रविवार, 27 मार्च 2011

नवकी... घर को जाने कब से बुढ़ौना लगा है!

बालम विदेस हैं। नवकी का करे? 
इस उजाड़खंड बरमंड में ससुर खाँसते रहते हैं और सास सुनगुन सूँघती रहती हैं। घर को जाने कब से बुढ़ौना लगा है जब कि  पलंग रात को चररमरर चर पर करती है। नवकी अपनी ही करवट उठान लेती है, लजाती है और फिर बालम को कोसती है  - मुआँ एक किल्ला तक ठीक न करा पाया, अब नवकी का करे? इस चररमरर का का करे? 
नवकी किरकेट देखती है। लागा झुलनिया के धक्का बलम कलकत्ता। अरे नाहीं रे छक्का! कोई इतनी नई मेहरारू को छोड कर जाता है भला?
चौका छक्का ना रे नवकी! सब धक्का है। तोहरी झुलनिया क नाहीं रे! माया क धक्का। देखो मोबैल पर, टीवी पर तिरकिथ धिन तिरकित धिन मधुबन में राधिका, धुत्त पगली! माया नाचे रे! बालम की मुरलिया बाजे रे। थिरकित थिरकित, छनछन न न न नोट गिरे स न न न। 
कहाँ बाड़ू sss हो पतोहा? नवकी नाक सिकोड़ती है। मुसकाती है। दाँत न दिखाना, अम्मा जी कहिन। घुघ्घुट काहें तनले, रे पतोहा। पुरान जमाना गइल रे। इहाँ आव देखीं। लपर लपर। हमहूँ कहीं, ललना काहे विदेस गैल? लै लो मुँहदेखाई। वोकर त करम फूट गैल। सनीचरी जस मेहरारू। 
नवकी रोय रही। झुलनिया में कौनो धक्का नाहीं, रे सच्चो! नवकी रिमोट से खेलती है। बालम रिमोट। हींच लाव। सनेसा भेजो। टीवी पर सनेसा। अरे ई त हरदम इतर फुलेला किरीम पवडर पोत झाड़ बनारसी। ई का सनेसा दीहें। नवकी टीवी में इतर फुलेल की खुशबू भी सूँघ लेती है। मास्साब पढ़ाये रहन। एडीसन। कवनो एडीसन अब काहें न होत? टीवी से बालम चलि जाऊँ। टीवी से खुशबू सुनगुन लै लेऊँ। 
नवकी सिसकारी ले रही है। ससुर खाँस रहे हैं। सास सुनगुन ले रही है। 
मउगा चैत मेहरारू के दिमाग खराब कै दिहिन है। बुढ़िया मुसका रही है। मालिक त खँसतो मउगा। लुग्गा के कोर दाँत दबा रही है बुढ़िया। 
घर को जाने कब से बुढ़ौना लगा है...           

बुधवार, 23 मार्च 2011

नरमेध परम्परा जारी रहेगी।

सतयुग कृतयुग 
बारह वर्षों का दुर्भिक्ष 
(सतयुग में भी अकाल पड़ते थे!) 
धरा समूची त्राहि त्राहि। 


मनुष्य ठीक हों, रहें तो 
अकाल पड़ ही नहीं सकते।
सतयुग में भी यह बात सच थी 
अर्थ यह कि सतयुग में भी होते थे कुकर्मी। 


वर्षा की बूदें नहीं, 
आकाश नपुंसक हो गया। 
धरा के माथे बन्ध्या का कलंक लगा। 


जैसा अब भी होता है 
तब भी जन ने देवताओं की शरण ली 
देवजन को ठिठोली सूझी
(अब भी सूझती है) 
'कोई मनुष्य स्वेच्छा से अपनी बलि दे
दुर्भिक्ष समाप्त हो जायेगा'। 


इतिहास में नरमेध की वह पहली माँग थी 
लाखों की मृत्यु देख चुके तिल तिल मरते 
जन में से कोई आगे नहीं आया - 
जन की दृष्टि में जीवन तब भी मूल्यवान था
अब भी है 
पर देवताओं का क्या? 
उन्हें नरबलि चाहिये तो चाहिये। 


'ऐसे जीवन का मूल्य क्या 
जो तिल तिल जिये मरे 
जीते मरते देखे - 
दे दो आहुति!' 
शतमन्यु आगे आया, 
जिसने पाया था 
पहली दुग्धधार के साथ
अकाल  का प्रसाद, 
जो अब तक था अकाल में ही जिया। 
और 
बधावे बज उठे
(आज भी बजते हैं।
आत्मा के हुतात्मा हो जाने के बाद
आनन्द दुगुना हो जाता है, 
मनुष्य ने समय से यह सीख ली है।) 


गले में माला
मस्तक पर चन्दन
पूजन। 
वधिक तैयार हुआ परशु ले कर 
और 
किशोर के अन्तर से स्वर फूटे 
मौन गहन सजल प्रार्थना -
अपने लिये नहीं 
जन के लिये 
जीवन के लिये 
बन्ध्या धरा के लिये 
नपुंसक आकाश के लिये 
वनस्पतियों के लिये 
नदियों के लिये 
पशुओं के लिये - 
इतिहास में मनुष्य की नि:स्वार्थता का 
पहला प्रमाण था वह। 


और 
इन्द्र हिला
इन्द्रासन हिला
देव हिले 
देवत्त्व हिला। 
उठा बवंडर प्रलय गर्भ में ले कर 
घबराया
सहमा
लजाया अपनी ठिठोली पर 
वज्र घुमाया
इन्द्र प्रकट हुआ - 
झमाझम बूँदें। 
किशोर पहला स्नातक बना 
और 
पहली बार 
वरुण ने सँभाल लिया
ऋत का भार।   
धरा को बन्ध्यत्त्व से मिली मुक्ति 
उसने गर्भभार धारण किया।


त्रेता द्वापर बीत गये 
धर्मबुद्धि कुछ बची रही
अकाल पड़े 
पर नरमेध आयोजन नहीं हुये। 
लेकिन नि:स्वार्थ प्रार्थना के स्वर भी 
एक दिन मन्द पड़ते हैं 
काल के फेर में लोग भूलते हैं 
सो भूल गये
और 
कलिकाल में मनुष्य़ ने 
मनुष्य का शोषण प्रारम्भ किया
(उस दिन पुण्य़ समाप्त हो गये 
जिस दिन पहली बार 
एक मनुष्य के पैर पड़ीं 
दासत्त्व की बेड़ियाँ) 
अब नये ढंग और नये नियम 
मनुष्य़ को गढ़ने थे
और 
मनुष्यों में ही कुछ देवता होने लगे थे
जिनके पास था - शोषण का अमृत कुम्भ।


