शुक्रवार, 15 जून 2012

भाग 3 : बबुनवा आ चिरई, खूँटा, बढ़ई के कथ्था

पिछले भाग-1 और भाग-2 से आगे ... 


बबुनवा ने करवट फेर लिया है। ए सी और ठंडा कर दिया है। वही विचित्र मुद्रा है जिसमें दोनों सुख पाते हैं – बबुनी के गोड़ बबुनवा पर, बिछुआ वाली अंगुरी रह रह हिला रही है और बबुनवा का हाथ अपने सीने पर रख ली है।
ऐसी टेंढ़ में कोई सोझ(सीधा) सोच सकता है भला? अरे रह ही नहीं सकता लेकिन इनका तो सुभाव ही अलग - बबुनवा अपनी नाक बजते सुन सकता है और मन में चलती कहानी भी ...
... बछरू पीपर (छोटा पीपल) की पुतली तक सूरजदेव चढ़े तो लाला का नशा टूटा। स्थिति वैसी ही थी जैसे किसी परिचित की गइया भुलाते भटकते अपने घारी आ गई हो और उसे वापस पहुँचाने की जल्दी हो। बुढ़िया को फरमान जारी हुआ – कन्ता के गाड़ा नाधे के कहु! कनिया के चहुँपावे के बा, संगे हमहूँ जाइब।(रमाकांत को बैलगाड़ी नाधने को कहो, लड़की को उसके घर पहुँचाना है, साथ में मैं भी जाऊँगा)
जाने बुढ़िया के जी में कैसा किरोध(क्रोध) था – हरे मुतपियना! हे हाल में जइबे? कंतो नाहीं जाई। कनिया के अकेल जाये दे। सरेह जवार देखले बा, दिन के बेरा, अकेल्ले चलि जाई।(हे मुतपिये! इस हाल में जाओगे? रमाकांत भी नहीं जायेगा। लड़की को अकेले जाने दो। सरेह इलाका देखी हुई है, दिन का समय है, अकेले चली जायेगी।)  
लाला शांत रहे। जमीन पर लेटे लेटे ही लाठी खींच लिये और बोले – अहिर गोड़ तुरले बइठेलें? जौले ठेहुना ठीक, अहिरा डाँड़े लीक (पैर टूटने से अहिर घर बैठते हैं? जब तक घुटना ठीक, अहिर के बगल में राह)
घबराई बुढ़िया ने जल्दी जल्दी सबको बुला लिया। गाड़ा पर ऊँचा पुवरा(पुआल) बिछा कर काका को लिटा दिया गया और कंता के पहिला कइन सटहा (हरे बाँस से बना पतला छरहरा डंडा) के जोर से बैल झड़क चले – झुन, झुन, रुन, झुन ...घंटियाँ बजने लगीं तो सुनने को कनिया कंता के बगल में आगे जा बैठी।
लाला तड़प उठे – ए कनिया! पीछे बइठु! घर में तोके बइठवले खातिर आज जाने का होई?(ऐ लड़की, पीछे बैठ! घर में तुम्हें बैठा लेने के लिये आज जाने क्या हो?)  
 काका के दुवार गाड़ा पहुँचा। बैल छोड़ा अभी सिपावा (बिन बैल बैलगाड़ी को सहारा देने के लिये प्रयुक्त दो बाँस के डंडों से बना जुगाड़) लगाया भी नहीं था कि बबुआने के लोग लुगाई जुटने लगे। लाला ने कंता से कहा - मितऊ से हमार हाल कहि बोला ले आउ (मित्र को मेरा हाल बता कर बुला लाओ)
कनिया गाड़ा से उतरी और मेहरारुओं के हाथ चमकने लगे – आ गइल उढ़री! मूँहे करिक्खा लगा लेहलिस आ लाज हया एक नाहिं! (घर से भागी वापस आ गई! मुँह में कालिख लगा ली लेकिन लाज हया एक नहीं!)
बाद में कनिया ने बताया था कि उस क्षण ही उसकी उमर दो तीन बरस बढ़ गई, अफरात समझ आ गई। समझ आई तो अलग से रोना भी आ गया। वहीं बैठ गई, घुटने में मुँह छिपा लिया। मेहरारुओं ने तिरिया चलित्तर भी समझा दिया! कनिया सही में झटके में दो तीन बरस बढ़ गई!
रमाकांत ने काका को देखा तो मुँह बाये रह गया – सफाचट्ट मुँह आ कपार उघार, का भइल काका?(मुखमंडल सफाचट और सिर नंगा, क्या हुआ काका?)  
रम्मनसिंघ बुझ चुके थे। कंता उस कांतिक्षय को  क्या समझता?
वापस भागता लाला के पास आ गया – ऊ, काका, ऊ... बोल नहीं पाया तो हाथों से इशारे करने लगा। लाला समझ गये लेकिन गाड़े से कैसे उतर सकते थे? बुद्धि अभी और खुलती ही कि मितऊ की बजरंग दहाड़ सुनाई दी – मरि गइल बबुनी! ...गद्दार!! (मर गई बबुनी! ... गद्दार!)  
