रविवार, 31 मार्च 2013

जतिगो सम्हति - अंतिम भाग

(पिछले भाग से आगे)

(4)

उस साल की होली के बाद जब जुवा नाग दुबारा गाँव वापस आया तो अकेला नहीं था, उसके साथ उसकी विवाहिता सोमा भी थी। घर पहुँच कर उसने दुआरे ही माँ बाप से कहा – मुझे जो ठीक लगा, किया और आप लोगों को भी बिना किये ही उसका मौका दे देता हूँ। आज से इस घर से मैं खुद बाहर होता हूँ। आप लोग कई गँवई मुसीबतों से बच जायेंगे।

जिन लोगों ने देखा सुना उनकी मानें तो पंडित पंडिताइन दोनों ऐसे चुप रहे जैसे उनमें पहले से ही सहमति बन गई थी। आशुतोष पांडेय और सोमा नाग ने अपनी पलानी चमटोली में बनाई। खरहरा पंडित ने नागिनबासा नाम दिया और गाँव में वे नाग नागिन नाम से प्रसिद्ध हुये। दोनों ग़ायब होते तो महीनों पता नहीं चलता। उनकी संदिग्ध हरकतों से खरहरा पंडित में दुविधा ने प्रवेश किया – सबजन कि बहुजन? आ कि कमनिस्ट?  

अहिरटोली के जुवा वर्ग ने एक बार चँचरा काट कर तसदीक भी कर लिया कि उनके यहाँ सिवा कुछ किताबों और अलमुनिया भँड़सा के कुछ नहीं था। बाकी गाँव के हिसाब से असतोसवा जैसा पतित इतिहास में पैदा नहीं हुआ। इतिहास माने पुरनियों को याद रह गईं गाँव जवार की बिसभोरी बातें!

उस साल एक और ऐतिहासिक घटना हुई – सम्हति न रखी गयी और न जली। सभी जातियों की घरनियों ने अपने अपने सँवागों को जी भर कर कोसा और देह से छूटी बुकुवा झिल्ली को दूसरे गाँव की सम्हति में फेंक आने के लिये अपनी अपनी औलादों को दौड़ा दिया। बीते सालों की आस कि अंत समय अपने गाँव भी जल ही जायेगी, उस साल न फली।

सुबह का उजाला हो ही रहा था कि चमटोली की ओर से धुँआ उठा। हल्ला होने पर जब वहाँ लोग इकट्ठे हुये तो देखा कि नागिनबासा धू धू कर जल रहा था। असतोसवा जाने कौन सी भाषा में चिल्ला रहा था जिससे सिर्फ यह अनुमान लगाया जा सकता था कि होली के दिन गाँव में पुलिस आयेगी और अपनी बेंत को सबके गुह से तृप्त करेगी।

“किसने किया यह?”

यह प्रश्न सबकी जुबान पर तो नहीं लेकिन मन में अवश्य था। निरगुन ने फुसफुसा कर छ्ट्ठू से कहा – खुदे फूँक दिये होंगे सब। नागिन को देखो, कैसे घूर रही है!

“खुदे काहें?”

“असतोसवा सम्हति के बिरोध में तो था ही, क्या पता अब होली को भी बन्द करवाना चाहता हो?”

छ्ट्ठू से रहा नहीं गया, सुनाई पड़ने वाली आवाज़ में बोल पड़ा – तुम्हारे जैसा चूतिया भी इतिहास में कभिये कभार पैदा होता है! 

कानाफूसी को नोट करते हुये सीरी ने निर्लिप्त भाव से खरहरा को देखा, दो मित्रों की आँखों ने बातें की और बीच के मौन मुस्कान ने पुष्टि की कि नागिन पेट से थी!

