मंगलवार, 31 जुलाई 2012

एक परम्परा ऐसी भी

चित्राभार :  http://www.kamat.com/database/pictures/corel/515043.jpg  
रुक जाऊँगा एक दिन जब चलने को राह नहीं रहेगी और कहीं किसी लैब में कोई वैज्ञानिक पृथ्वी की परिधि  माप लेगी। 
इस युग की तमाम घिसी पिटी बातों से नुकीली तराश लिये एक बात - एकला चलो रे! मुझसे नहीं जुड़ती। 
मैं कभी अकेला नहीं होता, मेरे साथ होती हैं - कानों में ऊष्म फुसफुसाहटें, पैरों में तलवे काँटों से मढ़े  - मैं चलता हूँ।  

मुठ्ठियों में भिंचे काँटेदार शब्द राहत पाने को करवटें बदलते हैं, रक्त रिसता है - पैरों से नहीं, हाथों से - मैं लिखता हूँ।
चित्राभार: http://www.cse.iitk.ac.in/~amit/birds/good/0650sw_brahminy-chased-off-by-babbler_14.10.jpg
मैं चलता हूँ वह लीक पकड़ जिस पर हैं विशाल झंखाड़ बरगद, पाकड़ - अमरबेलों के बलियूप। 
कभी बोये थे रक्तबीज पथिकों ने, जिनके हाथ रिसते थे, जो लिखते भी थे। 

हाँ, मुझे पता है कि हैं कुछ उद्यान, सदियों से परिरक्षित ज्ञान, कहलाते जीवंत!  
जिनमें खेलती हैं नई पीढ़ियाँ, जिनकी बेंचों पर बैठ बूढ़े करते हैं लेखजोख सभ्यताओं की मृत्यु के! 
और युवा नशा पीते हैं, संसार को जीते हैं।
चित्राभार : http://previews.agefotostock.com/previewimage/bajaage/b44450dcfd457e8ef02516a1ed7f9720/IBR-591303.jpg
मैं नहीं वहाँ यायावर अक्सर, नहीं अच्छे लगते वे, साज सँभाल बनाती है शंकालु मुझे, मृत्यु की बातें बनाती हैं दयालु मुझे वहाँ बू आती है - षड़यंत्रों, दुरभिसन्धियों की, समझ सकता हूँ जिन्हें समझा नहीं सकता, सूँघ सकता हूँ सूत्रों में सँजो नहीं सकता -गन्ध सूत्रबद्ध न हुये कभी, न होंगे कभी। 
मैं बता नहीं सकता कि शब्द भिंचे छ्टपटाते छोड़ने पड़ेंगे, मुठ्ठियाँ खोलनी होंगी, होना होगा अकेला निपट - 
मैं अकेले चल नहीं सकता और रुकना मुझे स्वीकार नहीं। मैं हूँ वाहक घनचक्करों की परम्परा का - भाषा है, भाष्य नहीं।

शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

12. कोणार्क सूर्यमन्दिर : स्त्री-पुरुष - संयोग और स्थापत्य के कुछ पहलू - 2

भाग 12, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10 और 11 से आगे...
उपासना के अंतर्निहित भावों और देवस्थलों को स्थूल रूप देने के पीछे स्त्री पुरुष संयोग के सूक्ष्म और प्रकट तरीकों के कारण और कुछ प्रकार हम पिछली कड़ी में देख चुके हैं। दार्शनिक चित्रण, मंत्र, स्थापत्य, मिथकीय चित्रण और आधुनिक स्थापत्य में भी निर्माण के दर्शक पर पड़ने वाले सकल स्त्री या पुल्लिंग प्रभावों के बारे में भी हम बातें कर चुके हैं कि कैसे कुछ निर्माण स्त्री, पुरुष या उभयलिंगी रूप में हमारे सामने प्रस्तुत होते हैं।
भारत में देखें तो अजंता, एलोरादि समस्त गुफा आराधना, ललित कला स्थल स्त्रीलिंग होंगे और ऊँचे पर्वताकार शिखर और गोपुरम वाले मन्दिर पुल्लिंग। बहुधा देवियों के आराधनास्थल या तो गुफाओं में हैं या नीचे शिखर वाले मन्दिरों में। स्त्री तत्त्व आधारित आध्यात्मिक साधना की गोपनीयता और कठिनाइयों को स्थूल रूप में रेखांकित करने की मंशा के कारण ही तंत्र और शाक्त पूजा स्थल दुर्गम पहाड़ियों में हैं या अब आबाद हो चुके पहले के दुर्गम वनप्रांतरों में।
पुरुष में स्त्री और स्त्री में पुरुष तत्त्व का सर्वोत्तम उदाहरण भारत की अर्धनारीश्वर संकल्पना है जिसमें यौनांगों के बजाय पूरी देह को ही स्त्री और पुरुष देहों के संपृक्त रूप में दर्शाया जाता है। ताओवाद की यिन यांग संकल्पना का इससे अच्छा वैकल्पिक निरूपण नहीं हो सकता। शिव आराधना में जो गोपनीय पक्ष है, वह शिवा के अर्धांग प्रभाव के कारण है।
समाज बहुत पहले से ही पुरुषप्रधान रहा है और इसका प्रभाव देवालयों या स्मारकों के स्थापत्य पर भी पड़ा है। मिस्र के देवता के उत्थित लिंग का उदाहरण हम देख ही चुके हैं। इतर सभ्यताओं में भी पुरुष का लिंग श्रेष्ठता मापन और निरूपण का प्रेरक तत्त्व रहा है। इसके सबसे अच्छे उदाहरण विभिन्न प्रकार के स्तम्भ हैं। मिस्र के ओबेलिस्क हों या ग्रीक रोमन सभ्यताओं के स्तम्भ या हिन्दू देवताओं के प्रतीकों के स्तम्भ, सब की प्रेरणा में वही लिंगोत्त्थान का भाव है। दैवी शक्तियों का उच्च भाव इस से स्वभावत: जुड़ जाता है। मणि पद्म के बीज मंत्र का पीड़ित जन पर उच्च स्थिति से नीचे की ओर करुणा दृष्टि डालते अवलोकितेश्वर से सम्बन्ध ऐसे ही नहीं है। अपने से उच्च मानने के कारण ही मनुष्य देवताओं या ईश्वर का वास अंतरिक्ष में मानता आया है। पिरामिड हों, ऊँचे शिखर वाले मन्दिर हों, मिनारे हों या ऊँची पहाड़ियों पठारों पर बने पूजास्थल हों, सबमें उच्चता भाव का स्थूलीकरण है।
हिन्दुओं में मिथकीय सुमेरु पर्वत की संकल्पना रही है। महादेव का निवास भीतरी हिमालय की कैलाश चोटी पर माना गया है। हिमालयक्षेत्र को देवभूमि माना जाता रहा है। पांडवों की स्वर्गारोहण कथा इसी संकल्पना की देन है। 
सभ्यता के विकास के साथ ही मनुष्य की क्षमतायें बढ़ीं। अब वह पर्वत सरीखे ऊँचे देवालय अपनी सुविधा से कहीं भी बना सकता था। हिन्दुओं के देवालय शिखर या गोपुरम सुमेरु से प्रेरित हैं जो पुरुष अंग और पुरुष के मनोविज्ञान से भी जुड़ते हैं।
पुरुष जीवन दो सूक्ष्म भावों से परिचालित होता है – प्रभाव क्षेत्र और अमरत्त्व की चाह। पुरुष अपने कृत्य, व्यवहार और संतति के प्रसार द्वारा इन दोनों की परिलब्धि करता है। कुछ स्तनधारी जंतुओं के नरों जैसे शेर, हाथी, कुत्ते आदि में अपना ‘इलाका’ चिह्नित कर रखने में प्रभाव क्षेत्र ही कारक है। वे दूसरों के प्रभाव क्षेत्र का सम्मान करते हैं और लड़ाई का घोष भी उसके उल्लंघन द्वारा ही करते हैं। ऊँचे शिखर युक्त भव्य मन्दिरों, प्रासादों के निर्माण के पीछे प्रभाव क्षेत्र और अमरत्त्व प्राप्ति की सोच ही काम करती है। ऊँचे शिखर एक ओर तो अंतरिक्ष स्थित देवों के निकट पुरुष की कीर्ति ले जाते हैं तो दूसरी ओर बहुत दूर से दिख कर उसके प्रभाव क्षेत्र और उसकी कीर्ति का विस्तार करते हैं। इनका निर्माण ऐसा किया जाता है कि सैकड़ो वर्षों तक बने रहें। पीढ़ी दर पीढ़ी निर्माण और निर्माता की कीर्ति मिथकीय रूप लेती उन्हें दैवी गरिमा से युक्त कर देती है।
मन्दिरों की संकल्पना में पाँच तत्त्वों को भी सम्मिलित किया गया। 
चूँकि सृष्टि केवल पुरुष तत्त्व से नहीं बनी है, इसलिये स्त्री तत्त्व का भी ध्यान रखा जाना चाहिये। तो मन्दिर का आकार कैसा हो जो इनको प्रदर्शित कर सके? मन्दिरों में तो आराधक भी आयेंगे जिनके लिये पर्याप्त स्थान चाहिये। स्तंभ आकार में उतना ‘गगन’ कहाँ – गगन माने खाली स्थान? क्षिति तो मन्दिर का पिंड है, जल की पूर्ति कुओं, पुष्करणियों के निर्माण द्वारा या नदी और समुद्र के किनारे निर्माण से हो जाती है, अग्नि तत्त्व तो स्वयं विग्रह है जिसके पास दीप प्रज्वलित रहते हैं और जब गगन होगा तो वायु रहेगी ही! प्रश्न वहीं का वहीं रह जाता है – गगन का सृजन आराधना स्थल में कैसे हो?
निर्माताओं की दृष्टि पर्वतों पर पड़ी।
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ध्यान से देखने पर क्रमश: ऊँचे सँकरे होते जाते और अंतत: एकदम ऊँचे एक विन्दु भर रह जाने में ज्यामिति का एक आकार उभरता है – त्रिभुज। सीधे खड़े त्रिभुज में ऊँचाई भी है, चौड़ा आधार ऊँचाई से संपृक्त हो गगन का सृजन भी कर देता है और निर्माण की मूल ईकाई के रूप में इसे बनाना आसान भी है। बात यहीं समाप्त नहीं होती – आधार बढ़ा कर इसे चाहे जितना ऊँचा बनाया जा सकता है जिसमें विराट पौरुष के विराट लिंग का भाव समाहित हो जाता है। साथ ही जनित गगन का त्रिकोण स्त्रीप्रतीक गर्भ का सृजन कर देता है। उन्हों ने कल्पना को और विस्तार दिया तो पाया कि त्रिभुज का प्रयोग पुरुष लिंग और स्त्री योनि को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाने के लिये किया जा सकता है:
(1)  आधार नीचे और चोटी ऊपर – लिंग।
(2)  चोटी नीचे और आधार ऊपर – योनि।
यह तो हुआ ऊर्ध्व विस्तार।
मन्दिरों के क्षैतिज विस्तार को देखें तो हम पाते हैं कि दो धारायें हैं – शरीर प्रधान और संयोग प्रधान।
शरीर प्रधान योजना ने मनुष्य शरीर को आधार बना कर मन्दिरों के क्षैतिज विस्तार की परिकल्पना की जो स्पष्टत: पुरुष देह ही थी। दोनों हाथ फैलाया खड़ा पुरुष हो या हाथ जोड़, पैर सिकोड़ बैठा पुरुष – एक वर्गाकार आकृति बनती है। वास्तुपुरुष की संकल्पना यहाँ से आई। संकल्पना और निर्माण दोनों दृष्टियों से अपने ज्यामितीय गुणों और सरलता के कारण वर्ग और बाद में आयत मन्दिर क्षैतिज योजना के मूल बने।  
संयोग प्रधान योजना ने दो देहों के संयोग के प्रतीक को आधार बनाया। दो त्रिभुजों के संयोग द्वारा दैवी सम्भोग की प्रक्रिया कि निरूपित किया गया और छ: कोणों वाली आकृति अस्तित्त्व में आई जो कालांतर में विभिन्न प्रकार के यंत्रों जैसे श्रीयंत्र के रूप में विकसित हुई।
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इसमें पुरुष प्रतीक चार त्रिभुजों का उलट आधार वाले चार स्त्री प्रतीक त्रिभुजों से संयोग था और पाँचवा उलट आधार वाला त्रिभुज स्त्री तत्त्व की श्रेष्ठता को अभिव्यक्त करता था जिसके ऊपर लिंग स्वरूप महादेव विराजते थे। त्रिभुजों की संख्या इस तरह से ली गई कि छोटे छोटे त्रिभुज संख्या में गर्भ की संकल्पना को अभिव्यक्त करें जिन्हें अन्तत: गर्भ प्रतीक कमल पंखुड़ियों से घेर दिया गया।





