रविवार, 12 फ़रवरी 2012

लोक : भोजपुरी - 2 : कवने ठगवा - वसुन्धरा और कुमार गन्धर्व : एक गली स्मृति की

(1) लोक : भोजपुरी - 1: साहेब राउर भेदवा


भोजपुरी शृंखला में आज एक प्रसिद्ध निरगुन। रचयिता एक बार पुन: कबीर और गायकद्वय कुमार गन्धर्व और वसुन्धरा। मेरा प्रयास अनजान जन द्वारा गाये और आम जन जीवन में घुले गीतों को प्रस्तुत करने का रहेगा। यू ट्यूब आदि पर जो कुछ पहले से उपलब्ध है उसे भरसक नहीं दुहराऊँगा लेकिन यह गीत मेरे लिये बहुत ही खास है।

आकाशवाणी गोरखपुर की प्रात: वन्दना में इसे पहली बार सुना था। घर में रेडियो था और हमलोग उसके वन्देमातरम से जगते थे। जाड़े के दिन थे। पिताजी की गोद में रजाई में दुबका था और तभी यह गीत बजना शुरू हुआ। दुलराते (इंटरमीडिएट में पढ़ते पुत्र को भी दुलराया जा सकता है! और वह पिता के पास सोने की ज़िद भी कर सकता है!!) पिताजी एकदम शांत हो गये और मैं भी। “कवने ठगवा नगरिया लूटल हो!” – लगा जैसे भीतर वैराग और पवित्रता की धारायें बहने लगी हों। गीत समाप्त होने पर पिताजी ने कहा – कुछ होता जिससे इसे रोज सुन पाते (हमारे घर में ग्रामोफोन या टेपरिकॉर्डर नहीं थे)। उन्हों ने उसी दिन भिनसहरी गायन की परम्परा बताई। कुछ था उस निरगुन में, उन स्वरों में, गायन में जो मनप्रस्तर पर अमिट अंकित हो गया। पता किया तो बस यही जाना कि शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में कुमार गन्धर्व बहुत बड़ा नाम है।

उसी दिन से मैं शास्त्रीय, उपशास्त्रीय और शाम को आकाशवाणी से ही प्रसारित जुगानी भाई द्वारा प्रस्तुत गाँव देहात भोजपुरी प्रोग्राम में सुनाये जाने वाले लोकगीतों में सुरों को ढूँढ़ने लगा। एक ऐसी यात्रा का प्रारम्भ हुआ जिसने मुझे लोक, शास्त्रीय, पश्चिमी, रॉक, डिस्को, ओपेरा, सूफी, कंट्री, जोगी और जाने किन किन संगीत धाराओं में अब तक नहाने का सुख दिया है जब कि संगीत का स भी मुझे नहीं आता। बाद में अम्मा से जाना कि जब मैं गर्भ में था तब गाँव की हर शाम लोकगीतों की होती थी – कीर्तन, फगुआ, चैती, निरगुन, कजरी, सोरठी, आल्हा आदि आदि और अम्मा ओसारे में बैठी सुनती रहती थीं। कुमार गन्धर्व ने सुप्त संस्कारों को जगा दिया!
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आकाशवाणी केन्द्रों में जाने कितने ही लोकगायकों के लोकगीत तालों में बन्द हैं। कितने ही एल पी रिकॉर्ड नष्ट हो गये/हो रहे हैं। आवश्यकता है कि उन्हें लोकहित में आम कर दिया जाय। कोई सरकारी बाबू सुन रहा है?
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गोरखपुर इंजीनियरिंग करने गया तो खोज शुरू हुई। गोलघर में गीतांजलि म्यूजिक स्टोर को एक सिख परिवार चलाता है। स्टोर काफी समृद्ध है। मैं वहाँ पहुँचा और सहमते हुये फरमाइश कर दी। सरदार जी ने मुझे अजीब नज़रों से देखा और फिर से पूछा जैसे विश्वास न हुआ हो। मुझे आश्चर्य हुआ जब उन्हों ने एच एम वी के चार कैसेटों का डीलक्स संस्करण अलबम सामने लाकर रख दिया। तीन कैसेट तो शुद्ध शास्त्रीय थे लेकिन चौथे में त्रिवेणी नाम से ‘सूर, मीरा और कबीर’ की रचनायें संग्रहीत थीं – एक से बढ़ कर एक जैसे ‘सखी मोरि नींद नसानी हो’, ‘नीरभय नीरगुन’। दाम देखकर पाँव तले धरती खिसक गई (सम्भवत: तीन सौ रुपये, तब छ: सौ में महीने भर का खर्च चल जाता था!) । एक कैसेट लायक मुद्रा पास में थी और उसे खर्चा भी जा सकता था। मुझे पूरा विश्वास था कि एक वह कैसेट दिखाने पर पिताजी टेपरिकॉर्डर खरीद देंगे। डरते डरते सरदार जी से पूछा कि क्या वह केवल एक कैसेट देंगे? उन्हों ने उपेक्षा से मुँह बिचका कर उत्तर दिया – यही तो समस्या है। बाकी तीन कौन लेगा? वह अलबम वापस ले दूसरे ग्राहकों की ओर मुड़ गये। 
निराश मैं इन्दिरा गार्डेन, सिनेमा रोड और जाने कहाँ कहाँ घूम आया। जो चाहिये वह सामने था और मैं...!  साहस कर पुन: पहुँचा और इस बार अपने समवयस्क लड़के से जो सरदार जी का पोता था, पूछ बैठा। उसने भी अलबम सामने लाकर रख दिया। मैंने केवल एक कैसेट लेने की इच्छा जताई तो उसने भी वही उत्तर दिया। मैंने प्रस्ताव रखा – आप अभी केवल एक कैसेट दे दें। वादा करता हूँ कि एक एक कर बाकी तीनों भी ले जाऊँगा। जाने समआयु का असर था या मेरी कातरता का, लड़के ने यह कहते हुये कि किनारे रख रहा हूँ, जल्दी ले जाना और दुकान पर सिर्फ मुझसे माँगना; वह कैसेट मुझे दे दिया। अगले रविवार कैसेट पिताजी के सामने था और उसके अगले रविवार हमारे घर में पहला कैसेट रिकॉर्डर आया जिस पर बाद में मैंने घुमंतू जोगी का गाया एक गीत बैटरी लगा कर रिकॉर्ड किया। 

