सोमवार, 1 अप्रैल 2013

जाना ही नहीं चाहिये था!

उस घर में चोरियाँ अधिक होती हैं जिसमें प्रार्थनायें अधिक पढ़ी जाती हैं, डकैतियाँ भी खूब पड़ती हैं! प्रार्थी को आँसू भले भले न लगें उसे भले अवश्य लगते हैं जिसकी स्तुतियाँ गाई जाती हैं।
सोचता हूँ कि किसी क्षण समूचे ब्रह्मांड में खिल रही मुस्कानों को इकठ्ठा कर उस घर में ले जाऊँ और कहूँ कि कोई बात नहीं, आँसुओं को बहने दो, अपना आँचल पसारो और इन्हें ले लो। कल की तुम्हारी प्रार्थना और उल्लासमयी होनी चाहिये लेकिन हो नहीं पाता, कुछ चोरियाँ आकस्मिक मृत्यु से भी अधिक अवसाद छोड़ जाती हैं।
जब सब हट जाते हैं तो उस कोने में जा खड़ा होता हूँ जहाँ एक निर्वात यथावत सधा है इसके बावजूद कि तमाम साँसें वहाँ पूरक भर कर छोड़ी गईं। तमाम प्रशंसाओं के बाद भी अभिनय तो अभिनय ही होता है, सोचता हूँ कि घर पहुँच कर सहानुभूतियाँ कितनी उन्मुक्त हँसी हँसती होंगी!
निर्वात मुझसे भी सामान्य नहीं होता हालाँकि मैं सच में अनुभूतिमय हूँ।  कोई भीतर कहता है- तुम समर्पण में झुकते नहीं, तुझमें  अहंकार हर पल रहता है। उसका तना ऐसे झंझावातों में केवल टूटने के लिये होता है। मैं असहमत होता हूँ और कहता हूँ कि केवल प्राकृतिक होना और सच में परदुखकातर होना ही पर्याप्त होना चाहिये। एक के भी ऐसे होने से सब भर जाना चाहिये।
वह उत्तर देता है - यह केवल सद् इच्छा भर है जो मात्र मिथकों में वस्तु रूप लेती है। अच्छी है, जीना आसान कर देती है लेकिन उसके आगे बाँझ होती है।
असहमतियों और तीखी नोक झोंक के बाद किनारे चुपचाप बगल में बैठता हूँ। मौन के उन क्षणों में आम बौराते हैं, गेहूँ के खेत पकते हैं, पक्षी चहकते हैं, हवायें मलयानिल होती हैं - सब चुराये जाने के लिये! ... ऐसा बहुत कुछ होता है केवल इसलिये कि मुझमें वह अब भी है जो तुम्हारे भीतर के उस से खिंचता है।
अपना खिंचना और यूँ चुकना सहा नहीं जाता, निर्वात का सूनापन कहा नहीं जाता। औपचारिक उदासी ओढ़ लोकाचार निभा कर चला आता हूँ।
लगता है कि जाना ही नहीं चाहिये था! 
2013-03-29-207

5 टिप्‍पणियां:

  1. लगता तो बहुत कुछ है. लगाव से अलगाव होना बहुत कठिन है लेकिन उसके बाद भी बगल में बैठ पाना ... "गाना मेरे बस की बात नहीं ..."

    [यूं ही, जाने क्यों शुरुआत में ऐसा लगा जैसे ओशो को पढ़ रहा था ... ]

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  2. जब चिन्ता अधिक होती है तो वह हो जाता है, चिन्ता में सततता आ जाती है..फिर हो जाता है।

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  3. सहानुभूतियों की हंसी भी निर्वात के मौन को कहाँ भेद पाती होगी!
    अहंकार मूल कारण है, कहना गलत न होगा.

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