   
Meru1galaxyleovira_df4_493019श्री यंत्र का त्रिविमीय रूप ही सुमेरु पर्वत कहलाया जिससे प्रेरणा ले कर बौद्ध तंत्र में स्तूप गढ़े गये। समूचे क्षैतिज विस्तार को योनि रूप मान कर उसके ऊपर लिंग स्थापित कर दिया गया जिससे स्त्री और पुरुष तत्त्व और मुखर हो अपनी उपस्थिति जताने लगे। वैदिक यज्ञों की बलियूप (स्तम्भ) पूजा से मिलकर शिवलिंग के वर्तमान रूप का विकास सुमेरु पर्वत की इसी संकल्पना से हुआ।

गूढ़ प्रतीकात्मकता और निर्माण की जटिलता की आवश्यकता वश ज्यामिति ज्ञान परिवर्धित हुआ और गोपन संयोग कर्म से जुड़ाव के कारण यह उपासना पद्धति आम जन से दूर ही रही। वेदी पर स्थापित विभिन्न प्रकार के यंत्र ही मन्दिर स्वरूप हो गये जो पोर्टेबल थे और 'जहाँ भक्त वहाँ ईश्वर' की अवधारणा से जुड़ते थे।
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शरीर प्रधान ऊँचे शिखर वाले वास्तु को देखें या संयोग प्रधान गुह्य वास्तु को, हम पाते हैं कि कहीं न कहीं ईकाई स्वरूप एक ही आकार की बारम्बरता से विशालता का सृजन हुआ है। श्रीयंत्र में यह त्रिभुजों के क्षैतिज रूप में दिखता है तो मन्दिर शिखरों में त्रिकोणीय आकारों की बारम्बारता में। तड़ित झंझा हो, बादल हों, पर्वत शिखर हों, वनस्पतियाँ हों या सागर तट; प्रकृति ऐसे ही निर्माण करती है जिसे अंग्रेजी में फ्रैक्टल (fractal) कहते हैं। सूक्ष्म में स्थूल के और स्थूल में सूक्ष्म के निवास का भाव प्रकृति में भी है जिसे आराधना स्थलों और वस्तुओं में मनुष्य ने व्यक्त किया है।            
अपने प्रभाव क्षेत्र, यश और संरचना की वृत्ति को सर्वोच्च रूप में अभिव्यक्त करने के लिये पुरुष ने देवालयों को चुना क्यों कि उनसे दैवीयता भी जुड़ जाती थी। मन्दिर के शिखर जहाँ तक दिखते वहाँ तक मनुष्य दैवी अनुशासन में रहते। यह प्रसिद्ध है कि प्राचीन सोमनाथ का कलश ध्वज जहाँ दिख जाता वहाँ हत्या को आतुर पीछा करता शत्रु भी प्रतिद्वन्द्वी को छोड़ देता।
तमाम सूक्ष्म संकेतों को समेटे हुये मन्दिर स्थापत्य स्थूल रूप से पुरुष देह को व्यक्त करने लगे। वाहन स्तम्भ जैसे गरुड़ स्तम्भ, अरुण स्तम्भ आदि उत्त्थित लिंग के प्रतीक हो गये जहाँ से मन्दिर में प्रवेश किया जाता था। मस्तक स्वरूप गर्भगृह का ऊँचा शिखर उदात्तता का प्रतीक हो गया जहाँ आदिम संयोग भाव ईश्वरीय संयोग में परिवर्तित हो जाते। 
कुन्डलिनि तंत्र साधना में यह मूलाधार से सहस्रार तक की यात्रा मानी गयी है जिसका अंतिम उद्देश्य है - निर्विकल्प समाधि। मन्दिर स्थापत्य इसी यात्रा को सांकेतिक रूप से व्यक्त करते हैं।  
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(जारी)

