रविवार, 8 अप्रैल 2012

लोक : भोजपुरी -11: कन्यादान गीत - कवन गरहनवा पापा रउरा पर लागे?

बैसाख का शुक्ल पक्ष खरमास की समाप्ति ले आयेगा और सतुआनि के दिन से लगन खुल जायेगी। यह समय विवाह के लिये शुभ मुहुर्तों को लायेगा। हिन्दू विवाह पद्धति में कन्यादान एक बहुत ही पवित्र प्रथा मानी गई है जो कि आधुनिक पितृसत्तात्मकसमाज में स्त्री की अधिकारघोषयुक्त दखल के साथ ही बहुत ही विवादास्पद भी हो गई है। तर्क यह हैं कि क्या स्त्री सम्पत्ति है जिसका दान कर दिया जाय? एक वयस्क को दान देने का अधिकार दूसरे वयस्कों को कैसे? और यह भी कि यह स्त्री को सम्पत्ति से बेदखल करने के षड़यंत्रों का प्रस्थान विन्दु है। स्त्रीवादी तो यही कहेंगे कि हिन्दू विवाह दिव्यता के बोझ तले स्त्री और उसके अधिकारों को कुचलने और उसे आजन्म शोषित प्रताड़ित बनाये रखने का एक षड़यंत्र भर है!
समाज की विकृतियों को देखें तो ये सारे तर्क अपने स्थान पर सत्य हैं लेकिन मुझे यहाँ यह नहीं बताना है कि क्या सही है, क्या ग़लत? मुझे जो प्रचलित है और उसके पीछे जो तर्क या कुछ और हैं, उन्हें समझने का प्रयास लोकगीत की भावभूमि में करना है।
हिन्दुओं में हर मंगल अवसर के लिये गीत हैं जिन्हें पुरुष नहीं स्त्रियाँ गाती हैं। शुभ अवसरों पर प्रसन्नता की अभिव्यक्ति वे गीत गा कर करती हैं। विवाह का अवसर बहुत ही व्यापक होता है। महीनों पहले से तैयारी प्रारम्भ हो जाती है। संझा पराती, मटिकोड़वा, पितरनेवतनी, बरनेत, कन्यादान, बिदाई आदि आदि हर अवसर के लिये अलग अलग गीत और सभी अर्थगहन। यदि इन गीतों के बोलों पर ध्यान दिया जाय तो अचरज होता है। सीमाओं में बँधी घरनी कितनी सुन्दरता, सादगी और भावप्रवणता के साथ इन अवसरों पर अपने मन की बात कहती आई है! दम्भी पुरुष यदि ध्यान दे तो घर का वातावरण और सुघर हो जाय लेकिन उसे बाहरी संसार के प्रपंचों से कहाँ मुक्ति?
हिन्दू समाज धर्मबुद्धि से संयोजित रहा है। स्मृतियों में विवाह विच्छेद की परिस्थितियाँ और विधियाँ वर्णित हैं लेकिन बात बहुत बिगड़ जाय तब ही वरना विवाह माने जन्म जन्मांतरों का सम्बन्ध ही होता है। यहाँ विवाह संविदा न होकर समाज को चलाने वाले गृहस्थधर्म का प्रस्थानविन्दु है। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासी, ये सब गृहस्थ के आश्रित हैं। वह धर्मधुरी है जिसकी शक्ति का आश्रय ले समूचा समाज चलता है, सृष्टि चलती है। आश्चर्य नहीं कि हिन्दू विवाह संस्था तमाम मामलों में अनूठी है – कोई मंगल कार्य बिना पत्नी से गाँठ जोड़े पूरा नहीं होता, अकेले की पूछ नहीं! यह उनका सम्मान है जो घर और बाहर दोनों को साध कर जीवन की पावन परम्परा को प्रवाहित रखने में अपना योगदान देते आये हैं, उनका सम्मान है जो समाज को धारण किये हैं। वे मूर्तिमान धर्म हैं।
