शनिवार, 24 मार्च 2012

लंठ महाचर्चा : बाऊ और नेबुआ के झाँखी - 14

पिछले भाग से जारी....
..एक भटकता औघड़ है जिसके आधे चेहरे चाँदनी बरसती है और आधा काजल पुता  है। दुनिया जो भी कहे, उसे सब स्वीकार है। वह तो रहता ही अँधेरी गुफा में है जिसकी भीतों पर भी कालिख पुती है ... वह जाने क्या क्या बकता रहता है! 
 
(प)
कुछ लोग महतारी की कोख में ही देह के रस पुष्ट करा कर पैदा होते हैं। जीवन भर भले मकुनी खायें, देह किसी राजे की तरह दिखती है। भले कुकर्मों की फेहरिस्त में नये नये जोड़ते रहें, चेहरा सिद्ध सा चमकता है। लमघोड़ा सोहिता ऐसा ही था। चार लोगों के साथ खड़ा होता तो सबसे अलग नज़र आता जैसे किसी और देश का वासी हो। उसकी शोहरत यह थी कि कोई जनानी पसन्द आ जाय तो सोहिता को उसे फाँसने में एक दिन भी नहीं लगता था। आस पास के टोलों में भी वह सरनाम था – जाने कितनी कोमल देहों का स्वाद ले चुका था। अपनी कला में इतना प्रवीण था कि कभी न तो पकड़ा गया और न ही कोई सुराग छोड़ा। गन्हवरिया गाँव महोधिया चंडी, खदेरन, जुग्गुल के साथ साथ सोहिता के लिये भी जाना जाता था। शक़ का आलम यह था कि उसके घर गाँव की बहू बेटियाँ नहीं जाती थीं या यूँ कहें उन्हें जाने नहीं दिया जाता था। न जाने देने के पीछे एक और बात भी थी।
जुग्गुल की कुटिलता दूसरी तरह की थी सो सिवाय दुआ बन्दगी के और गाभी बोलों के दोनों में कोई आपसी लगाव नहीं था। कुरूप जुग्गुल को अगर कभी हीनता होती तो लमघोड़े को देख कर ही होती लेकिन जुग्गुल की मनलहर का अब वह संगी था – लाँड़ श्रेणी का आदर्श पुरुष। तो बाण और लाँड़ की मित्रता का प्रारम्भ कुछ ऐसे हुआ:
“राम राम काका!”
“राम राम भतीजा!”
सोहिता को आश्चर्य सा हुआ,“हे, हे, हे ...आज त बड़ा दुलराइल बोली बोललऽ काका...भतीजा।“ (आज तो बहुत प्रेमिल वाणी बोले काका! ...भतीजा!)
जुग्गुल ने चौकी के पास बैठने का संकेत करते हुये सुरती को जोर से ठोंका। सोहिता को छींक आ गई।
“का रेऽ, छींके लगलेऽ, खाले नाहीं काऽ?“ (क्यों रे!, छींकने लगे, खाते नहीं हो क्या?)
“काका ई अमल हमके नाइँ बा। मुँह बस्साला।“ (काका यह आदत मुझे नहीं है। खाने से मुँह गन्धाता है।)
जुग्गुल को मुँह की बास से बात की राह मिली।
हँसते हुये बोला,“हँ तोके त मूँहे में मूँह जोरे के रहेलाऽ। बस्साई त चुम्मा लेत शिकाइत हो जाई।“ (हाँ, तुम्हें तो मुख से मुख जोड़ना होता है। बदबू होगी तो चुम्बन लेने में शिकायत हो जायेगी।)
“का कक्का! भतीजा से केहू एतरे बतियावेला भला?” (क्या काका! कोई भतीजे से इस तरह बात करता है भला?”)
“भतीजा गइल सीधा लेवे ...” जुग्गुल ने आँख मटकाते हुये फुसकी मारी,”ई बताउ जाल में क गो मछरी? सिधरी कि मँगुरी?” (ये बताओ जाल में कितनी मछलियाँ? सिधरी हैं या माँगुर?)
सोहिता सतर्क हो गया। घटियाही काम का पहला अलिखित नियम होता है – राज़ को अपने मुँह से कभी न बको। उसने वैसे ही कूट में उत्तर दिया – सिधरी खातिर जाल के कौन जरूरत कक्का? रोहू, मँगुरी के कौनो कमी नइखे। तोहहुके चाहीं का? (सिधरी के लिये जाल की क्या जरूरत काका? रोहू और माँगुर की कोई कमी नहीं है। तुम्हें भी चाहिये क्या?) और खड़ा हो गया।
लाठी का सहारा लेकर खड़ा हुआ जुग्गुल उसके आगे बौना हो गया। सुरती थूकते हुये बोला - मँगुरी के मार तोरिये मान के बा सोहित... हुमचावन के गइले के बादि से बड़ा सून लागेला। आइल करऽ। (माँगुर की मार तुम्हीं झेल सकते हो... हुमचावन की मौत के बाद बड़ा सूना सूना सा लगता है। आया करो।)
