बुधवार, 14 नवंबर 2012

दूसरा कमरा

दोनों एक कमरे में एक ही समय सोने लगे हैं। पति पत्नी के लिये कोई असामान्य बात नहीं लेकिन इस वृद्ध युगल के लिये है। इसलिये कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ, युवावस्था में भी नहीं। बूढ़ा कहता है कि अकेले कमरे में उसे कउवावन लगने लगा है। जाने इस शब्द का उत्स क्या है लेकिन इतना पता है कि यह एकांत के भय और ऊब से आगे की बात है। वृद्धा जन्मजात खर्राटेबाज है शायद और इस आयु में नींद वैसे ही कच्ची हो जाती है, चुनांचे बूढ़ा ठीक उस समय पलंग पर आ विराजता है जब चटकते हाड़ लिये थकी उसकी संगिनी सोने आती है ताकि जब तक नासिका गर्जन प्रारम्भ हो वह भी सो जाय। दोनों जागते हुये सोते हैं लेकिन पहली नींद बिन विघ्न बाधा सम्पन्न हो जाय तो अच्छा रहता है।

जिस दिन ऐसा होना शुरू हुआ उस दिन सूर्य और चन्द्र विशाखा में, शुक्र मूल में और बृहस्पति स्वाती नक्षत्र में थे। बाकी ग्रहों की याद नहीं। अपने पोते के जन्म समय को वृद्ध ने इसके लिये उचित समझा। उसे विश्वास था कि डाँट नहीं पड़ेगी और नमक मिर्च मसाले में पुत कर यह बात पतोहुओं तक नहीं पहुँचेगी। दिन दिनांक बूढ़े को याद नहीं। उसका बेटा एक दिन पहले पोते के जन्मदिन की याद दिलाता है कि पहला हैप्पी बड्डे सन्देश आप का होना चाहिये, वह प्रतीक्षा में रहता है!  

वृद्ध यह सोच हैरान होता है कि बगल में सोती पत्नी में एक खास छाँव भी है जिससे इतने दिन वह वंचित रहा। यह वह छाँव है किसकी पुतली बैठ स्मृतिकाक संतोषी कहानियाँ कहते हैं, जिन्हें बूढ़ा अपना इतिहास कहता है। रात बिरात जगता है तो खर्राटों के बगल में बैठ वह पाठ करता है, पूछ्ता है कि इतिहास राजा रानियों और बड़े लोगों के ही क्यों लिखे जाते रहे? ऐसी बात का कोई मोल नहीं फिर भी वह पाता है कि वे जीवित इतिहास हैं। होश सँभालने से ले कर अब तक कितनी घटनायें उनके अस्तित्त्व पर दर्ज हैं। उसे आश्चर्य होता है कि आँखों देखी और कानों सुनी बातों घटनाओं में भी सच झूठ इतनी जल्दी घुस जाते हैं गो कि इतिहास कोई निर्वात हो जिसे इन्हें भरना ही हो!

वह पानी पीता है और जग का ढक्कन बन्द करते अन्धेरे में लाल लाल चमकती टी वी स्विच की स्टैन्डबाई एल ई डी को देख सोचता है – वे दोनों भी अब उसी मोड में हैं। बाल बच्चे आते हैं तो ऑन कर देते हैं। एक ही सीरियल में जाने कितने चैनल खुल जाते हैं। बताने और बात करने की उमंग में दोनों अक्सर उलझ जाते हैं और सुनने वाली बहुयें और बेटे भी असमंजस में पड़े रहते हैं कि सुनें तो किसकी सुनें! बाद में बूढ़ा उनके घबराये और भ्रमित सी मुख भंगिमाओं की सोच मुस्कुराता रहता है – छोटकी एच आर अधिकारी है, बुढ़िया के आगे उसकी सारी पॉलिश उतर जाती है और बड़की? दोनों के लिये सुशील बहू बनने के चक्कर में गड़बड़ा जाती है। सबसे अच्छा बड़का है - स्टैंड पर टेबल फैन की तरह घूमता दोनों की बारी बारी सुनता है और जब आँखें फेरता है तो सुखद बयार बहा ले जाती है। छोटका अभी बच्चा है, मूड़ गाड़े हूँ हाँ करता रहता है।

वे लोग उनकी बातों में अपने हिस्से का सच झूठ ढूँढ़ते रहते हैं। नहीं, बूढ़ा सोचता है कि वे दोनों वाकई इतिहास के सच जैसे हैं जिसमें सब अपने अपने झूठ ढूँढ़ते हैं। यही बात उसे कचोटती है। वह जानता है कि हजारो वर्षों पहले से ऐसा होता चला आ रहा है और कचोट भी उतनी ही पुरानी है फिर भी हैरानी की बात यह है कि इस पर हैरानी हुये बिना नहीं रहती।