इतनी उदात्त संकल्पना को आकार कैसे मिले? स्वभावत: विवाह एक बहुत ही जटिल कर्म भी हो जाता है जिसमें समाज के सभी वर्गों को सम्मिलित किया जाता है। इस कारण ही लोक में कई रंग और वैविध्य दिखते हैं। एक के भी बिना काम पूरा नहीं होता। परोक्ष रूप से सभी साक्षी बना लिये जाते हैं और उन्हें इसका भान भी नहीं होता। असल साक्षी कौन होता है? अग्नि। दंड और न्याय विधान विवाद की परिस्थिति में भले अन्य साक्षी ढूँढ़ ले और मान्यता दे दें लेकिन धर्म तो यही कहता है कि पवित्र अग्नि को साक्षी मान कर तुम दोनों आज पति पत्नी हुये। स्त्रियाँ भी यदि अपने गीतों में बुला कर रखती हैं तो कुलदेवता, कुलदेवी, ग्रामदेवता, अन्य देवता और पितर। चाहे अग्नि हो या ये सब – कौन गवाही देने आयेगा? यह सूक्ष्म नकार स्थूलता का नकार है जो इस संस्था को दिव्यता प्रदान करता है।
पाणिग्रहण के समय मंडप में कन्या का भाई, माता पिता और ब्राह्मण होते हैं और बाहर उन्हें घेरे हुये कन्या पक्ष के लोग। मनबढ़ई में दुल्हे के मित्र भले आ धमकें लेकिन वे होते अनाहूतो प्रविशति ही हैं। वरपक्ष की ओर से मात्र एक व्यक्ति होता है – स्वयं दूल्हा। इस कारुणिक प्रसंग को उसे अकेले दिखाने के पीछे गहन मनोविज्ञान है। उसकी संवेदनाओं को जगाकर सर्वदा के लिये स्मृति में सुरक्षित कर देने का आयोजन है – धर्मपत्नी ने निज गृह को तज बहुत बड़ा त्याग किया है, उसका आजीवन सम्मान होना चाहिये। इसका दायित्त्व केवल तुम पर है!
कन्या एक घर छोड़ दूसरे के घर जा रही है, अनजान अपरिचित परिवेश को अपना बनाने जा रही है, दूजे की संतति को आगे बढ़ाने जा रही है, उसके देवों और पितरों के आह्वान के लिये होता बन कर जा रही है और अपना अब तक का सब कुछ छोड़ कर जा रही है! इतना बड़ा त्याग और साथ में उससे कई गुना बड़ा दायित्त्व! उसे भान कैसे हो? कोई शपथ काम करेगा? वह तो तब काम करेगा न जब टूट पूर्ण हो जाय? बन्धन में कैसा निर्वाह? तो राह क्या हो?
वह सम्पत्ति नहीं, कलेजे का टुकड़ा है – माँ बाप बेच तो सकते नहीं कि चलो यह चीज आज तक मेरी थी, तुमने मूल्य दिया, अब तुम्हारी हुई? बोल वचन में तो इतनी गुरुता ही नहीं होती कि बस कह दें और काम हो जाय!  तो राह क्या हो?
माता पिता दान करते हैं – सबको दिखते हुये भी गुप्तदान की गरिमा लिये हुये कन्यादान। जाओ तुम्हें दान दिया! अब तुम्हारा हमारा आगम सम्बन्ध गौण हुआ, अब तुम पर हमारा कोई अधिकार नहीं, तुम दूसरे परिवार की हुई। वह तुम्हारा सर्वस्व है।
