैसे उगते या डूबते सूरज का रंग लाल होता है या केसरिया? उनकी तमाम बहसबाजियों के बावजूद सूरज पहले रंगीन फिर सफेद और फिर रंगीन होते अपनी यात्रायें करता रहता।
अल्पांश में ऐसे युवा भी थे जो किसी रंगविशेष में विश्वास नहीं रखते थे, दोनो हाथों से काम करते थे, सुविधा और समय को देखते किसी भी साइड चल लेते थे। ऐसे युवा घृणित कोटि में आते थे और रंगीन क्रांति के सपने देखने वाले उन्हें मनुष्य से नीचे की श्रेणी में रखते थे। ऐसे बहुमार्गियों को बेपेंदी के लोटे कहा जाता था। वैसे भी विश्वविद्यालय में इनका कोई प्रभावक्षेत्र नहीं था। विश्वविद्यालय अपने इतिहास और प्रशासनिक लालपंथी झुकाव के कारण वाममार्गियों के प्रभुत्त्व में ही रहा।
विश्वविद्यालय में एक खास बात और थी। वहाँ बीज और क्षेत्र को साथ साथ रखा जाता था। इस पर सारे पक्ष सहमत थे कि यह प्राकृतिक व्यवस्था है। दो पक्षों में मतभेद इन बातों पर था कि नियमन होना चाहिये या नहीं? बीज और क्षेत्र साथ साथ रखने के पीछे केवल नैसर्गिक भूख से मुक्ति ध्येय होना चाहिये या कुछ और? बहसें उदात्तता, संस्कृति, समाज, परिवर्तन आदि जैसे शब्दों पर पहुँच कर अनिर्णित ही समाप्त हो जाती थीं। इनका एक लाभ यह होता था कि दोनों पक्षों की शब्द सम्पदायें समृद्ध होती थीं जिनमें सभ्य गालियों की संख्या कुछ अधिक ही होती थी।
समय गुजरता रहा। विश्वविद्यालय की ख्याति बढ़ती रही और एक दिन जब यह पाया गया कि विश्व के शीर्ष शिक्षा संस्थानों की सूची में विश्वविद्यालय का नाम बहुत बहुत नीचे है तो प्रतिक्रियायें अलग अलग हुईं। वाममार्गियों ने इसे साजिश बताया और उन मानकों को ही खारिज कर दिया जिनके तहत सूची बनी थी। उनसे पूछने पर वे कहते कि ऐसी बातें ध्यान देने लायक भी नहीं होतीं। दक्षिणमार्गियों ने इसे वाममार्गी प्रभुत्त्व के कारण घटित हुआ बताया और कहा कि सपनों में जीने वाले वास्तविकता से कट चुके हैं।
ऐसे में एक दिन इस बात का खुलासा हुआ कि एक छात्रावास में नीली फिल्म बनी है जिसमें कलाकार विश्वविद्यालय के युवा ही हैं। नीली फिल्म का बनना अचानक घटित घटना नहीं थी। यह वर्षों से चली आ रही एक सबकी जानी लेकिन उपेक्षित निषिद्ध सी परम्परा का तार्किक विकास थी। फिर भी सारे पक्षों ने इस पर ऐसी प्रतिक्रियायें दीं जिनका सार चौंक, दुख, क्षोभ आदि शब्दों में समेटा जा सकता है। उन्हें नीली फिल्में देखने से परहेज़ नहीं था लेकिन परिसर में बनाये जाने से गहरा धक्का लगा था। उन लोगों ने उस फिल्म को देखा, बार बार समीक्षक निगाहों से देखा और निष्कर्ष निकाला कि गुणवत्ता की दृष्टि से फिल्म उत्तम थी। प्रोफेशनलकृति लगती थी। सारे पक्षों को दुख इस बात से नहीं हुआ कि प्रोफेशनलिज्म के पीछे एक पतनशील धारा थी बल्कि इन कारणों से हुआ:
वाममार्गी लाल फिल्म क्यों नहीं बनी? नीली फिल्म क्यों बनी?
दक्षिणमार्गी केसरिया भी तो बन सकती थी? नीली फिल्म क्यों?
बहुमार्गी फिल्म बहुरंगी क्यों नहीं बनी?
बहुमार्गी अचानक ही लाइब्रेरी में इन्द्रधनुषी रंगों के केटेलॉग ढूँढ़ने लगे। कुछ अलग किस्म के युवा बीज और क्षेत्र को साथ साथ रखे जाने की व्यवस्था को ही इसका कारण बताने लगे लेकिन उनके स्वर दबे ही रहे।
तीन दिन बीत गये और प्रशासन ने छात्रों की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने न आता देख समस्या पर सोचना शुरू किया लाल विश्वविद्यालय में नीली फिल्म? कैसे? क्यों? नीली क्रांति की बातें तो इस विश्वविद्यालय में आज तक नहीं हुईं, फिर यह कैसे हुआ?