अकाल, प्लेग, महामारी 
सबके ऊपर शोषण भारी। 
जन कुत्तों की तरह लड़ने लगे 
जीने लगे 
चाटने लगे 
चटवाने लगे 
मनुष्य और पशु में कोई अंतर न रहा, 
चन्द देवता शासक बन बैठे। 


लाखों वर्षों पुरानी परम्परा के स्वर 
तब भी हवा में फुसफुसा रहे थे 
और कुछ उन्हें सुनने, समझने में लगे थे। 
उन्हों ने पाया 
कि देवता बहरे थे - सुन नहीं सकते थे
जन बेदम थे 
जो अपने से 
न सुनते थे, 
न कहते थे,
न चलते थे, 
बस देवताओं का कहा करते थे। 
सुन कर समझ कर 
गुन कर कि 
पुन: लाना होगा - 
श्री, विजय, भूति 
और उनके लिये 
निश्चित नीति, 
कुछ मनचलों ने धमाकों का निर्णय लिया।
(प्रार्थना सतयुग की प्रथा थी, अब नहीं चलने वाली थी)

इस बार नरमेध समर्पण नहीं, 
मारना होगा, चिल्लाना होगा 
ताकि देवता समझें कि 
आँसू होते हैं 
आँखें झपकती हैं 
उनसे आँसू बहते हैं 
जो खारे होते हैं।
सूखने पर चीर देते हैं देह 
और भर देते हैं तीखा दर्द 
जिसे अधिक समय तक 
सहा नहीं जा सकता।    


धमाके हुये 
जिनकी धमक क्या खूब गूँजी 
आज भी घमकती है। 
उनकी हत्या 
नहीं थी पहला नरमेध।
लेकिन 
मृत शरीरों से देवता पहली बार डरे थे।
नदी किनारे बोटियाँ काट काट 
एक की देह जलायी गयी 
और 
देवता अपने आसन से गिरे -
हमेशा के लिये
वे कसाई हो गये। 


जन ने समझा 
देव तो होते ही नहीं 
मनुष्य़ ही उन्हें बनाते हैं
और 
इसलिये उन्हें नष्ट भी कर सकते हैं। 


परम्परा में कलिकाल का यह योगदान 
रहेगा सुरक्षित अनंत काल तक। 
कुछ मनचलों को 
प्रेरित करता रहेगा - 
प्रार्थना को 
नि:स्वार्थता को 
पुण्य को 
बलिदान को। 
उन कायरों को भी 
जो केवल लिख सकते हैं
कुछ कर नहीं सकते। 
जो केवल सराह सकते हैं 
कराह नहीं सकते। 
   
नरमेध परम्परा जारी रहेगी।

रविवार, 20 मार्च 2011

अस्सी कवि सम्मेलन एडवांस बुकिंग के लिये सम्पर्क करें

विश्वसनीय सूत्रों से पता चला है कि होली के अवसर पर प्रति वर्ष काशी के अस्सी घाट पर होने वाले कवि सम्मेलन में श्रोतारूप में अगले साल जाने के लिए ब्लॉग जगत के कुछ लंठो ने प्रोग्राम बनाया है। एडवांस बुकिंग के लिये पुरुष ब्लॉगर (केवल अनाड़ीवादी) सम्पर्क करें (चेतावनी -  नाड़ी का नाड़ा से कोई सम्बन्ध नहीं है।) 
यह पाया गया है कि ब्लॉग जगत से कोई भी 'कवि' के रूप में क़्वालिफाई नहीं कर पाया है। क़्वालिफाई करने के लिये अंत में दी गई 'समस्या पूर्ति' हर हर महादेव! टेक के साथ करनी है।

अब तक का प्रोग्रेस: 

