शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

गिफ्ट वाली पायल - अंतिम भाग

पहला भाग 
दूसरा भाग 
तीसरा भाग 
चौथा भाग 
अब आगे ... 

सनीप ने उसे फिर से चुप रहने को डाँटा। एडवोकेट ने जुट आई भीड़ से मुखातिब होकर तंज कसा – तो अब झुग्गी वाले हमलोगों से बराबरी करेंगे! ... ऐ सनीप! यहाँ तमाशा लगाने से कोई फायदा नहीं। तुम लोग मेरे घर चलो, वहीं बात होगी। मामला सीरियस है।
बिनती कहाँ चुप रहने वाली थी – हम तुम्हारे घर क्यों आयें? जिसे गरज हो वो जाये। उसने सनीप को भी कसा – चाहे जहाँ चलना हो चलूँगी लेकिन इस वकील के यहाँ तो मैं न जाऊँगी। तुम्हें जो सुहाये वो करो।
सनीप को स्टेडियम के अलावा कुछ नहीं सूझा। उसने प्रस्ताव रखा और सभी मान गये। बाकी लोगों को पीछे आने से मना करते एडवोकेट के होठों पर अर्थ संकेत भरी मुस्कान थी जिसने बाकी झुग्गी वालों को कई शामों की बतकूचन का मसाला दे दिया – दूसरे के साफ चोले पर दाग दिखने की खुशी अनिर्वचनीय होती है!

स्टेडियम के आगे किनारे की वही बेंच थी। इस बार सामने वाली बेंच भी आबाद थी और दूर खेलते बच्चों में सूरा और नीरा भी थे। रजनी ने चश्मा उतारा और बिनती से आँखें मिलीं – यही बच्चे उस दिन कैसे थे और आज कैसे लग रहे हैं? इस राँड़ को सजा कर तो आँखें खुल गईं। सनीप इसे कभी नहीं छोड़ेगा।
बिनती की आँखों में चुनौती ही चुनौती थी। रजनी को उसकी दीठ सही नहीं गई। उसने आँखें हटा लीं और बोली – सनीप, मैं लड़ने नहीं आई अपना हक़ लेने आई हूँ।
एडवोकेट ने उसकी बात आगे बढ़ाई – देख सनीप, छुट्टा छुट्टी को कोर्ट नहीं मानेगा। क़ानूनन रजनी आज भी तुम्हारी बीवी है। एक पत्नी के रहते दूसरा विवाह करना हिन्दुओं में अपराध है। बेकार की लड़ाई में न पड़ कर सुलह सफाई कर लो। रजनी की माँग मान लो वरना ठीक नहीं होगा।
बिनती बिफर उठी – हो जी, इनसे कहो कि अपने समाज में तो ऐसे ही चलता है। दोनों के बाप सामने थे जब छुट्टा छुट्टी हुई। उसकी नौबत क्यों आई? यह भी बताओ। पूछो तो मैं भी जानूँ कि इतने बरस बाद क्यों सुध आई?
उस भोली को नहीं पता था कि बात इतनी सीधी नहीं थी। सनीप को चुप देख कर एडवोकेट मे माँग रख दी – बाइपास वाली ज़मीन में आधा हिस्सा और ...वह रुका, बिनती की ओर देख कुटिल मुस्कान के साथ बात पूरी की – छोटा नीरा...उसने अर्थ भरे मौन के साथ बात अधूरी छोड़ दी।
सनीप और बिनती दोनों स्तब्ध हो गये! इसकी तो कल्पना भी नहीं थी!!   
बिनती चीख उठी – इस राँड़ को मैं अपना बेटा दूँगी? चौराहे चौराहे भीख माँगते कितने घूमते हैं, उनमें से ही किसी को क्यों नहीं ले लेती?
मारे क्रोध के उसका चेहरा विकृत हो उठा – इतने साल तो सैकड़ों के आगे टाँगें फैला चुकी होगी, खुद पैदा क्यों नहीं कर लिया कोई हरामी?
चोट मर्म पर लगी थी। तमतमा कर रजनी उठी और उसने चाटा मारने को हाथ चलाया लेकिन बिनती की वज्र पकड़ ने उसे थाम लिया। फुफकारते हुये बिनती बोली – ऐ रंडी! परिवार का इतना ही शौक है तो चल हम सब तेरे साथ चलते हैं। तेरे सैलून में मैं नौकरी कर लूँगी। घर घर बरतन घिसने से छुट्टी मिलेगी। तुम्हें कहने सुनने को एक मरद भी मिल जायेगा और बच्चों को एक और महतारी। जमीन जायदाद तो रहेगी ही। बोल, तैयार हो?
रजनी ने इतना बवंडर सोचा ही नहीं था। उसे बिनती के ऐसा होने की उम्मीद ही नहीं थी। रूप हो, उमर हो, तेजी हो – बिनती बीस थी।
प्रकट में उसने जवाब दिया – जबान सँभाल कर बात कर! ऐसे चक्कर में डालूँगी कि अन्न के दाने तक को तरस जाओगे तुम लोग! किस बात का तुम्हें इतना गरूर है? ठेले का कि बरतन घिसने का? बारह बरस तक तेरे जैसी मर्दमार ने जिसे चूसा हो उस मर्द से अब क्या मिलने वाला? मुझे कोई दिलचस्पी नहीं। जो चाहिये था बता दिया। तुम लोगों के पास कल तक समय है, मानना हो या न मानना, कल तक बता देना। चलिये वकील साहब!
जुट गये कुछ तमाशाइयों के बीच से रजनी निकली और कुछ सोच कर फिर से बिनती के पास आई – छोटा इसलिये चाहिये कि एकदम सनीप की नकल लगता है। सनीप से मुझे अब भी दिल्लगी है लेकिन पुराने सनीप से, इस छिछोड़े से नहीं, इसे तू ही रख।
उत्तेजना न सँभाली गई तो बिनती घस्स से बेंच पर बैठ गई। बच्चों को पुकारते सनीप की आवाज खोखली थी, चिंता ने सारी मजबूती हर ली थी।