कुलपति ने तीन प्रोफेसरों की कमेटी बिठा दी। उसे इन बातों का पता लगाना था कि विश्वविद्यालय के स्थापक स्वप्नदर्शियों के सपनों में नीले रंग का कितना प्रभाव था? उनकी लिखाई में प्रयुक्त नीले रंगों का नीली फिल्म से क्या सम्बन्ध है? ...ऐसी ही तमाम बहुत ऊँची किस्म की बातें प्रोफेसरों के जिम्मे कर दी गईं और वे उसी लाइब्रेरी में सिर खपाने लगे जिसमें इन्द्रधनुषी रंगों के केटेलॉग ढूँढ़े जा रहे थे।
कुछ दिन और बीते और सन्नाटे को देख मंत्रालय ने हस्तक्षेप का मौका उपयुक्त पाया। कुलपति को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया। अब कुलपति महोदय भी लाइब्रेरी में आने लगे।
एक बहुमार्गी छात्र से यह सब न देखा गया। उसने एक दिन हिम्मत की और कुलपति के पास जा कर बोला सर! मेरे पास आप की समस्या से निपटने की एक युक्ति है।
कुलपति ,जो कि खासे परेशान हो चुके थे, पूछ बैठे क्या है? छात्र ने उन्हें बाहर आने का इशारा किया और उन्हें उन्हीं के चैम्बर में ले गया।
सर! समस्या से निपटने की एक राह यह भी है कि उससे बड़ी समस्या खड़ी कर दो। बड़ी समस्या से निपटने के चक्कर में छोटी भुला दी जाती है या कई दफे अपने आप हल भी हो जाती है। मुझे नहीं पता कि आप नीली फिल्म को समस्या मानते हैं कि नहीं? मैं तो इसे समस्या के एक सिम्प्टम की तरह देखता हूँ। आप की समस्या मंत्रालय की नोटिस है न? आप कुछ न कीजिये। इस चैम्बर में प्रचार के साथ धूम धाम से सत्यनारायण कथा का आयोजन कराइये। घोषित उद्देश्य विश्वविद्यालय का कल्याण और परिसर में सद्भावना, शांति का प्रसार हो, धर्म का विकास हो।
कुलपति क्रुद्ध हो गये।
कहीं तुम दक्षिणमार्गी तो नहीं? इस विश्वविद्यालय में ऐसी अपसंस्कृति फैलाने का सुझाव देने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?”
मैं बहुमार्गी हूँ सर! नीली फिल्म और सत्यनारायण कथा दोनों को संस्कृति से जोड़ कर नहीं देखता। मैं बस आप की समस्या का हल बता रहा हूँ। जिस तरह से वास्तविक जीवन में कुकर्म और नकारात्मक बातें होती हैं वैसे ही सपनों में भी होती हैं। इस चैम्बर में आज तक ऐसी कथा का आयोजन नहीं हुआ होगा। इससे विश्वविद्यालय के सपनों में घुल गये नकारात्मक तत्त्वों का शमन होगा। एक बार विश्वास कर के देखिये। जानता हूँ कि आप के लिये आस्था और विश्वास बुर्जुआ प्रतिक्रांतिकारी धारणायें हैं लेकिन यह कथा उस समस्या का सृजन करेगी जिससे आप तात्कालिक समस्या से निकल जायेंगे। इस देश में सत्यनारायण कथा का आयोजन कोई अपराध नहीं है।
 मंत्रालय का बाबू नोटिस को भूल आप को भविष्य में ऐसा न करने का निर्देश टाइप करने लगेगा। दक्षिणमार्गी आप के पक्ष में आ जायेंगे। बहुमार्गी हमेशा की तरह कंफ्यूज रहेंगे। वाममार्गी और प्रगतिशील आप को गाली अवश्य देंगे लेकिन वे तात्कालिक समस्या से जुड़े विस्फोटक प्रश्न पूछना भी बन्द कर देंगे। हक़ीक़त में वे ऐसा चाहते भी हैं क्यों कि ये प्रश्न उनसे भी हैं जिनके उत्तर उन्हें स्वयं नहीं पता। ऐसे में वे कथा के मुद्दे को जोर शोर से उछालेंगे और उन्हीं के शब्दों में फासीवादी कृत्य के विरोध में राष्ट्रव्यापी प्रदर्शनों का आयोजन करेंगे प्रगतिशीलता के गढ़ में ऐसी हरकत कैसे सहन की जा सकती है? दक्षिणमार्गी आप के समर्थन में सत्यनारायण यात्राओं का आयोजन करेंगे।
देश में एक बहस सेकुलरिज्म और धार्मिकता पर चल पड़ेगी। सारे हो हल्ला के बीच में नीली फिल्म भुला दी जायेगी। उसके बाद अगर आप चाहें तो शांति पूर्वक इससे जुड़े प्रश्नों का उत्तर ढूँढ़ सकेंगे और ऐक्शन ले सकेंगे या इस समस्या को अगले कुलपति के लिये सुरक्षित कर सुख सपनों में डूब सकेंगे।
कुलपति को लगा जैसे दिमाग में हजारो सूरज उग आये हों। भाँति भाँति के रंगीन सूरज लाल, पीला, हरा, केसरिया, बैगनी ....