छ्ट्ठू को महातम कोइरी के क़त्ल के बाद आई पुलिस की याद हो आई। जाने क्यों भीतर तक थरथराहट भर गई।

(5)

थानेदार बल्लभ पाल को लेकर गाँव में पहले से ही कंफ्यूजन था - गड़रिया है या बबुआन? चूँकि इस मामले में किसी को भी मुलजिम नहीं कहा जा सकता था और कोई भी मुलजिम हो सकता था और ले दे के एक झोंपड़ा ही फूँका गया था जिसके रहवासी ‘भारत के मूल निवासी वर्ग’ से नहीं आते थे इसलिये पुराने इतिहास को देखते हुये बल्लभ पाल की जात जानने का यह बहुत ही उपयुक्त अवसर था क्यों कि कोई खतरा था ही नहीं! गाँव प्रसन्न था।

महातम हत्याकांड में अपने सीनियर के साथ अब के थानेदार पाल भी आये थे। इतने हरामी गाँव से होली के दिन घटना की सूचना मिलने पर एक दिन भी चुप नहीं रहा जा सकता था – क्या पता उस कांड की कोई कड़ी ही हाथ लग जाय! पाल को अच्छी तरह से वह दिन याद है...

 

...सीरी के दुआरे पिटे तुड़े बाभन बबुआन इकट्ठा थे। सब चुप थे। थानेदार यादव जी की बातों का जवाब या तो सीरी देता या हरख पाँड़े।

“क्या हुआ था?”

“अइसहीं ...मारपीट”

“उसी जमीन के लिये न जिसके कारण मर्डर हुआ है?”

“साहब, टैम तो वही था लेकिन जमीन का कोई मामला नहीं था।“

“भोंसड़ी के क्या सब ऐसे ही तुड़े तुड़ाये खड़े हैं?”

“देखिये साहब, गाली गुप्ता न दीजिये। जैसा कि कहा है – यह केवल संयोग है कि मारपीट उसी दिन हुई लेकिन मामले दो थे। इधर जो मारपीट हुई वह इसलिये हुई कि किसी के घर में कोई घुसा था। इज्जत आबरू का मामला है, सबने सलट लिया है, इससे अधिक हमलोग कुछ न बता पायेंगे।“

“अभी चार को थाने ले जा कर रगड़ना शुरू करेंगे तो सब बकने लगेंगे। बताते हो या?”

इस प्रश्न के उत्तर में सीरी बाबू ने अपना मोबाइल हाथ में ले लिया – आप जैसा उचित समझें, करें। सम्पर्क और भी हैं और आप की उगलवाई बकचोदी को कोरा बकवास साबित करने के सूत्र भी। हासिल कुछ नहीं होगा, पुलिस प्रशासन की बदनामी जरूर होगी। रही बात पिटाई की तो जैसे उतनी सही वैसे और भी सह लेंगे। कोइटोले से कोई किसी बाभन बबुआन का नाम ले ले तो फिर से आ जाइयेगा। हमलोग यहीं हैं।

 

धमकाने के बाद यादव जी कोइटोले गये जहाँ पुलिस के जवान पहले से ही फील्ड वर्क में लगे थे। एक स्वर में सबने अहिरटोली के जुवाओं का नाम लिया लेकिन यहाँ भी लेकिन लग गई!

कोई एक या दो नाम न बता कर टोली के सब पर इलजाम लगाया गया। मामला ऐसा समझ में आया कि भीड़ में दो पक्षों के बीच लाठियाँ चलीं और उन्हीं में से कोई एक लाठी प्राणघातक साबित हुई। मजे की बात यह कि जिस छ्ट्ठू यादव के ऊपर कब्जे का इलजाम था, वह उस दिन गाँव में था ही नहीं! इसकी तसदीक हर टोली ने की।

थानेदार यादव जी ने ग़ैर इरादतन हत्या का केस बना कर अहिरों को बचाने का  मन बना लिया – थोक में गिरफ्तारी और तुड़ाई। बाद की बाद में। हर टोली पट्टी से कुल मिला कर बाइस जन पकड़े गये जिनमें अधिकतर पहले से ही घायल थे। दुआर पर सीरी और खरहरा के दुस्साहस दिखाने और चालाकी बघारने का दंड बाभन और बबुआन टोली के जुवा बर्ग ने खास बेंतों के रूप में भोगा। तुड़इया तो खैर सबकी हुई। महीनों बाद जमानतें एक एक कर हुईं और मुकदमा शुरू हुआ, सबने राहत की साँस ली – केस का तो अब रामे मालिक।  महातम की मुसमात में कितना दम? और यादव जी तो अपनी जात बिगाड़ने से रहे!...