नयनों की भाखा पढ़ने में माहिर सोहिता भाँप गया। जुग्गुल की बदली बोली भी इशारा कर रही थी। पूछ बैठा – रोज रोज के टंटा सून भइले से कहतलऽ काका? (रोज रोज टंटा सूना होने से कह रहे हो काका?)
जुग्गुल ने सुरती थूक दिया – खाली मन शैतान के बासा। अब कुच्छू नाहीं होई। (अब कुछ नहीं होगा।)
सोहिता का ध्यान अपनी मुसमात (विधवा) भौजी पर चला गया था।
(फ)
सोहित सिंह का घर गाँव का अकेला घर था जिसमें केवल दो परानी और एक नौकर थे। माँ बाप तो कब के गुजर चुके थे। एक बहुत भारी त्रासदी तब हुई जब साँप काटने से बड़े भाई सनीपन का मरन हुआ। उस समय भौजी के पाँव की लाली भी नहीं छूटी थी। रात में भीतर जाते भइया को साँप ने काटा था, बिसहरिया के आने से पहले ही प्राण पखेरू उड़ गये। दूर नदी में भइया की देह में पत्थर बाँध कर नाव से ढकेलते सोहित कितना रोया था! सबको रुला दिया। लौट कर मर्दानों ने बताया – सोहित त डँहको पहको, लागत रहे कि नद्दी मइया आँखि में उतर गइल रहली। लौट कर आये सोहित को गाँव की जनानियों से सुनने को मिला – बुजरी के पौरा ठीक नाहींऽ बा, नागिन आइलि बा, नागिन। अपनिये मरदे के डँसि लेहलसि। (बुजरी के पाँव ठीक नहीं हैं, नागिन आई है, नागिन। अपने पति को ही डँस ली।)
जब रमैनी काकी ने यह सुनाया तो सोहित सन्न रह गया था। हमार भउजी नागिन? (मेरी भौजी नागिन?)
“देवर मने भउजी पर दोहर हक़ बबुना!” (देवर माने भाभी पर दुगुना हक बाबू!) यही कहा था भउजी ने जब पहली मुँहदेखाई से निपटी थीं। घर में अँजोर भउजी। ऊ भउजी नागिन! दाँत पीस कर रह गया था सोहित। मुसमाति भउजी का सूना मुख देखे न बने। भीतर जाना छोड़ ही दिया सोहित ने। नौकर ईसरभर ही दोनों के बीच कड़ी रह गया। उस साल तो कोई त्यौहार नहीं मने लेकिन बरसी के बाद के साल भी वही स्थिति रही तो कर्कश पंडित खदेरन ने एक दिन समझाया – जिसे जाना था, गया। घर मन्दिर होता है सोहित! तर त्यौहार तो मनाया करो।
खदेरन फुसफुसाये थे – ऐसे में शास्त्रों की अनुमति है। पहाड़ सा जीवन सामने पड़ा है। बहू से विवाह कर लो। मैं पुरोहिती कर दूँगा। सोहित ने हाथ जोड़ लिये – ई हमसे नाहिं होई बाबा! (यह मुझसे नहीं होगा बाबा!) लेकिन तर त्यौहार वाली बात उसके मन में धँस गई।
पँचई के दिन सोहित ज़िद पर उतर आया – भउजी तूहीं न कहले रहलू कि देवर मने दोहर हक़? हम नाहिं मानब, आज घर के घेरा करे के परी। (भौजी! तुम्हीं ने कहा था न कि देवर माने दुगुना हक? मैं नहीं मानूँगा, आज घर पर घेरा डालना ही पड़ेगा) सोहित अभिमंत्रण के लिये गाय का गोबर, सरसो, बालू जुटा कर खदेरन को बुला लाया – बाबा! अइसन मंतर पढ़ब कि सब दुख दूर हो जा।
घूघट काढ़े सनीपन बहू के मुख के सूनेपन को भाँप कर खदेरन कसमसा कर रह गये। कैसी जोड़ी होती! मूरख मानता ही नहीं। ज़िन्दगी कैसे कटेगी? कुछ न कह कर उन्हों ने कर्मकांड पूरा किया और घेरा पूरने के निर्देश दे चले गये।
सजना बिन घर साजन! मन में तूफान लिये भउजी ने उस दिन दलभरी पूड़ी, मसालेदार तरकारी और खीर बनाया। गोबर का घेरा पूरते भउजी घर के कोने तक आई कि रमैनी काकी और दो तीन औरतों की टिबोली सुनाई दी –सवाँगेऽ के डँसि के नागिन नागदेवता पूजतियाऽ। अब देवरो जाईऽ। (पति को मार कर नागिन नागदेवता को पूज रही है! अब देवर भी मरेगा।)