वधू अनकहे संकेतों को बखूबी समझ जाती है और वर भी समझ जाता है कि कोई स्थूल साक्षी नहीं, कोई मूल्य नहीं, यह दान तो अनमोल है। धर्म विधि से सम्पत्ति का विभाजन भी यहीं हो जाता है – कन्या का अब नैहर की सम्पत्ति में कोई अधिकार नहीं। उसे गृहस्थ परम्परा के वाहक, स्वयं उसके माता पिता, ने वयस्क होने पर दान दे सम्पत्ति से वंचित कर दिया। उनके दिये उपहार ही उसका स्त्रीधन होंगे और वह वरपक्ष की सम्पत्ति की अधिकारी होगी ठीक वैसे ही जैसे उसकी माँ अपने ससुराल में है। कोई भी दो स्थानों की सम्पत्ति पर अधिकारी नहीं हो सकता। 
बिनटूटी जलधार गिराता भाई पाणिग्रहण के समय जैसे यह जता देता है कि हमारा तुम्हारा सम्बन्ध अब इस पानी की धार जैसा ही रहेगा। तरलता रहेगी, अटूट प्रवाह रहेगा लेकिन यहाँ की धरती पर अब केवल मेरा अधिकार रहेगा, तुम्हारा अधिकार अब कहीं और है!
स्त्री के लिये विशिष्टता यहीं आती है कि वह निज गृह छोड़ दूसरे के घर जाती है। यदि पुरुष विवाह के पश्चात स्त्री के घर को विदा होता तो सम्भवत: उसके लिये भी यही सब होता। ऐसी परिपाटी न हो तो न कोई जटिलता रहे और न तर्कविलास को तमाम मुद्दे! आज कल हो रहा है न? माता पिता कहीं और और मियाँ बीवी की दुनिया कहीं और – एकदम अलग थलग। इस दबाव में धीरे धीरे ये सभी विधान घिस जायेंगे लेकिन अभी समय है।
इतना बड़ा कांड हो जाय और करुणा न हो, हो ही नहीं सकता। अनिवार्यत: इस अवसर के गीत रुला देते हैं। सहज, अर्थसम्प्रेषक, भोले, तर्कातीत गीत – स्त्रियों ने सबकी भावनाओं को इन गीतों में अभिव्यक्ति दी है। जामाता को दसवाँ ग्रह बताया जाता है। दुष्ट ग्रह अपने घर में हो तो और बली हो जाता है। मेरी मौसिया सास जी मेरे यहाँ आईं तो मैंने मौके का लाभ उठा कन्यादान गीत का अनुरोध कर डाला। उनका स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं था फिर भी निजगृहव्याप्त दुष्ट ग्रह का मान रखते हुये उन्हों ने गाया।
इस गीत में उल्लास भरे घर की तैयारी है, कभी स्त्रीधन रहे दहेज की भयानक कुरीति के बोझ तले दब कर नीचे हो गये पति की दुर्दशा है, सब कुछ चुपचाप स्वीकारती पुत्री का दुख है – माँ बेटी तो आपस में सब कह सुन रो लेती थीं लेकिन प्रस्थान के पूर्व के अवसर पर जो इतना गरिमामय और मर्यादापूर्ण धर्म वातावरण बना है उसमें पिता से पुत्री कहे तो क्या कहे? माँ की ओर से स्त्रियाँ पिता और पुत्री की बातचीत को बयाँ करती हैं। अंत आते आते इतनी कारुणिकता आ जाती है कि सप्तपदी के अग्निकुंड की दाहकता पिता के हृदय में पहले ही व्याप्त हो जाती है, गीत अचानक ही समाप्त हो जाता है – कहने सुनने को कुछ बचा ही नहीं!  