बुधवार, 25 जुलाई 2012

पुरानी स्लेट, बाल कविता और चवन्नी भर चकबक


आयु बढ़ने के साथ साथ मस्तिष्क पुरानी स्लेट हो जाता है।
 बचपन की स्लेट जब नयी होती थी तो पुन: पुन: लिखा जाता था, पुराना मिटा दिया जाता था लेकिन धीरे धीरे खड़ियों के अक्षर स्लेट पर प्रभाव छोड़ने लगते थे। कुछ तो इतने हठी हो जाते कि हाथ से, थूक से, पानी से, भँगरइया से चाहे जिससे रगड़ लो, स्लेट के सूखने पर पुन: अपने आभास देने लगते। वे उन चिढ़ाने वाले सहपाठियों से लगते जिनकी शिकायत आचार्य जी से करनी होती थी और जिन्हें दंडित होता देख अच्छा लगता। 
स्लेट की भी शिकायत होती और पिताजी नई ले आते। 
एक बार एक दारोगा की कन्या की स्लेट मेरे हाथ से लग कर टूट गई तो उसने पुलिसिया ड्ंडे का इतना आतंक जमाया कि मुझे प्रधानाचार्य जी तक सिफारिश लगानी पड़ी। उसकी नज़र मेरी उस स्लेट पर थी जिस पर लिखाई बड़ी सुन्दर होती थी। अब लिखाई का स्लेट से क्या सम्बन्ध लेकिन उसकी समझ जो थी वो थी! मैंने भी अपनी स्लेट बदले में नहीं दी बल्कि चवन्नी दंड दे कर पीछा छुड़ाया। उसके बाद उसने 'मिल्ली' करने की तमाम कोशिशें कीं लेकिन सब बेकार! 
सोचता हूँ कि मस्तिष्क भी स्लेट जैसा होता जिसे पुराना होने पर बदला जा सकता! फिलहाल तो यह असम्भव है। वैसे भी मैं मस्तिष्क ही तो हूँ! जब वही बदल जाय तो मैं रहूँगा ही नहीं लेकिन फिर भी सोचो तो मस्तिष्क अलग सा लगता है। मनुष्य सोचता कहाँ है? मस्तिष्क में न? तो फिर मस्तिष्क इतना चालाक है कि स्वयं से भी अलगाव का भाव रख लेता है? ऐसे मस्तिष्क से कैसे पार पायें? 
पुरानी स्लेट सरीखे मस्तिष्क का क्या करूँ जिस पर अक्षरों के धुँधलके मुँह चिढ़ाते हैं और नये लिखे नहीं जाते? :( 
स्लेटयुग से आगे की एक चित्रमयी पुस्तक की एक कविता टुकड़ा टुकड़ा याद आई है। जाने किसने रचा था? पता नहीं यह पूरी है भी या नहीं? 
बरसो राम धड़ाके से 
बुढ़िया मर गइ फाँके से 
गरमी पड़ी कड़ाके की 
नानी मर गइ नाके की। 

पेड़ों के पत्ते सूखे 
धोबी के लत्ते सूखे 
घबराई मछली रानी 
देख नदी में कम पानी। 

सब मिल कर के चिल्लाये 
उमड़ घुमड़ मेघा आये 
ओले गिरे लप लप लप 
हमने खाये गप गप गप!
ज़िन्दगी इस कविता सरीखी आसान होती तो क्या बात होती! बरेली, कोकराझार, मानेसर और दंडकारण्य जैसे मामले कितनी आसानी से सुलझ जाते! छेड़खानी के बाद चलती ट्रेन से फेंक दी गई लड़की को कोई हवाई राजकुमार बाहों में सँभाल लेता और उन सबकी आँखों में सुराख कर देता जिन्हों ने चुप तमाशा देखा। 
लेकिन ऐसा कहाँ होता है?  
अव्वल तो ओले पड़ते नहीं, पड़ते भी हैं तो भाग कर अपनी चाँद बचानी होती है। मुँह में लेने की कौन सोचे जब हजार बैक्टीरिया, वायरस आबो हवा में फैले हुये हैं। दाँत सेंसिटिव हो गये हैं। ठंड गर्म सहा नहीं जाता और टी वी पर सेंसोडाइन का प्रचार करती नकली डाक्टर की नकली मुस्कान देख लगता है कि दारोगा की वह बेटी अब सयानी हो गई है, इतनी भोली नहीं रही कि अच्छी लिखाई का गुर हाथ में न देख स्लेट में देखे, चवन्नी से मान जाय और बाद में मिल्ली की कोशिशें करें। बड़प्पन भोलापन छीन लेता है। 
सम्वेदनायें आइसक्रीम सी हो गई हैं,  आइसिंग के नीचे घुल जाने वाली ठंड है; न जीभ पर रोड़ा और न दाँतों को कुछ खास कष्ट। चुभलाते हुये मन तृप्त होता है और भूल जाता है। 
इस भुलक्कड़ी में शब्द तक याद नहीं रह जाते।  वे शब्द जो सृष्टि की नींव समूल हिलाने की सामर्थ्य रखते थे, मन प्रांतर में कहीं खो गये हैं। पुकार भी ठीक से नहीं हो पाती! 
उमड़ घुमड़ मेघ कैसे आयें? ओले कैसे पडें?       