तिरपाल और जाजिम की बेवस्था वैज्ञानिक मुखारविन्द के जिम्मे है। तिरपाल पर पड़े चूतड़ चिह्नों के निरीक्षण से उन्हें अपने 'नायक नायिका' नख शिख वर्णन में रह गई कसर पूरी करने में मदद मिलेगी।
सचाई की शरण वाले माट्साब सौन्दर्य लहरी की परम्परा में अस्सी के योगदान पर एक विशद लेख लिखेंगे।
कवि हृदय ऋजु प्रकृति कुँवारे बालक पूरे सम्मेलन की कविताओं को लिपिबद्ध करेंगे।
चूँकि सम्मेलन अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व का है, इसलिये अंग्रेजी और जापानी भाषाओं में अनुवाद के लिये मूल रचनाओं को समझने हेतु चतुर भारतीय संत पिटासवर्ग से आयेंगे। उन्हों ने अश्लील शब्दों को निकाल कर सभ्य भाषा में उतने ही प्रभावकारी अनुवाद की बात कही है। 
उनका यह कारनामा किसी चमत्कार से कम नहीं होगा, इसलिये नाड़ा नाम विख्यात देश से ऊड़न लाल भी पधार रहे हैं। उन्हें आज कल ऐसइच उपन्यासिका लिख लिख फोकट में बाँटने का शौक चर्राया है।   
इस पर प्रथम आचार्य नाम विख्यात विवाहितादिललपकू कुमार ने कहा है कि न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी। वैसे उन्हों ने उन दिव्य कवित्तों में लोक सम्वेदना के स्वर पाये जाने की बात कही है जिनके कारण कभी भी क्रांति हो सकती है। 
पलटकुमार ने राधा और तेल के मेल का खेल देखने के लिये अभी से दालमंडी गली में कमरा ढूँढ़ लिया है। 
आलसी नाम विख्यात ने आलस तजते हुये अगुवाई की जिम्मेदारी स्वीकार की है। झूठा ज्ञान बघार कर आतंक फैलाने वाले इस शख्स ने यह सिद्ध करने की ठान ली है कि अश्लीलता ही भाषा की प्राण है।
शातिर कली ने हामी भरते हुये 'बात में वजन' की अपनी अवधारणा की प्रस्तुति का प्रोग्राम बनाया है।
यह और बात है कि वहाँ संगठन, संघटन वालों की गठन ठन ठन कर देने का बन्दोबश्त  एक भटकती आत्मा ने कर रखा है। आज कल उन्हें विश्वनाथ मन्दिर में हक्का बक्का मंत्र पढ़ते पाया जाता है। कुछ का कहना है कि असल में शकीरा का वक्का वक्का वो वो सुनने देखने के बाद से ही उनका दिमाग ठरक गया है।   
हर सफेद दीवार में श्वेत प्रदर के चिह्न तलाशने वाले व्हाइट हाउस के मालिक बम-बई से सिर्फ इसलिये पहुँचने का पिरोगराम बनाये हैं कि चिलगोंजई के ओरिजिन को तलाशा जा सके। पलटकुमार दालमंडी से रोज उनसे बातें करते हैं और लत्ता बीनने के गुन सीखते हैं।   
ग़लती से पच्छिम में पैदा हो गये दपक बाबा भी आ रहे हैं। खैनी खा खा कर उन्हें कुछ हो गया है और उनके दोस्त परबिये ने उन्हें यह झाँसा दिया है कि जब दिब्य कबित्त अवतरित होंगे तो उनकी आँच से उस कुछ की वो सिंकाई होगी कि वह कल को सर्व करने चला जायेगा। 
आली भी आ रहे हैं। उन्हें उकसाने में अपून कुस्सुल का हाथ है। आली मुखारविन्द की दोस्ती और अपून की नूर दुश्मनी में दुरभिसन्धियों को समझने के लिये पधार रहे हैं। ये बात अलग है कि इसी बहाने दोनों उनके नाड़ी ज्ञान की ऐसी तैसी करने वाले हैं। आली ने कहा है कि अगर वे हार गये तो नाड़ी ब्लॉगों पर लम्बी अज्ञानी/अगमजानी/हैरानी टाइप की बड़ी बड़ी टिप्पणियाँ करना छोड़ देंगे। 
कवि सम्मेलन से एकदम असम्बद्ध इस प्रस्ताव पर बलापाल ने एक नये ब्लॉग का शुभारंभ अगली होली के दिन से करने को कहा है। प्रथम आचार्य ने मेल कर उनसे पूछा है कि क्यों खाली पीली पादते रहते हैं? हाल लिखने तक दोनों नेट पर बज़बज़ाते हुये गुथ्थमगुत्था थे।   
बात बात में झेलाऊ कार्टून बनाने वाले काजलमार ने 'ब्लॉग क्राइम्स' में एक कार्टून स्ट्रिप अभी से छापने की बात बताई है। 
इस पर आत्ममुग्ध महजूफ कली का कहना है कि बात कुछ हजम नहीं हुई। मेरे जैसे स्मार्ट पर कार्टून क्यों नहीं बनाया जा रहा?
 परम सभ्य सैनिक उभयराजारिसि ने जलजला लिख कर उन्हें समझाया है कि तुम ऐसे ही कार्टून हो, बनाने की क्या जरूरत? दोनों ने अस्सी कवि सम्मेलन में एक दूसरे को देख लेने की धमकी दी है। 
घोषित अद्वितीय कुटिल-खल-कामी अपने नाम के तीसरे भाग को चरित्र में उतारने की सीख के लिये पधारेंगे। वैसे उन्हें सीख से नफरत है और बेफालतू फिल्मी गानों के बघार पोस्टों में देने की फितरत है। फिर भी देखी जायेगी। 
शिवज्ञान लाहाबाद से बनारस पहुँचेंगे। बनारस से शिवगंगा एक्सप्रेस पकड़ कर दिल्ली जायेंगे और दिल्ली से जयझा जैसे नमूने ब्लॉगरों को इकठ्ठा कर लायेंगे। ऐसा सिर्फ इसलिये कि शिवज्ञान के रहते किसी को भी रेल टिकट नहीं लगेगा। खुद उन्हें तो कभी लगता ही नहीं है। वे इसे गंगा जी की कृपा बताते हैं और उनका बिरोधी खेमा रैंकिंग बढ़ाने की चाल कहता है। 
कुदर्शन मिसिर ने किसी के चाल चलन पर सवाल उठाने से इनकार करते हुये कहा है कि वे कवि सम्मेलन में सिर्फ इसलिये श्रोतारूप भाग लेंगे कि कुछ और एनीमेशन के लायक कैरेक्टर मिलेंगे। उनका ब्लॉग अव्वल तो लोग पढ़ते ही नहीं, जो जाते भी हैं वे एनीमेशन के चक्कर में टिपियाना ही भूल जाते हैं। आलसी ने उन्हें एनीमेशन के बजाय असल चीज परोसने की सलाह दी है। दोनों इस मुद्दे पर भदैनी कुटी में डिछ्क्स करेंगे।     
चारशून्य टाइप पोस्टें लिखने वाले ब्लॉगर ने बड़ा वाजिब सवाल उठाया है कि सरकारी अधिकारियों द्वारा सोविधा का दुरुपयोग सिरफ भड़ैती सुनने सुनवाने के लिए क्यों किया जा रहा है? 
इस पर भाऊ बैडनिक्कर ने ऑब्जेक्शन लिया है कि इस सन्दर्भ में 'भड़ैती' शब्द का प्रयोग ग़लत है। चारशून्य टाइपो ने उनसे चुप चाप रह कर कविता सुनने लायक दिमाग विकसित करने की नसीहत दी है। उनकी एक और सिखावन 'बिना वाक्य के शब्द देह नहीं कसाईखाने की बोटियाँ हैं' को समझने की कोशिश में वे कहीं एक और पुरस्कार न झटके लें! 
सुना गया है कि इसी बात पर मलमल नन्द और कुकवि कास में जबरदस्त झगड़ा हो गयेला है। अब बैडनिक्कर उन्हें दस्त के अर्थ समझाने में लगे हैं। यह पक्का है कि कोई आये न आये ये चारो अस्सी जरूर पहुचेंगे।
बरधा के साँड़ों से घबरा कर धत्तार्थ प्रिताठी नखलौ आ धमके हैं और पुरस्कारी लाल के साथ अस्सी पहुँचने की योजना बना रहे हैं। दोनों इस गुंताड़ में लगे हैं कि कैसे वहाँ के कवियों को पुरस्कार दिया जाय? वैसे उन कवियों की हर चीज में बाँस कर देने की आदत के बारे में सुन सुन कर दोनों सहमे भी हैं। उनके निर्णय की उत्सुकता से प्रतीक्षा है। 
हैट लगा कर काला पैसा इधर उधर करने वाले बोझा से कम ही बात हो पाई है। उनका मोबाइल डिस्चार्ज है और वलिया में डॉलर न चलने कारण जनरेटर नहीं खरीद पा रहे जिससे कि मोबाइल चार्ज हो सके। फिर भी उन्हों ने पहुँचने के लिये अभी से छुट्टी का ऐप्लीकेशन लगा दिया है। जिस समय उनसे बात हुई, वह आम के पेंड़ से सेम तोड़ने के बहाने ऊँचाई से लाइन मार रहे थे। आलसी ने उन्हें समझाया है कि बबुआ इतना जल्दी न भूलो, पेंड़ हवाई जहाज नहीं कि अव्वल तो टपकोगे नहीं और अगर टपक गये तो सीधे सू sssssss। पेंड़ से टपके तो इतनी पूजा होगी कि बस्स बरफ सेंकने से ही लगी आग बुझेगी। .... 