बूढ़ा फिर से जीने लगा है और यह सोच थोड़ा सहम भी जाता है कि मृत्यु के समय बिताया गया जीवन क्रमश: सामने दिखने लगता है। उसे हैरानी भी होती है कि बुढ़िया को ऐसा कुछ नहीं होता वोता। टिकठी बाँधते उसकी आँखें सूखी हैं। वह सोच रहा है कि क्या अब वह अकेले सो पायेगा? खर्राटे, छाँव, उस पर विराजते कउवे और इतिहास सब समाप्त नहीं हो जायेंगे अब? कफन की आखिरी गाँठ बाँधते वह बुदबुदाया है – प्रिया को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और मुस्कुराने लगा है।
उसने बड़के से कहा है –जीवन ही सत्य है। तुम्हारी माँ मरी नहीं, दूसरे कमरे में अलग सोने चली गयी है। अगले महीने जब छोटकी की संतान होगी तो मैं भी उस कमरे में चला जाऊँगा... उठाओ अब! ...रोते नहीं। राम नाम सत्य है।

11 टिप्‍पणियां:

  1. कथा हर बार की तरह चमत्कृत करती है. हालाँकि ऐसा कहना भी इस कथा की ऊंचाइयों को छू पाने में असमर्थ है.
    इस पूरी लघु-कथा को पढते हुए दो लोगों का स्मरण हो आया.
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    @ रात बिरात जगता है तो खर्राटों के बगल में बैठ वह पाठ करता है, पूछ्ता है कि इतिहास राजा रानियों और बड़े लोगों के ही क्यों लिखे जाते रहे?
    यही बात साहिर साहब (क्षमा सहित) ने अपनी एक लंबी नज़्म में कही है! वो फिर कभी.
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    @टिकठी बाँधते उसकी आँखें सूखी हैं। वह सोच रहा है कि क्या अब वह अकेले सो पायेगा? खर्राटे, छाँव, उस पर विराजते कउवे और इतिहास सब समाप्त नहीं हो जायेंगे अब?
    मुझे मेरे स्वर्गीय पिताजी याद आ गए. जब यह घटना (हू-ब-हू ऐसी ही) बताते हुए उनकी आँखों से आंसू रुक नहीं रहे थे और बाद में उन्होंने वह रास्ता बदल दिया जहाँ वह बूढ़ा "अकेले" सोने लगा था... इलाहाबाद जंक्शन, सन १९७०!!
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    उसी अवस्था में हूँ इसे पढकर!!

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  2. जीने के लिये कोई साथ चाहिये..अभी नहीं तो बाद में।

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  3. एक तो बुढापा काटना ऊपर से पत्नी का विछोह मर्माहत करता है अभी से इसकी तैयारी में लग जाना चाहिए
    कुछ ऐसी सोच क्या आज कल आपके मन में चल रही है जो इस कथा के माध्यम से रूपायित हो रही है कथा का
    प्रारम्भ व अंत दोनों मर्माहत करते है

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  4. साथ की आदत हो जाती है...
    पूरा जीवन साथ बि‍ता देने के बाद बहुत मुश्‍कि‍ल होता है स्‍वयं को समझा पाना यूं...

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  5. इस उम्र मे जब लगभग सब कुछ जिया जा चुका होता है ... एक अनजाना शून्य डराने लगता है ... ऐसे मे पति पत्नी न हो कर बचपन मे घर घरौंदा खेलने वाले बच्चे जैसे हो जाते हैं लोग...

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  6. कोई इस पीड़ा को नहीं भोगे ,यही कह सकती हूं। ... खुद की तो क्या कहूँ , मगर जब से माँ को देखा उसकी आँखों में यहीं सब देखा ... ओह! कितना कुछ याद आया लिखने को मगर शब्द कहाँ से पाऊं :-(

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  7. बुढापे मे साथ की जरूरत उमर् के किसी भी पडाव से ज्यादा होती है।पर अनुभव भविष्य के लिए परिपक्व बना चुका होता है।यहां कम से कम बच्चों का साथ तो है, नही तो कउआना स्थायी साथ बना चुका होता।

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  8. शेषप्रायः जीवन अपनी संतान के माध्यम से जिएं अथवा क्रूर खालीपन-अकेलेपन के साथ, जो वास्तविक है।

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