रविवार, 22 जुलाई 2012

11. कोणार्क सूर्यमन्दिर : स्त्री-पुरुष - संयोग और स्थापत्य के कुछ पहलू - 1

suryaचेतावनी:
मन्दिर यात्रा अब उस क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी है जहाँ गम्भीर और पूर्वग्रहमुक्त पाठन की माँग है। कुछ शब्द, सामग्री और चित्रादि सम्वेदनशील जन को लज्जास्पद लग सकते हैं।  हालाँकि गणित, स्थापत्य, ज्यामिति, साहित्यादि के कारण इसके रोचक होते जाने की भी आशंका है ;) स्वविवेक से निर्णय लें कि इस चेतावनी के पश्चात आप पढ़ना चाहते/ती हैं या नहीं।

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भाग 12, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 और 10 से आगे...
जारी कोणार्क शृंखला की एक कड़ी में विचार शून्य ने मिथुन मूर्तियों से सम्बन्धित यह जिज्ञासा जताई थी:
… दूसरी बात जिसने मेरा ध्यान खीचा वो सम्भोग रत युगल की मूर्ति थी जो मुझे सभी मंदिरों में दिखाई दी. कोणार्क के सूर्य मंदिर में तो खुजराहो की ही तरह की मूर्तियों की भरमार है. मेरे साथ यात्रा कर रहे मेरे एक मेवाती सहयोगी ने बार बार मुझसे पूछा की भाई पंडित जी आपके मंदिरों में इस प्रकार की मूर्तियाँ क्यों होती है. मैं उसकी बात का कोई जवाब नहीं दे पाया पर कभी ना कभी उसे जवाब देना जरुर चाहता हूँ. काश टाइम मशीन का अविष्कार हुआ होता.

