सोमवार, 25 जून 2012

6. कोणार्क सूर्यमन्दिर : अभिशप्त ब्रह्मा, अभिशप्त केतकी?

अर्कक्षेत्र का वनसरू

भाग 12, 3, 4 और 5 से आगे...

पथ के दोनों ओर कभी यादृच्छ, कभी पंक्तियों में वनस्पति की उपस्थिति अंतहीन लगने लगी है। सूर्यमन्दिर को जाते पथिकों के स्वागत में प्रकृति ने पथ को अपनी सुषमा से अलंकृत कर रखा है। निर्माणकामी अवश्य प्रकृति और सौन्दर्य प्रेमी रहा होगा! 

अर्क के दर्शन को जाते श्रद्धालुओं के स्वागत में अर्क नामधारी फूले मदार और ... संकेत करते हुये मैं चालक गुड्डू से पूछ बैठता हूँ – ये जो दिख रहे हैं, उन्हें क्या कहते हैं? वह नहीं समझ पाता। दुबारा पूछ्ता हूँ और परिचय की मुस्कान उभरती है ज्यों फूल खिल उठा हो – किया, कियाफूल ...उससे इतर निकालते हैं । बहुत तेज सेंट ...अभी सीजन नहीं है नहीं तो फूला दिखाता।

“किया, कया, क्या? ...केवड़ा?”

“हाँ, वही...इसकी खेती भी होती है।“

अपने अनुमान में मैं सही था – केवड़ा (Panadanus odoratissimus)

“भगवान को चढ़ता है?”

“नहीं ...इतर निकालते हैं...मदार का फूल उधर चढ़ता है।” गुड्डू के लिये हिन्दी बोलना कठिन है। मैं उधर का अर्थ पुरी से लेता हूँ। प्रकट में कहता हूँ – गाड़ी रोक लो।

पिता पुत्री दोनों उतर जाते हैं। बेटी डिजिटल कैमरे से मदार के चित्र उतारने लगी है और मैं केवड़े के...

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वनसरू, अर्क, नीम जैसी एक वनस्पति

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 पुष्पित अर्क यानि मदार
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 पुष्पित मदार
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सड़क किनारे केवड़ा
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केवड़ा झुरमुट
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केवड़ा (जड़, तना)

...केवड़ा। इसका संस्कृत नाम केतकी, केतक, केविका, स्वर्ण केतकी, पुष्प चामर, पांशुका आदि आदि। इसके नर फूल के आसवन से सुगन्धित द्रव्य निकलता है।

एक पौराणिक कथा है – निर्माता ब्रह्मा और पालक विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हो गया। विवाद बढ़ता देख संहार देव शिव उनके सामने ब्रह्मांडीय तेजस्तम्भ के रूप में प्रकट हुये और यह व्यवस्था दी कि ब्रह्मा स्तम्भ का शीर्ष पता कर के आयें और विष्णु मूल। जो पहले आ जायेगा उसे श्रेष्ठ माना जायेगा। विष्णु को मूल नहीं मिल पाया और वे असमर्थता जताते हुये शिव के सामने आ खड़े हुये। ब्रह्मा को राह में ही केतकी पुष्प मिला। पूछने पर उसने परिचय दिया कि उसका स्थान शीर्ष पर है। ब्रह्मा के प्रलोभन पर उसने शिव के सामने आ कर झूठी गवाही दी कि ब्रह्मा शीर्ष पर पहुँच गये। वास्तविकता जान कर शिव ने दोनों को शाप दिया – असत्य वाचन के कारण ब्रह्मा की आराधना नहीं होगी और उनका साथ देने के कारण केतकी का फूल शिव आराधना में प्रयुक्त नहीं होगा। लोग शिव तो क्या, किसी देव को केवड़े का फूल नहीं चढ़ाते...

...  भारतीय मिथकों की बराबरी केवल मिस्र, ग्रीस और रोम के मिथक ही कर सकते हैं। इस मिथक के पीछे का सत्य क्या है? मुझे यह प्राचीन भारत की तीन पूजा पद्धतियों के आपसी संघर्ष से जुड़ी कथा लगती है। ब्रह्मा का वर्तमान रूप वेदों में नहीं मिलता। खींच खाँच कर प्रजापति से लोग ब्रह्मा की पहचान करने के प्रयास करते हैं लेकिन बात बनती नहीं। ब्रह्मा का सरस्वती से सम्बन्ध विवादित है कि वह उनकी पुत्री थीं जिनसे विवाह के कारण वह पूजा स्थान से पतित हो गये।

