शनिवार, 16 जून 2012

तोरू और अविनाश के साथ - वनसरू की छाँव में

saruकोणार्क यात्रा की पिछली कड़ी में आप को याद होगा कि हमने वनसरू की छाँव पुन: आ रुकने का वादा किया था। कारण अपने आप में स्मृति आह्लाद को जगाने वाला है – अविनाश चन्द्र द्वारा तोरू दत्त की कविता के अनुवाद का वादा।

जिन क्षणों में मैं अपने कैशोर्य को जी गया था, उन क्षणों को अविनाश के अनुवाद ने पुन: रससिक्त कर दिया है। समझ में नहीं आ रहा कि मूल को सराहूँ या अनुवाद को। अद्भुत है अद्भुत!

किसी ने सच ही कहा है Poetry is joy forever!

अविनाश के ब्लॉग मेरी कलम से ... गुजरना हिन्दी काव्य के सौन्दर्य को पीने जैसा होता है, शब्द माधुरी से मुग्ध होने का होता है। सम्भवत: इलियट ने कहा था कि वर्तमान से भूत का पुन:सृजन होता है। भूत परिवर्तित परिवर्द्धित होता है। कड़ियाँ जुड़ने से शृंखला वही पुरानी नहीं रह जाती।  आज साक्षात्कार कर रहा हूँ।

 

Our Casuarina Tree  तोरु Toru Datt

LIKE a huge Python, winding round and round
The rugged trunk, indented deep with scars,
Up to its very summit near the stars,
A creeper climbs, in whose embraces bound

No other tree could live. But gallantly
The giant wears the scarf, and flowers are hung
In crimson clusters all the boughs among,
Whereon all day are gathered bird and bee;

And oft at nights the garden overflows
With one sweet song that seems to have no close,
Sung darkling from our tree, while men repose.

When first my casement is wide open thrown
At dawn, my eyes delighted on it rest;
Sometimes, and most in winter,—on its crest
A gray baboon sits statue-like alone
Watching the sunrise; while on lower boughs
His puny offspring leap about and play;

And far and near kokilas hail the day;
And to their pastures wend our sleepy cows;
And in the shadow, on the broad tank cast
By that hoar tree, so beautiful and vast,
The water-lilies spring, like snow enmassed.
But not because of its magnificence

Dear is the Casuarina to my soul:
Beneath it we have played; though years may roll,
O sweet companions, loved with love intense,
For your sakes, shall the tree be ever dear.
Blent with your images, it shall arise
In memory, till the hot tears blind mine eyes!

What is that dirge-like murmur that I hear
Like the sea breaking on a shingle-beach?
It is the tree’s lament, an eerie speech,
That haply to the unknown land may reach.
Unknown, yet well-known to the eye of faith!
Ah, I have heard that wail far, far away
In distant lands, by many a sheltered bay,
When slumbered in his cave the water-wraith
And the waves gently kissed the classic shore
Of France or Italy, beneath the moon,


When earth lay trancèd in a dreamless swoon:
And every time the music rose,—before
Mine inner vision rose a form sublime,
Thy form, O Tree, as in my happy prime
I saw thee, in my own loved native clime.


Therefore I fain would consecrate a lay
Unto thy honor, Tree, beloved of those
Who now in blessed sleep for aye repose,—
Dearer than life to me, alas, were they!
Mayst thou be numbered when my days are done
With deathless trees—like those in Borrowdale,
Under whose awful branches lingered pale
“Fear, trembling Hope, and Death, the skeleton,
And Time the shadow;” and though weak the verse
That would thy beauty fain, oh, fain rehearse,
May Love defend thee from Oblivion’s curse.

हमारा वनसरू तरुavi  अनुवाद - अविनाश चन्द्र

जिस अतिकाय तरु का, भाल सभी तारों ने देखा।
जिसके तन पर काल के, अगणित व्रणों की है रेखा।
उस पर एक परजीवी वल्लरी, ऊपर-ऊपर चढ़ी जाती है।
जैसे महाव्याल कोई कद, वर्तुल कुण्डली में लेता।

ऐसा पाश कि जिसका घेरा बहुत घना है।
उसको इस विराट ने उत्तरीय सम पहना है।
हर प्रशाख-टहनी पर रक्तिम सुमन उगे हैं,
उन गुच्छों पर भर दिन खग-कीटों को रहना है।

