शुक्रवार, 29 जून 2012

7. कोणार्क सूर्यमन्दिर : देहरी और मिहिर से भेंट

भाग 12, 3, 4, 5 और 6 से आगे...

बीते युग के सामने खड़ा हूँ, भीतर टटोल रहा हूँ – कुछ नहीं है, कुछ भी नहीं। कदम बढ़ते हैं और सामने जो है धीरे धीरे आहत सा श्रद्धा भाव उड़ेलता है – काश! ....

बद्रीनाथ धाम प्राण हथेली पर लेकर गया था - वर्षा और भयावह भू स्खलन से संघर्षरत। उनसे साक्षात हुआ, झेला, सीधी ऊँचाई पर पैरों के नीचे की भूमि को काँपते अनुभव किया और आँखों के आगे पूरी पहाड़ी को खिसकते देखा। यह प्रतीति पुष्ट हुई कि जीवन कुछ नहीं है। वर्तमान होता नहीं, भविष्य अज्ञात  और भूत तो जो बीत गई सो बीत गई। गर्भगृह में उस दिन सम्भवत: दस जन भी नहीं पहुँचे। विधिवत और सम्पूर्ण दर्शन, समय की कोई रोक टोक नहीं  – अम्मा का गद्गद कंठ स्वर सारे भाव ले डूबा।

समुद्र के प्रभास तट पर द्वारकाधीश मन्दिर की सन्ध्या आरती के समय दर्शन हुये और आँखों से आँसू बह चले थे - पहली बार किसी मन्दिर में उसके आँसू जिसने कभी वर्षों मन्दिरों में प्रवेश तक नहीं किया। मैं स्तब्ध हुआ था कि कहाँ से आये ये आँसू? कहाँ छिपे थे?

जगनाथ पुरी मन्दिर के बाहर की जीवन्तता से जितना ही प्रभावित हुआ, अन्त:पुर की गन्दगी से उतना ही विरक्त। गन्धाते चमगादड़ों की आहटें द्वार पर स्वागत करती हैं और भीतर!

मुक्तिमंडप(धाम?) के किनारे ऊँचाई पर बैठे पाँव लटकाये अनेक पतितपावन, उनके पाँव से मस्तक स्पर्श करा दो तो परम पुण्य, मुक्ति। हाय ईश्वर!  एक पंडे ने पूछा था – दर्शन करना हो तो ... नहीं करना मुझे दर्शन वर्सन। आँखों के आगे बोधगया मन्दिर का गर्भगृह नाच उठा।

...सामने स्वर्णमंडित बुद्ध हैं। चढ़ाये गये श्रद्धारूप रक्तकमल वेदी से झाड़ू से बुहार कर कचरे के प्लास्टिक पात्र में कुचले जा रहे हैं। राह में श्रीलंका, जापान, थाईलैंड और जाने कहाँ कहाँ से आये स्तोत्र पढ़ते मन्दिर जाते पंक्तिबद्ध श्रद्धालुओं के हाथ में रक्तकमल देख रोमांच हो आया था। यहाँ उनका इतना अनादर!

जीवंत मन्दिर, कुचली आत्मायें। नहीं करना दर्शन मुझे, पाँव द्वार से ही लौट गये थे। बोधिवृक्ष की बाड़ से कुछ स्वर्णअंश ले मैं लौट आया। बाहर हाथ के कमल को यथावत देख एक भिक्षु की विद्रूप मुस्कान देखा ही था कि उसका मोबाइल बज उठा था - जादू तेरी नज़र...तू है मेरी किरण। पास जा कर मैंने पूछ लिया - इस किरण की तलाश है या बुद्ध के बोध किरण की? वह नासमझ मुस्कान दे कर चलता बना...        

...लेकिन आज जो सामने है वह तो काव्य है! गहन आदर भाव जगाता है, बुलाता है कि आओ! मुझे निहारो...लम्बे गलियारे के सामने उत्तुंग श्यामल शिखर, दूर न हो कर भी दूर। प्रात: की छिपी किरणें ध्वस्त महालय के शेष अंशों के मध्य आराध्य को जैसे ढूँढ़ रही हैं और मेरे मन में एक वाक्यांश उठता है – प्रस्तर महाकाव्य कोणार्क! शिल्पियों का शब्दहीन दृश्य काव्य – कोणार्क। अभी तो भीतर गया भी नहीं, तो भी? पूर्व परिचय साक्षात हुआ है, नयनों से नयनों के पहले साक्षात्कार का पल है।  पुरी तट की लहरों पर रात रची कविता पराती बन आगे बढ़ उठी है:

Thousands and thousands of waves,

Millions of 'Kash' flowers dancing before eyes,

Dark cloudy sky, the moon listening attentive

To the tunes of wind and sea.