अभी तक इतना ही। 

समस्या पूर्ति की पंक्तियाँ:

लाँड़ उठे न गाँड़ में दम 
हम बानी केसे कम? 
...........
.......... .
...........
...........

बोल जोगीरा, हर हर महादेव!
________________________________________________________________ 

नोट - इस लेख और ब्लॉग का अश्लीलता से दूर दूर तक नाता नहीं है। अश्लील या व्यक्तिपरक टिप्पणियाँ प्रकाशित नहीं की जायेंगी। कृपया अश्लील भाषा का प्रयोग न करें। लेख जैसी सभ्य भाषा का प्रयोग करें।   
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बुरा न मानो होली है। लिहो लकारा लिहो लिहो ...होली है.. हर हर महादेव! 

       

गुरुवार, 17 मार्च 2011

जोबना हमार गोल गोल अरे बकलोल!

फागुन गीतों में अभिधा, लक्षणा और व्यञ्जना तीनों शब्द शक्तियाँ मिलती हैं। हमारे गाँव के पास के एक गाँव चितामन चक (चक चिंतामणि) के रामबली मास्टर साहब फगुआ और नौटंकियों के बहाने ज्वलंत मुद्दे उठाने के लिये जाने जाते थे। बचपन में उन्हें सुना था। आज सोचा कि भोजपुरी में स्वयं प्रयास करूँ।
कुछ संकेत दे दे रहा हूँ। पहला अंतरा 'नरेगा' के भ्रष्टाचार और किसानी के चौपट होने से सम्बन्धित है। दूसरा अंतरा चौपट होती ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था से, तीसरा सत्तासीन प्रभु वर्ग द्वारा जनता को लूट कर विदेशी बैंकों में धन जमा करने से, चौथा जो कि बाकियों से दुगुना है, मनुष्य द्वारा प्रकृति के दोहन और आपदाओं (जापानी भूकम्प) से, पाँचवाँ आप समझ ही गये होंगे ;) और छ्ठा क्रिकेट में व्याप्त भ्रष्टाचार और जनता की आँखमूँदू दीवानगी से सम्बन्धित है।
'जोबना' उरूज के लिये प्रयुक्त हुआ है, 'उरोज' के लिये नहीं ;)। 'ताक न रे!' की टेक आँख खोलने की चेतावनी है। 'बकलोल' देसज शब्द है जिसका हिन्दी अर्थ देसभाषा और हिन्दी दोनों में निष्णात 'आचारज जी' ही बता पायेंगे :) मैं तो एक अदना सा विद्यार्थी हूँ। 'गोल' शब्द आकार के लिये नहीं बल्कि व्यवस्था की प्रकृति को दर्शाने के लिये प्रयुक्त हुआ है - चाहे जितना घूम लो, वापस पहुँचोगे उसी दर पर।
चित्र जहाँ से लिया है, वहाँ इसे पाकिस्तानी होली का चित्र बताया गया है। राम जाने क्या सच है? इतनी हिन्दू लड़कियाँ एक साथ इतनी उन्मुक्त होकर वहाँ होली खेल सकती हैं? पता नहीं। वहाँ इतनी बची भी हैं? फोटो प्यारा लगा, लगा दिया। आप आँख मूँद सकते हैं या बिना देखे जा सकते हैं। :) 
कुछ ईश्वरभीरु धर्मप्राण पवित्र संस्कारी जन को मेरे ब्लॉग के चित्रों से कष्ट पहुँचता है, इसके लिये उनसे क्षमा। एक पुरुष का अस्तित्त्व और पूर्णता, स्त्री के जननी, भगिनी, पुत्री, सखी,अंकिनी और पत्नी आदि सभी रूपों से है। स्त्रियाँ इस मामले में क्या सोचती हैं, मुझे नहीं पता। पता लगाने के प्रयास कर पिटने की कोई इच्छा नहीं है :) .... शुचिता और अश्लीलता दोनों के अतिरेक मुझे अप्राकृतिक और त्याज्य लगते हैं... अपनी अपनी दृष्टि है...सब केहू काकी त केकरे ओर ताकीं?... बुरा न मानो होली है! .... सर र र र sssss    
           _______________________________
जोबना हमार गोल गोल, अरे बकलोल, ताक न रे!
माया से हमरे लोग बउराइल
छूटल गरीबी अमीरी आइल
मुरगा छटके थरिया, रोटी बड़ी पनछोर
अरे बकलोल, ताक न रे!         ~1~


इसकूले के खिचड़ी में मूस मलाई
पंडीजी खाईं हरिजन जी खाईं
लइका कुल खाई लइकी कुल खाई
लाँणे के दक्खिन पढ़इया, उत्तर में पोल
अरे बकलोल, ताक न रे!        ~2~


तोहरे पसीना फसल इतराये
लूटें बहिन जी मैडम जी भाये
साहब मिलावें फोन, धन घन इटलिया शोर
अरे बकलोल, ताक न रे!        ~3~


जोबना में हमरे बहुते गरमी
लुग्गा हटावें सइयाँ बेशरमी
धधकल करेजवा जालिम, उठल लहरिया जोर
अरे बकलोल, ताक न रे!
पोछिटा खुलल जो सइयाँ जी भगलें
गरमी के डर से दुख सब जगलें
नोचे कपार बड़ि जोर, आइल जबर भुँइडोल
अरे बकलोल, ताक न रे!       ~4~
 
बड़की ईमानी बड़ी परधानी
पोसे पगड़िया सगर बैमानी
नाचें उघारे भड़ुआ, फाइल घुमे गोल गोल
अरे बकलोल, ताक न रे!       ~5~ 
 
