बुधवार, 11 जुलाई 2012

देवता नाराज़ नहीं पगला गये हैं ...

वाराणसी।

2012-07-11-942 

कल दिन भर जो हुआ उसके बारे में फेसबुक पर यह लिखा:

writing stories is only that easy as understanding modern Hindi poetry...gud night, it was such a long tense and futile day crawling in dark cave, when the light was visible the day was over..shit!

पिछ्ले लेख के बाद असहमतियाँ अपनी हद से आगे बढ़ interpretations और निरूपण विस्तार की अनजानी राहें पकड़ चुकी हैं, मुझे लग रहा था कि देवता नाराज़ हैं लेकिन आज सुबह ताज़ गेटवे के सूट में सुबह सुबह एक फिल्म देखने को मिली - The Gods Must be Crazy. उसके बाद यह स्टेटस मुझे परफेक्ट लगा:

Boys! अभी अभी The Gods Must be Crazy देखनी खत्म की है। देवता सचमुच में पगला गये हैं। पिछ्ले दिनों में ऐसा बहुत बार हुआ है कि मैंने जो कहा है उसे कुछ और ही समझा गया है। :) फिल्म वाकई देखने लायक है - हल्के फुल्के हास्य से भरी। कुछ नमूने :
"I married 7 times, so I know how to marry but I do not know how to live with them." :)
______________________
"I wish to tell her..yes I will say ..see I am normally a normal person but when I'm with a lady, due to strange psychological Freudian phenomenon my brain locks and strange things happen.... Will it happen when I say so?"
"No .... but surely some big complex words will happen." :)
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ये जो दूसरा वाला है, मेरे ऊपर एकदम ठीक बैठता है। ;)
तो मेरे मित्रों! मेरी बातों में निहितार्थ न ढूँढ़ो, मैं ऐसा ही हूँ - strangely normal. By the way, yesterday I enjoyed ladies company :) वे भी हमारी तरह ही होती हैं - वैसे ही झूठ बोलती हैं, उनका भी वैसे ही ब्रेन लॉक होता है ...

वाराणसी के दो स्थान - रज़िया मस्ज़िद जो कि विश्वनाथ का मूल स्थान थी और धरहरा मस्ज़िद जो कि बिन्दु माधव का मूल स्थान थी, इन पर जाने की योजना योजना ही रह गयी। अच्छा ही हुआ वरना इस देश का सेकुलर ढाँचा खतरे में पड़ सकता था ;) देवता तो वैसे ही पगलाये हुये हैं।

कुछ चित्र होटल के कमरे से बाहर और भीतर भी। भीतर का तो आलम वही है कि बहुत सी चीजों का स्पर्श भी नहीं किया है। इतने बड़े सड़े लिविंग रूम, बेड रूम, दु द्दु गो टी वी या बड्डे टॉयलेट की क्या जरूरत ,जब रात को सोना भर है और प्रात को उठ कर फिर से वही दिन दुपहरिया साँझ रात की सुरंगों में रेंगना है?

अभिषेक ओझा या विवेक रस्तोगी शायद बता पायें। :)   

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(Disclaimer – इस पोस्ट के कोई साम्प्रदायिक, सेकुलर, स्त्रीवादी, दलित विमर्शी, वामपंथी, संघी, धार्मिक, मजहबी, ऑफिसियल, अनऑफिसियल, गँवई, भावमारू, भावखानी आदि आदि निहितार्थ नहीं है। यह एक फुल्ली फालतू बकबक है जिसे सीरियसली वही लेंगे जो  normally abnormal होते होंगे।)

 

24 टिप्‍पणियां:

  1. and what about those who are abnormally normal?
    they should take it seriously aur like a एक फुल्ली फालतू बकबक?
    हवाई जहाज की टिकट भी दिखानी थी, अभी आपको बहुत कुछ सीखना है कि खुद को कैसे प्रोमोट किया जाए:)
    पिछली पोस्ट देखते हैं अब.