ऐसा मधु गीत कि जिसका अंत नहीं मिल पाता,
बहुधा रात्रि में उपवन को प्लावित कर जाता।
तमा-निशा जिसको पादप पर से गाती है,
धरती का जब एक-एक मानव सो जाता।
प्रथम बार गवाक्ष मुक्त हो जब खुलते हैं,
प्रातः इसके दर्शन पा, नयन मुदित होते हैं।
यदा-कदा और शीत ऋतु में तो प्रायः,
इसकी फुनगी पर से रवि को शीश नवाने,
एकाकी एक वृद्ध लंगूर ध्यानमग्न रहता है।
और वहीँ उसके नन्हे गभुआरे शावक जन,
निचली शाखाओं पर केलि-क्रीडा करते हैं।
सभी दिशाओं से गाती है गीत कोकिला,
मानो आने वाले दिन के अभिवादन में।
मींच उनींदी आँखें सब अलसाई गउएँ,
झुण्ड में शाद्वल भूमि को चरने चलतीं हैं।
इस विशाल मंजुल अनुभवी तरुवर की प्रशस्त छाया में,
पूरे कुण्ड हिम चादर सी कुमुदिनियाँ खिलतीं हैं।
किन्तु इस वृहद भव्य रूप के कारण,
इस वनसरू से उमगा मेरा प्रेम नहीं हैं।

ओ प्रिय मित्रों! तुमसे कितना नेह रहा है!
इसकी छाया में बीता बचपन शेष रहा है।
इससे प्रियता हेतु तुम्हारे, तुम हो कारण।
सींचा, घुला-मिला तुम्हारी मृदुल छवियों से।
जब तक ना अंधा कर देंगे उष्ण अश्रु दृग,
मेरी स्मृतियों में अनुदिन यह वृक्ष बढ़ेगा।
क्या है वह शोकाकुल ध्वनियाँ जो सुनती हूँ?
सागर के बजरी तट पर टूटन के जैसी!
क्या वह वृक्ष विलाप कर रहा घोर नाद में?
जो कि दुर्गम विजन भूमि तक भी जा पहुँचे।
अनजाना अनचीन्हा, फिर भी चिर से पहचाना,
इतनी दूर से हा! मैंने वह नाद सुना है।
दूर देश अगणित क्रीकों के पार कहीं पर,
जब अपनी गुहा में जल-प्रेत सोता है।
और तरंगे शशि के नीचे चुम्बन देतीं,
हलके से चुपचाप पश्चिमी श्रेष्ठ तटों को।

जब कि भूमि समाधिस्थ पड़ी हो स्वप्नविहीना,
हर बार संगीत लहरियों के उठने पर,
मेरे अंतस पर हे भव्य! तुम्हारा चित्र बना है।
रूप तुम्हारा हे तरु! अपने मुदित मूल में,
मैंने देखा तुमको अपने प्रिय जन्मज स्थल में।

मुझको जो प्रिय प्राणों से थे, हा प्यारे!
जा सोयें हैं उस निद्रा जिससे कोई नहीं उठा रे!
उनके हेतु जिनको तुमसे नेह रहा था,
आज तुम्हारे आगे मान से मेरा शीश झुका रे!
तुम पाओ अमरत्व, सूदूर स्थित अपने भ्राताओं सा,
हे अजर! तुम्हे आयु मेरी भी आज जा लगे।


जब कभी जीर्ण-पीत विवर्ण होंगी शाखायें,
दुर्बलता, भय, मृत्यु, निराशा काल ले आएगा।
हाँ! अशक्त गीत भले हो यह संभवतः,
आनंद तुम्हारा ही पुनः-पुनः गा दोहराएगा।  
विस्मृति के शाप से तुमको मुक्त रखे,
आयु भर का प्रेम हमारा ऐसा हो।

... उमस भरी उत्सुक यात्रा में छँहा लिया बन्धु! अब आगे चलेंगे फिर से ...

26 टिप्‍पणियां:

  1. oh its lovely - i am not satisfied with my previous comment - nor with this second one

    thanks avinash ji

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  2. तोरू दत्त सी अनन्य प्रतिभा...उसकी कलम से निकली अद्भुत और अनोखी कविता--पहले ही विस्मित करने को पर्याप्त थीं!
    अब अविनाश भईया का अनुवाद-छन्द! ठगे-से रह गए! अप्रतिम!
    शब्दों ने कहाँ यह बताया है कि ये अनुवाद के लिए सजे हैं...हिन्दी का सौंदर्य है लरजता!

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  3. सबसे पहले अविनाश को ढेर सारी बधाई और आशीष...बहुत खूबसूरत अनुवाद किया है उसने..
    दूसरा, आपके अगले प्रयास के लिए शुभकामनायें...हम आपके साथ हैं, दशक के ब्लोग्गर सम्मान का आयोजन भी बहुत सफल होगा, हमें पूरा विश्वास है..

