शनिवार, 24 नवंबर 2012

स्त्री पाठ और बन्द द्वार

साँझ से पहले का समय था। उनकी वाणी से सहज सुबोध ज्ञान की निर्झरिणी बरस रही थी। जनता मुग्ध भाव से अश्वत्थ छाँव में बैठी सुन रही थी। अचानक क्रन्दन करती एक विधवा आई और उसने अपने मृत पुत्र को वहीं लिटा दिया – यह मेरा एकमात्र सहारा है। इसे पुनर्जीवित करें आर्य!
उन्हों ने अविचलित स्वर में पूर्ववत शांति के साथ कृपा बरसाई – था कहिये आर्ये! अब वह नहीं है। मृत्यु शाश्वत सत्य है। उससे कोई नहीं बचा। मृत्यु एकल दिशा में चलती है। आप का मृत पुत्र पुन: जी नहीं सकता। 

विधवा के करुण विलाप से अश्वत्थ वृक्ष की पत्तियाँ और डोलने लगीं। जन के नेत्रों में मौन आग्रह देख उन्हों ने विधवा से कहा – माता! जाओ जिस घर में कभी मृत्यु न हुई हो उस घर से मुठ्ठी भर सरसो ले कर आओ, मैं तुम्हारे पुत्र को जिला दूँगा। पास में बैठा उनका शिष्य चौंका किंतु मौन रहा।
मन में आस बँधी, विधवा ने मृत पुत्र को वहीं छोड़ा और गाँव की ओर दौड़ पड़ी। वह पूर्ववत ज्ञान बरसाने लगे किंतु शिष्य अब अन्यमनस्क हो चला था।
विधवा भटकती रही। कोई घर ऐसा नहीं मिला जिसमें कभी मृत्यु न हुई हो लेकिन माँ तो माँ, बिना सरसो कैसे लौट सकती थी!
रात बीती, उदय की लाली सिमटी तो उसने कपाटविहीन द्वार से एक कुटीर में झाँक कर अपनी माँग रखी। गृही मुस्कुराया और यह कहते हुये उसने अपनी पोटली में एक ओर बँधी सरसो विधवा के हाथ में खाली कर दी कि माँ, नये घर में मृत्यु का क्या काम? उसमें तो कपाट भी नहीं होते जो खटखटा सकें। ले जाओ, तुम्हारा कल्याण हो।
सरसो लिये भागती पड़ती विधवा पुन: वहीं पहुँची। पुत्र की मृत देह वैसी ही पड़ी थी। पास ही अग्नि के अवशेष से स्पष्ट था कि किसी ने रात भर रखवाली की थी।

हर्ष से चीखती वह उनके पैरों पर गिर पड़ी - मैं सरसो ले आई प्रभु! ले आई!! ...अब आप अपना वचन पूरा करें। 
उन्हों ने दूर डूबते सूर्य की ओर दृष्टि उठाई और बहुत ही शांत स्मित के साथ कहा – मृत्यु अपरिवर्तनीय है। माता! जाओ, अब मृत देह का अंतिम संस्कार करो, और उठ खड़े हुये – जाइये सब जन अब, सूर्यास्त हो चला है। जनसमूह उठ खड़ा हुआ। 

विधवा विक्षिप्त सी हो गई, दारुण रूदन – तो कल आप ने असत्य आश्वासन क्यों दिया, असत्य भाषण क्यों किया?

क्षण भर मौन के पश्चात उन्हों ने कहा – हर प्रश्न का उत्तर नहीं होता। कभी कभी मौन उचित होता है। 
उसी समय चीवर उनके हाथ में थमाते हुये शिष्य ने विदा माँगी – भंते! मुझे विदा दें। आप धर्म च्युत हो गये हैं।
पहली बार उनके मुख से स्मित लुप्त हुई–ऐसा क्यों कह रहे हो वत्स?
शिष्य ने उत्तर दिया - असत्य ही नहीं, आप से हिंसा भी हुई है। किसी को आस बँधा कर तोड़ना और दुख देना हिंसा है। छल है यह! आप से तो विनय का भी उल्लंघन हुआ है।
वे आश्चर्य में पड़ गये – किंतु वत्स, ऐसा कैसे हो सकता है? ...ऐसा घर कैसे हो सकता है जिस में ...
शिष्य ने बीच में ही उनकी बात काट कर कहा – बुद्धि की सीमा होती है चाहे वह बोधि प्राप्त जन की ही क्यों न हो!
उसने विधवा से कहा  – चलो! तुम्हारे पुत्र का अंतिम संस्कार करें। इसे जिला नहीं सकता किंतु तुम्हें दूसरा पुत्र दे सकता हूँ। क्या मैं स्वीकार हूँ?
अस्त होते सूर्य की अंतिम किरण साक्षी हुई, हाथ ने हाथ को थाम लिया।  
उन दोनों ने बहुत ढूँढ़ा, उस स्थान पर न तो वह कपाटविहीन कुटीर मिला और न सरसो की भिक्षा देने वाला गृही। वे दोनों वहीं एक कुटीर बना कर रहने लगे। कहते हैं कि उसमें द्वार तो थे लेकिन कपाट नहीं और किसी के आने जाने पर कोई रोक टोक नहीं थी।
आगे के उद्बोधनों में महात्मा यह कहना कभी नहीं भूले – स्त्री के लिये स्वर्ग के द्वार बन्द हैं! 