खजुराहो और कोणार्क में कामक्रीड़ा एकदम नग्न रूप में बहुलता से चित्रित हुई है तो इतर प्राचीन मन्दिरों में भी इक्का दुक्का दबे ढके रूप में। प्रश्न यह उठता है कि देवालयों में इन्हें प्रदर्शित करते का क्या औचित्य? क्या तुक?
देवालय या आराधना के स्थल रोटी, कपड़ा और मकान की मूलभूत आवश्यकताओं के बाद आते हैं। शिक्षा इन तीनों के लिये पूर्वशर्त है – शिक्षा का अर्थ बस शालीय शिक्षा से न लें। मनुष्य अपने परिवेश से सम्मिलन, संयोग और विलयन के दौरान ही किसी परा शक्ति की सम्भावना पर सोचने लगता है।
लाखों वर्षों के विकास ने उसके मस्तिष्क में इतने प्रज्ञा मोड़ सृजित कर दिये हैं कि वह बिना सोचे रह ही नहीं सकता। पेट भरा हो, वस्त्र हों, सिर पर छत हो तो आगे क्या? इनसे आगे आता है परिष्करण और विचारों के प्रथम पग पर ही यह प्रश्न आ खड़ा होता है – सृष्टि कैसे? सृष्टि का होना, इसका नैरंतर्य, जन्म, जीवन और मृत्यु की एक विधि व्यवस्था का दिखना और परा शक्ति के आभास उसे स्वयं भी कुछ अद्भुत सृजित करने के लिये तैयार करते हैं लेकिन वह सृजन कैसा हो? उसका आधार क्या हो? पुन: उसे सृष्टि दिखती है और उसके साथ ही दिखते हैं परस्पर विरोधी से दिखते पूरक तत्त्व और उनका अद्भुत आपसी रमण – दिन-रात, प्रकाश-अन्धकार, मौन-ध्वनि और इनके साथ ही सामने आते हैं सर्वसत्य युग्म : स्त्री-पुरुष जिनके संयोग से सृष्टि का उद्भव होता है, जिनके संयोग के कारण ही नैरंतर्य है और जिनमें क्रीड़ा की वही वृत्ति है जो अन्य भौतिक युग्मों में दिखती है – विपर्यय और उसे बनाये रखते हुये योग, कुछ इस तरह कि एक के बिना दूसरे का अस्तित्त्व ही न रहे। यह अद्भुत बाजीगरी ही परा शक्ति की परम अभिव्यक्ति लगती है।
स्त्री और पुरुष पदार्थ रूप में हैं लेकिन वातावरण के प्रभाव रूप भी वैसे ही हैं। यही प्रेक्षण अंतत: इस उद्घोष में अभिव्यक्त होता है – ईश्वर ने मनुष्य को निज रूप गढ़ा।
मनुष्य को लगता है कि वह उससे बिछड़ गया है और मृत्यु कुछ नहीं, उसके पास जाने का प्रस्थानबिन्दु भर है लेकिन मृत्यु होने तक वह उससे अलग क्यों रहे? परा शक्ति से जुड़ने और उसके आगे झुकने की चाह देवालयों का निर्माण करवाती है। ये निर्माता के अहंकार प्रतीक भी हो सकते हैं लेकिन मूल भाव वही रहते हैं और अभिमान की घोषणाओं में भी अनिवार्य रूप से अभिव्यक्त होते हैं।    
तो अब जब मनुष्य को ईश्वर, उस परा शक्ति को गढ़ना है या उसके आगे झुकना है तो उसका रूप क्या हो? रूप को लेकर अनंत मान्यतायें और मार्ग हो सकते हैं लेकिन एक मार्ग सृजन के रूप से जुड़ता है – गर्भ में पलता पिंड धीरे धीरे बढ़ता है, निर्जीव से सजीव होता है और एक दिन जन्म भी लेता है। दिव्यता की ओर मनुष्य की यात्रा भी तो ऐसे ही होती है। यहीं मनुष्य का वह रूप सबसे श्रेष्ठ और पूजनीय हो जाता है जो जन्म के पहले और बाद में भी पोसता है – माँ।
आश्चर्य नहीं कि प्रथम उपासना प्रकृति के रूप में कल्पित आदिम माँ की हुई। सरस्वती सभ्यता (सीमित ज्ञान के कारण पहले इसे सिन्धु नदी घाटी में सीमित कर दिया जाता था) में मातृपूजा के चिह्न अनायास ही नहीं हैं। बहुधा विश्लेषण करते हम भूल जाते हैं कि पूर्वजों ने आराधना को समग्रता में लिया। माँ होने के पहले सम्भोग की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। प्राचीन सभ्यताओं में संभोग गोपनीय कृत्य तो था लेकिन आजकल ;) की तरह अपवित्र और लज्जास्पद कर्म नहीं था। इसलिये योनि और लिंग की पूजा मिलती है और ब्रह्मांडीय सम्भोग मिलन के मिथकीय चित्रण भी।
सरस्वती सभ्यता में मातृदेवी के साथ साथ ही विराट पुरुष भी है जिसे पशुपति कहा जाता है। वस्तुत: वह पुरुष देव है। उत्थित लिंग प्रमाण है। यहीं मुद्राओं में सम्भोग की कथित मिशनरी मुद्रा अंकित मिलती है जिसमें विराट पुरुष को लेटी हुई मातृदेवी के ऊपर झुके हुये दर्शाया गया है।   
800px-Geb,_Nut,_Shuप्राचीन मिस्र में नट नाम से आकाश की देवी मिलती है जो नीचे पड़ी पृथ्वी के ऊपर आच्छादित है। उसके स्तन और योनि पर हाथ लगा वायु देवता शू सँभाले हुये हैं। देवता का स्तन और योनि का स्पर्श करना पुन: ब्रह्मांडीय कामक्रीड़ा का संकेत है। सृष्टिकारक देवता सूर्य से सम्बन्धित है जिसके प्रतीक स्तम्भ और पिरामिड हैं। इस देवता को आनुपातिक रूप से बहुत बड़े उत्थित लिंग के साथ दिखाया जाता है जिसकी नोक पर आश्चर्यजनक रूप से यूरोपीय मूल और वर्तमान में प्रयुक्त स्त्री प्रतीक लगा दिखता है जो कि योनिद्वार और गर्भ का संयुक्त चित्रण है।
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प्रतीक उपासना की ऐसी स्थूल विधियों से मनुष्य विरक्त हुआ और ऐसे प्रश्न पूछे जाने लगे जिनका आगे विकास दर्शन और दार्शनिक पद्धतियों में हुआ। एक सबसे पुराने प्रस्थान प्रश्न में भी उपासना के साथ गर्भ के सन्दर्भ हैं:
तम आसीत्तमसा गूळमग्रे अप्रकेतं सलिलं सर्वमाम्।
तुछ्येनाभ्वपिहितं यदासीत् तपसस्तन्महिनाजायतैकम्॥ 
कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्।
सतो बन्धुमसति निरविन्दन हृदि परतीष्याकवयो मनीषा
सृजन के घटित होने का जो प्रथम रूप परिवेश में आभासित है, कवि उसी को विराटता, व्यापकता दे सृष्टि का प्रस्थान बिन्दु घोषित कर देता है।
अन्धकार ही था, अन्धकार से घिरा हुआ
जल तत्त्व था सब ओर अथाह।
जो था वह था शून्य और रूपहीन तब
महान तपरूप ऊष्मा से वह जन्मा हुआ।
तत्पश्चात उमगा कामभाव, आदि बीज आदि भाव