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  4. मुझे अपने प्रिय कवि का काव्य-लेखन और अनुवाद सभी पसंद है. और विशेष स्नेह पाने को ही जबरन आलोचना की खींचमखाँच करता हूँ.
    इस अनुवाद से प्रतीत होता है जब भी अविनाश जी किसी रचना को अपने भाषिक साँचों में ढालेंगे ... वह मूल रचना से कमतर नहीं आँकी जायेगी.

    शिष्यभाव से पूछ रहा हूँ : 'गभुआरे शावक' का अर्थ समझ तो रहा हूँ... लेकिन 'गभुआरे' मेरे लिये नया शब्द है.. क्या इसका अर्थ 'बेचारे' से है? अथवा, 'मासूम' से है? अथवा कुछ ओर?

    "सभी दिशाओं से गाती है गीत कोकिला,"
    @ 'कोकिल'/ 'कोकिला' को मैं भी तब तक मधुर कंठ की गायिका ही मानता था जब तक कि सत्य नहीं जानता था... नर कोकिल कर्णप्रिय गायन करता है [कूहू-कूहू] जबकि मादा कोकिल (कोकिला) कर्णकटु स्वर में कभी-कभी बोलती है [किक-किक].

    .... And the waves gently kissed the classic shore Of France or Italy, beneath the moon,
    ....जब अपनी गुहा में जल-प्रेत सोता है। और तरंगे शशि के नीचे चुम्बन देतीं, हलके से चुपचाप पश्चिमी श्रेष्ठ तटों को।
    @ कमाल की उलथा. साधु!

    अनचीन्हा = अनचीह्ना

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    1. प्रतुल जी,
      हर्ष हुआ आपको देख कर।
      'गभुआरे' का अर्थ 'कोमल' ही होता है, अर्थात जो छूने में मुलायम हो।
      'कोकिला' वाली मजबूरी गिरिजेश जी बता ही चुके हैं, मैं तोरू को अनुवाद करके गलत नहीं कहना चाहता था।
      भावानुवाद में फ्रांस और इटली न लेना आप मेरी मजबूरी कह सकतें है, या सौन्दर्यबोध का यत्न - दोनों ग्राह्य है।

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    2. छंद तो याद नहीं है, (तुलसी ने ?), मुंडन होने के पहले के बालों के लिए उपयुक्त किया था बाल्य्काण्ड में।

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    3. @ अविनाश जी, मुझे वास्तव में पसंद आया है आपका किया भावानुवाद.

      'कमाल की उलथा' का व्यंग्यार्थ न निकालें.

      मात्रिक 'छंद' अतिरिक्त श्रम की चाहना रखता इसलिये अनुदित भाव मुक्त छंद में ही अपना सौन्दर्य बिखेर रहे हैं. विश्वास करें.

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  5. प्रतुल जी, इस कविता का अनुवाद मैं स्वयं कर सकता था लेकिन अपने मुक्त स्वभाव के कारण स्वयं संतुष्ट नहीं होता, मेरी दृष्टि में इसके साथ न्याय हिमांशु या अविनाश कर सकते थे। अविनाश को कहा कि वह इसके पहले एक अंग्रेजी गीत का अनुवाद कर चुके थे तो मेरी समझ में यह था कि अंग्रेजी शब्दों को हिन्दी तराश देने में उन्हें अधिक श्रम नहीं करना पड़ेगा। यदि आप मूल लेख देखेंगे तो वहाँ श्रम को लेकर हास परिहास सा कुछ हुआ था।
    अब आप की बात का शिष्यसमझ से ही उत्तर यह है कि 'गभुआरे' का अर्थ यही दो बतायें तो ठीक। थोड़ा छ्न्द बन्ध चाहिये, मुक्त सा बताना ठीक नहीं। :)
    कोकिला वाली आप की बात एकदम सही है। बुद्धिनाथ मिश्र ने अपने एक गीत की प्रस्तुति में भी इस बात को बताया है जो कि संयोगवश बहुत पहले यहाँ प्रस्तुत की जा चुकी है - http://kavita-vihangam.blogspot.in/2011/11/blog-post.html. कुछ बातें मुझसे बार बार टकराती हैं, नहीं? :)
    अनुवादक की स्थिति विचित्र होती है। उसे मूलस्वर की ओर भी ध्यान देना होता है। देखिये तो तोरू क्या कहती हैं? And far and near kokilas hail the day; जिस समय की यह कविता है उस समय काव्य रूढ़ि में गाती कोकिला ही था, प्रगतिशील युग में अब तो टेलीफोन धुन बजती है, कोयल गाता/गाती नहीं ;)
    टेलिफोन धुन में बजने वाली
    मेलबोर्न बिजली मचलने वाली
    डिजिटल में सुर है तराशा
    मैडोना है या नताशा
    पश्चिमी तटों की गुहा समझने के लिये थोड़ा और पहले जायें - गुहा cave का अनुवाद है। अविनाश की विशेषता इसमें है कि पंक्ति समुच्च्य के भाव को आकार दिया है। मैंने इनसे भावानुवाद का अनुरोध किया था।
    In distant lands, by many a sheltered bay,
    When slumbered in his cave the water-wraith
    And the waves gently kissed the classic shore
    Of France or Italy, beneath the moon,