रात घिर आने तक सभी वहीं बैठे रहे। चूल्हा नहीं जला, बच्चे पावरोटी और चाय खा सो गये। बेटी को सुला कर छोटे नीरा की बात की लौ पकड़ बिनती सिसकने लगी – मम्मी! वो आंटी अंकल के साथ क्यों आई थीं? तुम चिल्ला क्यों रही थी? सूरा ने तो इतना भी नहीं पूछा – जाने क्या समझा होगा निबोला?
सहानुभूति में सनीप ने हाथ लगाया तो उससे लिपट कर बिनती फूट फूट कर रो पड़ी। कुछ देर में शांत हुई तो भारी आवाज़ में कहना शुरू किया – हो जी, एक बात बतानी है...बुरा मत मानना। कुछ तुमने छिपाया था तो कुछ मैंने भी। जानते हो उस वकील के यहाँ मैं क्यों नहीं गई? क्यों उसका काम पहले छोड़ दिया था? ...एक दिन जब उसके यहाँ किचेन में बरतन धो रही थी तो पीछे से आकर उसने पकड़ लिया था। बीवी जी थी नहीं, गन्दी बातें करने लगा। जबरदस्ती की कोशिश भी किया। उस दिन मैं यह धमका कर बच पायी कि छोड़ दे नहीं तो बीवी जी के आने पर बता दूँगी... अगले दिन ही काम छोड़ दिया। बीवी जी नाराज़ हो गईं लेकिन कारण न बताया...इतनी अच्छी बीवी होने पर भी जाने क्यों लोग...उसी का बदला आज ले रहा है।
सनीप देर तक चुप रहा। उसकी चुप्पी नहीं सही गयी तो सहमी बिनती सिसक उठी – मुझे मारते क्यों नहीं? तुमने रजनी को तो मारा था न?  
किनारे सरकते सनीप ने उत्तर दिया – बिनतो! मेरा मन यह सुन कर और भारी हो गया है। मारूँगा क्यों? उसमें तुम्हारी क्या गलती थी? छिपाने पर मैं कुछ कहने लायक नहीं बिनतो! ... हम लोग लड़ नहीं पायेंगे। उस कलमुँही को पूरा पता है कि बहुत जल्द उस ज़मीन का दाम सोना उगलने वाला है। हमारी इतनी कहाँ बिसात कि लड़ सकें?
सुलह कर लेने में ही भलाई है।
बिनती का पछ्तावा भाव उड़न छू हो गया। वह उठ बैठी – हो जी, तुम जमीन दे दोगे? और नीरा को भी? ऐसा कैसे सोच लिया सूरा के पापा?  
रात भारी हो चली थी, भार उठाये न उठता था। दोनों देर तक अबोले ही रहे।
स्पर्श की पहल सनीप ने ही की – रिसान गई बिनतो! तू ही बता क्या करूँ?
बिनती ने हाथ झटक दिये तो सनीप ने हथियार डाल दिये – तू जो कहेगी, वही होगा। बताओ क्या करूँ?
प्रश्न नहीं, यह समर्पण था। सजनी सजन के अंग लग गई। मन के भारी भावों को, आशंकाओं को, डर को, सबको दो देहों के बहाव बहा ले चले। बाढ़ थमी तो दोनों हल्के थे। तीन बच्चे सोये हुये थे, चौथे का बपन हो चुका था...