2012-02-12-002

गाई के गोबर अँगना लिपाई गजमति चउका पुराई जी
चउका पर बइठीले बेटी के पापा धीया करीलें कन्यादान जी
काँच ही बाँस के मड़वा छवइले गजमोतियन झालर लगाई जी

जँघिया पर बइठेली बेटी दुलारी मोतियन आँसू बहाई जी
गोदिया में बइठेली बेटी दुलारी मोतियन आँसू बहाई जी

सब केहु बइठेले लाल जजिमवा मोरे प्रभु कुस के चटाई जी
एतना दहेज देइ नीच हो गइनीं सत्रु के धिया मति होस जी

कवन गरहनवा पापा लागे दुपहरिया हे कवन गरहनवा भिनुसार जी
कवन गरहनवा पापा रउरा पर लागे कब दल उग्रिन होस जी

सूरज गरहनवा बेटी लागे दुपहरिया हो चन्द्र गरहनवा भिनुसार जी  
तोहार गरहनवा बेटी हमरा पर लागे जब दल उग्रिन होस जी

कथि बिनु पापा हे खिरवो न सीझे कथि बिनु हुमवो न होस जी
कथि बिनु पापा हे सग्र अन्हार कथि बिनु धर्म न होस जी

दूध बिनु बेटी हो खिरवो न सीझेला घिव बिनु हुमवो न होस जी
पुत्र बिनु बेटी हो स्वर्ग अन्हार धिया बिनु धर्म न होस जी

डलवा में काँपेला दूब अछतिया हे कलसा गंगा जल पानि जी
धिया लिहले काँपीलें बेटी के पापा हे कइसे करीं कन्यादान जी

कास पितल करति मोह न लागे हे, सोनवा कइल नहिं जास जी
धियवा के दान करत हिरदया में लहरे जइसे अगिनिया के कुंड जी  


