बुधवार, 9 मई 2012

...और सुन्दर लहरें


प्रतिदिन की तरह आज भी जब गैरिक यायावर द्वार पर आयेगा, मैं उसे थोड़ी सी चाँदी दूँगा, ठंडी सी चाँदी। पता है कि वह हौले से  मुस्कुरायेगा और पूछेगा - आज ऐसा क्या खास है जो इतने उदार हो रहे हो? मैं उससे कहूँगा - तुम्हें दे रहा हूँ कि बाँट सकूँ सब को, मैं तो अब चल भी नहीं पाता। सम्भवत: वह किंचित दुखी होगा और चमकते हाथ झुलाते चला जायेगा।

मैं लिखने बैठ जाऊँगा - चन्द कतरे, चन्द मीठी बातें - कुछ यहाँ की, कुछ वहाँ की और कुछ सारे जहाँ की। संसार की सबसे सुन्दर स्त्री उन्हें पहनेगी, इठलायेगी कि देखो कैसी लग रही हूँ? मैं कुछ भी नहीं कहूँगा । उसे निहारते मेरी आँखों में चाँदी फैलती जायेगी जिसे यायावर उछाल रहा होगा उन प्रशांत विवरों की ओर जिनके पास जन्मों के अनगिनत महाशंख होंगे। मेरी श्वेत पुतलियों के सूनेपन को भाँप वह रूठ जायेगी, साँझ ढल जायेगी और एक और मृत्यु हो जायेगी - सार्थक मृत्यु। अकथ्य अपार सौन्दर्य को निहारते मरना कोई कमतर घटना नहीं होती। 

रात उस प्रेम का सन्देश ले कर आयेगी जो रहता रहा है लेकिन हुआ कभी नहीं। मेरे सपनों में बादल धरती पर उतर आयेंगे। हाँफता बूढ़ा समुद्र होगा जो अपनी लहरदुहिताओं से खेलते कभी नहीं थकता। बादल उनसे कहेंगे – धरती पर तो तुम सब हम जैसी हो, आओ हम सब खेलें! बाबा समुद्र की उल्लासमय चेतावनियाँ उन्हें घेरेंगी। वह बोलेगा – खेलो तुम सब, मैं थक गया हूँ। विचित्र खेल में जोड़ियाँ बनेंगी, पानी नमकीन हो उठेगा – सब विदा हो जायेंगी। भटकता यायावर ऊपर से ऊर्ध्व जाल फेंकेगा और सब चल देंगे अनजान विवरों की ओर। उनमें बिन पानी मछलियों वाली छटपटाहट नहीं होगी। मेरी नींद टूटेगी, थोड़ा सा पानी पिऊँगा और करवट ले सो जाऊँगा। यूँ सोते सपने बहुत आते हैं!

एक जगा हुआ सपना, भोलेपन की साध लिये कि सब कुछ सुन्दर क्यों नहीं हो सकता? दीवारों से घिरी घूमती हहर माँ की तरह समझायेगी – मुन्ने! तब तुम जानोगे कैसे कि सुन्दरता क्या है? तब तो कुछ भी नहीं होगा! मैं कहूँगा – जो अच्छा लगे वही सुन्दर है। वह एक पुरानी लोरी गाने लगेगी:
तोड़े है मलिया नौ नौ फूल,
राजा की बगिया नौ नौ फूल,
रानी के जूड़े नौ नौ फूल।
तोड़े है मलिया नौ नौ फूल,
देवी के गोड़े नौ नौ फूल,
धूल धगे निगोड़े नौ नौ फूल।
तोड़े है मलिया नौ नौ फूल,
फूले जो रहते हैं फूले फूल
देखे है दुनिया नौ नौ फूल।
“माँ! नौ नौ क्यों?” - उसे मेरे होठों पर काँपते लड़खड़ाते माते प्रश्न की चिंता नहीं होगी, पता होगा कि अभी सो जायेगा। सिरहाने लहरों की ममता छोड़ जायेगी। घुँघराले केशों में सिहरती ममता – तू ऐसा क्यों है रे? क्यों नहीं समझता?
मैं गहरी नींद होऊँगा, जिसमें कोई सपने नहीं होते। अनूठे कृष्ण विवर होते हैं जिनका गुरुत्त्व समय को भी सोख लेता है, पता ही नहीं चलता कि इतनी कालिख यकायक कहाँ से आ गई? कुछ भी पता नहीं चलता – ‘मैं’ भी नहीं।
.....
.....
यायावर ने बताया है कि समय लगेगा, सपनों वाली गहरी नींद आने में समय लगेगा। मैंने उससे कहा है – मेरे पास अब और चाँदी नहीं, बस सुन्दरता है। मैं तुम्हें आँखें देने से रहा!
उसने कहा है – वे तुम पर ही अच्छी लगती हैं, देखते रहो! एक दिन सब सुन्दर होगा। मैंने हाथ जोड़ लिये हैं।                      

11 टिप्‍पणियां:

  1. मन चाहे पर अब रातों में स्वप्न नहीं आते हैं,
    रातों की काली स्याही ने दिन को छींट दिया है।

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  2. ओहह्ह्ह

    कितना सुन्दर है यह |

    क्या कहूं - शब्द ही नहीं | आप किस जहां से आये हैं गिरिजेश जी ? कहाँ की कहानियाँ हैं ये ? कैसी रुई के उड़ते फाहों सी भारहीन ethereal सी परियां हैं ये ? ये झिलमिलाहट इस धरती पर तो पायी नहीं जाती !! क्या किसी सितारे से चुरा लाते हैं, ये अभिनव कविता जैसी कहानियों के टुकड़े ? इस प्रतिभा को सम्हाले रखियेगा - बड़ी नाज़ुक fragile सी होती है ऐसी प्रतिभा - जैसे पतले कांच को फूंक कर बनाई कलाकृतियाँ - जरा दबाव से चूर हो जाती हैं |

    इसे पढ़ कर ऐसा लग रहा है जैसे किसी और ही दुनिया में पहुँच गयी |

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    1. शानदार प्रतिक्रिया :)

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    2. आभार अली जी - यह गिरिजेश जी का ही असर है ..... :)

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  3. शिल्पा जी की टिप्पणी से इतर कुछ कहना संभव नहीं है -इथेरल तो है .....

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  4. शिल्पा जी के कहने के बाद वाकई, मौन मुस्कान ही बचती हैं... :) :)

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