प्रकट में उन्हों ने धन्यवाद तक नहीं कहा, उल्टे विपरीत परिणाम होने पर गम्भीर परिणाम भुगतने की चेतावनी छात्र को दे डाली। छात्र मुस्कुरा कर रह गया।
आनन फानन में कुलपति के चैम्बर में मय घंटा, घड़ियाल, लाउडस्पीकरों के सत्यनारायण कथा का आयोजन हुआ जिसके यजमान कुलपति दम्पति बने और घोषित उद्देश्य वही रहे जैसा छात्र ने बताया था। सभी छात्रों को निमंत्रण पत्र भी भेजे गये जिन पर दढ़ियल फोटो की जगह भगवान सत्यनारायण का मुस्कुराता फुटपाथिया चित्र लगा था। सुरक्षा व्यवस्था तगड़ी थी। दक्षिणमार्गी और वाममार्गी युवा शक्ति प्रदर्शन की सोचते ही रह गये, कथा चरणामृत और प्रसाद के साथ सम्पूर्ण हुई।
उसी शाम विश्वविद्यालय परिसर में और टीवी चैनलों पर कोहराम मच गया। परिसर में सत्यनारायण कथा पोथियाँ और मेनिफेस्टो अलग अलग जगहों पर जलाये जाने लगे। समूचे देश में सेकुलरी, धार्मिक, क्रांतिकारी वगैरा वगैरा टाइप की बहसें शुरू हो गईं जिनके शोर में नीली फिल्म का संगीत पहले दबा और फिर सिम्फनी की तरह आखिरी साँस भर कर चुप हो गया।
दो गिरफ्तार युवा जेल में अगली नीली फिल्म के वेन्यू, विषय, नायिका की देह के ऐंगल, स्टोरी लाइन आदि पर गम्भीरता पूर्वक मनोमंथन करते रहे। जेलर को निर्देश था कि उन्हें जो पेन दिये जायँ उनमें नीले रंग की स्याही नहीं होनी चाहिये।
... उस साल उस बहुमार्गी छात्र को कुलपति पदकमिला। कुलपति ने काला चोगा पहन रखा था। यह संयोग ही था कि पदक जिस फीते से छात्र के गले में लटक रहा था उसमें चार रंगों की पट्टियाँ थीं। लाल, केसरिया, नीला और सफेद - लाल केसरिया पास पास।

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

गन्ने से सरसो तक सड़क पर बिकास की बास

“बड़ा अच्छा लगता होगा न तुम्हें गाँव आकर? कुछ दिन का ब्रेक। चारो ओर हरियाली। टेंसन से मुक्ति। पुरानी यादें। शायद पेड़ों को देख मुस्कुराते भी होगे।“
”हाँ, वह तो है।“
“तुम्हें साल दर साल गाँव उदास होता नही दिखता?”
“...समस्यायें तो हर जगह हैं।”
“क़्वालिटी और लेवल का फर्क है।... नहीं समझे? यूँ समझो कि तुम्हारी समस्यायें हर हाल में मुझसे बेहतर होंगी।“
गन्ने के खेत के पास वह थम गया है। छिले जाते गन्ने की गन्ध हवा पर सवार है।
“पिछले साल कठ्ठे में पन्द्रह कुंतल तक गन्ना हुआ। इस साल पाँच कुंतल भी नहीं होगा। फसल मार गई।...सोचा था इस साल केले और ओल की खेती शुरू करूँगा। अब मुल्तवी।“
“तुम कुछ अधिक ही निराश लग रहे हो... फसल तो अगले साल बेहतर हो जायेगी। लगा ही रहता है। ... मरने की नौबत तो नहीं आई न। उपजाऊ बहुफसली धरती है।“
उसके चेहरे पर विद्रूप उभर आया है।
”कह तो ऐसे रहे हो जैसे बड़के खेतिहर हो।...हमलोग मरते हुये ही जीते हैं। सोचने की बात यह है कि क़ुदरत भी हमें ऐसे ही रखना चाहती है। एक साल की अच्छी फसल की खुशी पूरी तरह खिल भी नहीं पाती कि अगले साल सब स्वाहा...“
“मेरे खेत अधिया बटाई हैं, तुम ही ले कर कराओ न। रकबा बढ़ेगा तो बरक्कत भी होगी। दूध का व्यापार क्यों नहीं शुरू कर देते?”