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    1. वो कैसे भी ले सकते हैं - चाय के साथ, ठन्डे या गर्म पानी के साथ :)
      @ हवाई जहाज - इतनी छोटी दूरी के लिये हवाई जहाज फालतू का खर्चा लगता है। मैं तो रेलवे के 3A में सवार हो कर आया और जाऊँगा भी वैसे ही।
      @ खुद को प्रोमोट - दिल्ली आता हूँ तो आप से मिलता हूँ गुर सीखने के लिये। वैसे एक बात ध्यान में आई है कि यही पोस्ट चचा लिखे होते तो अब तक कमेंटों की झड़ी लग गई होती। जाने क्या क्या लोग ढूँढ़ लेते इसमें :)
      अपने देवता वाकई पगला गये हैं ;)

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    2. sanjay babu..

      viswas mat karna ki delhi aakar sahab log aap se milage..yeh ek kori kalpana hai....sahab log delhi aate hai aur aakar chale jate hai....

      jai baba banaras...

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    3. हाय राम..!!
      आप हवाई जहाज से नहीं जाते हैं..?
      का जानी कैसन-कैसन लोग हैं दुनिया में...जो हवाई जहाज से नहीं जाते हैं..
      हम तो रेलवे टीसन भी हवाई जहाज से जाते हैं :)
      हाँ ...!

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    4. हम तो रेलवे टीसन भी हवाई जहाज से जाते हैं :)

      ईर्ष्‍या हुई

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    5. @ गुर सीखने....
      इस मामले में हमारे भरोसे मत रहिएगा:) वैसे इस बहाने मुलाक़ात का चांस तो बनेगा, स्वागत है|
      अकेले कहीं आते जाते अपनी चोईस तो साधारण शयन यान है, परिवार साथ हो तभी ए.सी. प्रेफर करते हैं|
      ध्यान आई बात पर हमें ये कहना है कि सिर्फ टिप्पणी और सिर्फ कंटेंट का कोई फार्मूला नहीं है| चचा भी साल-छह महीना आपकी तरह 'टीपनविमुख' हो जाएँ तो बेहतरीन से बेहतरीन पोस्ट पर सूखा छा जाएगा|
      ===========

      @ कौशल जी,
      हमारे चचा पहले ही फरमा गए थे,
      'तेरे वादे पर जिए हम, तो ये जान झूठ जाना,
      कि खुशी से मर ही जाते अगर ऐतबार होता'
      अब आपने चेता दिया तो और सावधान रहेंगे साहब लोगों से :)
      ============

      @ अदा जी,
      का रखा है जी हवाई जहाज में? बाँध के बैठा देते हैं जैसे सवारी न हो, सींग मारने वाली गाय हो कोई| फोन बंद कीजिये, लैपटॉप बंद कीजिये, ये मत कीजिये, वो मत कीजिये - कौन नखरे सहे उनके? कल को पिलेन वाले यूं भी कह सके हैं कि आलसी का ब्लॉग बंद कीजिये या मो सम का ब्लॉग बंद कीजिये|
      अतः इस्ट ऑर वेस्ट, टिरेन इज दी भेस्ट:)

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    6. वैसे आपका और गिरिजेश जी ब्लॉग तो बैन हो ही जाएगा अब प्लेन में....इतने बेकार ब्लोग्स हैं, कि सहयात्रियों के मुँह का जायका ख़राब हो जाता है...कोई न कोई कम्प्लेन करिए देगा इन भयानक हिंदी ब्लोग्स के बारे में, :):)
      आपलोग अंग्रेजी में काहे नहीं लिखते हैं ब्लॉग, बेकार में लोगों की टेढ़ी नज़र का शिकार हो रहे हैं...
      और अब तो वो दिन भी दूर नहीं, जब हर प्लेन में एक नोटिस होगा 'हिंदी ब्लोग्गर्स आर नॉट अलाउड टू बोर्ड दी प्लेन...'
      आई.डी. बनवा लीजिये अंग्रेजी ब्लोग्गर का, नहीं तो किसी दिन बुरे फंसियेगा...हम बता दे रहे हैं..

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  2. " The Gods Must be Crazy." का दूसरा भाग भी देखिये! वह भी मस्त है!

