बुधवार, 13 जून 2012

4. कोणार्क सूर्यमन्दिर : वनसरू और अभिशप्त कवयित्री का आशीर्वाद

भाग 1,  2 और 3 से आगे... 


शूकर समूह के पीछे हम रेत चढ़ते हैं। सामने वृक्षों का एक बड़ा मानव रोपित क्षेत्र है जिससे रह रह दुर्गन्ध आ रही है। निकलते हुये बेटी पूछ पड़ती है – पापा, ये पेंड़ पाइन जैसे दिखते हैं। यहाँ?

पाइन! मैं ठिठक जाता हूँ। निकट जा कर देखता हूँ, चित्र लेता हूँ। पहले कभी नहीं देखा, इनमें तो सूई जैसे पत्ते (अगर कह सकें तो) हैं! क्या हैं ये? यहाँ क्यों हैं? आम उड़िया जन पेड़ पौधों के बारे में उतने ही निष्णात हैं जितने और जगहों के लोग। किससे पूछूँ?

मोबाइल पर chandrabhaga beach tree डाल कर सर्च करता हूँ। तीसरे स्थान पर ही दिखता है:

The golden sand and the casurina trees add to the natural glamor of the beach. But the biggest claim to fame of the Chandrabhaga beach is the Konarak Temple 

मैं ढूँढ़ता चला जाता हूँ, पहले परिणाम में वर्तनी ठीक नहीं है, सही नाम है Casuarina, वैज्ञानिक नाम Casuarina equisetifolia, हिन्दी में जंगली या विलायती सरू, उड़िया व बंगला में झाऊ।


बंगाल! ... अचानक ही पढ़ाते हुये पिताजी की स्मृति हो आती है और फिर एक क्षयरोग (टी बी)  अभिशप्त युवा कवयित्री तोरू दत्त की जिसने इस वृक्ष को अपनी कविता में अमर कर दिया। अंग्रेजी साहित्य में वह कविता क्लासिक मानी जाती है – Our Casuarina Tree

धन्य हुये आज तो! तोरू के प्यार के दर्शन जो हो गये! ...  

 

... यूरोप के अपने प्रवास में आसन्न मृत्यु की छाँव में रहती तोरू दत्त खिड़की खोलने पर दूर भारत की भोर में एक वनसरू को याद करती है, याद करती है उसकी छाँव में बहनों के साथ खेलता अपना बचपन:

  At dawn, my eyes delighted on it rest; 
Sometimes, and most in winter,—on its crest 
.. And far and near kokilas hail the day; 
And to their pastures wend our sleepy cows; 
And in the shadow, on the broad tank cast 
By that hoar tree, so beautiful and vast, 
The water-lilies spring, like snow enmassed. 
...

Beneath it we have played; though years may roll, 
O sweet companions, loved with love intense, 
For your sakes, shall the tree be ever dear. 
Blent with your images, it shall arise 
In memory, till the hot tears blind mine eyes! 
...
Unknown, yet well-known to the eye of faith! 
Ah, I have heard that wail far, far away 
In distant lands, by many a sheltered bay, 
When slumbered in his cave the water-wraith 
And the waves gently kissed the classic shore 
Of France or Italy, beneath the moon, 
When earth lay trancèd in a dreamless swoon: 
And every time the music rose,—before 
Mine inner vision rose a form sublime, 
Thy form, O Tree, as in my happy prime 
I saw thee, in my own loved native clime. 


 ...“पापा! चलें?”

मैं टूटता हूँ। मोबाइल स्क्रीन से दृष्टि हटा देखता हूँ। बिन देखे जानता हूँ कि कपड़ों के नीचे शरीर भीग रही है, भीतर भी कुछ भीग उठा है – समुद्री किनारा होगा, सरू वृक्ष से आती मर्मर ध्वनि होगी – एक आह सी कि उसकी संगिनी कुछ दिनों की मेहमान है:


What is that dirge-like murmur that I hear 
Like the sea breaking on a shingle-beach? 
It is the tree’s lament, an eerie speech, 
That haply to the unknown land may reach. 