“गाय के गोबर से आँगन लीप दिया है और चौक की पुराई गजमति सरीखी है। चौके में बैठ कर बेटी के पापा कन्यादान कर रहे हैं। उन्हों ने कच्चे बाँस का मंडप छवाया है जिस पर गजमुक्ताओं सी झालर भी लगवाये हैं। पिता की जाँघ पर बैठी दुलारी बेटी आँसुओं के मोती बहा रही है। (बेटियाँ कच्ची होती हैं, जिनमें पक कर घर बनाने की क्षमता होती है – कच्चे बाँस का मंडप यह सन्देश देता है और हरियाली लिये भी होता है कि होने वाला सम्बन्ध जीवंत रहे। परम्परानुसार बेटी को पिता की जाँघ पर बैठना होता है लेकिन उपवास और विछोह के दुख के दुहरे बोझ से उसकी स्थिति ऐसी हो जाती है कि गोद में सँभालना पड़ता है, वैसे ही जैसे बचपन में। यौवन आने के साथ पिता को ले जो स्वाभाविक संकोच रहता है वह इस अवसर रह ही नहीं पाता)।
बेटी की माँ अपने पति की स्थिति देख कहती है – आज बाराती जन और सभी सगे सम्बन्धी तो लाल रंग के भव्य जाजिम पर बैठे हैं लेकिन मेरे पति कुश की चटाई पर बैठे हैं। कितने कष्ट सह दहेज की व्यवस्था किये! इतना दहेज देकर भी नीचे हो गये हैं जैसे अपनी पुत्री ही शत्रु सरीखी हो गई हो! बेटी इस स्थिति को समझती है, कैसे कहे? पिता को ढाँढ़स कैसे बँधाये?
लोक की दृष्टांत परम्परा में वह पूछती है – पापा! दुपहर में कौन ग्रहण लगता है और भोर में कौन सा? आप के ऊपर कौन सा ग्रहण लगा है, आप कब मुक्त होंगे?
पिता उत्तर देता है – दुपहर में सूर्यग्रहण लगता है और भोर में चन्द्रग्रहण। मेरे ऊपर तो बेटी! तुम्हारा ग्रहण लगा है, तुमसे उऋण होऊँ तो मुक्ति हो।
यह धर्म व्यवस्था के प्रति लोक आक्रोश है। तुम इस परिपाटी को पवित्र और सब शुभ कर्मों का मूल बताते हो न? अरे यह ग्रहण है ग्रहण! देखो तो सही बाप बेटी का क्या हाल हो रखा है? पुत्री न हुई, शत्रु सरीखी हो गई, ग्रहण लगाती दुष्ट छाया हो गई! धिक्कार है तुम्हारी इस परिपाटी पर!
बेटी आगे पूछती है – पापा! खीर किसके बिना नहीं पकती? हवन किसके बिना नहीं होता? किसके बिना स्वर्ग भी अन्धेरे जैसा होता है? किसके बिना धर्म का होश ही नहीं रहता?
यह लोकोपनिषद की प्रश्न परम्परा है जिसमें एक साथ ढाँढ़स, सँभाल और यथार्थ तीनों हैं। गा रही हैं स्त्रियाँ, पूछ रही है बेटी।
उत्तर देता पिता तीनों का साक्षात्कार कर लेता है – दूध के बिना खीर नहीं बनती। घी के बिना हवन नहीं होता। पुत्र के बिना स्वर्ग भी अन्धेरे जैसा होता है और पुत्री के बिना धर्म का होश नहीं होता।
घर में पवित्र अग्नि है, चावल है, शर्करा है लेकिन बिना दूध के खाद्य पायस नहीं बनेगा। नये घर को जाती मेरी पुत्री वहाँ पूर्णता लायेगी। वह अन्न को क्षुधा शांत करने लायक बनायेगी – वह दूध सरीखी होगी- पोषक और पालक। वह गृहस्थ परम्परा की अग्निशाला में घृत आहुति जैसी होगी। उसके बिना कोई पवित्र कार्य सम्पन्न नहीं होगा। उसके तप से, उसकी संतानों से घर आगे बढ़ेगा। बिना संतानों के स्वर्ग भी अन्धेरा है और धर्म का तो ध्यान ही नहीं रहता।
ऐसी पुत्री से धर्म का निर्वाह होता है। पुत्र भले स्वर्ग में स्थान दिला दे लेकिन धर्म तो कन्या से ही होता है, उसके दान से ही होता है कि नया घर बसता है।
सारा सँजोया संयम और ज्ञान यह सोचने पर हवा हो जाते हैं कि दुलारी बेटी घर से जा रही है! पिता की स्थिति डाल में काँपते दूब अक्षत और काँपते गंगाजल जैसी हो गई है। दूब, अक्षत और गंगाजल ये तीन पवित्र तत्त्व भी विछोह के दुख का भार सँभालने में सहायक नहीं हैं। गोद में पुत्री को लिया पिता काँप रहा है – अपनी पुत्री का दान कैसे कर दूँ? उसे अपनी सारी सम्पदा काँसा पीतल की तरह लगती है जब कि पुत्री सोने सरीखी। उसके हृदय में जैसे आग का कुंड प्रज्वलित हो गया है जिसमें सब कुछ भस्म हुआ जा रहा है। (जाओ मेरी सोना बेटी! यह आग तुम्हें कुन्दन बनाये।)“
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14 टिप्‍पणियां:

  1. रुला तो आपके इस आलेख ने दिया .....
    मगर यह सब अब महज एक कर्मकांड होकर रह गया है .....मगर अच्छी बात यह कि स्त्रियों के ये लोकोपचार मनुष्य की संवेदना को झंकृत करते आ रहे हैं .....

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  2. कहाँ से आता है इतना दर्द? कहाँ बनते हैं लोकगीत?
    हिन्दू धर्म से बाहर जन्मी एक कन्या का हिन्दू-विवाह सम्पन्न होने के बाद भारत से आये उसके 70 वर्षीय चाचा ने कहा था, "अब तक न जाने कितनी शादियाँ देखी हैं, विवाह का वास्तविक अर्थ आज पहली बार समझ आया।" सोच रहा हूँ कि यदि उन्हें यह आलेख पढने को मिलता तो क्या कहते।
    हृदयस्पर्शी आलेख, मर्मस्पर्शी गायन! जारी रहे ...

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  3. बहुत ही आत्मीय लेख है बंधु !

    विवाह गीतों को लेकर बचपन से ही जिज्ञासा रही है कि कौन लिखता होगा, कौन बनाता होगा, कैसे छंद गढ़े गये होंगे ?