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  3. वो क्या है ना कि ये सब होटल उनके लिये हैं जो वर्क लाईफ़ बैलेन्स रखते हैं, इन सुविधाओं का उपयोग करने के लिये आपके पास समय भी तो होना चाहिये ना ! हम तो भरपूर उपयोग करते हैं :) ई पिक्चर हम भी देखते हैं, सुने बहुत हैं, और अभी एक नई फ़िलिम देखे "द हंगर गेम", अच्छा लगा ।

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  4. crazy na ho aadmi to gobar ka dher lagta hai.main to anandit hoon,crazy bhi hoon kyon ki 'DEV-VIGRAH ' hoon.

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  5. होटल में हर बार निकलते हुए लगता है कि यार काहे रुके थे ! और बिल देख कर लगता है कि इसका कुछ हिस्सा दे दिया होता हमें... तो खुद ही कहीं रह लेते :)
    वैसे मैं दोस्तों को बुला लेता हूँ. वही थोडा एन्जॉय करते हैं. हम कुछ नहीं करते... देर रात लौटकर सोने के सिवा.

    एक वाकया बता दूं... इस बार मुंबई में रात के २ बजे एक मित्र ने फ़ोन कर कहा -
    -मिनी बार खोलो.
    -कौन कौन सी दारु है.? (हमने एक एक का ब्रांड और इयर पढ़ कर बताया).
    - पहले बताया होता तो मैं आती. नालायक हो. चलो अब दारु पियो.
    हमने कहा - नहीं. आधे घंटे उन्होंने समझाया कि तुम्हारा जीना बेकार है. मैं होती तो जरूर पिला देती... इन सब के बाद भी पीना शुरू नहीं कर पाए. ! और नहीं पीने वाले तो वैसे ही कुछ वसूल नहीं कर पाते :)

    बाकी मित्रों ने स्पा, जकुजी और पता नहीं क्या क्या सजेस्ट करते हैं.. हम देर रात और सुबह जल्दी के बीच में ही होटल में रह पाते हैं... तो ... हम कुछ भी नहीं कर पाते. :) हमसे मत पूछिए. किसी मैकेंजी, बीसीजी टैप कंपनी के कंसल्टेंट से पूछिए.. ६-६ महीने रहते हैं :) शायद वो कुछ बताएँ.

    देवता तो खैर पगलाए हुए हैये हैं :)

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    1. पिछले महीने की बात है, स्थान - पुणे।
      रात तीन बजे हमें फ़ोन करके उठाया गया - जाग रहे हो? गेट खोलो!
      "तुम दोनों! इतनी रात को? क्यों आई हो? क्या काम?"
      "हमारे फ्रिज की वोदका ख़त्म हो गई, दोनों बोतलें इधर लाओ।"
      हमारी सूरत normally abnormal थी।

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    2. अभिषेक जी और आप के अनुभवों से लग रहा है कि नई पीढ़ी सही जा रही है ;) दारू को इनसे खतरा हो न हो, लड़कियों को तो नहिंये है!

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    3. नई पीढ़ी भी सही जा रही है और उनके जुल्म भी सहे जा रहे हैं। मैं बहुत खुश हूँ कि दुनिया भर में बिखरी हैवानियत के बावजूद संसार को महाप्रलय का कोई खतरा "फिलहाल" नहीं है।
      उधार की पंक्ति: चुपचाप पड़े रहते हैं कुछ बोलते नहीं, बच्चे बिगड़ गए हैं बहुत लाड़-प्यार से ...

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  6. इत्ते साफ-सुथरा और बड़े कमरे (सुइट) में हमें नींद ही नहीं आ सकती. और दारु तो हम भि नहीं पीते कि टुन्न होकर सो जाएँ :)

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  7. देवता जबर पगलाए हैं, दूसरे पार्ट में भी पगलाए ही हैं, देखिएगा?
    बनारस के कौन से कोने में थे जो इतनी हरियाली बाँटें हैं?

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    1. होटल गेट वे (ताज) के पीछे का बागीचा है। अच्छा मेंटेन किया है।

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  8. योजना की परियोजना क्या है, कौन जान पाया है? अब दोनों स्थान देखकर आओ। मैंने सोचा कि लंबे समय से उधार पड़ी कुछ टिप्पणियाँ आज संतुलित कर दूँ।

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