सोमवार, 2 अप्रैल 2012

एलर्जी

क्षितिज। उत्तर से दक्षिण तक दो धूसर गुहाओं के बीच पिलपिला वितान। किनारों से धूल भरी वायु उड़ती है। दूर आकाशगंगा में नक्षत्र अग्नि में तप,  भाप बन उड़ने लगते हैं। ऊपर नहीं जाते, नीचे उतरते आते पिलपिले वितान पर जमने लगते हैं।
 एक बूँद भारी होते होते टपक पड़ती है। निर्वात का अनुभव खींचता है। धूसर गुहाओं के खाली भाग भी संघनित हो नीचे आ उतरते हैं। बूँद को घेरे एक ज्वालामुख में गहरे उतरते जाते हैं और प्रस्फोट होता है। गड़ गड़ गड़ ध्वनियाँ जाने कितनी आवृत्ति से चीखती ऊपर उठती हैं। वितान से एक धार सी निकसती है और सामने खुल जाती है एक और गुहा ...
नींद उचट जाती है। लगता है कि कमरे की चार दीवारों के बीच भरी हवा की हर सलवट में हजारो पिस्सू एक साथ जग उठे हैं। खाँसी और छींकों को हाँकती एक दुर्दमनीय इच्छा उठा देती है – इस समय तुम्हें श्रम करना चाहिये। किसी खेत में कुदाल चलाने या बाज़ार से दोनों हाथों में भरे झोले टाँगे जैसे घर आना हो वैसे ही बाहर निकलने का प्रयास करने जैसा।
सब कुछ सूख सा जाता है। कानों में भयानक खुजली, आँखों के कोरों में जलन और ठोड़ी की त्वचा के नीचे कहीं बेचैन सी खुज खिज खाज। फेफडों में ठूँस ठूँस बालू। नाक कि गंगा यमुना! 
मैं शीतल होना चाहता हूँ हालाँकि गरमी जैसी कोई बात नहीं है। फ्रिज से ऐपी का बोतल निकाल हलक के नीचे उड़ेलता हूँ। तालू पर मेघ जमे हैं – जोर से भीतर खींचता हूँ कि बरस दें और भार हल्का हो जाय लेकिन अनुभूति में छलना है। कहीं कुछ भी नहीं है। नीचे उतरते बुलबुले सब कुछ सिकोड़ रहे हैं। ऊर्जा का संघनन इस शीतलता में! फूट पड़ेगी!!
 कहीं बहुत गहरे से खाँसी उठती है और पड़ते हैं सम्पूर्ण अस्तित्त्व को हिलाते दौरे... हाँफने लगता हूँ। कुछ देर बाद ही उठान बैठने लगती है... 
शांत है सब कुछ, शांत। नींद आयेगी अब?
सलवटों के पिस्सू देह में नथ गये हैं। बालू के बीच गतर गतर पिस्सू! नींद कैसे आयेगी?
लेट लूँ। आराम मिलेगा।
क्षितिज पुन: खिंच गया है। इतना तनाव कि आँखों में रात फट गयी है। कोई बहुत धीमे धीमे रो रहा है, रात को रफू कर रहा है। काला धागा नहीं है उसके पास। एक एक तुरुप बिजली सी चमक रही है
“उठो बेटे! सूर्योदय के बाद नहीं सोते।“
“मैं बहुत थका हूँ पिता! सोने दीजिये।“
“ऑफिस नहीं जाना?”
“जाना है।“
“तबियत ठीक नहीं तो न जाओ। जरूरी है क्या?”
“जरूरी नहीं पिता! दिन भर बैठ किसी अनजान दुर्घटना की प्रतीक्षा करनी है - ए सी को हाई पर सेट कर के। ...यह काम मैं ही कर सकता हूँ।“
“अभी से ए सी?”
“हाँ... उससे आराम मिलता है। ठंड लगने लगती है तो बन्द कर देता हूँ और बिना दूध की चाय ... ठंड, गर्म, ठंड, गर्म... दुर्घटना आओ न!”
पिता व्यथित, चिंतित और आतंकित से हैं।
“अरे! धीमे धीमे ड्राइव करते मैं चला जाऊँगा। चिंता की कोई बात नहीं।“
मोबाइल से एफ एम ट्रांसमिशन करता हूँ -  कंट्री सांग है, फिल्म क्रेज़ी हार्ट से। कलर ऑफ द ब्लू – नहीं! कलर ऑफ द स्काई। उत्तर से दक्षिण तक दो धूसर गुहाओं के बीच पिलपिला वितान। क्षितिज।
You are driving dear! Be careful…
  
Up above me are the skies
Like the twinkle in your eyes
…Blue must be the colour of the blues
Still as cold as you left me
Yes blue must be the colour of the blues

There's a rainbow over head
With more blue than gold and red
Blue must be the colour angels choose
Blue days come and blue days go
How I feel nobody knows
Life is pretty empty without you
There's a blue note in each song
That I sing …
  
…“Sir! such a pretty song. Where did you get?”  
“रात में देखा था ... बहुत कम...झलक सा।“
वह हैरान है – देखा था ..कि सुना था?
“अरे यार! तुम्हें क्या पता कि गीत देखना क्या होता है? ...वह फाइल उठाओ। मौत की गिनती शुरू करें।“
वह मुस्कुराता है – जो कनेक्ट नहीं हुये, समझो मर गये!
दौरा पड़ता है – सर! सर!! यू ओके?
“पानी...तीखी चाय, अदरक वाली। दिनेश को कहो – जल्दी से!”
मैं मीलों दौड़ आया हूँ। सब शांत है। जान नहीं बची अब तो! दिन भर कुदाल चलाने से छुट्टी! किसी को नहीं दफनाना। कोई नहीं मरेगा। 
“Sir, you know? … People who write like this are basically sick by composition.”
अच्छा! ... यह ज्ञान आप को किसने दिया?”
“हे, हे, हे ...सर! ऐसे ही फेंक दिया। अच्छा था न?”
“Be serious!...what you have said is partially true … one composes hymns because he passes through sickness…
वो गीत में भी गाया है न? There's a blue note in each song that I sing!
 ... मुझे एलर्जी है – हवा से, पानी से, आग से, मिट्टी से और निर्वात से...और तुमसे भी...तुम इन्हीं से तो बने हो!”
Sir! you are not well… and incomprehensible many times.”
“Ya…”     

11 टिप्‍पणियां:

  1. जल्दी से अच्छे हो जाइए | बहुत सी शुभकामनायें |

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  2. यह छायावाद के पुनरागमन की दस्तक है क्या...? स्वास्थ्य लाभ की कामनाओं के साथ...
    सादर
    ललित

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  3. एक बार एलर्जी हो जाये तो मन भन्ना जाता है, कारण समझ में आता नहीं, क्षितिज ही पिलपिला लगने लगता है।

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  4. हा..हा..हा..मैं अकेला नहीं हूँ...बेचैन आत्मा।

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  5. शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की अभिलाषा के साथ ढेर सारा नेह !

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  6. @कहीं बहुत गहरे से खाँसी उठती है और पड़ते हैं सम्पूर्ण अस्तित्त्व को हिलाते दौरे... हाँफने लगता हूँ। कुछ देर बाद ही उठान बैठने लगती है ...
    जानकर छोड़ा हुआ था, 10,000 मीटर चलने के बाद पढा तब भी इंशा जी ही याद आये; बोले, "चलती फिरती छाया है, सब माया है ..."

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