लाला का खून खौल उठा। जाने कैसा परेत उतर आया देह में कि लाठी टेक टूटा गोड़ ऊपर उठाये एक ही गोड़ कूद पड़े – ऐ मितऊ! जबान सँभारि के बोल, तमाशा नाहिं... हमार हाल देखतल? कल्हिंये के टूटल गोड़ ले आइल बानीं (मित्र! जुबान सँभाल कर बोलो, तमाशा न लगाओ... मेरा हाल देख रहे हो? कल का ही टूटा पैर ले कर आया हूँ।)  
मन की पीर देह की पीर से सौ गुनी भारी, लाला लोगों के सामने खड़े हो गये जैसे कह रहे हों – प्रत्यक्ष को क्या प्रमाण ? सोझवा बुद्धि ने समझा कि लोग देख कर सब समझ जायेंगे। कनिया काका और लाला के बीच आ खड़ी हो गई। झोंटा बिखरा, लाल लाल आँखें।
पीछे से आवाज़ आई – मार सो अहिरभुच्चन के! (मारों मूर्ख अहिरों को!)  
रमाकांत लाला के आगे आ गया – हाथ लगा के केहु देखि ले तनि! (कोई हाथ लगा कर देख ले थोड़ा!)  
गोड़ की असहनीय पीड़ा को दबा कर लाला ने हाथ उठाया, बस एक पुकार – मितऊ! हम गद्दार नाहीं, कनिया अब्बो गंगा जइसन, कनिया त हमरो धिया ह (मित्र! मैं गद्दार नहीं हूँ, लड़की अभी भी गंगा जैसी है, लड़की तो मेरी भी पुत्री है) ...लड़खड़ाती देह बबुनी के हाथ का सहारा लेते हुये भी न ले पाई, जमीन पर भहरा गये।
बबुनी ने बाप को निहारा और बिना कुछ बताये ही सब समझ गई – कंता, लखनी, लोग लुगाइयों की आँखें, काका की आँखों में चलती लू ...कनिया के केस ढिलई लग गई थी, वह अब घर जाति किसी की नहीं रही। एक खिलवाड़ जिन्दगी बदल चुका था:            
उज्जर उज्जर अमरुच लाल लाल दागी
लाला भखें अकेल्ले मोछिया लागे आगी।
उज्जर उज्जर अमरुच लाल लाल दागी
लाला के गमछा सगर भाग जागी।
कौन कहता है कि इस उमर की देहातिन में अक्ल नहीं होती? उसने गाड़े से गँड़ासा उठा लिया – अगर केहू छुअल त एहि जा बालि देब! (अगर किसी ने छुआ तो उसकी यहीं बलि दे दूँगी।)   
बबुनी ने कंता का हाथ पकड़ा – चलु भइया, एक बाप त छूटल, दुसरे सही (चलो भैया! एक पिता तो छूट गया, दूसरा ही सही)
दोनों ने मिल कर लाला को जैसे तैसे घसीटते हुये गाड़े में लिटाया। टूटे गोड़ का कमचा खुल गया।
पगहा कनिया के हाथ में थमा रमाकांत बाप की छाती पर ढह गया।
कनिया ने लाला की कुनमुनाहट सुनी, खड़ी हुई और सटहा हाथ में ले बैल को जोर से मारा – आँहे..च च च च, किट किट किट। बैल भाग चले। उन्हें किसी ने नहीं रोका।
बबुआनों की धरती से एक धिया ऐसे विदा हुई – कलंकिनी!
उसका बियाह कैसे होगा?...
...”ठंड बढ़ गई है। टेम्परेचर बढ़ा दो।“ बबुनवा ने कहा है।
“खुद क्यों नहीं कर लेते?”
“अरे, हाथ तो तुमने बझा रखे हैं!”
बबुनी शरमा गई है – बेशरम! आज कथा नहीं कह पाऊँगी।
बबुनवा ने आह भरी है – रात बहुत बड़ी होती है।
...वह फिर से कथा में घुसपैठ कर गया है।
   ॥इति चतुर्थोध्याय:॥

5 टिप्‍पणियां:

  1. एलिटनेस और क्लिष्टता के नाम पर चें चें करने वालों को शायद अकल आये कि हम तो धूसर देहात भी उसी अंदाज से रचते हैं जिस अंदाज में क्लिष्टावली :)

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  2. हम्म :)

    मुझे भी कहानी सुनते सुनते कुछ छींक सी आने लगी, ए सी का टेम्परेचर बढा दीजिए.

    सही में मानो मैं भी वहीँ बैठ कर कहानी सुन रहा हूँ, जीवन्तता.

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