वह रुक गया है। हमारे कदमों के नीचे कॉंक्रीट की सड़क है।
“आइडिया तो अच्छा है... एक काम करो। मेरे खेत अधिया ले कर कराओ। डेरी खोल लो। कुछ पूँजी तो होगी ही, मशीनें भी लगा लेना।“
“मैं? मैं कैसे कर सकता हूँ? मैं तो नौकरीपेशा हूँ। छोड़ कर कैसे आ पाऊँगा?”
वह तीखा हो चला है।
“झूठ बोल रहे हो तुम! नौकरी तो एक बहाना है। असल में तुम वहाँ इसलिये हो कि वह बेहतर है – लाख गुना, नहीं तो तुम भी खेती करा रहे होते और मैं ऐसे कलप नहीं रहा होता।... यह सड़क...तुम्हीं ने कहा था न कि कम से कम तीस साल तो चलनी चाहिये। देखो पाँच साल में ही क्या हाल हो गया?... साला, जो जहाँ है वहीं लूटने पर लगा है।...मैं, मैं बी एड कर के बैठा हूँ। प्राइमरी की मास्टरी तक नहीं मिली। आखिरी उम्मीद बची है कि एक साल और बी एड वालों को प्राइमरी में लेंगे। अगले साल तो बीटीसी फिर शुरू हो जाएगी... पता है, इस बार आठ बी डी एस डॉक्टर और दस एम बी ए बीटीसी में दाखिला लिये हैं... क्लिनिक चले या न चले, घर बैठे डाक्टर साहब को बीस हजार महीना मिला करेगा, मास्टर साहब भी और डॉक्टर साहब भी। और ये एम बी ए! बेंचेंगे साबुन तेल और तनखाह उठायेंगे दोहरा....
... बेटी ग्यारहवीं में गई। जमा पूँजी कुछ नहीं। आगे क्या करेगी?...उसकी शादी भी पाँच छ: साल में करनी ही पड़ेगी। इस साल मैं भी सब बटाई पर दे कर दिल्ली जा रहा हूँ। दोस्त से बात कर लिया है। एटीम मशीन पर ड्यूटी मिल जायेगी - छ: हजार महीना।”
“तुम्हें छ: हजार कौन देगा? दे भी दिया तो उसमें तुम क्या बचा लोगे? बेवकूफी न करो। बेटी के लिये भी तुम्हारा घर रहना जरूरी है।“
“दारू पीते हो?”
“नहीं। ..क्यों?”
“मैं भी नहीं पीता, पसियाने में ठर्रा पीने और गाँजा लगाने नहीं जाता...कुछ पक गया है भीतर। मुझे शहर में शामिल होना ही है। यूँ समझो कि नशे की दरकार है।“
सरसो के खेत आ गये हैं। चहुँओर फैली पीली चादर। रस्टिक ताज़ी गन्ध। जानते हुये भी कि पॉलेन एलर्जी है, मैंने गहरी साँसें भरी हैं। शायद इसे अब ठीक से समझा सकूँ।
“लगता है अबकी सरसो गन्ने के नुकसान की भरपाई कर देगी। ...देखो तो कितनी सुन्दरता पसरी हुई है! बसंत की सुषमा।”
“कविराज! बसंत की सुध अब सिर्फ अखबारों में बची है। तुम्हारे जैसे कुछ भरपेटू सनकी शहर में भी इसे याद कर लेते हैं। ...लाही, हवा और दूजी बीमारियों से फसल बचेगी तो कुछ मिलेगा। बाँझ सुन्दरता किस काम की? गन्ने का कोई जोड़ नहीं है। हमने बहुत कोशिश की लेकिन बस ‘लेकिन’ ही हाथ लगी...ऐसा नहीं कि हम फसल देख खुश नहीं होते लेकिन तुम्हारी और हमारी खुशी में फर्क है। तुम्हारे लिये सरसो की फसल ओपेन थियेटर में किसी फिल्म की नई सुन्दर नायिका की तरह है, पैसे फेंकोगे, देखोगे, आहें भरोगे और भूल जाओगे। तुम्हारी खुशी तुम्हारी दया की तरह ही क्षणजीवी है। ...हमारे लिये फसलें बहू बेटियाँ हैं। हमसे कुछ नहीं कहतीं लेकिन उनके रुख देख हम खुश हो लेते हैं, दुखी भी हो लेते हैं। इनसे घर चलते हैं। इनका फूलना फुलाना ज़िन्दगी है, जो कि कोई नई बात नहीं। तुम्हारी तुम जानो।...” उसे जाते हुए मैं घूरे जा रहा हूँ। ऊँचा स्वस्थ कद, यह भी हार गया?