 

... “साहब! नमस्ते... कहाँ आज होली के दिन?”

खरहरा पंडित के अभिवादन से पाल वर्तमान में गिर पड़ा। उसने बुरा सा मुँह बनाते हुये पूछा – गाँव के बाहर रहते हो क्या बे? साले, हमें शौक चढ़ा है तुम लोगों का दर्शन करने का?

गाली की कोमलता और तड़क में कमी से पंडित ने अनुमान लगाया – गड़रिया ही है। प्रकट में बोल पड़ा – अरे साहब! ऐसी छोटी सी बात पर आप भी अंग्रेजी के चक्कर में आ गये!

“अंग्रेजी?”
“हाँ, नगवा आप के यहाँ जा कर अंग्रेजिये बोला होगा तभी तो आ पहुँचे!”

“नगवा! कौन नगवा?”

“हे, हे, हे ...अरे साहब! नहीं जानते? इस गाँव में असतोसवा को नाग कहा जाता है। दिल्ली से एक ठो नागिन बझा के लाया, महतारी बाप को लात मार कर घर से बाहर हो गया। बाभन की औलाद जाने किस जाति की घरैतिन कर के चमटोली में रहता है। सब तर त्यौहार को ढोंग पोंग कहता है और सभी सबरनों को यूरिया नस्ल। ... गाँव में तो कल सम्हति भी नहीं जली! किसी का घर कोई क्यों फूँकेगा, वह भी बिहाने बिहाने? नागिन पेट से है साहब! रात में रखी दीया ढेबरी गिर सिर गई होगी। फुसऊ घर में कितनी जान?”

“ठीके कहता है। तुम लोग हो ही ऐसे हरामी! ... उसने सम्हति नहीं जलने दिया? उसकी बीवी पेट से है?”

‘मेन पाइंट से बहक गया! सरवा पक्का गड़रिया है’ - पंडित मन ही मन अपने अनुमान की पुष्टि से प्रसन्न हुआ। प्रकट में बोल पड़ा – अरे! वह क्या खा के रोकेगा भला? आप तो जानते ही हैं पुराना कांड! तभी से सब उचाट हो गया। सीरी भाई जैसे तैसे कर के जलवा देते थे लेकिन इस साल तो वह भी फेल हो गये। मेरी बात पर भरोसा न हो तो असतोसवा और उसकी औरत से खुदे प्राइवेट कर लीजिये।

थानेदार पाल को जल्दी थी। उसने नाग नागिन जोड़े से पूछ्ताछ की, अपने तरीके से गर्भ की सूचना की पुष्टि कर उसने उन्हें समझाया कि हो सकता है किसी ने कुछ न किया हो, किसी और कारण आग लग गई हो। सतर्क रहने की हिदायत दे चलने से पहले उसने उन्हें ‘हैप्पी होली’ भी बोला।

छिप कर सुनते सीरी बाबू ने हैप्पी सुना और पक्का समझ गये कि यह पाल तो वो वाला है!

छ्ट्ठू ने पंडित की वह सराहना शुरू की कि कोई सुनता तो उनके अपोजिट पार्टी में होने का विश्वास ही नहीं करता।

(6)

खटिया का ओनचन छोड़ खरहरा पंडित और सीरी बाबू अपने अपने मनधुन में टहलते अब तक थोड़ी दूर निकल आये थे। दिन डूब रहा था। देर का मौन पंडित ने तोड़ा – तो क्या होगा इस साल? सम्हति रखी जायेगी कि नहीं?