भारत में कभी इनकी आराधना व्यापक स्तर पर थी और वैसे ही लुप्त हो गई जैसे विष्णु और वैष्णव मत के विकास के कारण सूर्यपूजा। ब्रह्मा का सम्बन्ध ज्ञान साधना से है और सरस्वती तो ज्ञान की देवी हैं ही। राजस्थान का पुष्कर आज भी ब्रह्मा के मन्दिर के लिये जाना जाता है और उसे ब्रह्मा की यज्ञभूमि कहा जाता है। यह सिद्ध हो चुका है कि लुप्त होने के पहले सरस्वती राजस्थान में बहती थी।

आख्यान है कि जब ब्रह्मा पुष्कर में यज्ञ के लिये दीक्षित हुये तो उनकी पत्नी सरस्वती उस समय वहाँ नहीं थीं इसलिये उन्हों ने एक गुर्जर कन्या ‘गायत्री’ से विवाह कर यज्ञ के यजमान का पद ग्रहण किया। पुष्कर का मन्दिर गुर्जर प्रतिहार वंश के किसी राजा का बनवाया हुआ है और आज भी वहाँ के पुजारी वर्ग में गूजर पुरोहित होता है। कौन था उनका पुरोहित?

उल्लेखनीय है कि गुर्जर सूर्य पूजक थे और गायत्री का सम्बन्ध भी सूर्य से है। कहीं गायत्री के द्रष्टा विश्वामित्र की परम्परा से जुड़ा हुआ तो नहीं था कोई ब्रह्मा का पुरोहित्? विश्वामित्र को ब्रह्मा के समांतर सृष्टि का रचयिता माना जाता है। राजर्षि से ब्रह्मर्षि बनने के तप में उन्हों ने भैंस, नारियल आदि वैकल्पिक साधनों का अनुसन्धान किया। कहीं ऐसा तो नहीं कि सरस्वती के सूख जाने के पश्चात उन्हें गायत्रीमंत्र के दर्शन हुये और सरस्वती से जुड़ी आर्य सभ्यता को उससे नई दिशा मिली जिसका नेतृत्त्व ब्रह्मा के हाथ में था?

विश्वामित्र के भांजे परशुराम द्वारा राजसत्ता के संहार के पश्चात उपजे निर्वात को दंतकथाओं में यही ब्रह्मा पूरते हैं। मान्यता है कि राजस्थान के ही आबू(अर्बुद) पर्वत पर ब्रह्मा द्वारा किये यज्ञ से क्षत्रियों का अग्निकुल उत्पन्न हुआ। यह कथा भी एक वैकल्पिक व्यवस्था की ओर संकेत करती है। अग्निकुल में ही आता है गुर्जर प्रतिहार वंश जिसने राजस्थान में पहला राजपूत साम्राज्य स्थापित किया।      

क्या यह मानें कि लुप्तप्राय सरस्वती (बाद के स्यमंतपंचक कुंड) के किनारे ज्ञान साधना की कोई पद्धति विकसित हुई थी जिसका अपने प्रसार के दौरान स्थापित शिव और विष्णु पूजा पद्धतियों से संघर्ष हुआ और इनके अनुयायियों ने लुप्तप्राय सरस्वती और ब्रह्मा को लेकर घिनौना मिथक गढ़ दिया?

ऐसे मिथक के बाद भी ब्रह्मा की पूजा पद्धति पूर्वी तट तक आ पहुँची। केवल पूर्वी तट पर ही केवड़ा प्राकृतिक रूप से होता है। केवड़े का फूल रूप आकार में ऐसे कमल जैसा दिखता है जिसकी पंखुड़ियाँ मुँद गई हों। कहीं ऐसा तो नहीं कि यहाँ पहुँचने पर ब्रह्मा के पुजारियों ने इसके अद्भुत गन्ध और रूप के कारण अपनी पूजापद्धति का एक अंग बना लिया हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि भाँग, धतूरे आदि के उपयोगी शिवपूजक और क्षीर सागर के कमल पर शयन करते विष्णु के पुजारियों को यह उद्धत प्रतिद्वन्द्वी भाव न रुचा हो और उनके संयुक्त प्रतिरोध स्वरूप ब्रह्मांडीय तेजस्तम्भ वाला मिथक उपजा हो?

