मंगलवार, 6 मार्च 2012

आकाश कभी बूढ़ा नहीं होता

आभार: 
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पिता वह वृक्ष होते हैं जिसकी डार आप झूलते हैं।
डालें झुक जाती हैं कि कूदते हुये ऊँचाई अधिक न हो भूमि से।
आप समूची सृष्टि को ठेंगा दिखाते झूलते हैं और वे झुकते रहते हैं। 

आप उनसे लड़ लेते हैं। क्या खूब लड़ाइयाँ होती हैं कि जिनमें साँझ दर साँझ सुलह होती है
और पिता कहते हैं - जिन पिता-पुत्र में लड़ाइयाँ नहीं होती उनके जीवन व्यर्थ होते हैं।
पीठ पर हल्का सा स्पर्श होता है और सम्वाद पूर्ण हो जाते हैं।

पिता जब वाकई झुक जाते हैं तो प्रारम्भ होता है आप के भीतर की पहली टुटन का।
औषधियों की पोटली से टेबलेट चुगते पिता कहते हैं कि देह कबाड़खाना हो गई!
आप को अपने भीतर कबाड़ का बोध होता है और पहली बार अकेलेपन की आहट भी आती है।  

 अविनाश चन्द्र की लेखनी किसी परिचय की आवश्यकता नहीं रखती। पिता के बारे में वे लिखते हैं:

pita
कहा नहीं जाता फिर भी कहने से सुकून मिलता है कि आकाश कभी बूढ़ा नहीं होता:
युसुफ इस्लाम के पिता तो और युवा हैं। उनको सुनना अच्छा लगता है। पिता अब नहीं बहलाते। स्वयं को बहला कर ही देखते हैं:


"Father And Son"
It's not time to make a change
Just relax--take it easy
You're still young--that's your fault
There's so much you have to know
Find a girl, settle down
If you want, you can marry
Look at me--I am old
But I'm happy
I was once like you are now
And I know that it's not easy
To become when you've found
Something going on
But take your time--think a lot
Think of everthing you've got
For you will still be here tomorrow
But your dreams may not...
How can I try to explain?
When I do--it turns away again
And it's always been the same
Same old story
From the moment I could talk
I was ordered to listen
Now there's a way, and I know
That I have to go away
I know, I have to go...

It's not time to make a change
Just sit down
and take it slowly
You're still young--that's your fault
There's so much you have to go through

Find a girl, settle down
If you want, you can marry
Look at me--I am old
But I'm happy

All the times, that I've cried
Keeping all the things I knew inside
And it's hard
But it's harder to ignore it
If they were right--I'd agree
But it's them--they know
Not me That I have to go away

11 टिप्‍पणियां:

  1. I do not understand this child

    Though we have lived together now

    In the same house for years. I know

    Nothing of him, so try to build

    Up a relationship from how

    He was when small. Yet have I killed

    The seed I spent or sown it where

    The land is his and none of mine?

    We speak like strangers, there's no sign

    Of understanding in the air.

    This child is built to my design

    Yet what he loves I cannot share.

    Silence surrounds us. I would have

    Him prodigal, returning to

    His father's house, the home he knew,

    Rather than see him make and move

    His world. I would forgive him too,

    Shaping from sorrow a new love.

    Father and son, we both must live

    On the same globe and the same land.

    He speaks: I cannot understand

    Myself, why anger grows from grief.

    We each put out an empty hand,

    Longing for something to forgive.

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    1. रश्मिप्रभा जी,
      हर रचना का एक वातावरण होता है जिसमें भाव का एक पक्ष रखा जाता है, उसे ऊँचाई दी जाती है और बहुत कुछ अनकहा भी कहा जाता है।
      आप की टिप्पणी का उत्तरार्द्ध इस रचना से कहीं नहीं जुड़ता, उल्टे भावबोध को आहत कर रहा है।

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  3. एक और एक ग्यारह जैसा संगम लग रहा है ...अविनाश की कविता और आपकी आवाज..

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  4. उनकी ही तो छत्रछाया में विकास होता है, आकाश ही रहेगा उनका होना..

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  5. बहुत ही अनुपम भाव संयोजन लिए ...बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  6. एक फ़ेवरेट का जिक्र एक और फ़ेवरेट की महफ़िल में, रंगा खुश:)

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  7. Much has been said about the relationship in between the son and father! May be it 'child is the father of man" or 'Atma vai jaayte putrah" But yes,notwithstanding this backdrop this post is very thoughtful....father never gets old..but when he nevertheless gets a patronage is gone....shelter is gone,protective roof is gone, exposing the sky overhead!

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