अगले दो महीनों में मैंने बाकी तीन कैसेट भी खरीद लिये और आज तक उस निर्णय पर नाज करता हूँ। उस लड़के से चलती फिरती मित्रता हो गई, इतनी कि बैजू बावरा के एक गीत में मामूली सी गड़बड़ी की मेरी शिकायत पर उसने पूरा लॉट ही वापस कर दिया। कॉलेज से निकल जाने के कई वर्षों बाद एक दिन गोरखपुर गया तो सहज उत्सुकता से लड़के से मिलने (हमदोनों एक दूसरे का नाम तक नहीं जानते थे) गया। डबडबायी आँखों से सरदार जी ने सड़क दुर्घटना में उसकी मृत्यु की बात बताई ... लौट कर बहुत देर तक मैं चुप इन्दिरा गार्डेन में बैठा रहा। उसके बाद दुबारा वहाँ जाने का साहस आज तक नहीं कर पाया ....
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कबीर की बानी का क्षेत्र पश्चिम में दूर पंजाब तक है। गुरुग्रंथसाहब में भी उनकी बानी दर्ज है। दक्षिणवासी कुमार—वसुन्धरा के स्वरों में अंत में ‘-ल हो’, ‘लयो’ और 'लओ' तीनों ध्वनित हैं लेकिन वह भोजपुरी ‘-ल हो’ ही है। वैसे भी कबीर को क्या बाँधना? एक पंक्ति में कहते हैं ‘आये जमराज पलंग चढ़ि बैठा’(व्याकरण की दृष्टि से देखें तो बिगड़ी पश्चिमी भाषा) और तुरंत दूसरी पंक्ति में कहते हैं ‘नयनन अँसुआ टूटल हो’ – ‘नयनन अँसुआ’ पर पुराने हिन्दुस्तानी का प्रभाव है तो ‘–ल’ से अंत होने वाली क्रिया विशुद्ध भोजपुरी। ‘चार जने मिलि’ भोजपुरी है तो ‘खाट उठाइन’ अवधी(?)। ‘चहुँदिसि’ ब्रजावधी है तो ‘धुमधुम’ ध्वनि भोजपुरी की। भाखा बहता नीर और सधुक्कड़ी के पर्याय कबीर किसी व्याकरण में नहीं बँधते लेकिन लोक में ‘कहत कबीर सुनो भइ साधो’ की टेक वाली रचनायें भोजपुरी की हैं जिनमें सधुक्कड़ी की चलती भाखा घुलमिल गई है। फक्कड़ी घुमंतू जोगियों के स्वरों ने उन्हें संस्कारित किया है।
  