अगले दिन बच्चे स्कूल गये और सुबह काम पर जाने से पहले सनीप ने बताया – सेठ के भाई वकील हैं। उनसे बात करूँगा। तुम्हारे पास तो सेठ का नम्बर है न? बिनती ने हामी भर दी। निर्णय हो चुका था – लड़ना है।
सनीप को मौका ही नहीं मिला। दुपहर बाद ही रजनी ने उसे गली में पकड़ लिया और सख्त इनकार पाया। रजनी जैसे पहले से ही सब तैयारी किये हुई थी, तिजहर को ही सनीप को पुलिस पकड़ ले गयी।

बिनती को खबर सेठ के फोन से ही मिली। उन्हों ने अगले दिन कुछ उपाय करने की बात कही। जब बेटी कह कर सेठ ने धीरज रखने को कहा तो बिनती रोने लगी।
बच्चों को यह सांत्वना दे कि तुम्हारे पापा बीमार पड़ गये हैं, इसलिये रो रही हूँ; उसने सुला दिया और फिर देर तक रोती रही। पड़ोस की झुग्गियों ने कोई खबर नहीं ली।

दाँत बैठाये चुप बिनती ने अगले दिन भी बच्चों को स्कूल भेजा और बेटी को टाँगे सेठ के यहाँ पहुँच गयी।
देख बिनती! मामला साफ है – सेठ के भाई वकील श्यामसुन्दर ने समझाते हुये कहा – सनीप का केस कमजोर है लेकिन उसे शादी वाले मामले में नहीं कोई झूठा संगीन आरोप लगा कर फँसाया गया है। इतनी जल्दी गिरफ्तारी की कोई और वजह नहीं बनती। इसका मतलब यह कि तुम लोगों को दो दो मुकदमें लड़ने पड़ेंगे – पहला झूठा वाला और दूसरा सच्चा वाला। कैसे कर पाओगे तुम लोग? ...उसे तो छुड़ा लिया जायेगा, मैं बात करता हूँ। यहीं बैठो, थोड़ी देर में आता हूँ।
दो दो मुकदमें! सच्चे और झूठे!! – बापों के आगे जुबान की कोई बखत ही नहीं? कैसी फाँस में डाल दिये भगवान? ऐसा कौन सा पाप कर दिया था मैंने? सूनी आँखों छ्त निहारती बिनती के प्रश्न का छत या आसमान किसी के पास कोई उत्तर नहीं था।
श्यामजी खबर ले आये - छुड़ाने में पन्द्रह हजार लगेंगे। बिनती चाहे तो मिल सकती है।