सीरी बाबू ने देखा कि वे दोनों उस तिराहे पर खड़े थे जहाँ से अलग अलग टोलों को रास्ते फूटते थे। उन्हों ने बगल की बँसवारी से कइनबाँसा तड़का लिया। कमर से छूरी निकाल उसका टूटा सिरा पैना किया और हुमच के कोने में अपने खेट में गाड़ दिया – गड़ गई सम्हति!

पंडित चौंके,“यह क्या? ... अपने खेत में? हर साल के बिमारी”

“तो तुम्हारे में गाड़ दें? कहीं न कहीं जमीन पर ही गड़ेगी न? पुरनियों को मरने पर अपने खेत में फूँक दिया जाता है और बाद में जगह जोता जाती है। इसमें कैसा भेद?”

बगल में रखे पतहर के दो बोझे दोनों ने उठा कर वहाँ जमा दिये।

लौटते हुये पंडित ने पूछा – लेकिन इससे होगा क्या? लोग तो शामिल होने से रहे!

“क्यों नहीं शामिल होंगे? सब परपंच के बाद भी गाँव के लोग सुख दुख में शामिल होते ही हैं। सम्हति भले न जले, होली में भेंट मुलाकात मनावन होती ही है। सम्हति को टेंशन का एक बहाना बना लिया है लोगों ने। असो जतिगो सम्हति होगी – हर जाति की अपनी अपनी।“

पंडित इस प्रस्ताव पर भौंचक्के थे।

अगले दिन सीरी बाबू के दुआर पर मीटिंग हुई – सब जाति जुटी। कोई निष्कर्ष न निकलता देख सीरी बाबू ने समाधान दिया – हम खुद ही हर टोले की अलग सम्हति का बाँस सुभीता से गड़वा देंगे। बाकी उस टोली पर निर्भर करता है कि उसे बढ़ाये और फूँके या रहने दे। अपने अपने जाति की सबको ऐंठन है। इस जमाने में सब सबरन हैं और सब सूद। कोई नहीं जलेगी तो मेरे खेत वाली तो जलेगी ही। देखी जायेगी कि लोग शामिल होते हैं या नहीं!

सम्हति जैसा छुद्र मामला भी इतना जटिल हो सकता है! केदार कोइरी को समझे में नहीं आ रहा था।

दिन बीतते गये। गड़े बाँस सूखते गये लेकिन सम्हति बढ़ाने को किसी ने एक तृण भी नहीं रखा। दहन की साँझ भी आ पहुँची तो चिंतित खरहरा पंडित सीरी के दुआर पहुँचे। सीरी ने उन्हें आश्वासन दिया – मौका मोकाम देख लिया है। रात में काम हो जायेगा। घर घर साइत का सन्देसा पहुँचवा दो।

दहन के पहले ही सब लोग खा पी कर पटा गये लेकिन पूरे गाँव के पेट में जैसे उत्सुकता की आग लगी हुई थी। बाकी सब जगहों को छोड़ लोग बस उस तिराहे की ओर ध्यान लगाये हुये थे – क्या होगा?

समय होने पर सीरी बाबू ने अपने तीनों बेटों को उठाया। खरहरा पंडित को मिला कर कुल पाँच जन तेलियापट्टी की ओर चुपचाप चल दिये – सम्हति में चोरी का पतहर न पड़े तो कैसी सम्हति? पाँचो ने खामोशी से एक एक बोझा उठा लिया। कुछ पल ही चले होंगे कि पीछे से चोर, चोर और गालियों की आवाजों के साथ अनेक कदमों के दौड़ने की आहटें जुवा हो गईं। पाँचो ठिठके और सीरी कुछ समझ पाते कि उनके बेटों में से दो तो अपने अपने बोझ पटक भाग पड़े। बचे तीनों ने अपने बोझ वहीं पटके और खड़े हो गये।