हमरे जोबन के एगारे दीवाने
करोड़ीदेई जनता बहुते सयाने
फर्जी घुमावें बल्ला, गेना चले चोर चोर
अरे बकलोल, ताक न रे !       ~6~






आचारज जी - दुबारा :)

पूर्वी उत्तरप्रदेश में गाई जाने वाली फाग धुन पर आधारित यह भोजपुरी रचना एक पुनर्प्रस्तुति है। पछाहीं खड़ी बोली का प्रभाव भी है। यह रचना किसी दूजे के ऊपर तंज न होकर, स्वयं पर है। ब्लॉग जगत के कुछ लंठ मुझे 'आचार्य' कहने लगे हैं। 'आचार्य' ही लोक में 'आचारज' या 'अचारज' हो जाता है। 
... हाँ, पिछली बार जिन 'आचार्यों' को लक्ष्य कर यह रचना लिखी गई थी, वे स्वयं 'सारे सरदार मर गये क्या जो दूसरों पर चुटकुले सुना रहे हो' की तर्ज पर आपत्ति जतायें तो और बात है   
... टिप्पणी विकल्प खोल रहा हूँ। होली है sssss 
      



फागुन आइल आचारज जी
लागे पहेली सोझ बतियाँ आचारज जी
अरे, आचारज जी।

नेहिया ले फन्दा मदन बौराया
मदन बौराया मदन बौराया
तेल पोतलें देहियाँ आचारज जी
न खाएँ गुलगुल्ला आचारज जी
आइल फागुन लखेरा आचारज जी।

बिछली दुअरवा लगन लग घूमे
लगन लग घूमे लगन लग घूमे
ताकें हमरी रसोइया आचारज जी
न खाएँ गुलगुल्ला आचारज जी।

मकुनी औ मेवा रोटी पकवलीं
चटनी पोत बिजना परोसलीं
बरजोरी से आए आचारज जी
अरे, आचारज जी।
चटकारा ले खाएँ आचारज जी
जो देखे कोई थूकें आचारज जी।


लागल करेजा फागुन के बतियाँ
अरे भइलें अकारन चारज
हमरे अचारज जी ।
नजर बौराया नजर बौराया
अरे कहें अखियाँ अकारज
चारज भइलें अचारज जी।

 
न खाएँ गुलगुल्ला आचारज जी।

अरे आचारज जी। 


गुरुवार, 10 मार्च 2011

69-2

पिछले भाग से जारी ...
इस दृष्टि से उन्हें विपरीत या विरुद्ध न कह कर पूरक कहना अधिक उपयुक्त है। यह बात अलग है कि ऐसी दृष्टि पाने के लिये बहुत तपना पड़ता है। नैसर्गिक अधूरापन ही आकर्षण को जन्म देता है। खालीपन को प्रकृति स्वीकार नहीं पाती लेकिन अधूरेपन को सनातन बनाये रखती है ताकि यह विधान जारी रहे, सृष्टि चलती रहे और संतुलन भी बना रहे। विधान, सृष्टि और संतुलन भी कैसे? एक दूसरे पर निर्भर लेकिन फिर भी स्वतंत्र तत्त्वों की एक दूजे की परिक्रमा जैसे।
69 की बात हो और नर नारी, उनके आपसी आकर्षण और मिलन संभोग की बात न हो! – हो ही नहीं सकता। पाश्चात्य और पूर्वी कामशास्त्रों में संभोग की एक सबसे उत्तेजक और विवादास्पद मुद्रा 69 वर्णित है जिसमें स्त्री पुरुष एक साथ एक दूसरे के यौनांगों का मुख द्वारा उत्तेजन करते हैं और चरम आनन्द की प्राप्ति करते हैं।
khajuraho
69_2
  खजुराहो के मन्दिरों पर इस मुद्रा के शिल्प हैं और पश्चिमी सभ्यता के चित्रों और शिल्पों में भी यह मुद्रा पाई जाती है। पुरुष प्रधान समाज की सबसे पूर्ण कामकला विषयक कृति कामसूत्र में वात्स्यायन ऐसी संभोग मुद्रा को काकवृत्ति से जोड़ते हैं (2/9) – कौआ गन्दी चीजों पर मुँह मारता है। वह औपरिष्टक नाम से चर्चित विभिन्न मुख मैथुन मुद्राओं का प्रयोग विवाहिताओं के साथ करने से मना करते हैं।
संभोग को साधना के एक मार्ग या यज्ञ की तरह देखने की परम्परा के दर्शन प्रश्नोपनिषद, छान्दोग्य, वृहदारण्यक और वामाचारी मान्यताओं में होते हैं। वामाचार में तो इसका पूरा तंत्र ही है। वहाँ ‘प्रज्ञा’ को नारी तत्व और ‘उपाय’ को नर तत्व माना गया है। दोनों के मिलन अर्थात संभोग को ‘प्रज्ञोपाय’ कह कर उसे समाधि जैसी श्रेणी में रखा गया है। वैदिक बलि यूप का शैव मत में योनिपीठ पर विराजमान लिंग में परिवर्तन भी साधना के इस मार्ग की ओर संकेत करता है। जाग्रत लिंग को कुंडलिनी के जागरण से भी जोड़ा गया है। उल्लेखनीय है कि 69 मुद्रा में गर्भाधान हो ही नहीं सकता। अर्थ यह कि यह या तो केवल आनन्द प्राप्ति के लिये है या केवल साधना के लिये। ऐसी और मुद्रायें भी हो सकती हैं लेकिन उनमें ऐसी बराबरी नहीं होती। पूरक तत्वों के एक दूसरे को उठान देने की प्रवृत्ति पर सोचने पर इस मुद्रा का साधना पक्ष ही अधिक प्रबल लगता है। यिन और यांग का उन्मुक्त, प्रगाढ़ और पूर्णत: वर्जनाहीन संयोग – अस्तित्त्व बनाये रखते हुये भी सर्वस्व निछावर कर देने की साधना। शारीरिक दृष्टि से भी सबसे प्रकट और सबसे गुह्य अंगों का संयोग, आलोड़न, विलोड़न। प्रतीत होता है कि ऐसी मुद्रायें कभी रहे मातृप्रधान समाज की ध्वंसावशेष हैं। विलुप्त हो चुके उस समाज की प्रवृत्तियों ने वज्रयान, तंत्र, वामाचार आदि मार्गों में पैठ बना ली। हाँ, रूप अवश्य बहुत परिवर्तित हो गया होगा।
आप को लग रहा होगा कि अचानक 69 पर लिखने की मुझे क्यों सूझी? बेटा क्रिकेट का नया नया फैन हुआ है और उसके चक्कर में अभी जारी विश्वकप के रिक्शाखींचू उद्घाटन समारोह को मुझे देखना पड़ा। संतान जो न कराये वरना क्रिकेट से घृणा करने वालों में मैं भी सम्मिलित हूँ। उस समारोह में प्रसिद्ध रॉक गायक ब्रायन एडम्स ने अपना एक बहुत प्रसिद्ध गीत Summer of 69 प्रस्तुत किया। ‘69 की गर्मी’ ने 69 अंक के भूले बिसरे संयोगों की याद दिला दी। उत्सुकता हुई कि इस गीत का 69 है क्या बला जो यह इतना मशहूर हुआ? कोफ्त भी हुई कि मैंने आज तक इसे सुना क्यों नहीं? रॉक संगीत के शब्द पल्ले नहीं पड़ते सो शब्दों के लिये नेट खँगालना पड़ा। पता चला कि ब्रायन एडम्स और जिम वल्लांसे द्वारा लिखा यह गीत ‘रेकलेस’ अलबम में 1985 में रिलीज हुआ था। अपन राम उस समय बज्र भोजपुरी इलाके में इश्क़ के शुरुआती पाठ पढ़ रहे थे – खाक पता चलता! गीत को पढ़ा तो लग गया कि दोनों लिखने वाले बला के लंठ हैं।
अभी सोच ही रहा था कि दो दिनों पहले बारह वर्षों के बाद एक मित्र ने मुझे फेसबुक पर ढूँढ़ निकाला। बेचारा मनु आज तक फेसबुक पर ऊर्मि को नहीं ढूँढ़ पाया है। बागी बलिया के निवासी यह मित्र फाइनाइट एलीमेंट एनलिसिस के जटिल सबरूटीन एक ही बार में कॉपी पर लिख देते थे जिन्हें रन कराते त्रुटि सन्देश भी नहीं आते थे! कमरा नं. एस-69 में आलसी राम निवास करते थे और उसी विंग की सत्तरी शृंखलानामधारी किसी कमरे में यह महाशय।
...  69 पर लिखना अपरिहार्य हो गया।
’69 की गर्मी’ पर वापस आते हैं। इस गीत में दो पर्ते हैं जिनकी चर्चा अपने कवितायें और कवि भी ब्लॉग पर इस शृंखला की समापन कड़ी के रूप में करूँगा। चलते चलते बस एक बात – जिस तरह से अकेली कहानी जैसी कोई बात नहीं होती वैसे ही किसी कविता या गीत का कोई अकेला अर्थ नहीं होता ... अब सात दिनों के लिये आलसी राम को विदा दीजिये।