श्यामजी की बदौलत बिनती जेल में सनीप से मिली  – एक रात में ही जैसे उसका सब कुछ चूस लिया गया था। वह चुप था – न रोना और न बात। पूछ्ने पर बस हाँ, हूँ।
बिनती न रो पाये और न चुप रह पाये – हो जी, सबर रखो। बस एक दिन। रकम का जुगाड़ कर तुम्हें कल ही छुड़ा लूँगी।
सनीप ने पहली बार मुँह खोला – जा कर रजनी से कह दे कि हम आधी जमीन देने को तैयार हैं लेकिन नीरा नहीं देंगे। मान गई तो वही छुड़ा लेगी वरना ... मुझे सूरा की चिंता लगी है, जाने क्या ... सनीप ने डबडबाई आँखों को रोका और ऊपर देखते हुये उमड़ आये आँसुओं को पी जाने की कोशिश करने लगा।
स्वयं को सँभाल कर उसने फिर कहा – अगर न माने तो जो कुछ भी है, बेच कर और उधार ले रकम का जुगाड़ कर लेना।
दोनों चुप हो गये। सनीप की नज़र ज़मीन को नाखून से कुरेदते हुये बिनती के पैर पर पड़ी, उसने झुक कर उसके पैर पकड़ लिये। घबरायी बिनती ने पैर खींचे – हो जी, क्या करते हो?
कुछ नहीं बिनती...इन पायलों को न बेचना। हरगिज न बेचना ... पिये जा चुके आँसुओं को आँखों ने उड़ेलना शुरू कर दिया। अब सनीप लाचार था।
झटके से बिनती मुड़ी और भाग चली। बाहर आ कर गेट पर रुकी तो डूबते सूरज पर नज़र पड़ी – नहीं, नहीं।
चेहरे पर जाने कितनी लाली निचुड़ आई, मैं रजनी के पास कहने भी नहीं जाऊँगी। यह तो हम दोनों की बेइज्जती होगी - बिनती कुछ भी नहीं देगी। कुछ भी नहीं!
उसने पैर को जमीन पर जोर से पटका। उड़ती धरती मइया से पायल ने कहा – मैं तुमसे अलग नहीं हो पाऊँगी।
... हवलदार बिनती को वापस सनीप के पास जाने से रोक रहा था। दीवारों से बिनती की चीखें टकरा कर बल खा रही थीं – हो जी! ... सूरा के पापा!!...हम जमीन नहीं देंगे। हम लड़ेंगे, लड़ेंगे ...
...स्टेडियम के बाहर बेंच पर सूरा प्रतीक्षा में था – पापा न सही, मम्मी तो जरूर आयेगी। उसने नीरा को बहला कर वहीं सुला दिया था। पहला अवसर था जब एक माँ को न तो बच्चों की भूख की पड़ी थी और न बच्चों को भूख ने सताया था।  (समाप्त)          

13 टिप्‍पणियां:

  1. हम जमीन नहीं देंगे। हम लड़ेंगे, लड़ेंगे .....ekdum fit hai,Boss!

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  2. चलिए कहानी गृह-प्रवेश से अलग तो हुई!! मगर जो हुई वो बहुत ही भारी है!!कह नहीं सकता कैसा महसूस कर रहा हूँ!!