लानटेन, टार्च की रोशनी में तीनों ने देखा – घेरने वालों के हाथों में लाठियाँ चमक रही थीं।

सीरी बाबू बोल पड़े – सबको पता है कि मैंने सबके लिये सम्हति गड़वाई थी। मैं चाहता तो पतहर भी रखवा कर अपनी सम्हति तो जला ही देता लेकिन चोरी और गाली की रस्म का क्या होता? अब दोनों पूरी हो गईं। हमलोग खड़े हैं, मारना हो तो मारो या चाहे जो करो, भागेंगे नहीं। बस सम्हति जलनी चाहिये।

निरगुन तेली आगे थे लेकिन चुप रहे। जुलमिया निकल कर सामने आया – घर छाने के लिये जुटा कर रखा था लेकिन अब तो यह पतहर मसान की चीज जैसा हो गया। जो करना हो करिये। हम से तो मार पीट नहीं हो पायेगी।

पंडित को हिम्मत बँधी तो बुद्धि ने वाणी पाई – ले जायेगा कौन पाँच बोझा, आदमी बस तीन?

जुलमिया ने अवसर का लाभ उठाया – छिनरो के छौंड़े चोरी करें, मारि डरे भागि परें... सर र र र र....

समवेत स्वर के सर र र र का उत्साह था और अन्धेरा भी – जिस बात पर आँखों में खून उतरना था, उस पर सीरी के होठों पर आ उमगी मुस्कुराहट को किसी ने नहीं देखा। तेलियापट्टी के पाँच जवानों ने बोझे उठा लिये।    

लुकारों के प्रकाश में जब सभी तिराहे पहुँचे तो चारो ओर लोग जमा थे। हर आदमी ने अपनी जात से अलग जात वाले को नोटिस में लिया और मनों में सामूहिक स्वीकार हुआ कि पूरा गाँव जमा था। बहोरन बाबू आग लगाने चले कि एक स्त्री स्वर से सब चौंक गये – थामो! होली हम जलायेंगे।

नागिन यानि सोमा? ऐसा कैसे? असतोसवा के मेहरारू? असतोसवा कहाँ है? ....होली जलाने जनानी? यह कैसे हो सकता है? जाने कौन जाति?

सीरी बाबू को लगा कि मौका दुरुस्त है, सबको सम्बोधित हो बोल पड़े – सम्हति में जात पात, छूत छात, मरद मेहरारू सब माफ! लगा लेने दिया जाय।

हाथ में लुकारा ले सोमा ने गोद के बच्चे को खरहरा पंडित को थमाया – आशुतोष दिल्ली गया है, रहता तब भी आज उसे घसीट ले आती लेकिन हमारे यहाँ गाली गलौज नहीं होता है। इस साल आप लोग भी न कीजिये, बस इस साल।

सम्हति की आग धधक उठी। पहली लपट को देखने से बचने को मुँह दूसरी ओर किये लोगों ने जब मुँह वापस फेरा तो जलती होली के प्रकाश में खड़ी बुलन्द आवाज में बोलती सोमा कुछ और ही लगी – पिछले साल अपनी झोपड़ी में आग मैंने खुद लगाई थी। हमारे यहाँ मानते हैं कि जिस गाँव में होली नहीं जलती उसका सत्यानाश हो जाता है। अपने गाँव का ऐसा कैसे होने देती?
रुक कर उसने पंडित की गोद में रोते अपने बच्चे की ओर इशारा किया - उस समय तो यह भी पेट में था!
 

भीड़ पर जैसे बिजली गिरी थी, सन्नाट हो गई!

कुछ न समझ पाने पर भकुवाये पंडित ने गोद के बच्चे को हल्के से उछाल कर जयकारा लगाया – बोलो होलिका मइया की .... लोगों ने सन्नाटा तोड़ा – जय!