बुधवार, 9 मार्च 2011

69 -1

संयोग जीवन के अनिवार्य अंग हैं। हम सबका इनसे पाला पड़ता है। संयोग किसी भी रूप में घट सकते हैं। आप को अन्धविश्वासी बना सकते हैं, विश्वासी बना सकते हैं, कौतुहल से भरे बचपन को पुन: पुन: आप के भीतर जगा कर जीवनपर्यंत खिलन्दड़ बनाये रख सकते हैं। यह इस पर निर्भर है कि आप कितने सम्वेदनशील हैं और जीवन को गम्भीरता और हल्केपन के मिश्रण के रूप में कितना देख पाते हैं।
मेरे जीवन में 69 अंक का संयोग निर्माणकाल के दौरान बना रहा। इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा के अनुक्रमांक से प्रारम्भ हुआ यह संयोग सेवायोजन के आखिरी चरण में एक साथी के इनकार और बाद में उसके त्यागपत्र तक बना रहा। जाने वह कहाँ है? आज भी यह जानने की उत्सुकता है कि मेरे भाग्यांक    को जानते हुये भी काटने वाला आज किस स्थिति में है? मैं इसे बचपना नहीं बचपन मानता हूँ जो अभी भी मेरे भीतर जीवित है। अंकों के साथ खिलवाड़ और उनसे जुड़े संयोगों से आँखमिचौनी की मेरी प्रवृत्ति दिन ब दिन बढ़ती रही है। मजे की बात यह है कि न तो मुझे अंकज्योतिष में विश्वास है और न उससे जुड़ी तमाम शाखाओं पर ‘शाखा ते शाखा पर जाहीं’ जैसी कोई खिलन्दड़ प्रवृत्ति है।
47 कड़ियों में भी अधूरे रह गये प्रेमपत्र पिनकोड 273010 में अंक संयोगों की छाया अंत तक दिखती रहेगी। अंक को गिनती से जुड़ा ही समझें, कुछ और नहीं । इसे लिखते हुये भी संयोगों से पाला पड़ता रहा है। सबसे नये वाले का तो पता अभी हाल में चला – मैं दंग रह गया। सम्बन्धित व्यक्ति को बताया भी और साथ ही दु:खी भी हुआ। फिर यह सोच कर स्वयं को बहला लिया कि संयोग घटते ही रहते हैं और एक अकेली कहानी जैसी कोई बात नहीं होती।
गणितीय दृष्टि से 69 एक अर्द्ध अभाज्य अंक है। यह विभाजित तो होता है लेकिन अभाज्य संख्याओं से। विभाजन का यह स्वभाव अकड़ और झुकाव के सामंजस्य को दर्शाता है। यह बात तो आप ने सुनी ही होगी - इतने न झुको कि दूसरे तुम्हें गलीचों की तरह रौदें और इतने अकड़ू भी न बनो कि टूट जाओ!
यह संयोग ही है कि धनु राशि में पाया जाने वाला आकाशीय तारक समूह एम-69 clip_image002हमारी आकाशगंगा के घूर्णन केन्द्र के बहुत निकट है। अब इसका नाम एम-46 भी हो सकता था लेकिन संयोग तो संयोग है। यह माना जाता है कि आकाशगंगा के घूर्णन केन्द्र में एक अति विशाल ब्लैक होल है। संतुलन के लिये घूमना आवश्यक है और घूमने के लिये एक शक्तिशाली केन्द्र। clip_image004ऐसा हमारे जीवन में भी है। हमारे मस्तिष्क में भी चेतना का एक अतिशक्तिशाली केन्द्र है और हम सारा जीवन उसके इर्द गिर्द घूमते रहते हैं। हमारे जीवन की गुणवत्ता उस केन्द्र की शक्ति पर निर्भर है। ऐसा सब के साथ है केवल धनुराशि वालों के साथ नहीं  
69 घूर्णन सममिति, प्राकृतिक संतुलन और विरुद्धों के सामंजस्य का प्रतीक है। प्रतीक तो प्रतीक होते हैं और यह बस संयोग है कि अंतर्राष्ट्रीय भारतीय लिपि (अज्ञानता के कारण लोग अरेबिक स्क्रिप्ट भी कहते हैं) में यह अंक ऐसा दिखता है कि इसे इन सबसे जोड़ा जा सके अन्यथा देवनागरी लिपि का उनहत्तर इनका प्रतीक नहीं बन सकता। 