सरसो के खेत के उस पार उसकी बेटी जो गाँव के रिश्ते से मेरी भतीजी भी लगेगी, साइकिल से आती दिखी है। उसने अगर पीला दुपट्टा लगाया होता तो सरसो और फुला जाती। अकस्मात ही बगल के इकलौते अहिर के घर की बेटी का चेहरा आँखों में घिर आया है। दो साल पहले दपदप गोराई वाले चेहरे पर जड़ी बड़ी बोलती आँखें याद आई हैं, आज सुबह भी वैसी ही थीं लेकिन देह में और कुछ भी शेष नहीं। गोराई से गार कर जैसे कोई खून निचोड़ रहा है – धीरे धीरे, दो बच्चे सँभाल रही है। दूध पीते बच्चे की गन्ध, गन्ने की गन्ध, सरसो की गन्ध...एक दिन भतीजी का भी यही हाल होगा। कुछ नहीं बदला, कुछ भी नहीं।
मैंने ड्राइवर को फोन कर गाड़ी लाने को कहा है।
“धीरे धीरे चलो।“
सारी खिड़कियाँ खोल दी हैं।...
...गाड़ी नहीं यह पिंजरा है जिसमें आज़ादी है, ताजी हवा बेरोक आ जा सकती है लेकिन चलती गाड़ी से उतरने की कोशिश किये तो हाथ पाँव सलामत नहीं रहेंगे। गाड़ी रोकी भी तो जा सकती है... चलते रहो।
अकस्मात ही तीखी बदबू भर गई है। सड़क की सूरत बदल गई है लेकिन उसके किनारे अभी भी ओपेन शौचालय है और हगने वाले वैसे ही दिखते हैं जैसे बीस साल पहले दिखते थे। ... दूध पीते बच्चे की गन्ध, गन्ने की गन्ध, सरसो की गन्ध, गुह की गन्ध, गन्ध ही गन्ध... बास आ रही है।
योजना आयोग की किताबों और बाबुओं के चश्मों से नीचे उतर कर ‘डेवलपमेंट’ जब राज्य की राजधानी में पहुँचा तो ‘विकास’ हुआ और गाँव तक आते आते ‘बिकास’ हो गया जिसकी तुक बास से बैठती है। इस बास का गन्ने, सरसो, बच्चों, बहू बेटियों और किसानों से सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध की स्वाभाविकता को बदबू कहा जाता है जिसे इम्पोर्टेड परफ्यूम की गन्ध से ढक दिया जाता है।
पहले गाँव में बिकास नहीं तरक्की की बात होती थी। तरक्की माने घर खेती की तरक्की, आदमी की तरक्की, परिवार की तरक्की। उनके एजेंडा में न तो देश का विकास था और न ह्यूमन इन्डेक्स डेवलपमेंट। सोचनीय स्थिति थी। बिकास के आते ही सब बदल गया। एकाएक ही ऐसी भाषा में बात होने लगी जिसे समझना आज भी उनके लिए कठिन है। उन्हें दिखा तो बस लूट और मुफ्तखोरी का एक और अवसर, चाहे उसके लिये भले अपनी जमाँ पूजी गँवानी पड़े। परधानी के चुनाव में जाने कितने घर तबाह हुये और हुये जा रहे हैं। प्रधान के पास आता फंड वह माया है जिससे ठगे जाने को सभी लालायित हैं। तरक्की रुकी है, बिकास हो रहा है, फाइलों में डेवलपमेंट है, आँकड़ों में डेवलपमेंट है, इंडेक्स अच्छे हैं।
प्रधान जी की बहू जो कि शिक्षामित्र हैं, कभी पढ़ाने नहीं जातीं। वह बिकासग्रस्त हैं। एक अध्यापक और तीन शिक्षामित्रों वाले स्कूल में केवल एक ‘मास्टर’ सारी कक्षाओं के बच्चों को एक ही गोले में बैठा कर जाने क्या और कैसे पढ़ाता है? सुना है कि उसे बीस हजार तनखाह पाने वाले माट्साब ने दो हजार रूपये महीने पर रखा है। बिकास का यह मॉडल विश्व के इसी कोने में पाया जाता है।
फाइल में स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी है। असलियत में वे सिर्फ रोल पर दुपहर की दलिया खाने आते हैं। चश्मा चढ़ाये कम्प्यूटर के सॉफ्टवेयर से भूख में कमी नापी जा रही है और अधनंगे बच्चों के दिमाग धीमे लकवे के शिकार हो रहे हैं। पेट और दिमाग बिकासग्रस्त हैं।