I'm in love at Puri beach.

....

Not only are by your pen o poet!

Words immortal in poetry cast

Watch the magic of chisel and sweat

Stones are here to long and last.

पत्थरों की कामना - ध्वंस के भीतर सनातन अस्तित्त्व। ऐसे ही होते रहे होंगे ऋचाओं के दर्शन:  

प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं
रूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनुर्यजूंषि ।
सामानि यस्य किरणाः प्रभवादिहेतुं
ब्रह्मा हरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम् ॥...

...बेटी ने हाथ पकड़ा है – “पापा... टिकट।“ तन्द्रा टूट गयी है। मुस्कुराते गुड्डू के मन में क्या है? क्या सोच रही होगी बेटी?

झेंप मिटाने को कहता हूँ – आगे खड़ी हो, तुम्हारा चित्र उतार लूँ।

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गुड्डू ने संकेत किया है – मैं वहाँ इंतज़ार करूँगा।

“जाओ गुड्डू! मुझे कोई जल्दी नहीं है।“

मैं वापस इहलोक में हूँ। पुरातत्त्व विभाग के लगाये प्रस्तर अभिलेख सामने हैं। हिन्दी में ‘शदी’ और ‘सुरक्षित स्थित’ की वर्तनी त्रुटियों से आहत अंग्रेजी देखता हूँ – पहली सदी में दूर देश के पेरिप्लस ने लिखा इस क्षेत्र का नाम कइनापारा या कैणापारा?...

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... यहाँ स्थापित पत्तन था जहाँ जहाज रुकते थे, समुद्र मार्ग से व्यापार होता था। साम्ब की प्राचीन गाथा सच है। इस क्षेत्र में आक के पौधों की बहुलता भी उसे सिद्ध करती है। वैद्यकी में आक (अर्क या मदार) को सूर्य के गुणों का शोषक माना गया है। उसके कुष्ठ रोग से मुक्तिदायी होने के उल्लेख आयुर्वेद में मिलते हैं:

जीवितुं यदि वाञ्छन्ति सत्यर्के मयि भूतले ।

अन्धा: कुतोऽवसीदन्ति श्वासश्वित्रकफार्दिता:॥

(यदि नेत्रज्योति खोकर अंधे हो गये हो, श्वास, कास, श्वेत कुष्ठ और कफ के रोगों से पीड़ित हो और अब भी तुम्हारे जीने की इच्छा है तो मुझ आक के रहते हुए तुम कष्ट क्यों उठा रहे हो?)

‘कण्डूकुष्ठकृमिविनाशनः’ और ‘वातकुष्ठव्रणान्हन्ति’ आदि से भी स्पष्ट है कि अर्क कुष्ठरोग के उपचार में प्रयुक्त होता है। उल्लेखनीय है कि आधुनिक आयुर्वेद के जनक माने जाने वाले चरक भी सूर्यपूजक मग ब्राह्मण थे और आज भी गाँव देहात में त्वचा के श्वेतकुष्ठ को ‘चरक रोग’ कहा जाता है। ...   

...मन पुन: अनुमान लगाने लगा है - कइनापारा = कइना+पारा। पारा तो पुर या पुरी से निकसा होगा। आज भी भारत में गाँव या बस्तियों के नाम पीछे पुरवा, पाड़ा, पारा आदि लगते हैं लेकिन कइना? स्पष्ट है कि पुराने नाम में ‘अर्क’ नहीं है लेकिन ‘कइना’ है तो यह मानें कि स्थान नाम या तो केवड़े से सम्बन्धित है या कोण से? मैंने सिर को झटक दिया है – यह भी हो सकता है कि इसका उत्स इन सबसे न होकर किसी दूसरे अज्ञात कारक से हो, किस लिये सिर खपाना? मेरा मन कितना झूलता है रे! कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है? भाव भी कैसे इतनी तेज बदल जाते हैं! पल में तोला, पल में मासा!...