ताओवाद में प्रयुक्त दो विरुद्ध शक्तियों के प्रतीक ताइजीतू में भी इस अंक की छटा दिखती है। प्रकृति में परस्पर विरुद्ध प्रतीत होती दो शक्तियों यिन यांग के आपसी जुड़ाव, पारस्परिक निर्भरता और एक दूसरे को उठान देने के स्वभाव को दर्शाता यह प्रतीक अरस्तू के स्वर्णिम माध्य, कंफ्यूसस के मध्यमान मत,बौद्धों के मज्झिम मार्ग और सनातनी योग के संतुलन मार्ग से भी जुड़ता है। विपरीत शक्तियाँ एक दूसरे के सापेक्ष ही अस्तित्त्व में होती हैं। [क्रमश:]
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इस आलेख के लिये कुछ सामग्री वीकीपीडिया से ली गई है, लेखक आभारी है।

बुधवार, 2 मार्च 2011

हे देश शंकर! [पुनर्प्रस्तुति]


चित्र - सम्बन्धित इंटरनेट साइटों से साभार; 
मिश्रण, सम्पादन - सुपुत्री अलका द्वारा 
हे देश शंकर! 
फागुन माह होलिका, भूत भयंकर -
प्रज्ज्वलित, हों भस्म कुराग दूषण अरि सर -
मल खल दल बल। पोत भभूत बम बम हर हर।
हे देश शंकर!
स्वर्ण कपूत सज कर 
कर रहे अनर्थ, कार्यस्थल, पथ घर बिस्तर पर ।
लो लूट भ्रष्ट पुर, सजे दहन हर, हर चौराहे वीथि पर 
जगे जोगीरा सरर सरर, हर गले कह कह गाली से रुचिकर।
हे देश शंकर!
हर हर बह रहा रुधिर 
है प्रगति क्षुधित बेकल हर गाँव शहर। 
खोल हिमालय जटा जूट, जूँ पीते शोणित त्रस्त प्रकर 
तांडव हुहकार, रँग उमंग धार, बह चले सुमति गंगा निर्झर। 
हे देश शंकर!
पाक चीन उद्धत बर्बर 
चीर देह शोणित भर खप्पर नृत्य प्रखर। 
डमरू डम घोष गहन, हिल उठें दुर्ग अरि, छल कट्टर
शक्ति मिलन त्रिनेत्र दृष्टि, आतंक धाम हों भस्म भूत, ढाह कहर। 
हे देश शंकर!

मंगलवार, 1 मार्च 2011

लंठ महाचर्चा: बाउ और नेबुआ के झाँखी - 11


मेरे पात्र बैताल की तरह
चढ़ जाते हैं सिर और कंधे पर, पूछते हैं हजार सवाल।
मुझमें इतना कहाँ विक्रम जो दे सकूं जवाब
...रोज़ मेरा सिर हजार टुकड़े होता है। 