...यहाँ भी समुद्री किनारा है, बू भरी हवा है – मृत्यु की बू, ध्वंस की बू, शाप की मल बू। क्या सभी शापित एक ही तरह होते हैं? तो फिर यह कविता इतनी हृदयस्पर्शी क्यों है? मरती हुई कवयित्री वनसरू वृक्ष पर आशीर्वादों की झड़ी लगा देती है:


Mayst thou be numbered when my days are done
With deathless trees—like those in Borrowdale,
Under whose awful branches lingered pale
“Fear, trembling Hope, and Death, the skeleton,
And Time the shadow;” and though weak the verse
That would thy beauty fain, oh, fain rehearse,
May Love defend thee from Oblivion’s curse.

 

तुम्हारा सौन्दर्य भले ढल जाय, मैं भले न रहूँ; मेरा प्रेम तुम्हें विस्मृति के अभिशाप से बचा लेगा।


 मनभावन वनसरुओं से घिरा कोणार्क मन्दिर भी ऐसा ही होगा – शिल्पियों द्वारा पत्थरों पर उकेरा गया महाकाव्य। आराधना नहीं की होगी धर्मपाद ने उसके प्रांगण में किंतु जीवन की अंतिम भोर किरणों से ऐसे ही आशीर्वाद माँगा होगा। शापितों के वरदान ऐसे ही होते हैं – कालजयी, कालातीत।


मैं कहाँ से कहाँ पहुँच गया? मन में काल और स्थान की कोई सीमा नहीं। कैसे आये होंगे सरू वृक्ष भारत में? मूलत: यहाँ के तो हैं नहीं। नेट बताता है कि संसार के अनेक तटीय भागों में ये वृक्ष पाये जाते हैं, समुद्र की क्षारीय वायु को नियंत्रित करने के लिये लगाये जाते हैं, कोणार्क मन्दिर को बचाने के लिये भी लगाये जा रहे हैं। मूलत: ऑस्ट्रेलिया या सम्भवत: मेडागास्कर के हैं? कौन लाया होगा इन्हें यहाँ? पश्चिमी तट पर भी तो नहीं पाये जाते?


मेडागास्कर यानि मालागासी यानि प्राचीन भारत में यमक्षेत्र के नाम से जानी जाती भूमि। मगद्वीप से आते सकलदीपी कहीं इसके समुद्री हवारोधी गुण से परिचित तो नहीं थे? लेकिन वे यमभूमि क्यों जायेंगे? यमभूमि में भी सूर्यपूजा स्थापित थी। गुरुपुत्र को बचाने गये कृष्ण कहीं वहाँ पर तो नहीं मिले उनसे?

साम्ब को स्वस्थ करने वाले  सकलदीपी पुरोहित तो नहीं ले आये वनसरू को यहाँ? 


मित्र और वरुण के देश के अभिचारी पुरोहित, सूर्यविद्या के ज्ञाता:

  • जलदेव के रूप में वरुण का सम्बन्ध स्वाधिष्ठान चक्र से है  - कफ दोष निवारण।
  • सौर अग्नि के रूप में मित्र का सम्बन्ध मणिपुर चक्र से है - पित्त दोष निवारण।
  • तड़ितझंझा इन्द्र रूपी सूर्य का सम्बन्ध हृदयचक्र अंत:प्राण से है – वात दोष निवारण।
यम का अर्थ होता है – नियंत्रण। यमभूमि के सूर्य पूजकों द्वारा साम्ब की रोग मुक्ति – त्रिकोणार्क क्षेत्र में त्रिदोष नियंत्रण द्वारा। त्रिकोण भूमि बाद के वृक्षरूप दारुविष्णु की उपासना करने वालों के क्षेत्र पुरी के उत्तरपूर्व यानि पवित्र ईशान कोण में पड़ती है।

पवित्र दारु किस वृक्ष का भाग थी? सरू पर बढ़ईगीरी के काम नहीं हो पाते और पुरी मन्दिर में स्थापित चतुर्मूर्तियों से लगता है कि बहुत कठिनाई हुई होगी उन्हें गढ़ते! चेहरे तो बन ही नहीं पाये! सपाट तल पर रंग द्वारा बनाये जाते हैं। कहीं बन्द कमरे में काम करते विश्वकर्मा को बीच में ही बाधित कर देने से अधूरी रह गई मूर्तियों का मिथक इस तथ्य से तो नहीं जुड़ता कि वह लकड़ी नक्कासी या तरास दृष्टि से बहुत कठोर रही होगी? वर्तमान विग्रह नीम की लकड़ी से बनाये जाते हैं लेकिन इन विग्रहों को तो कई बार आक्रमणकारियों के भय से गर्भ गृह से बाहर ले जा छिपाया जाता रहा। हर बारह से अट्ठारह वर्ष पर अब भी बदल दिया जाता है। यह किसी पुरानी स्मृति का दुहराव तो नहीं? मूल विग्रह किसी और लकड़ी के तो नहीं थे? 