    कभी कभी लगता है लोकजीवन के ये गीत गझिन गाछ से है तो कभी लगता है हरियर बांस की हरियर कइन से लचीला है लोकजीवन ।

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  4. मेरी बेटी, इकलौती बेटी, इस गीत को सुनकर हंस रही है और मेरी आँखों से और मेरी श्रीमती जी की आँखों से आंसू बह रहे हैं..! एक गैप है,हमने इस दर्द को देखा सुना है और उससे भी ज़्यादा महसूस किया है!!
    बस आचार्य जी!!

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  5. विवाह के उत्सव और गीतों के माध्यम से न जाने कितना कुछ कहता हमारा लोक व्यवहार

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  6. अद्भुत निरीक्षण!! चिर सार्थक विवेचन!! शब्द शब्द संवेदनाओं का झरना!! सजल आंखों से पढ़ना भी भावुकता भरा हो गया। पहली बार इतने श्रेष्ठ मर्मस्पर्शी आलेख से सामना हुआ है। पुत्री-पक्ष के विवाह बिदाई माहेरा आदि के लोक-गीत मुझे अतिशय भावुक कर जाते है। भोजपुरी मेरे लिए जरा कठिन है अतः भावों की गहराई नहीं छू पा रहा, पर अर्थ आलेखन कर आपने आसान कर दिया।

    किस किस वाक्य का उल्लेख करूँ जिसने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया? एक शब्द भी नहीं है जिससे मैं अप्रभावित रहा होउँ!!

    अनमोल भावनाएँ जगाने के लिए आपका सदैव आभारी!!

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  7. बहुत बड़ी चीज घटित हो रही है यहां, हम साक्षी बन कर ही धन्‍य हैं.

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  8. सुनकर ह्रदय पिघल-सा गया... ऐसे गीत सुने तो थे मैंने भी,... लेकिन अच्छी बात है कि आज का समाज बहुत परिवर्तित हो चुका है..
    पहली बार आना हुआ आपके ब्लॉग पे, बहुत अच्छा लगा.
    सादर शुभकामनाएं
    मधुरेश

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    1. आप का आना बहुत अच्छा लगा। नये लोग जुड़ते हैं और सुख पाते हैं तो स्वयं को भी संतोष होता है कि श्रम सार्थक हुआ।
      परिवर्तन में अभी बहुत समय है। 70% भारत गाँवों में रहता है और कृषि आधारित अर्थ व्यवस्था में कमोबेश हाल यथावत ही है।
      आते रहिये। यह शृंखला जारी रहेगी और आलसी की बकबक भी।

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  9. कि हिन्दू विवाह संस्था तमाम मामलों में अनूठी है – कोई मंगल कार्य बिना पत्नी से गाँठ जोड़े पूरा नहीं होता, अकेले की पूछ नहीं! यह उनका सम्मान है

    jai baba banaras...

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  10. यह सहेजने की चीज है, पढ़ के निकल सकने की नहीं।
    धन्य भये सर।

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  11. बड़ा ही मार्मिक प्रसंग आपने इस गीत को शब्दों में लिपिबद्ध कर व उसके भावो को भी अभिव्यक्ति दी आपके मौसिया सास को बधाई की इतनी अस्वस्थता में जामाता दसवा ग्रह का मान रखा व हम सबको इतना सस्वर पाठ सुनाया आपसे आग्रह है की लोक संस्कृति के इस ध्वन्यात्मक आख्यान को यू ट्यूब पर भी डाले मई तो वहा खोजते खोजते थक गया था पता नहीं था गोद में छोरा नगर ढिढोरा वाली बात हो गई

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  12. अति सुन्दर भाषा एबं प्रस्तुति इस प्रसंग को पढते हुए मुझे अपनी बेटी की शादी की याद आ गयी और आँख का कोना गीले हुए बिना न रह सके

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