    देसभाषाओं में संस्कृत शब्द तद्भव होते हैं जैसे तरु का तोरू :)
    भोजपुरी में 'चीन्हना' पहचान के तौर पर प्रयुक्त होता है। जैसा कि पहले ही कहा - अंग्रेजी शब्दों को हिन्दी तराश देने में सिद्धहस्त हैं अविनाश, 'अनचीन्हा' का प्रयोग कर उसे उस देसज अर्थगुरुता और सोंधेपन से संपृक्त कर दिया है जो कि संस्कृत ध्वनि में सम्भव नहीं।
    हाँ, चीह्ना या अनचीह्ना जैसा कुछ मैंने नहीं सुना :) हो सकता है आप जैसे अनचीन्हे से अनचीन्हे हैं वैसे ही मैं इनसे अनचीन्हा होऊँ। :)

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    1. गिरिजेश जी
      आपके तार्किक उत्तर निरुत्तर भी करते हैं और स्मिति भी देते हैं.
      आपसे बात करने का दोहरा लाभ होता है.

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    2. धन्य हुये हम! :) आभार आप का।
      स्मिति या स्मित?

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    3. दोनों ही सही हैं.....

      वाक्यों में प्रयोग पर निर्भर हैं.... स्मित और स्मिति.

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    4. 'चिह्न' से बना है 'चिह्नना' मतलब पहचानना, संकेत लगाना.

      अनचिह्ना = बिना कोडिंग किया, पहचान के बिना, संकेतहीन.

      हाँ, यह बात सही है - प्रादेशिक भाषा में व्याकरणिक भाषा के विकृत रूप स्वीकार हैं. इसलिये 'अनचिन्हा' प्रचलन में अभी भी है.

      मुझे जब भी सही का पता चलता है उसे स्वीकार लेता हूँ... यहाँ किसी प्रकार का हठ नहीं है.

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    5. प्रतुल जी, यह हुई न बात! श्रमिक गली ने आप से भी थोड़ा श्रम करा ही लिया। :)
      आभार।

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  6. लाजवाब अनुवाद!! हिन्दी शब्द भंडार के पुष्प और भी खिल कर शृंगारित हो उठे है। स्तुत्य है अविनाश जी का कला सामर्थ्य!!

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  7. कविताओं, उनमें भी अंगरेजी कविताओं के मामले में अपन below poverty line हैं| तोरू दत्त की कविता, अविनाश द्वारा अनुवादित, आपके ब्लॉग पर - नदी-नाव-संयोग कहना ठीक रहेगा?
    अपना काम 'हमारा वनसरू तरु' से बखूबी चल गया, मूल को पढ़ा तो सिर्फ अनुवाद न्याय की दृष्टि से, सच ये है कि दोनों ही बहुत खूबसूरत हैं|
    शानदार, जानदार, दानेदार:)

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  8. अद्भुत! अनुवादित कविता मानो स्वयं कवि की अपनी रचना हो.
    बधाई इस अनुपम प्रस्तुति हेतु.

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  9. अविनाश के अनुवाद से ही कुछ समझ पाई.......मैंने तो पहले भी कहा है -http://archanachaoji.blogspot.in/2011/03/blog-post_18.html

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  10. अद्भुत!

    अंग्रेजी में कविता का मर्म नहीं समझ पाता। अविनाश भाई को पढ़कर ही मुग्ध हूँ। ..बधाई हो शब्द सम्राट।

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  11. अति सुन्दर! अविनाश और गिरिजेश दोनों का आभार!

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  12. आज पता चला ,अविनाश जी इतने दिनों से ब्लाग पर अुनपस्थित क्यों है..

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