पास ही भुबनेश्वर में शिव लिंगराज यानि ब्रह्मांडीय तेजस्तम्भ के रूप में विद्यमान हैं,  पुरी में विष्णु सूर्यपूजक कृष्ण के जगन्नाथ रूप में।

कहा जाता है कि लिंगराज शिव के अभिषेक में ब्रह्मा आये तो शिव ने उन्हें जाने से रोक दिया। पुष्कर झील की तरह ही भुबनेश्वर के बिन्दुसागर झील के तट पर है ब्रह्मा का मन्दिर। पुन: स्यमंतपंचक कुंडों पर ध्यान जाता है। ब्रह्मा का सम्बन्ध जलराशि से अवश्य रहा होगा।

लिंगराज का दर्शन तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक अनंत वासुदेव विष्णु और बिन्दुसागर ब्रह्मा का दर्शन नहीं कर लिया जाता। अब क्या हुआ ब्रह्मा के अपूजनीय होने के शाप को?

कहीं यह कथा तीनों पूजा पद्धतियों के उस समन्वय की ओर तो संकेत नहीं करती है जिसमें ब्रह्मा की पूजा ही लुप्त हो गई?  

अचानक ही केवड़ा और मदार युग्म मन को दूसरी ओर फेर देते हैं। संस्कृत नाम केविका, केतक या केतकी का केवड़ा होना समझ में नहीं आता। यह नाम अवश्य लोक से संस्कृत में गया होगा।

वास्तु में दिशाओं के कोण महत्त्वपूर्ण होते हैं और उनके अर्क यानि निचोड़ स्थान के रूप में नाम पड़ा कोणार्क, कोणार्क जो कि पवित्र पुरी के शुभ कोण ईशान में स्थित है लेकिन पहले इसका नाम केविका या किया और मदार यानि अर्क का संयुक्त रूप तो नहीं था? कियार्क जैसा कुछ?

दूसरी सम्भावना भी बनती है। अथर्ववेद में महुवे के फूल के आसवन से ‘परिस्रुत’ नामक पेय का वर्णन है जिसका पान ताजे और किण्वित (fermented) दोनों रूपों में किया जाता था। परिस्रुत नशामुक्त ‘सोम’ और नशायुक्त ‘सुरा’ के बीच का द्रव था। सिद्ध है कि पुष्प आसवन द्वारा उसे निचोड़ने यानि उसका अर्क निकालने का ज्ञान बहुत प्राचीन काल से भारतीयों को था। इस भूमि का नाम किया या केविका के अर्क निकालने की भूमि होने से तो नहीं पड़ा? कियार्क या केविकार्क या केतकार्क? पता नहीं?

...अंतहीन प्रश्नों के गुंजलक हैं, नयनों के आगे अन्धेरा है और यात्रा है आदित्य के मन्दिर की!...

 

टैक्सी में सवार मैं मन को शून्य कर लेता हूँ।

नहीं केतकी, तुम अभिशप्त नहीं हो।

 जो अतिथियों का स्वागत पथ के दोनों ओर सुगन्धि सजा कर करती हो, जिसका साथी अर्क हो, जिसके पुष्प आसव केवड़ा जल से संसार सुगन्धित होता हो और अनेक को आजीविका मिलती हो; वह अभिशप्त नहीं हो सकती।

 ब्रह्मा की ब्रह्मा जानें अभी तो नेट पर ही मग ब्राह्मण चाणक्य की नीति का यह श्लोक पढ़ रहा हूँ, सूर्य उपासक पितरों के संस्कार अर्क उसमें विद्यमान थे, उसने तुम्हें सदोष ही बस एक गुण के कारण सम्मान की कसौटी बना दिया:

व्यालाश्रयापि विकलापि सकण्टापि

वक्रापि पंकिलभवापि दुरासदापि।

गन्धेन बन्धुरसि केतकि सर्वजंता

रेको गुण: खलु निहंति समस्तदोषान्॥

(हे केतकी! तुम्हारी गोद में साँप रहते हैं, तुम्हारा फल खाद्य नहीं होता, तुम्हारे पत्ते काँटों से ढके होते हैं, तुम्हारी बाढ़ भी टेढ़ी मेढ़ी होती है, तुम कीचड़ में उत्पन्न होती हो और तुम्हारा पुष्प सुलभ भी नहीं; फिर भी अपनी दिव्य सुगन्धि के कारण तुम दूसरों को बन्धु समान प्रिय हो! एक अनूठा दिव्य गुण समस्त दोषों पर भारी पड़ता है।)

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नहीं केतकी! तुम अभिशप्त नहीं हो।...