कुछ हजार करोड़ नरेगा के नाम पर फेंक दिये गये हैं ताकि लाखो लाख करोड़ के घपले जस्टिफाई होते रहें। नरेगा में कच्चे पक्के काम के खर्च में दो और तीन का अनुपात फिक्स है। अब कच्चा काम रोज रोज तो हो नहीं सकता। न तो चकरोड रोज भरी जा सकती है और न नाली रोज खोदी जा सकती है। पोखरे तो एकाध ही होते हैं। लिहाजा पब्लिक कच्चे फंड से कच्ची पकी दारू के व्यवसाय का बिकास कर रही है। फी आदमी रोज 120 रूपये महँगाई के इस जमाने में भी कम नहीं होते। ठीक से लगाओ तो बिकास और आनन्द दोनों प्राप्त होते हैं।
सत्रह लाख करोड़ रूपये... काला धन जमा है जब कि मैं अपने सेविंग अकाउंट के ब्याज पर भी टैक्स देता हूँ। काले लोग तो देश में भी करोड़ो करोड़ खेल रहे हैं। डेवलपमेंट हो रहा है, इंफ्रास्ट्रक्चर मज़बूत हो रहा है, सड़कें बन रही हैं, इंडेक्स ऊपर की ओर छ्लाँगे मार रहे हैं और गाँव में लोग अब भी सड़क किनारे हग रहे हैं। नंग धड़ंग बच्चे सड़कों पर खेलते हैं, साइकिल चलाना सीखते हैं और बत्ता ताने हीरो छाप टिनहिये गँवई लौंडे गाड़ियों के आगे आराम से सड़क क्रॉस करते हैं, रोक सको तो रोक लो। पहले भी तो ऐसा ही था। शायद इसे ही बिकास कहते हैं। मैं तो इसे बकवास कहता हूँ ...
सड़क पर 3एम का इम्पोर्टेड स्पीड ब्रेकर लगा है ताकि हगने वालों, खेलने वालों और भैंस, बकरियों के साथ कोई दुर्घटना न हो। दोनों पक्षों की तरफ से यह मान लिया गया है कि गाँव वाले ऐसे ही रहते थे, हैं और रहेंगे। किसी ने स्पीड ब्रेकर के बीच से कुछ स्ट्रिप निकाल दिये हैं। क्यों? ताकि गाँव के हीरो को बाइक की स्पीड कम न करनी पड़े!
बेतहाशा स्पीड से गाँवों के सीनों पर डेवलपमेंट के कॉरीडोर बनाये जा रहे हैं ताकि उनसे होकर हाई स्पीड की कारें गुजर सकें, विदेशों में देश का नाम रोशन हो। जवान के सीने पर मांस नहीं बचा लेकिन स्पीड से वह भी लहालोट हो रहा है – बाइक ही सही। उसकी बाइक मर्सीडीज से कम नहीं। वह सड़क किनारे नहीं हगता, निपटने के लिये बाइक चलाते दूर खेतों की ओर जाता है। फसल देखने शायद ही जाय – पप्पा तो हैं ही। यही जवानी है, यही क्रांति है और यही बिकास है।
बिकास की माया। दसियों बरस पहले बने मकानों पर चूना पोत कर सूचनायें लिख दी गई हैं – फला योजना के तहत निर्मित। मंत्री का दौरा है – रातो रात बिना टंकी का शौचालय भी बन गया है। हगने हगाने की बिकास योजना। सुगना सुरती ठोंकते कह रहा है – थोड़ी शांति हो जाय तो इसे तोड़ कर ईंटों से नाद बना दूँ। मेहरारू इसमें जायेंगी तो दो हफ्तों में ही मच्छर काटने की शिकायतें करने लगेंगी। इतनी नाज़ुक हो जायेंगी कि रोपनी, छिलनी सब दुश्वार! ...इसे 'सोच का व्यावहारिक बिकास' कहते हैं।
शौचालय बन गया, दौरा हो गया, नाद भी बन जाएगा और सड़क किनारे भिनसारे वही पाँय, पोंय, पुर्र, भड़ाक – कई रंगों और आकृतियों के गन्धाते बिकास प्रतीक... IMG921-01
घर आ गया है। पहिये गुह से सने हैं। गन्ध से बौराई हवा भागती घर में घुस रही है।
“थके लग रहे हो। कहाँ चले गये थे?... गाड़ी से इतनी बदबू क्यों आ रही है?”