हम पहले आ पहुँचे दर्शकों में एक हैं। मन्दिर के और निकट हो एक और चित्र लेता हूँ।

konark_oil_2मुग्ध निहारता खड़ा हूँ कि सामने से एक स्वर आता है – साहब, गाइड करेंगे? ... मैं गवर्नमेंट अप्रूव्ड गाइड हूँ।

मन में भुनभुनाता हूँ – यायावर! तुम जिस तरह से चाहत का प्रदर्शन कर रहे हो, ताड़ने वाले ताड़ ही लेंगे कि बन्दा आसक्त है! लेकिन प्रकट में मैं निर्णय ले चुका हूँ – चार्ज कितना है?

“सौ रुपये”

मैंने सहमति में सिर हिला दिया है।

पूछ पड़ता हूँ – आप का नाम क्या है?

“मिहिर दास”

कानों पर विश्वास नहीं होता – मिहिर?

“हाँ, मिहिर दास।“

मैं पूछ बैठता हूँ – आप जानते हैं कि मिहिर माने सूर्य होता है?

वह सहमति में सिर हिलाते हैं।

निज महालय के दर्शन कराने को सूर्यदेव ने अपने अनुचर को भेज दिया है, और क्या चाहिये?

नन्दन कानन में जो गाइड मिले थे उनका नाम सनातन था। सनातन और मिहिरदास। सिवाय मिहिर नामधारी अपने भतीजे के ऐसे नामों वाले पहले जन मिले हैं मुझसे। उड़ीसा के नाम संस्कार अलग से हैं!

बात पक्की समझ मिहिर दास हमें एक वृक्ष की छाँव में ले जाते हैं – मन्दिर में प्रवेश के पहले कुछ बातें जान लीजिये।

वह हाथ जोड़ कर हमें प्रणाम करते हैं, औपचारिक अभिनन्दन करते हैं –पुरातत्त्व विभाग की ओर से मैं उड़ीसा के कोणार्क क्षेत्र में आप का स्वागत करता हूँ। मेरा नाम मिहिर दास है और मैं ...

मैं उनकी हिन्दी से थोड़ा अचम्भित सा हुआ हूँ लेकिन वह तेज प्रवाह में आ चुके हैं...अचानक मुझे सुध आती है – रिकॉर्ड कर लूँ, यहाँ तो कोयल की कूक भी है।

वह राजा के माँ की मन्नत बताते हैं। चन्द्रभागा नदी की बात करते हैं। यह भी बताते हैं कि मन्दिर खंडोलाइट पत्थरों से बना हुआ है जिनमें 32% तक लोहा होता है। मन्दिर के प्रवेशद्वार चौखट ग्रेनाइट पत्थरों में उकेरे गये हैं।

मन्दिर के पत्थरों को आपस में भी लोहे की छ्ड़ों से जोड़ा गया है। समुद्र की क्षारीय हवाओं से अभिक्रिया के कारण लौह तत्त्व का क्षरण हो रहा है और वह काला पड़ता जा रहा है – ब्लैक पैगोडा। वह मन्दिर की नागर उपशैली कलिंग की बात करते हैं जिसमें मन्दिर के चार द्वारों पर चार जंतुओं सिंह, शेर(?), हाथी, अश्व की प्रतिमायें होती हैं। प्रवेश में नवग्रह की मूर्तियाँ होती हैं।

 

एक सीधी रेखा में चार मंडप होते हैं – भोग, नृत्यनाट्य, प्रार्थना और मुख्यमन्दिर। नक्काशी बाहर तक सीमित होती है और भीतर की दीवारें सपाट रखी जाती हैं...