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    1. आप की टिप्पणी के बाद नेट पर उपलब्ध गृहप्रवेश की संक्षिप्त कहानी पढ़ी। प्रेमिका के घर आने से पहले पत्नी द्वारा की जा रही सजावट और नायक के बताने से लेकर प्रेमिका के घर आने तक की मनोदशाओं में थोड़ी साम्यता रही होगी, अनुमान ही लगा रहा हूँ क्यों कि फिल्म नहीं देखी।
      हल्का हो गया कि चलो यार, अनजाने ही पहले कही जा चुकी कहानी नहीं दुहराया।
      आप का कृतज्ञ हूँ कि आप ने बताया। विश्वास भी है कि आगे भी आप ऐसे ही जुड़े रहेंगे।

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  3. यही है असली वाली यथार्थ कहानी -कई जगहं तो अचम्भित होना पड़ा जैसे कोई भोगा हुआ यथार्थ सा पढ़ रहा हूँ ...
    एक एंगिल कहानी और छू सकती थी -वकील के समक्ष बिनती का सम्पूर्ण समर्पण -यह एक वीभत्स रियल्टी शो होता
    मगर कहानीकार की लानत मलामत भी हो जाती है -आखिर कहानीकार भी डरने भागने वाला साधारण इंसान ही तो होता
    है अक्सर !

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    1. :) अरे मैं कोई टी वी वाला या पटकथा लेखक थोड़े हूँ!
      आप जो सुझा रहे हैं, उस लालच में पड़ जाना बहुत आसान था लेकिन पूरी कहानी पढ़ने पर आप पायेंगे कि वैसे रहस्य या झटका देने के लिये यह थी ही नहीं। इसकी बुनावट बच रहे कुछ मूल्यों को रेखांकित करने वाली है। हाँ, उस तरह के चरित्र अवश्य हमारे चारो ओर बिखरे हुये हैं, फिर कभी :)। मानव बहुत जटिल है।
      हर कहानी 'वेश्या' की तरह नहीं हो सकती। वैसे भी, कल्पनाशील जन इस कहानी में भी बिनती के बजाय रजनी और वकील में आपसी सम्बन्ध का अनुमान कर सकते हैं।
      प्रतिक्रिया के लिये आभार।

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  4. काश निर्णयों की जीवटता हमारे समाज का नियमित अंग बन जाये, तब अन्याय सरलता से नहीं हो पायेगा।

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  5. मुझे यह मानने में कोई परहेज नहीं कि मुझे सुखान्त पसंद है।
    पर अच्छा ये है कि वैसा अंत नहीं किया जैसा कि किया जा सकता था।

    Thank you so much! :)

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  6. कहानी का अंत बिल्कुल प्रैक्टिकल है। कमेंट से सहमत से भी ज्यादा सहमत कि मानव बहुत जटिल है।

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    1. मो सम की सहमति से हमें भी सहमत माना जाय। किसी गिसे-पिटे अंत के मुकाबले मुझे तो यह अंत ही पर्फ़ेक्ट लगा। गुड जॉब!

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  7. I am a silent visitor for more than at least three years and a regular reader of Aalsi ka Chittha, Safed Ghar and Dil Ki Baat, and have always visited and revisited yours blogs, some time I didn't like tone of your creation but still came back to blogs and satisfied my carving for reading and reflecting on purposeful writing.

    Kudos to you, Girijesh, for transporting us to the time and place in which your characters live. Your writing always give me a feel of Easter UP with which I can identify myself. I never intended to write a comment but this story series forced me to praise the writer.

    Thanks for such a nice work, May Allah give you more life and give you more time to you so that you can show the images which are more real and thought provoking.

    I am sorry for not typing in Hindi, as I dont have the facility to typ ein Hindi Currently.

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    1. Thanks Khan ji!
      It is pleasure to know a regular follower like you. I'm honoured. Keep coming and giving your valuable comments.

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  8. ऐसे झगड़े सुनने को मिलते हैं। अंत तक रोचकता बनी रही पर अंत हाथ नहीं आया। ठीक है, कयास लगाते हैं लेकिन सनीप, बिनती और रजनी के बीच आपसी संवाद की भाषा भोजपुरी होती तो कहानी और भी अच्छी लगती।

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  9. कहानी पढ़ के 'गलती से' कमेंट्स भी पढ़ने बैठ गया, सो अपने कहने लायक कुछ बचा ही नहीं, बाकी सलाम खान साहेब जैसे पाठकों को..

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