 

...गुड्डू ने पुलिस चौकी पर गाड़ी रोक दी है - साहब! बीस रुपये दीजिये, हमलोग मन्दिर आ पहुँचे हैं।

“कहाँ है?”

“बस पहुँच गये...”

युवा वटवृक्ष की छाँव तले हम पिता पुत्री उतरे हैं। आगे, आगे ...सामने कौन है?

(जारी)

18 टिप्‍पणियां:

  1. 'एक अनूठा दिव्य गुण समस्त दोषों पर भारी पड़ता है।'

    रोचक!

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  2. आपके ब्लॉग पर इस तरह के रोचक, शोधपरक और ज्ञानवर्धक लेख हमें बार-बार खींच ले आते हैं। इसके अगले अंक की भी प्रतीक्षा रहेगी।

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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  4. रोचक जानकारीयुक्त बेहतरीन संस्मरण...

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  5. गिरिजेश जी - आपकी यह शृंखला - हर पोस्ट - सहेजने जैसी है | हर एक पोस्ट कई कई बार पढ़ रही हूँ | और फिर फिर से चली आती हूँ पढने के लिए | फिर एक बार - आभार आपका |

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  6. सोमरस के बारे में एक अच्‍छी जानकारी यह भी है कि जिस वनस्‍पति से सोमरस बनाया जाता है, वह कभी वर्तमान भारत में उगी ही नहीं थी। अफगानिस्‍तान (कभी अखण्‍ड भारतवर्ष का हिस्‍सा रहे) एवं उसके आस-पास के क्षेत्रों में अभी वह वनस्‍पति उगती है जिससे सोमरस बनता है।

    परिस्रुत नशामुक्त ‘सोम’ और नशायुक्त ‘सुरा’ के बीच का द्रव था।

    सोम को नशायुक्‍त या नशामुक्‍त कहना शायद जल्‍दबाजी होगी। माइकल वूड की स्‍टोरी ऑफ इंडिया एक बार देख लें। टोरेंट पर उपलब्ध है। उसमें कहीं बीच में सोमरस के बारे में आया है। माइकल वूड खुद पीकर बताते हैं कि इसका असर कैसा महसूस होता है... :)

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    1. :) पता है होम सोम वनस्पति के बारे में और उसके ताजे अर्क के प्रभाव के बारे में भी लेकिन संहिताओं में ही ऐसे सुस्पष्ट संकेत उपलब्ध हैं जो सोम की इस 'पहचान' को खारिज कर देते हैं।
      कभी लिखूँगा सोम पर भी लेकिन भय लगता है। अनिवार्यत: मेरे ऐसे लेख लम्बे शृंखलाबद्ध हो जाते हैं :(
      जैसा कि कोणार्क के साथ हो ही रहा है।

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    2. सिद्धार्थ जी - बे वनस्पतियाँ सोम नहीं हैं | अब यह नहीं पाया जाता | सोमलता के जो विवरण वेदों में मिलते हैं, वैसी बिलकुल नहीं हैं ये वनस्पतियाँ , जिनके बारे में सोम होने के दावे किये जाते हैं | कभी इस पर लिखूंगी, अभी इतना ही |

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    3. शिल्‍पाजी, राव साहब तो हो सकता है शृंखला बनाने तक इंतजार कराए, आपकी पोस्‍ट का इंतजार रहेगा। जानकारी देने के लिए आभार। मेरा एक दोस्‍त इन दिनों अफगानिस्‍तान में है। मैं सोच रहा हूं कि उससे सोम के पादप मंगवा लूं। आप अगर पुख्‍ता जानकारी देंगी तो शायद मंगवाने में आसानी रहेगी।

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    4. siddhaarth ji - som ab nahi hota | rigved ke online versions me padhaa hai ...

      girijesh ji - aapka fir ek bar aabhaar is shrunkhala ke liye

      mad - madaar , manmad, kamdev, unki judwa bahan sandhya, chandrabhaaga,........in sab ka aasi sambandh avashya hoga n??

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  7. कितना बड़ा भ्रम शमन हुआ आज ...
    उड़ीसा में "मंदार" नाम "अड़हुल" केलिए प्रयुक्त देख मुझे मदार और मंदार एक ही लगता था और जिसे आपने चित्र में "मदार" नाम से संबोधित किया है ,उसे "आक"(जिससे शिव की पूजा होती है) के नाम से जानती थी ..

    बाकी ,आलेख की तो क्या कहूँ ..

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