भाग–1भाग-2भाग–3,  भाग-4भाग-5भाग-6भाग-7भाग-8भाग-9, भाग-10   से आगे...
(ञ)
खदेरन के मन में आग लगी थी। खेत की फसल कोई और काट ले गया और उनके हिस्से आई लेंगियावन1 की आग। चहुँ ओर उठती लपटें। किनारे की लपटें बीच को बढ़ती हुई। यह अंत है?
प्रश्न नहीं मूर्ख! अग्निसंस्कार की सोच।...उनका क्या जो अभी भी भोगे जा रही हैं? एक जीवित अंकशायिनी घर में और दूसरी मृत बाहर खेत में... पंडित हो! तोहरे आस...अगर चमटोली से कोई दाहा करने को तैयार नहीं हुआ तो?
बाहर का सन्नाटा भीतर पैसता चला गया। जुग्गुल वाणी उससे टकरा टकरा गूँजने लगी ... तू चमार हो गइलss। जा के फेंकरनी के फूँकss... तिजहर हो चुकी थी। माटी खराब होने का डर - कल सबेरे तक दाहा नहीं हुआ तो गन्हाने लगेगी। खदेरन सिर पकड़ कर दुआरे बैठ गये। लाठी ठेकता मगहिया डोम आ पहुँचा। हाथ जोड़ कर बोला – महराज, आपन फरज नेभावे अइलीं हें। के बड़ के छोट, अंत बजरिया बँसवे जा। कहीं तss बिमान बना दीं? (महाराज! अपना फर्ज़ निभाने आया हूँ। बड़ा हो या छोटा, अंत समय सब को बाँस का ही सहारा मिलता है। कहिये तो विमान बना दूँ?)  
खदेरन मुँहगड़ी तन्द्रा से बाहर आये और उनके इशारे के बाद मगहिया बाँस काटने चल दिया।
फर्ज़, पंडित! तुम्हारा फर्ज़ क्या है?...किस संयोग मरी फेंकरनी! ...यही समय मिला था? जीती तो शायद मेरा जीना और मुहाल हो जाता। तुमसे क्या था? प्रेम? तुमने उसका इस्तेमाल किया और क्या हुआ उसका?...तुमने तो उसका नाश ही कर दिया! ...अभी और भ्रष्ट होना बाकी है... खदेरन की आँखें भरती चली गईं।
डोम टिखटी बना कर कुछ देर खड़ा रहा और फिर चुपचाप चला गया।
अग्निहोत्र? सूतक में अग्निहोत्र?... फेंकरनी के मरने पर सूतक कैसा? क्या लगती थी वह तुम्हारी? अंकशायिनी कि परिणीता कि दोनों? ... सन्न खदेरन दिशा निहारते शब्द ढूँढ़ने लगे लेकिन जुग्गुल वाणी के सिवाय कुछ नहीं था, कुछ भी नहीं... अग्निहोत्र के मंत्र खो गये। शिक्षा, संस्कार, वर्ण अभिमान सब एक मृत चमइन में सिमट गये थे।    
माँ की याद आई ...घबराओ नहीं, देवी कामाख्या की धरती का पुण्य खाली नहीं जायेगा। अपने जीवनकाल में ही समाहार देखोगे...। कितने पुण्य करूँ माँ? मेरे समझाने से तो चमटोली वाले इसे फूँकने से रहे, लेकिन एक बार कोशिश तो करनी ही होगी। साँस भरते उठे और चमटोली की ओर चल दिये।
ह,ह,ह, हि, हीsss थूकते हुये गिरधरिया हँस पड़ा।
“चमइन रखले बानींsss त फूँकी के? कुजतिहा के फेरा में अब रउरो लम्मर लागी बाबा! (चमाइन को रखे तो उसे फूँकेगा कौन? बाबा! कुजात के फेरे में अब आप का भी नम्बर लगेगा)” जो दो चार लोग पहले से उसे समझाने में लगे थे वह भी चुप हो गये। मन का चोर – फेंकरनी की औलाद खदेरन की भी तो हो सकती है! पापी बाभन! भुगतो अब...
खदेरन के पाँव अकेले नहीं थे। उनके साथ थे - निन्दा, उपहास,चुनौती, जुग्गुल के जोग और अन्धे चंडी चाचा की सम्भावित चालें।
झाँखी झूरा में मच्छर पीड़ित हुमचावन ने खदेरन को धीरे धीरे आते देखा। दिन का काम खत्म हो गया था। वह उन लोगों में था जिन्हें अपनी भावनाओं की रत्ती भर भी समझ नहीं होती लेकिन जुग्गुल के पास सूचना पहुँचाने जाते हुये उसने भी मन के भारीपन को महसूस किया। चलते हुये उसे अपना अँड़ुआ कुछ अधिक ही कष्टदायी लग रहा था। जुग्गुल को पहले से ही खबर हो गई थी। बात बात में ही हुमचावन ने बेमौसम कटहल फलने की बात उसे बतायी तो वह मुस्कुराने लगा – देखीं त ओकर तरकारी कइसन होला (देखें तो सही, उसकी सब्जी कैसी बनेगी)?
घर जाते हुये हुमचावन नींबू की बाड़ के पास रुक गया। उसे ध्यान आया कि बाड़ के अन्दर उसके कोले का भी एक नींबू लगा हुआ था। हुमचावन को पहली बार जगह भयानक लगी। सहमा सा अपनी मड़ई की ओर चल दिया।
(ट)
गोंयड़े के खेत में लाश के पास पत्थर प्रतिमा बैठी थी –शांत माई। दिन भर हिली तक नहीं थी। भूख, प्यास, दिसा मैदान कुछ नहीं। बेटी की मौत का दु:ख घना था या उसकी माटी के ठिकाने लगने की चिंता? नहीं कुछ और - मौत के बहुत नजदीक। भभक कर बुझने जैसी नहीं, महिया2 के ठंढी होने जैसी।  शीत सन्नाटा, अन्धकार।
मतवा वहाँ ढेबरी रख आईं। पिछ्ली रात के भस्मचिह्न पर दुबारा आग जलाते करेजा मुँह को आ रहा था – माई से बोलना क्या, उसकी ओर देखने की भी हिम्मत नहीं हुई। वह अग्निशाला में नींद में डूबे शिशु के पास लौट आईं। ममता अपने उफान पर थी। रात।
बहुत देर से जमीन पर धोती के मैली होने की चिंता किये बिना बैठे खदेरन को देख अग्निशाला की ओर इशारा कर बोल पड़ीं – जौन भइल तौन भइल। अब इनकर फिकिर करीं। एतना सोच में परि के का होई। ...बिहाने खुदे फूँकि देब। खेतवे में।(जो हुआ सो हुआ। अब बच्चे की फिक्र कीजिये। इतनी सोच में पड़ने से क्या होगा?...सबेरे स्वयं दाहसंस्कार कर दीजियेगा। खेत में ही।)  
भीतर ही भीतर भभक उठे खदेरन - सही तो कह रही है। जिस गाँव समाज में मनुष्य की मृत देह ठिकाने लगाने तक की सदाशयता नहीं, उसकी परवाह क्यों करना? सीवान3 के भीतर दाहा नहीं किया जाता लेकिन यह गाँव किस श्मशान से कम है?...
टाँग खींचते हुये चँवर में फेंक भी आया जा सकता है, वहीं दफनाया जा सकता है...नहीं! नहीं!!...नहीं!!!!
सन्नाटे से टकराती प्रतिध्वनियाँ झोंके सी आने लगीं। नहीं, अग्निहोत्री ब्राह्मण अभी जीवित है...मैं स्वर्ग से लौटा हूँ, अब कभी भ्रष्ट नहीं होना... वामाचारी रक्त अभिषेक - वह शूद्रा परिणीता थी। उसका अग्नि संस्कार होगा, अवश्य होगा।
क्षितिज पर चन्द्रमा ने उग कर रात गहराने का संकेत किया। सियारों की हुआँ हुआँ तेज हो गई थी। अग्निशाला में सोये शिशु की मुस्कान अगर खदेरन देख पाये होते तो माँ के ललाट पर लाल गोले को याद करते हुये उन्हें  कोस नहीं रहे होते...
...सबेरे का गोला अभी निकला भी नहीं था लेकिन बस्साती फेंकरनी के नंगे घूमने की बात कई जुबानों पर थी। इस बार यह पक्का पता था कि उसे जुग्गुल ने देखा था। इन सबसे बेखबर खदेरन अग्निहोत्र और चूल्हे के लिये रखी गई लकड़ियों के बोटे छाँटने में लगे थे। मतवा ने कुंड को कुरेदा, आग जीवित थी। (जारी)
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1 गन्ने की फसल कट जाने के बाद उसके सूखे पत्तों को खेत में बिखेर कर चारो किनारों से आग लगाने की क्रिया।
2 गुड़ बनाने के लिये गन्ने के रस को औंटा(आग पर खौलाया) जाता है। गर्म गाढ़ा रस महिया कहलाता है।
3 गाँव बस्ती की सीमा