नीम ही क्यों? नीम का सम्बन्ध सूर्य से माना जाता है। एक वैष्णव सम्प्रदाय है - 'निम्बार्क' - अर्क माने सूर्य। सूर्य है निम्ब यानि नीम में। पुन: साम्ब के सूर्योपासक पुरोहितों की ओर ध्यान जाता है और साथ ही वैदिक देवता विष्णु की ओर जो कि सौरदेव आदित्य ही हैं। नीम विशुद्ध भारतीय वृक्ष है। कहीं ऐसा तो नहीं कि मग देश और अर्क क्षेत्र की सूर्योपासना पद्धतियों का समन्वय हुआ?     


त्रिकोण का रहस्य क्या है? भुबनेश्वर, पुरी और कोणार्क का वर्तमान स्वर्ण त्रिकोण या कोणार्क मन्दिर में प्रभात, मध्याह्न, अस्त सूर्य प्रतिमाओं से बना त्रिकोण? त्रिकोण जो तंत्र मार्ग में अनेक अर्थ रखता है, कुछ और तो नहीं? सूर्यतंत्र जैसा भी कुछ था क्या?

...अनेक प्रश्नों की मेरी मनयात्रा को बाधित करता है पुत्री का स्वर – वो देखिये! यहाँ लाइट हाउस भी है। चलती गाड़ी से नाविकों को रात में दिशा दिखाने वाला प्रकाश स्तम्भ दिखता है। 


बोर्ड से पता चलता है कि दर्शकों के लिये खुला हुआ है। क्या अब भी यह उपयोगी है? या केवल पुराने गौरव की पुनर्स्थापना को यूँ ही बना दिया गया? पता नहीं। कहते हैं किसी समय सूर्यमन्दिर का उपयोग यूरोपीय लोग दिशा निर्देशक प्रकाश स्तम्भ के तौर पर करते थे।


“नहीं रुकना हमें यहाँ, हमें तो उसका महालय देखना है जो समस्त संसार को प्रकाशित करता है।“


(जारी)           



10 टिप्‍पणियां:

  1. कितनी मेहनत करते हैं गिरिजेश जी! बढ़िया लग रही है यह यात्रा।
    कविता पहले पढ़ी है मैंने, पर आप तो कैसे कैसे सामी निकाल लाते हैं - वाह!

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    1. धन्यवाद। मैं एक श्रमिक हूँ :)
      आप एक श्रम करेंगे सबके लिये? तोरू के काव्यांशों के भावानुवाद यहाँ दे सकें तो अच्छा हो। लोग अंग्रेजी देख सहम गये हैं।
      आप अनुवाद करेंगे तो भाव उतर आयेंगे। छ्न्द कोई आवश्यक नहीं।

      हटाएं
  2. साम्य* त्रुटी क्षमा करें!

    अनुवाद का यत्न करूँगा, समय सीमा न बाँधिए।
    इस सप्ताहांत तक मान के चलते हैं।

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  3. प्रश्नचिन्ह वाले पैरा के लगभग हर ? के लिए एक ही जवाब, वो भी सवाल के रूप में, 'क्यों नहीं हो सकता?'

    श्रमसाध्य कर्म करने वाला श्रमिक ही होता है| दुसरे श्रमिक के अनुवाद की प्रतीक्षा में ये तीसरा बन्दा भी लाईन में है|

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  4. बहुत सुन्दर. तथाकथित विलायती सरू अपने पूर्वी समुद्री किनारे अत्यधिक पायी जाती है. क्षारीय वायु को नियंत्रित करने के अतिरिक्त वे समुद्री तट के रेत को रोके रखते हैं. इनकी बाकायदा खेती होती है. जलाऊ लकड़ी के रूप में और कभी कभी बल्लियों के लिए भी इनका प्रयोग होते देखा है. पश्चिमी तट में इन्हें कहीं नहीं देख पाया.

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