“पिताजी यह बदबू नहीं बिकास की गन्ध है।“
“? .... बिकास नहीं विकास।“
“नहीं, दोनों होते हैं और दोनों में अंतर भी होता है।“

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

लंठ महाचर्चा: बाउ और नेबुआ के झाँखी - 10

मेरे पात्र बैताल की तरह
चढ़ जाते हैं सिर और कंधे पर, पूछते हैं हजार सवाल।
मुझमें इतना कहाँ विक्रम जो दे सकूं जवाब
...रोज़ मेरा सिर हजार टुकड़े होता है।

भाग–1, भाग-2, भाग–3भाग-4, भाग-5, भाग-6, भाग-7, भाग-8, भाग-9   से आगे...
(झ)
भुतही रात। दिमागों में जन्म ले जुबान जुबान फुसफुसाहटें बढ़ीं और जमानों के सोये प्रेत केवल जागे ही नहीं, दौड़ पड़े। मानुख का मन जाने क्या क्या भीतर छिपाये रखता है? दो बच्चों का जन्म, एक नींबू के लिये गाँव में दो मौतें और ग़ायब खदेरन का अचानक परगट होना। इन सबके ऊपर गाँव भर के लिये संकट सँजोते रहने वाले जुग्गुल का केश नोचते विलाप। बड़े होने के बाद उसे रोते हुये पहले किसी ने नहीं देखा सुना था। जिसने भी सुना महीनों पहले रास्ते में नींबू के पौधे के पास के तंतर मंतर को याद किया। मनचोरी ने शक के तीन दरवाजे खोल दिये थे – खदेरन, जुग्गुल और नींबू। माधव तो अभी तक गायब था – वह भी लौटेगा?
दो लाशें रात भर संस्कार की प्रतीक्षा में पड़ी रहनी थीं - सबेरे क्या होने वाला था?
हर तरफ एक ही समय एक ही बात। नींबू श्मशान पर इकठ्ठे प्रेतों ने नयों का स्वागत किया और घर घर से उठती भनभनहट की लय पर धीमे धीमे झूमने लगे। सदियों पुराना अभिचार – गाँव का हर वयस्क अपने स्वर दे रहा था। एक ही बात। एक ही समय ... गुड़ेरवा निकला और धीरे धीरे सन्नाटा छा गया। सुत्ता पड़ गया।
शोक के कारण रामसनेही की पट्टी में भोजन नहीं बना और उधर थरिया भर भात खाते गिरधरिया को देख बिघना बहू का रोंआ रोंआ रो उठा। चूल्हे पर तरकारी फदकते फदकते जल गई लेकिन उसकी आँखों के आँसू मृत फेंकरनी को दुलारते रहे, खुद को धिक्कारते रहे। पछताती रही... मतवा के लिये ढेरो आशीष मन से निकले और खाली मन में डर ने घर कर लिया।
अग्निशाला में बैठी मतवा ने खदेरन से पूछा – रुउरे बिना बतवले कहाँ चलि गइल रहलीं? ... एतना ज्ञानी के भरस्ट होखे के चमइने मिललि? (आप बिना बताये कहाँ चले गये थे?... इतने ज्ञानी को भ्रष्ट होने के लिये चमाइन ही मिली?)
बाहर आ कर आकाश को निहारते हुये खदेरन ने खोये स्वर में उत्तर दिया – भ्रष्ट होना था... चमाइन क्या, बाभन क्या?... मैं स्वर्ग से लौटा हूँ, अब कभी भ्रष्ट नहीं होना ...स्वर की चिंता –आँखों में तारे सिहरे और टिमटिमाने लगे।
गोंयड़े के खेत में अकेले दिये के पास आग जला कर माई अपनी बेटी की लाश रखा रही थी। सियारों की हुआँ हुआँ बढ़ती गई। तीखापन रात को चीर उठा – खेंखरि ... खें, खें, खें ...माई की गोद में बच्चा रोने लगा। मतवा का एहसान सोच न पंडित को गाली दिया जाता था और न शरापा जाता था। उसकी पूरी देह ही रूँध गई थी।
चिंतित खदेरन धीरे धीरे पास पहुँचे। लगा जैसे चारो ओर श्मशान ही श्मशान था जिसमें जीवन का एक ही लक्षण बचा था, बस एक ही – श्याम शिशु। उसको लेकर अग्निशाला में घुसे और मतवा का दिया शहद रुई में भिगो उसके होठों पर लगा दिये। पिता की मीठी गोद मिली – बच्चा चुप हो गया, सो गया। ...लकड़ी के खम्भे का सहारा लेकर बैठे खदेरन और मतवा काल की गति तिनजोन्हिया से नापते रहे, आसमान को ताकते रहे। नींद जाने कहाँ थी? ...आखिरकार आँखों की करुआई ने पूरब की ललरौटी से बहिनापा जोड़ ही लिया...