इस निरगुन को कुमार गन्धर्व ने अपनी धर्मपत्नी वसुन्धरा के साथ गाया है। कुमार गन्धर्व उन गायकों में थे जिन्हों ने शास्त्रीय संगीत का उत्स लोक से ही माना और शास्त्रीयता को लोक के ऊपर कभी चढ़ने नहीं दिया। लोक प्रभाव और मस्त उन्मुक्तता के कारण उनके गायन की बहुत आलोचनायें भी हुईं लेकिन कुमार तो कुमार! हम इसक मस्ताना, हमको दुनियादारी क्या! एक मस्ताने कबीर और दूजे ‘नीऽरभय नीऽरगुन’ कुमार। सुनिये ये दोनों जब मिलते हैं तो कैसा दिव्य सर्जित होता है: 
कवने ठगवा नगरिया लूटल हो
चन्दन काठ के बनल खटोला, तापर दुलहिन सूतल हो।
उठ्ठो सखी री माँग सँवारो, दुलहा मोसे रूठल हो
आये जमराज पलंग चढ़ि बैठा, नयनन अँसुआ टूटल हो।
चार जने मिलि खाट उठाइन, चहुँ दिसि धुमधुम ऊठल हो
कहत कबीरा सुनो भइ साधो, जग से नाता छूटल हो।

  KawaneThagwaNagariya
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अगले अंक में : घुमंतू जोगी -जइसे धधकेले हो गोपीचन्द! लोहरा घरे लोहसाई

12 टिप्‍पणियां:

  1. पढ़ने के बाद स्मृति-आलाप कर रहा हूं। शब्द नहीं है....

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  2. मार्मिक संस्मरण..बेहतरीन आलेख। ऐसी आलेख भोजपुरी क्षेत्र के हिंदी कवियों को भी प्रेरित करेंगे और भोजपुरी का कुछ भला होगा इसमें तनिक भी संदेह नहीं।...अभी तो आभार ही स्वीकारें।

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  3. शनिवार की सुबह साढ़े पांच बजे ऐसे संगीतमय कार्यक्रम दूरदर्शन चैनल पर आते हैं। पिछले महीने ही सुबह सुबह इसी गीत को पूरी तान और लय के साथ गाता देख मन हिलोर उठा था। ब्लैक एण्ड वाइट में ही थी रिकार्डिंग। दूरदर्शन को वाकई अपने ऐसे कार्यक्रमों को बाहर मार्केट में लाकर बेचना चाहिये। लोग हाथों हाथ लेंगे।

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  4. भोजपुरी श्रृंखला की दोनों पोस्टें पढ़ें -आँखें महज भर ही नहीं आयीं बकायदा अश्रुपात भी जारी है ....मन न जाने कैसा उभ चुभ कर रहा -बचो गिरिजेश, ऐसी संवेदना घातक है !

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  5. "कौन ठगवा" और उसके अलावा भी कुमार गन्धर्व को इतना सुना है कि क्या कहूँ, और कबीर, वे तो लगता है जैसे बरसों से साथ ही चल रहे हों। लेकिन उस सिख किशोर का किस्सा आज ही सुना ...

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  6. कबीर की कविताएँ बिना किसी व्याकरण की हद के साथ फैलीं, इसलिए उसमें मिलवा-पन है।

    कल ही पोस्ट पढ़ रहा था, आकाशवाणी के जिक्र पर रुक गया, फिर कुछ बातें एक पोस्ट में लिखने चला गया। लिखा, फिर अभी बांचा पूरी पोस्ट।

    गंधर्व-वसुंधरा का गाया यह सुनता रहा हूँ, अल्पावधि का उत्कृष्ट गायन है यह! पसंदीदा!

    जइसे धधकेले हो गोपीचन्द! लोहरा घरे लोहसाई - की प्रतीक्षा के साथ!

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  7. आकाशवाणी से एक लंबे समय तक जुड़े रहते हुए देखा है कि वहाँ वास्तव में बहुत से सांस्कृतिक और सुगम संगीत कलाकरों की रिकॉर्डिंग उपलब्ध है.. मगर साथ ही उन कीमती आवाजों की दुर्दशा भी देखी है.. एक समय रेडियो सीलोन ने यह काम बहुत ही हिफाज़त से किया था.. वो गीत जो बचपन में सुने थे आज भी ज़हन में ताज़ा हैं.. आज पंडित सत्यदेव दुबे याद आ गए..
    "कौनो ठगवा नगरिया लूटल जाए" को शास्त्रीय और सुगम संगीत दोनों धुनों में सुना है और असर दोनों का एक ही पाया.. आँखों से आंसू झरने लगते हैं.. वही होता है जब "गोरी सोयी सेज पर" सुनते हैं.. आज आपका यह आलेख दिल में ऐसा गहरा असर कर गया है कि कुछ कहना मुश्किल है!!

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  8. अच्छा है जो यहाँ आप हैं।
    मैं फिर आया, आना ही था।

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  9. मुझे नही याद मैने कहां से सीखा पर २० साल की वय तक कई समारोहों मे इसे लोकगीत की तरह गाकर वाहवाही लूटी थी।

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