... जाने कितने प्रश्न पीछे छोड़ती रहस्यमयी नागिन अन्धेरे में लुप्त होती चली गयी। लौटती भीड़ के उत्साह के कारण उस साल पहली और आखिरी बार गाँव में तीन होलिकायें और जलीं।

सीरी बाबू की खोंपी पुन: स्वाहा हुई लेकिन अबकी वह उलझे हुये थे और उदास भी – असतोसवा जानेगा तो सोमवा के साथ जाने किस तरह पेश आयेगा?                                         

निरगुन को ऐतिहासिक चूतिया कहने की साल भर पहले की गयी ग़लती की माफी छ्ट्ठू यादव ने यूँ माँगी – झूठ थोड़े है बनिये के दिमाग वाली कहावत!

निरगुन को ऐसी कोई कहावत पता नहीं थी लेकिन प्रकट में गुर्राये – जात मत बिगाड़ो, तैलंग बंस का दिमाग कहो।

छ्ट्ठू चुप्प!

(समाप्त)  

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

जतिगो सम्हति

(1)   
बसंतपंचमी की तिजहर थी। सीरी बाबू निखहरे खटिया सिर के नीचे बाँह दे बाँई करवट ऊँघ रहे थे। बीच बीच में भिनभिनाती मक्खियों को हाँक भी दे रहे थे। दिन में भी लगते मच्छरों का उनके ऊपर कोई असर नहीं पड़ता था, उनके बंडी, गमछा और धोती में खून के दाग प्रमाण थे। दूसरी ओर से आये खरहरा पंडित ने अपने इयार को चेताने को हल्के से खखार लगाई और बिना प्रतीक्षा किये ओनचन पर बैठ गये। वे सीरी बाबू के उपरोहित भी थे लेकिन यारी दोस्ती में धरम करम का क्या काम? सो पैंताने बैठने में कुछ भी ग़लत नहीं था।
ओनचन की चरचराहट और गोनतारी भार की आहट पा सीरी बाबू ने समझा कि कलुआ पिल्ला फिर से खटिया पर सवार हो गया है सो उन्हों ने आदतन लात चला दिया। निर्दोष लात खा कर पंडित ने जो दुरबासा डाँट लगाई उसका संक्षेप यही था कि बिना सोचे समझे लात हाथ चलाने के कारण ही सीरी का सन्स बरक्कत सब सफाया होता जा रहा है।
कहना न होगा कि सीरी की नींद हवा हो गयी। चेतन हो उन्हों ने कल्पित पिल्ले की माँ से अपना नाता जोड़ते हुये प्रास्चित किया और खरहरा पंडित की बगल में ही बैठ कर उनकी ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देखा। उस समय कोई इन दोनों को देखता तो महामूर्ख कहता – सगर खटिया छोड़ गोनतारी ओनचन पर जो बैठे थे!
अद्धी की जेब से पंडित ने जनेऊ निकाला और इयार के हाथ में थमा दिया। दोनों लगभग पचपन पार कर चुके थे और पंडित की मानें तो समूची बाबू पट्टी में जनेऊ पहनने वाले सीरी बाबू एकमात्र ‘जुवा’ बचे थे। उनसे कम उमर के जन नहीं पहनते थे। कमोबेश बभनटोली में भी यही हाल था, बस आयुसीमा पैंतिस के आसपास की होगी। पंडित इन सबको बिप्रजोनिसूदा कहते थे।