भउजी ने सुना और चँवर दरेसी का बन्धा टूटा। हाथ की थाली को वहीं पटक कर भउजी रोते हुये घर के भीतर को भागी। घरदुआरी (चौखट) पर खड़े सोहित से लिपट गई थी भउजी – बाबू! हमके नइहर पहुँचा देइँ। हम इहाँ नाहिं रहि पाइब। (बाबू! मुझे मेरे मायके पहुँचा दो। मैं यहाँ नहीं रह पाऊँगी।) नसों में खौलता खून लिये सोहित ने भउजी को बाहों में उठा लिया। घर के भीतर ले जा कर पलँगरी पर बैठाते हुये बोला – तूँ जइबू त हमहूँ जाइब, तैयार बाड़ूऽ? (आप जायेंगी तो मैं भी जाऊँगा, तैयार हैं आप?) और बाहर निकल आया।
रमैनी काकी के दुआर पर फेंटा बाँधे, कमर कसे और लाठी हाथ में लिये सोहित तड़क रहा था – आजु के बादि से जिन भोंसड़ो भउजी के कुछु कहली, उनके सोहाग जोगाड़ में इहे लाठी हूर देबऽ। (आज के बाद जिस भोंसड़ी ने भौजी को कुछ कहा, उसके सुहाग जुगाड़ में यही लाठी घुसेड़ दूँगा।) धरा धरी हुई लेकिन त्यौहार का अवसर देख और लोगों के समझावन से मामला शांत हुआ।
लेटी हुई भउजी के आँसू सूख चुके थे। देवर की बलिष्ठ शरीर और पौरुख, कैसे बाहों में उठा लिया!... तूँ जइबू त हमहूँ जाइब... भउजी का मन जाने कैसा हो रहा था। पलँगरी से उतर कर खाली भुइयाँ सो गई। धरती मइया कितनी ठंडी थी!
दलभरी पूड़ी, तरकारी, खीर ...सब रखे रह गये, किसी ने नहीं खाया। साँझ को सारी रसोई ईसरभर अपने घर ले गया।
और सोहित? .... उस नागपंचमी के दिन से ही सोहित के सोहिता बनने की प्रक्रिया शुरू हुई, जुग्गुल की नई जुबानी कहें तो – ‘लाँड़’।
रमैनी काकी के रमायन पुरान से निकला – मर्दानन में रहे त रहे, मेहरारू अब नगिनियाऽ के इहाँ नाहिं जइहें। (मर्दों में आपसी सम्बन्ध रहें तो रहें, गाँव की स्त्रियाँ अब नागिन से कोई नाता नहीं रखेंगी) बरदेखउवा (शादी के लिये लड़के देखने वाले) आयें तो कोई न कोई झूठी कहानी में ग़लत सम्बन्ध का सम्पुट दे सुना दे। जाने प्रतिक्रिया थी या जवानी का उफान, सोहिता नये नये शिकार फाँसता रहा फिर भी परम्परा की दृष्टि से कुँवारा ही रहा - गाँव जवार का सरनाम ‘घटिहा’।
(ब)
जनम जनम के शापितों पर गर्रह नछत्तर के प्रभाव नहीं पड़ते। उनके लिये बस अशुभ होता है – कभी अधिक, कभी कम। महतारी ने लछमिनिया नाम दिया था, जिस घर सुन्दर बेटी जायेगी, लछमी की बरखा होगी, सब सुखी रहेंगे लेकिन भउजी तो नागिन थी! नाम बदलने से क्या होने वाला था? मुसमात क्या हुई, नैहर से भी नाता टूट गया। महतारी मैभा तो न थी? नहीं, अगर होती तो ऐसा नाम रखती, इतना दुलार करती? फेर काहें माई?
रात में जब सलहंत हो जाता और दुआरे सोये देवर की नाक बजने लगती तब गलाघोंटू सिसकियाँ पुक्का बन फूट पड़तीं। कुछ देर की यह रुलाई ही उसके लिये अमृत का काम करती। नागिनें बीमार नहीं पड़तीं है सो भउजी हमेशा स्वस्थ रहती। गाँव में न किसी के घर जाना और न किसी का आना। दिन पहाड़ से और रात? मन और देह जैसे मद्धिम आँच पर अगहनी का भुजिया – आग भी, पानी भी। न गरमी न ठंढ, दाहा रह रह बदके, बुलबुल्ले फूटें! न काँच न पाकल, बिचऊ हिसाब। लोर बहते बहते जाने कब सूख जाती और फिर देंह में ऐंठन जलन शुरू होती। कितनी बार आँगन में खड़े खड़े पानी का गगरा भउजी ने अपने ऊपर उड़ेल लिया। इस रोग की आदत सी पड़ गई थी। सुबह इसरभर के आने से पहले गगरा खाली देख सोहित पूछता तो भौजी कह देती – पियास के कौन ठेकान बबुना? कब्बो कम, कब्बो ढेर। भउजी के पियास – सोहित का जी जाने कैसा हो जाता। (जारी)