कवियों मनीषियों ने कर निज हृदय अनुसन्धान
अस्तित्त्व का सम्बन्ध ढूँढ़ा अनस्तित्त्व से
गाढ़े अक्षरों को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि पूरा बिम्ब गर्भ के भीतर के दृश्य से निर्मित है और ‘कामभाव’ को विराट रूप दे मनुष्य के अस्तित्त्व से ब्रह्मांड के अस्तित्त्व को जोड़ दिया गया है। कालांतर में प्रकृति के तत्त्वों में माता और पिता को ढूँढ़ लिया गया। भूमि माँ हो गई और वर्षारूप पर्जन्य पिता। अथर्वण संहिता का वह सूक्त इस लेखमाला की पहली कड़ी के प्रारम्भ में अनायास ही नहीं आ गया! J
स्त्री पुरुष के कामसम्बन्धों को समूचे संसार में मिथकों के रूप में दर्शाया गया या उन्हें दार्शनिक रूप दिये गये। उपासना स्थलों और भवनों के निर्माण भी स्त्री और पुरुष तत्त्वों और उनके आपसी सम्बन्धों को प्रदर्शित करते हुये किये गये। कारण वही था – आदिम कामभाव और जनित क्रीड़ा ब्रह्मांडीय सृजन और पराशक्ति को भी व्यक्त करते हैं इसलिये मन्दिर या स्मारक वैसे ही होने चाहिये।
यह बहुत ही वृहद विषय है। गूढ़ भारतीय तंत्रमार्ग के बजाय हम उन प्रतीकों से समझने के प्रयास करेंगे जो आधुनिक युग में भी प्रचलित हैं।
ताओ मार्ग का एक बहुत ही प्रदर्शित प्रतीक है – यिन याँग। प्रकाश और अन्धकार के परस्पर विरोधी प्रतीत होते तत्वों के आपसी सम्बन्ध, उनकी  पारस्परिक निर्भरता और एक दूसरे को जन्म देते, आपसी पूर्णता देते तत्त्वों का यह प्रतीक चिह्न है। इनकी घूर्णित सममिति सनातन वैदिक ऋत की संकल्पना से जुड़ती है।
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प्रकाश पुरुष है, अन्धकार स्त्री। पुरुष प्रकट है, स्त्री गोपन। पुरुष पिंड है, स्त्री प्राण। स्त्री संकल्पना है, पुरुष निर्माण।553881_447102528643706_508088508_n पुरुष विराट है, स्त्री सूक्ष्म। पुरुष भवन है, स्त्री साज सज्जा। ... यह शृंखला अनंत है। आधुनिक वैचारिक कट्टरपंथी स्त्री के कुछ प्रतीकों पर नाक भौं सिकोड़ेंगे। उन्हें बस यही कहना है कि प्राचीन मनीषि अन्धकार को उतना ही मान देते थे जितना प्रकाश को। उनके लिये अन्धकार और प्रकाश दो आवश्यक तत्त्व भर थे जिनकी अपनी उपयोगितायें थीं। आश्चर्य नहीं कि विराट मन्दिरों के सम्मोहक स्थापत्य के बीच जो सबसे पवित्र स्थान था, वह लघु वर्ग भर होता था, जहाँ अन्धकार होता था,  जहाँ देवालय के देव विराजते थे और उसे गर्भगृह  कहा जाता था। मन्दिरों के स्थापत्य में स्त्री, पुरुष और उनके संयोग – इन तीनों का ध्यान रखा जाता है। यह भी ध्यातव्य है कि स्त्री पुरुष तत्त्वों के स्थूल रूप हैं स्त्री पुरुष जीवधारी और ये तत्त्व दोनों में पाये जाते हैं।
दूसरा प्रतीक है अपेक्षतया नये महायानी और वज्रयानी बौद्ध मतों में प्रयुक्त पवित्र मंत्र – ओं मणि पद्मे हूं ह्री:। संसार भर के लगभग समस्त बौद्ध मतावलम्बियों के लिये यह मंत्र पवित्र है। यह अपने आप में स्त्री, पुरुष और उनके संयोग  का बीजाक्षर मंत्र है। मणि पुरुष तत्त्व है, पद्म स्त्री तत्त्व, ओं काम भाव है, हूं संयोग के समय की ध्वनि और ह्री: संयोग के पश्चात का मौन तृप्त भाव। ह्री: का उच्चारण मानसिक रूप से करने के निर्देश हैं। रक्त कमल स्त्री जननांग या गर्भ को प्रदर्शित करने के लिये भी प्रयुक्त होता है।  
Bodhi_Ajanta (1)यह मंत्र सर्वप्रिय बोधिसत्त्व पद्मपाणि ‘अवलोकितस्वर’ का माना जाता है। संस्कृत परम्परा में यह अवलोकितेश्वर हो गये हैं यानि नीचे को देखते हुये ईश्वर। वास्तव में यह अवलोकितस्वर था यानि नीचे भूमि पर पीड़ित आर्तनाद करते जन पर करुणा दृष्टि डालते बुद्ध।
इसकी पुष्टि अवलोकितेश्वर के चीनी रूप ‘गुआनयीन’ से हो जाती है। मूलत: यह ममत्त्व और करुणा भाव स्त्री के प्रतीक थे और उन्हें इसी रूप में चित्रित किया जाता है। भारत में संस्कृत के ‘ईश्वर’ प्रभाव से यह पुरुष बोधिसत्त्व हो गये।  गुआनयीन का एक रूप गोद में लिये शिशु की तरह चित्रित होता है जो कि ईसाई मत पर बौद्ध प्रभाव को भी दर्शाता है – जीसस और उनकी माँ के चित्र। उल्लेखनीय है कि ईसाई मत में मातृपूजक पुरानी पगान परम्परा की धारा भी है जिसका विस्तृत चित्रण डान ब्राउन ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास The Da Vinci Code में कुछ कल्पना और कुछ यथार्थ के सहारे किया है। Sacred feminine यानि पवित्र स्त्री भाव एक सनातन सार्वभौमिक विचारधारा रही है।
yinyang5 220px-Guan_yin_100 Guanyin_and_child khajuraho1
mecca-black-stone-cc-toursaudiarabiaयह जानना रोचक होगा कि इस्लाम में पवित्र माने जाना वाला टूटा हुआ काला पत्थर चाँदी की योनिपीठ में जड़ा हुआ है और एक सूफी परम्परा नक़्शबन्दी ऐसी भी है जो ओं मणि पद्मे हूं का उद्भव अफगानिस्तान में मानती है और मंत्र को अपनाये हुये है।   
ग्रीक और रोमन मिथक ऐसी कथाओं से भरे हुये हैं जहाँ गोपन स्त्री तत्त्व से प्रकट पुरुष भिन्न भिन्न रूपभाव ले मिलता है। ‘लेडा और हंस’ और ‘यूरोपा का हरण’’ दो ऐसे मिथक रहे हैं जिन्हें मध्यकाल में चित्रों और अन्य विधियों में उकेरा गया।  इन चित्रों में स्त्री भाव और यिन यांग के नृत्य को सूक्ष्म सांकेतिक भाव से दर्शाया गया।
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माइकल एंजिलो के बनाये लेडा और हंस के रमण के इस चित्र को देखिये:
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स्त्री लेडा की देहयष्टि में पुरुष विराटता है, साथ ही गर्भ धारण करने और पोषित करने योग्य भराव भी है। पुरुष प्रतीक हंस में स्त्रीसुलभ संकोच है। लेडा के चारो ओर जो लाल वस्त्र है, वह स्त्री जननांग को प्रदर्शित करता है और हंस की पूँछ का कालापन पुरुष जननांग को। यहाँ भी दोनो क्रमश: विराट और सूक्ष्म भाव लिये हुये हैं। लेडा का मिथक पश्चिम के आधुनिक भवनों पर भी प्रदर्शित है। नियॉन प्रकाश से बने इस प्रदर्श को देखिये और समझिये कि मिथुन मूर्तियों की मन्दिरों की दीवारों पर स्थापना से जुड़ा दैवी भाव या मिथक का सूक्ष्म सुहावन प्रतीक पूर्णत: दैहिक भड़कीलेपन में बदल गया है:
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Anasyromenos_statuette,_Rome_art_marketस्त्री में पुरुष तत्त्व और पुरुष में स्त्री तत्त्व का सुन्दर मूर्तिकरण अनासिनोमेरस की प्रतिमा में है।  
‘यूरोपा का हरण’ मिथक पुरुष रूप साँड़ के आकर्षण में स्त्री का सुलभ लज्जा भाEuropaव तज मिलन के लिये प्रस्थान को दर्शाता है। यह चित्र वृषभ नक्षत्र पर वीनस के संक्रमण की खगोलीय घटना से जुड़ता है। ध्यान रहे कि वीनस यानि शुक्र सौन्दर्य, सृजन आदि स्त्री तत्त्वों की प्रतीक है।      
आधुनिक पश्चिम ने पुरातन पगान भावों को जीवित रखा है। स्त्री पुरुष युग्म का जो पुराना देव भाव था वह आधुनिक वास्तुविद्या में किसी निर्माण के दर्शक पर समग्र प्रभाव के स्त्री या पुरुष रूप होने से जुड़ चला है।
भवनों के लिंग परखे जाने लगे हैं जो कि स्त्री, पुरुष या दोनों तत्त्वों को समाहित किये संतुलन से जुड़े उभयलिंगी भी हो सकते हैं। भद्दा निर्माण neuter माना जाता है।
इस दृष्टि से विशाल लिंगरूप एम्पायर स्टेट बिल्डिंग पुल्लिंग मानी जाती है।
 आकार, अनुपात और पिंड के भार से परुषता, शक्ति और प्रभाव की विराटता दर्शाता हरबर्ट जॉनसन कला संग्रहालय भवन भी पुल्लिंग है।
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रंग, रूप, आकार और संरचना की दृष्टि से स्त्री तत्त्व को समेटे है एडोब प्यूब्लो भवन। यह भूमि से हाथों द्वारा निर्मित प्रतीत होता है, शुभ्र श्वेत धूसर रंग इसे स्त्री गरिमा देता है।
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स्त्री देह के उभारों और वक्राकृतियों से प्रेरणा लेते भवन या गर्भ और स्तन के आकार का प्रतीक लिये आमंत्रित करते भवन भी स्त्रीलिंग माने जाते हैं। सिडनी का ओपेरा हाउस स्त्री की विराटता और बोल्ड ऊर्जा को समेटे है तो सिंगापुर का एस्प्लांडे भवन ममत्त्व भाव को।
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आधुनिक बाथरूमों की कतिपय डिजाइनें भी मध्यकालीन कला से प्रेरित हैं। इस बाथरूम की तुलना लेडा और हंस के चित्र से की जा सकती है - बस नहाने वाले होने चाहिये! J
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उभयलिंगी भवनों में रूप, विन्यास, रंग, आकारादि के संयोजन, प्रकटीकरण और गोपन से अपेक्षित प्रभाव उत्पन्न किया जाता है। दुर्भाग्य से इनके सबसे अच्छे उदाहरण इस्लाम के भंजक इतिहास से जुड़ते हैं।
पहला है – तुर्की का आय्सोफिया या हेगिया सोफिया। पहले यह केथेड्रल था, बाद में इस्लामी हमलावरों ने इसे मस्ज़िद में बदल दिया। चारो कोनों पर चार मिनारें बनवाई गईं। इनके पहले आदर्शित स्तन आकार के दबे गुम्बद, गर्भाकार प्रवेश और क्षैतिज प्रसार के कारण यह भवन स्त्रीलिंग श्रेणी में आता था। इनके जुड़ने से समग्र प्रभाव में उभयलिंगी हो गया। मस्ज़िद बनने से पहले इसके गर्भगृह में पुरातन वस्तुयें संग्रहीत थीं। उन्हीं की स्मृति में आधुनिक सेकुलर तुर्की ने इसे संग्रहालय में बदल दिया।
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भारत का प्रसिद्ध तेजोमहालय भी उभयलिंगी श्रेणी में आता है। मकबरा बनने से पहले यह निर्माण पुल्लिंग श्रेणी में आता था जिसके तत्त्व थे – विराट योजना और चार लघु सुमेरुओं से घिरा भव्य ऊँचा शिखर। शुभ्र संगमरमर की अधिकता, गोलाकार कम ऊँचाई का मुख्य गुंबद जो कि चार लघु गम्बदों से घिरा है, वक्र रेखाओं के प्राचुर्य आदि के कारण इसके प्रभाव में स्त्री तत्त्व आया जो कि पुरुष प्रतीक चार मिनारों के तामीर किये जाने के बाद भी बना रहा। (ताजमहल को तेजोमहालय कहने पर आप को संघ या कुख्यात साहित्यकार ओक का प्रभाव लग सकता है। ऐसा नहीं है। इसे मन्दिर मानने के वास्तुगत कारण हैं। कभी यहाँ गया तो अवश्य विस्तार से लिखूँगा। आगे की शृंखला में जब वास्तुपुरुष और वास्तुमंडल पर चर्चा होगी, तब सम्भवत: आप कुछ समझ पायें।)
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525127_231439093625423_1951000505_nइस कड़ी का उद्देश्य कला, आराधना स्थल और अन्य संरचनाओं में स्त्री पुरुष तत्त्वों और उनके सम्भोग के सूक्ष्म या स्थूल चित्रण और उनमें अंतर्निहित कारणों पर थोड़ा सा प्रकाश डालना था। विषय तो बहुत ही वृहद है। खजुराहो या कोणार्क के हिन्दू मन्दिर इस दृष्टि से विशिष्ट हो जाते हैं कि सूक्ष्म और स्थूल दोनों भाव उकेरे गये हैं। लोगों के मानसिक स्तर परस्पर भिन्न होते हैं। विचारों को स्फुल्लिंग मिलें, मन्दिर ऐसे होने चाहिये। आगे तो यह कथन है ही:
जिन्ह कें रही भावना जैसी, प्रभु  मूरति तिन्ह देखी तैसी।            

(जारी)
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आभार: रुड़की विश्वविद्यालय के गुरुजन, श्रीमती जी, विकिपीडिया, गुगल, कुछ पुस्तकें, http://architecture.about.com, पाठक गण और आलसी नामधारी एक सनकी ;)