24 टिप्‍पणियां:

  1. बोध कथा एक नये दृष्टिकोण के साथ... आज का टेक अवे-"बुद्धि की सीमा होती है चाहे वह बोधि प्राप्त जन की ही क्यों न हो?"


    सादर

    ललित.

    टेक अवे का हिन्दी रूपांतर क्या होगा भैया जी...

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  2. "बुद्धि की सीमा होती है चाहे वह बोधि प्राप्त जन की ही क्यों न हो?"

    ...सत्य कथन।

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  3. vaise - yadi ve sach hi ve rahe hote jinhone asal me yah kahaa thaa - to jila bhi dete , unme shakti thee shayad ...

    - jinhone kahaa thaa - ve jaante the ki koi kapat nahi hai aisaa.....

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  4. शाश्वत सत्यों से क्यों जूझना..विजय तो जीवन पर हो, मृत्यु पर नहीं..

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  5. स्त्री के लिए स्वर्ग का द्वार क्यूँ बंद है?क्या उस विधवा ने पुनर्विवाह किया इसलिए?

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    1. नहीं, बन्द नहीं हैं।
      ऐसा तो वह महात्मा कह रहा है। कथा द्वारा इस तथ्य को रेखांकित बस किया गया है कि तमाम ज्ञान के होते हुये भी गहरे अंतर्मन में दबे भय और असुरक्षा भाव कैसे व्यक्ति को अनजाने ही धूर्तता पर उतारू कर देते हैं।
      स्त्री माँ है। प्रकृति ने उसे विशिष्ट अवदानों से जन्मना अलंकृत कर रखा है जो उसके व्यक्तित्त्व और व्यवहार दोनों में परिलक्षित होते हैं। उन्हें समझने के बजाय सभी पुराने पंथों में उसे न्यूनाधिक दोषी करार दे एक आसान राह चुन ली गयी। हजारो वर्षों तक इस राह चलते समाज का जो रूप बना उसमें कई बहुत ही स्पष्ट विकार हैं। उनकी पहचान के लिये मैं प्राय: व्यवस्था के मूल तक जाता हूँ जो कि पुरुष द्वारा पुरुष के लिये सृजित है।
      आश्चर्य होता है कि स्त्री ने अपने लिये ऐसा कुछ नहीं गढ़ा। एक भी स्त्री दूत या पैगम्बर नहीं! देवियाँ भी पुरुष व्यवस्था की सर्जना!! स्त्री विभूतियाँ भी व्यवस्था के भीतर रहते हुये ही विद्रोह के स्वर फूँकती - फिस्स! कहीं ऐसा तो नहीं कि 'माँ' इतनी स्वार्थी हो ही नहीं सकती कि अपने लिये अपना ईश्वर गढ़े? लेकिन हजारो वर्षों से व्यवस्था की शिकार स्त्री द्वारा अपने लिये कुछ न करना भी तो अप्राकृतिक लगता है!
      समझने की मेरी यह यात्रा पता नहीं कहाँ समाप्त होगी, कब समाप्त होगी? स्थापित विचारों या वादों से मैं संतुष्ट नहीं। कुछ है जो छूटता गया है, जा रहा है| स्त्रीवाद या ऐसा कोई प्रतिरोध मुझे प्रतिक्रियावादी दिखता है, उतना ही हिंसक। परिवर्तन बहुत धीमे हैं। हर बीस वर्ष में संसार नया होता जा रहा है जब कि ...
      ...इस पर जाने कितना लिख सकता हूँ लेकिन उससे भी क्या हासिल? मैं तो उस दृश्य की कल्पना से ही सिहर उठता हूँ जब बुद्ध जैसे व्यक्ति ने संघ के ऐसे नियम बनाये होंगे - स्त्री कितनी भी वरिष्ठ क्यों न हो, पुरुष भिक्षु से दोयम होगी। वह उसके स्वागत में उठेगी, उसे नमस्कार करेगी। सिर नीचे कर उससे बात करेगी...क्या है यह सब? पुरुष अपने से इतना डरा हुआ क्यों है? कैसी मुक्ति की अभिलाषा है यह? कैसा ईश्वर है यह? ...
      सम्भवत: आप ने मेरी यह कविता नहीं पढ़ी!
      http://kavita-vihangam.blogspot.in/2012/11/blog-post_8800.html

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    2. कविता आज पढ़ी और उत्तर भी...सच.....कैसा ईश्वर है यह?...पुरुष ही होगा ईश्वर भी.