...उनकी बातों में गम्भीर त्रुटियाँ भी हैं। सेकुलरी प्रशिक्षण के कारण वह काला पहाड़ वाले दुखद इतिहास को छोड़ 55 टन भारी विराट मिथकीय चुम्बक पत्थर की बात करते हैं जिसने आकर्षण शक्ति से सभी पत्थरों को एक साथ बाँध रखा था। पुर्तगाली व्यापारियों ने उसे निकाल दिया। इस कारण मन्दिर ध्वस्त हो गया।    

परिचय व्याख्यान के पश्चात वह हमें पूर्वी सिंहद्वार पर ले आये हैं।

 (सिंहद्वार पर मैं और गाइड मिहिर दास) 

(जारी)

___________

कोणार्क यात्रा के पहले इन्टरनेट पर ही पर्याप्त अध्ययन किया था और उपयोगी सामग्री को अपने लैप टॉप में रक्षित कर लिया था। अब लिखते हुये उस सामग्री से उद्धरण दे रहा हूँ, दुबारा गोते लगा रहा हूँ। निरूपण में बहुत सहायता मिल रही है। वेब पर इन सामग्रियों के प्रदाताओं को मेरा नमन और आभार।

25 टिप्‍पणियां:

  1. गिरिजेश भाई, आप यात्रा के समय भी इतने सजग रहते हैं कि पाठकों के लिए कोई भी छोटी-से-छोटी चीज विस्मृत नहीं करते। सम्भव है कि हम पाठक भी वहाँ जाकर भी इन जानकारियों से अनभिज्ञ रह जायें। आपको हिन्दी ब्लॉग जगत में इस ब्लॉग के रूप में सुन्दर योगदान हेतु धन्यवाद!

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  2. आपकी खोजपरक पोस्ट में मजा आ गया, और बहुत सारी जानकारी मिली है तो अब मन उत्कंठित है यहाँ आने के लिये ।

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  3. शोधार्थियों को सीख लेने वाली यात्रा और विवरण.

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  4. वाह आपने तो पूरी कि‍ताब ही लि‍ख दी इस यात्रा पर. कोई दूसरा कभी इतनी मेहनत नहीं करने वाला

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    1. किताब तो नहीं, तथ्य एक स्थान पर समेटने का प्रयास भर है. आप जैसे गुणीजन सराह रहे है, संतोष है.

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  5. सार्थक श्रम। बेचैन आत्मा तो आप का नाम होना चाहिए।:)

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    1. धन्यवाद. 'मन के पहिये' घूम रहे हैं बेचैनी तो रहेगी ही. :)
      वही चला रही है और आप जैसो की उपस्थिति भी.

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  6. मिथकीय चुम्बक, पत्थर न होकर कोई शैली होगी जो सारे पत्थरों को आपस में जोड़ के रखे, मेहराब की तरह ही कुछ..

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    1. दधिनौती पत्थर कहा जाता है. इस कड़ी में बताया गया है. http://girijeshrao.blogspot.in/2012/06/5.html आप ने पढ़ा भी है. :)

      विस्तार से तब बताऊंगा जब संरचना वाली कड़ी लिखूंगा.
      महत्त्वपूर्ण यह है कि तथ्य को भुला दिया गया और उसकी जगह एक मिथक जोड़ दिया गया. एक साथ सेकुलरी शिक्षा और शुतुरमुर्गी मानसिकता के कमाल के दर्शन होते है. मंदिर बनने का इतिहास भी रोचक और महत्त्वपूर्ण है, अगली कड़ी की प्रतीक्षा कीजिये.

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  7. उत्तर
    1. आप आये, सराहे; समझा कि श्रम सफल हुआ. मल्हार मेरे प्रिय ब्लोगों में है.

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  8. वाह, बहुत ही सशक्त ट्रेवलॉग! जियो!

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  9. बढ़ रहे हैं आपके साथ... किसी दिन वहां गया तो यह ब्‍लॉग खोलकर पढ़ता रहूंगा रास्‍ते में... :)

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  10. आपका वर्णन विस्तृत और बारीक है । कई साल पहले की गई अपनी कोणार्क यात्रा याद आ गई ।

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  11. पूरी श्रृंखला पढ़कर प्रतिक्रिया दूँगा यदि पढ़ पाया तो... :)

    अभी उपस्थिति दर्ज कर लीजिये. कोणार्क मैं भी देख चूका हूँ लेकिन इतना अध्ययन न तब किया था न बाद में. आपने इस विषय पर इतना शोध किया है जितना इस पर PhD की thesis लिखने वाला भी नहीं करता. नमन आपके प्रयास को...

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  12. एक आध बार से नै होगा, कई कई फेरा ,डुबकी लगाना पड़ेगा घूर घूर के ...

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