(ञ)
सबेरे बिघना बहू को दाँत पर दाँत लग रहे थे। भोर में फराकत (शौच) से लौटते हुये उसे फेंकरनी ने दौड़ाया था – चुड़ैल के पाँव उल्टे थे। बसखरिया माई को गोहराती सनकिया उसे खरहरे से झार रही थी। अभी देह भी माटी में नहीं मिली थी लेकिन फेंकरनी चुड़ैल हो गई थी।
पंडित टोले से भी खबर थी – रामसनेही को चूना पोते हवा में उड़ते किसी ने देखा था। किसने देखा? किसी को नहीं मालूम। औरत ने देखा कि मर्द ने देखा कि लड़के ने देखा कि लड़की ने देखा? कुच्छ नहीं पता लेकिन बाबू रामसनेही सिंघ भिंसारे चमकते हुए उड़ रहे थे और उनके पैर ग़ायब थे।
जुग्गुल ने सुना और काका की मौत के बाद पहली बार मुस्कुराया – बहान्चो ..लोग के भोरे भोरे भूत परेत लउकतनें (लोगों को भोरहरे भूत प्रेत दिख रहे हैं!), लगा जैसे दिमाग पर पड़ा भारी तिरपाल हट गया हो। लाल लाल आँखें लिये चमरौटी में पहुँचा। गिरधरिया के साथ साँय फुस फुस किया और मगहिया डोम को गरियाते हुये लौटा। डोम दुआरे आ कर जल्दी जल्दी बाँस की टिखटी बनाने लगा।
ऐसे में अग्निहोत्र क्या करते, पुरोहिती का धर्म निभाने खदेरन जब रामसनेही के दुआरे पहुँचे तो सुबह सुबह हरनाचिघार(हाहाकारी रोदन) मच गया। रो रो कर एक दिन पहले सबको अचरज में डालने वाला जुग्गुल चुप रहा, बोला - एहिजा से चलि जा पंडित! अब तू चमार हो गइलss। जा के फेंकरनी के फूँकss अउर लइका खेलावss (यहाँ से चले जाओ पंडित! अब तुम चमार हो गये हो। जा कर फेंकरनी का दाह संस्कार करो और बच्चे को दुलराओ)।
...यहाँ पैदा हुआ लाल तुम्हारे सत्यानाशी ज्ञान की देन है खदेरन! देख लिये न परिणति और अनादर! ... वह चंडी चाचा के खानदान का नाश करेगा? मूर्ख हो तुम!...हाँ माँ! मैं महामूर्ख हूँ।...
बाहरी भीतरी दोनों चोटों से घायल खदेरन बैठे तक नहीं, उल्टे पाँव लौट चले। उन्हें आभास तक नहीं हुआ कि उनके पीछे जुग्गुल ने अपने मीत अँड़ुहर तेली को लगा दिया था। अँड़ुहरवा बड़हर के पेंड़ से लग कर बैठ गया जहाँ से उसे खदेरन का दुआर और गोंयड़े का खेत दोनों दिखते थे। निगरानी अच्छी तरह से हो सकती थी।
रामसनेही को फूँक कर लौटती भींड़ चुप थी लेकिन सबके मन में एक ही कोलाहल ओल्हा पाती खेल रहा था। यह देखना था कि चमरौटी वाले फेंकरनी को कैसे फूँकते हैं? जुग्गुल ने चाल चल दी थी - जाति बाहर का जाति वाले कैसे दाहा (दाह संस्कार) करेंगे? कुजतिहा का दाहा कौन करेगा?...
अँड़ुहर तेली की नज़र सामने पेंड़ से लटकते तनहा बेमौसम कटहल पर पड़ी। उसने अपने अँड़ुआ को धोती से तोपा और कटहल को घूरते वह काम करने लगा जो बहुत कम करता था – सोचने लगा। (जारी)