शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

बाऊ और नेबुआ के झाँखी - 20

पिछले भाग से आगे…

उस दिन सोहित की भउजी के स्वर में डूब गये थे खदेरन। दिसा मैदान से लौटते हुये भी, गीत में देवताओं का आह्वान आग्रह वह भी अनजाने सइयाँ के माध्यम से, उन्हें भीतर भिगोता रहा - सोहिता सुपात्र नहीं।
पवित्रता और करुणा भाव तो थे ही, उस गीत में जो अजीब सा संतुष्ट बैराग था वह उनके चित्त में चुभ गया – ऐसा स्वर जिसकी सभी कामनायें पूरी हो गई हों लेकिन वह टीस बची हो जो मृत्यु में साथ समा जाती है।...
... अग्निशाला में प्रात:सन्ध्या को बैठे खदेरन आगे न सोच सके। आज उनके स्वर में भी दैनिक कर्मकांड नहीं, देवताओं का आह्वान था और स्वर लहरी सहज मंगल कामना से पगी थी। चित्त की पावनी गंगा बुलावे की धाराओं में उमगती चली गयी। पति के इन अनचीन्हे स्वरों पर मतवा ठिठक जड़ हो गईं जैसे कोई मुग्धा वेणु वादन सुन रही हो!
ओ३म्‌ शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये। शंयोरभि स्रवन्तु नः॥
आओ ईष, पूरब में पधारो, सबका कल्याण करो।
ॐ प्राची दिगग्निरधिपतिरसितो रक्षितादित्या इषवः। तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु। योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥
पितरों, दक्षिण दिशा के देवताओं, अपने आशीर्वाद से सब मंगल करो।
ॐ दक्षिणा दिगिन्द्रोऽधिपतिस्तिरश्चिराजी रक्षिता पितर इषवः।  
हे पश्चिम के वरुण! जीवन अनुशासन लयी करो!
ॐ प्रतीची दिग्वरुणोऽधिपतिः पृदाकू रक्षितान्नमिषवः
हे उत्तर के सोम! हमें जीवन रस राग से तृप्त करो
ॐ उदीची दिक् सोमोऽधिपतिः स्वजो रक्षिताऽशनिरिषवः...
प्राची में प्रत्यक्ष गैरिक देव ने दर्शन दिये और गाते गाते खदेरन का कंठ रुद्ध हो गया।
ॐ सजूर्देवेन सवित्रा सजूरुष सेंद्रवात्या. जुशान सूर्यो वेतु स्वः...
...प्रकृतिस्थ हुये तो मतवा को सामने बिठा कर सारा प्रकरण कह सुनाये – सोहितसिंघ विवाह कराने का प्रस्ताव ले मेरे पास आया था लेकिन मैंने मना कर दिया ...विधवा गर्भिणी है। मातृत्त्व का गीत गाती है, देवों को बुलाती है। आज मुझे लगा कि यम की प्रतीक्षा में है। क्या करूँ, कुछ समझ में नहीं आ रहा... अब मैं पुराना खदेरन नहीं रहा। संतान के मोह में कायर भीरु हो गया हूँ। साहस नहीं रह गया। बालक वेदमुनि के कारण ...
मतवा के कान ‘विधवा गर्भिणी’ सुनने के बाद ही बन्द हो गये। मन में उठते बवंडरों से घिरी उन्हों ने आगे कुछ नहीं सुना। लछमिनिया रे! तें ई का क दिहले? ...कूल, खनदान सब डुबा दिहले! (तुमने ये क्या कर दिया?..कुल, खानदान सब डुबा दिया!)
चेतना ने दूसरी करवट ली। हमल केतना पुरान? गिरा दे त (गर्भ कितना पुराना होगा। गिरा दे तो...)
सामने खेलते वेदमुनि को देख मतवा ने खुद को धिक्कारा - पापी मन। अरे, जिसने किया कराया वह गीत गाती है और तुम्हें... !
उस दिन खदेरन के घर चुप्पी आ घिरी जिसे बस वेदमुनि की किलकारियाँ तोड़ रही थीं। दिन चढ़ गया, दुपहर हो गई और आखिरकार घुटन से मुक्त हो सन्नाटे को तोड़ती हुई मतवा ने खदेरन से कहा – लइका के सम्हारीं, हम सोहित घरे जातनीं।(बच्चे को सँभालिये, मैं सोहित के घर जा रही हूँ।)  
लोक वर्जना की बाड़ को तोड़ती, रमइनी काकी के बहिष्कार को थूकती मतवा आज वर्षों से खिंची अगिनरेख लाँघने चली थी। चमइन के कोख जने को गले लगाने वाली मतवा उस नागिन से मिलने जा रही थी जिसने कभी अपने भतार का ही भक्षण कर लिया था और जो अब गर्भिणी थी - विधवा काजर रेख!  
लोक लाज, परम्परा, कुल मर्यादा सबको तज चुकी परित्यक्ता को उस सन्नाटे में भी गाते हुये मतवा ने सुना और देहरी पर ठिठक गईं – प्रात: पति जिस स्थिति में थे, उसका कारण समझ में आ गया।    
आगे चलु नइहर पाँथ नहिं सूझे, पिछउड़ दोष लगवलें हे राम!
केहि बिधि ससुरा जाइँ हम सजनी, बिरहा जोर जरवलें हे राम!  (अगले भाग का लिंक)         

3 टिप्‍पणियां:

  1. मातृत्व से बढ़ कर कौनसी तृप्ति हो सकती है ? क्या मूर्ख समाज हमने गढ़ा है जो मातृत्व को कलंक का नाम दे पाता है ...

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  2. Ummid se jaldi yeh part aa gaya.Bahut bahut dhanyabad मतवा ने खदेरन से कहा – लइका के सम्हारीं, हम सोहित घरे जातनीं।(बच्चे को सँभालिये, मैं सोहित के घर जा रही हूँ।) yeh hamare samaj main utna hi bada kadam hai jitna Armstrong ke chand par utarane ka tha.Mohit hoon sada ki tarah.Bau ka deewana.

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  3. ॐ शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये ...
    - आज बरसों बाद सुनकर बहुत कुछ याद आया

    कितना गहरा है मानव मन और कितने जटिल हैं सम्बन्ध. मातृत्व के प्रति मतवा का ममत्व मानवता की पहचान बने. सभ्यता सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट जैसे प्राकृतिक/जंगली नियमों से ऊपर ही होती है

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