पंडित ने अपनी खरहरा दृष्टि आसपास की छतों की ओर दौड़ाई तो बबुआने की अलग अलग छतों पर तीन लड़कियाँ मोबाइल पर लोर झोर बतियाते दिखीं। बिना सुने ही पंडित ने अनुमान लगा लिया कि किनसे क्या बातें हो रही होंगी। पंडित जानते थे कि उनके चलित्तर ठीक नहीं! न चाहते हुये भी बुदबुदा उठे – जोनी उड़ंता हो रही है, राम जाने क्या होगा इस जवार का? सीरी बाबू ने सुना और जैसे आकाश को सुनाते हुये उत्तर दिया – सभत्तर जोनी मोबाइल हो रही है खरहरा पंडित! कौनो जात नहीं बची। कब तक केवल लिंग ही बेदंड कवंडल घूमता रहेगा?  
सीरी से बेध्यानी हुई थी, नाम बिगाड़ उन्हीं का किया हुआ था लेकिन पंडित उनके मुँह से यह सम्बोधन बर्दाश्त नहीं कर पाते थे सो उछ्ल कर खड़े हो गये – लाण सबकी चिंता कर रहे हो! छात्रसमाज ही पतित हो गया तो बचेगा क्या?
सीरी ने चुटकी ली – इयार हो! सुबिधा और आजादी मिलने पर यह सब होता ही है। निश्चिंत रहो, जात पात सुद्ध साँच बचे रहेंगे और कुजात झूठ पाप भी। भूल गये अपना समय? ... कैसे आना हुआ? केवल जनेऊ देने या ...। सीरी ने बात अधूरी छोड़ दी जब कि पंडित समय पर अटक गये।
(2)   
सीरी के पहले बियाह के साल भर पहले की बात थी जब रामहरख पांडेय खरहरा पंडित हुये थे। एक्के छेदा हगने वालों के नाम से मशहूर ये दोनों उस दिन अलग अलग शिकार पर थे। सीरी एक खरहा मारने के चक्कर में और हरख पंडित हिरनी चखने के। खरहे का पीछा करते सीरी अरहर के खेत में पहुँचे तो पंडित प्रणय निवेदन से आगे बढ़ चुके थे। एकाएक इयार को देख हड़बड़ा कर हटे और बिना पूछे ही सफाई उगल पड़े – खरहरा बाँधना था सो डाँठ काटने आये थे। इधर की अरहर घनी है, खरहरा ठीक बनेगा।
हिरनी यानि सोगतिया और सीरी की आँखें चार हुईं, दो पूर्वपरिचित खिलखिला उठे। पंडित को भौंचक छोड़ सोगतिया ने खाँची उठाई और अस्त व्यस्त कपड़े लिये भाग पड़ी। हँसी रोकते रोकते सीरी का चेहरा लाल हो गया, शब्दों ने राह पाई – ग़जब! खरहरा पंडित। पूरा सरेह अट्टहास से गूँज उठा।
कहना नहीं होगा कि गाँव में अगले दिन यह नाम प्रचलित हो गया लेकिन तब भी पंडित ने सीरी बाबू की यारी निभाने की बात को समझा क्यों कि नाम परिवर्तन का वास्तविक कारण छिपा सीरी ने बात बनाई थी -  रामहरख का उल्टा खरहमरा। अरहर के खेत में पंडित ने खरहा मारा और पकड़े जाने पर बताने लगे खरहरा काटने आये थे। उल्टी बात बनाये न बने खरहमरा, खरहरा...
तराई से लगे इस इलाके में ब्राह्मणों का बकरा मछली खाना सामान्य था लेकिन खरहा तो और जातियाँ ही खाती थीं, पंडित जात के वश का नहीं तेज दौड़ते को पकड़ना! सत्रह की उमर के बिगड़ैल लौंडों का तमाशा समझ सबने हँसी हँसी में उड़ा दिया लेकिन पंडित का नाम बिगड़ा तो बिगड़ा ही रहा।
अगले बरस सीरी का पहला विवाह हुआ और दो साल बाद खरहरा पंडित का। खरहरा पंडित ने जीवन का पहला विवाह सीरी का ही कराया, बदले में धोती में बँधी पूड़ियों और चूतड़ में एक स्थान पर चुभती सूई का प्रसाद भी पाया। चुभोने वाली नाउन ने पुरोहित से प्रतिक्रिया में मसलन की सपने में भी कल्पना नहीं की होगी! किसी परायी स्त्री के साथ पंडित की यह आखिरी हरकत थी। उसके बाद दोनों वह हो गये जिन्हें देहात में सभ्भ सरीफ कहा जाता है – आँख उठा कर भी न देखने वाले। यह बात और है कि चाहे सीरी की मुसमात काकी का कुजड़े से सम्बन्ध हो या कोइटोले के तिरगुट का मैना अहिरिन से, भंडाफोड़ इन्हीं दोनों ने किया!  