8 टिप्‍पणियां:

  1. जुग्गुल और सोहित के तईं हमरे पास भेज हो बबुआ तनिक हम भी ई जुगल मनईन के मछरियन के बारे में कुछ औरो समझाई देई -यी बुजरी मांगुर बहुत खतरनाक होखे ला हो और जरा भी हैन्डिल करई में गफलत होय त करंट नाई डंक मारेला ...बिछुआ फेल.....सिंघी भी ऐसई मछरिया हौवे हो बाबू .....सधरी त बिचारी सोझका होंवे बड़ी आसानी से फंस जाले....और फंसावै वाला भी पूरा महफूज ....रोहू और नैन भी बिचारी सोझका होवें ...मुला गिरिजेश बाबू ई मांगुर बुजरी क कौनो बराबरी नहीं..हमें त उही सोहेला ....
    जबर्दस्त कृति ..छपवाने का जुगाड़ बनवाईये ...

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  2. मौलिक है, समाज की पोर पोर दुखाती..मिश्रजी की बात मान लीजिये।

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  3. समाजिक विसंगतियों का सचिव चित्रण, इंतजार...

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  4. Ek saans main pura episode padh liya ...ya kahuoon to padhne ke baad hi saans lene ki yaad aayi.dhanyabad.agli kist ka intejaar hai.

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  5. लगउले बाटा चौचक आग... जलल मछली विभाग...भौजी के शांत करा देवर जी।

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  6. @जनम जनम के शापितों पर गर्रह नछत्तर के प्रभाव नहीं पड़ते। उनके लिये बस अशुभ होता है – कभी अधिक, कभी कम।

    गाँव-दिहात में जीवन दर्शन सही समझ आ जाता है...

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  7. भाई मुझे भाग 11 एवं 12 नहीं मिल रहा है ।कृपया मदद करे ।

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    1. Pandey ji,
      It is encouraging that you are reading the story with such an interest! I am on my mobile with limited features. May you mail me your id so that I can send you the links? They are right here but you are unable to find the same.

      Regards.

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