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  6. .
    .
    .
    बुद्धि की सीमा होती है चाहे वह बोधि प्राप्त जन की ही क्यों न हो!

    नहीं, बुद्धि की कोई सीमा नहीं होती, तभी तो वह वह नया कपाटविहीन कुटीर और वह गृही बना देती है जहाँ मृत्यु का कोई काम नहीं... महात्मा को तो हारना ही पड़ेगा बुद्धि के आगे... वह मृत्यु को भी हरा सकती है...


    ...

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    1. :) नहीं, वह नया गृह और गृही दोनों उस स्त्री के सृजन हैं। बोधकथा सी कहानी में एक अदृश्य लहरी वाक्यों के साथ है। ऐसा कतिपय पुरानी गल्प/लोक कथाओं में भी पाया जाता है - अमूर्त से मूर्त की ओर। थोड़ी सूक्ष्म पहचान चाहिये- निरी बुद्धि से परे!
      स्त्री से महात्मा यूँ ही भयभीत नहीं!


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    2. .
      .
      .
      आप स्त्री के सृजन कह रहे हैं और मैं 'स्त्री की बुद्धि के'... वह 'हर हाल में' अपने मृत पुत्र को जीवित चाहती है... महात्मा का भयभीत होना लाजिमी है... बुद्ध ने संघ के नियम बनाते समय अगर यह नियम दिया कि 'स्त्री कितनी भी वरिष्ठ क्यों न हो, पुरुष भिक्षु से दोयम होगी। वह उसके स्वागत में उठेगी, उसे नमस्कार करेगी। सिर नीचे कर उससे बात करेगी...' तो कुछ वजह जरूर रही होगी, आखिर 'बुद्ध' थे वह... संतान मोह, घर-परिवार मोह और भी जाने कितने मोह ज्यादातर मामलों में ज्यादातर स्त्रियों की वस्तुनिष्ठ निर्णय व व्यवहार करने की क्षमता खत्म कर देते हैं, अभी तक की बयालीस साला जिंदगी का यह तजुर्बा है मेरा... जाने दीजिये, अब मैं विवादास्पद टेरिटरी में जा रहा हूँ...



      ...

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    3. हाँ अनुभव के साथ विवाद तो आते ही हैं!
      कहानी वाद विवाद के लिये है भी नहीं, एक अंतर्दृष्टि की लहरों को कथा के माध्यम में संघनित करने के लिये है।

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  7. @"उस दृश्य की कल्पना से ही सिहर उठता हूँ जब बुद्ध जैसे व्यक्ति ने संघ के ऐसे नियम बनाये होंगे - स्त्री कितनी भी वरिष्ठ क्यों न हो, पुरुष भिक्षु से दोयम होगी। वह उसके स्वागत में उठेगी, उसे नमस्कार करेगी।"............यह तो बड़े विशद अध्ययन और चिन्तन का विषय है. बुद्ध ही क्यों ! कबीर जैसे लोगों ने भी वही बात दुहरायी है.

    हो सकता है कि कुछ आध्यात्मिक उपलब्धियों के परिपेक्ष्य में व्यक्तिगत स्तर पर कोई अनुभूति/विचार/व्यवहार/ज्ञान बिम्ब/संवेदना बिम्ब यदि सहज स्फूर्त , स्वभाविक होता हो तो वही समूह के स्तर पर जाकर बाहर से थोपा हुआ , आरोपित हो जाता हो ! चूकि समूह को भी उसी प्रकार की आध्यात्मिक उपलब्धि पाना है जिसे व्यक्ति विशेष ने पाया है ,ऐसी स्थिति में व्यक्ति विशेष की मौलिक और नित्तान्त अद्वितिय विचार /अनुभूति/ प्रवृत्ति क्रमों को एक सूखे हुये नियम के स्वरूप में समूह पर फेंक दिया जाता है या यूं कहें कि फेंकना पड़ता है , कोई उपाय नहीं है . और शायद यहीं समस्या खड़ी होती है.

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  8. मृत्युसर्वहरश्चाहम ...
    साहस, त्याग और ... और बोध! सृष्टि से पहले सत नहीं था, असत भी नहीं ... नाहीं शूरजो नाहीं ज्योति ...

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