पैंतिस की उमर में जब एक रिश्तेदारी के विवाह में सीरी अपने पुरोहित ‘पं. रामहरख पांडेय’ के साथ गये थे तो किसी बात पर उभय पक्ष में झगड़ा हो गया। बात बिगड़ कर बारात वापस ले जाने तक आन पहुँची। खून खराबा होना तय देख खरहरा पंडित ने खिसक लेने का सुझाव दिया लेकिन सीरी बाबू ने अपने प्रस्ताव से उन्हें चौंका दिया – दोनो पच्छ राजी हों तो कन्या दर्शन के बाद सीरी बाबू उससे विवाह कर सकते थे यानि कि दूसरा विवाह! प्रस्ताव लेकर खरहरा पंडित को ही जाना पड़ा और नेम टेम तिगड़म फाँस के कारण कन्या दर्शन का सौभाग्य भी उन्हें ही मिला।
उनके ऊँचे सुदर्शन खाते पीते घर के इयार को कौन अभागा अपनी कन्या नहीं देता! सो बियाह सम्पन्न भया।  डोला लेकर जब सीरी बाबू अपने दुआर पहुँचे तो बड़ा तमाशा हुआ। समाचार सुनते ही दुलहिन यानि पहली के दाँत लग गये। महतारी ने कलेजे पर सिलबट्टा रख कर गम्भीर मुख हो रस्म निर्वाह किये और सीरी बाबू के इस बेहूदे कर्म से घर में व्याप्त कलह के शमन की जिम्मेदारी सहज ही उपरोहित यानि कि  खरहरा पंडित पर आन पड़ी।
दो दुहिताओं को जनने के बाद धरम करम में तल्लीन दुलहिन को देह सुख से विरक्ति हो गई थी जब कि सीरी बाबू तो जैसे अब जवान हुये थे। कदाचित दूसरे विवाह का कारण भी यही था। पंडित ने इस स्थिति का फायदा उठाया। महीने भर की मेहनत के बाद दुलहिन ने प्रारब्ध और भक्ति का वह जटिल समीकरण सीख ही लिया जिसकी गूढ़ उपपत्ति सैकड़ो वर्षों से सवर्ण सुहागिन स्त्री को जुगल सरकार राधाकृष्ण की त्रिभंगी मुद्रा या मीरा बनाती आई थी। वह दासी हो गईं – दसिया बहू। घर में शांति हुई। सीरी बाबू को प्रणय सुख मिलना पुन: शुरू हुआ, नवकी ने जाना कि साँड़ की उमर अधिक मायने नहीं रखती और खरहरा पंडित की मानें तो उन्हों ने अरहर के खेत का कर्ज उतार दिया।
पैंतालिस की आयु होते होते सीरी तीन बेटों के बाप बन चुके थे और दो दुहिताओं का कन्यादान भी कर चुके थे। उनकी महतारी को तो जैसे धरती पर ही स्वर्ग मिल गया सो ऊपर का हालचाल लेने रुखसत हुईं और दसिया बहू मलकिन हो गईं!
(3)
अटकन से बाहर आ पंडित सीधे पाइंट पकड़ लिये – असो भी सम्हति नहीं गड़ेगी क्या?
सीरी बाबू के सीने में फाँस सी चुभी। पुरनियों के जमाने से ही पंचमी को सम्हति गड़ती थी और होलिका दहन के दिन तक समृद्ध होती रहती थी। किसी की खोंपी, किसी की मचान, गोहरा बथान, किसी का सीसो – गोंइठी की माँग का समय आते आते सम्हति मइया चोरी और जबरदस्त लंठई के माल से भरी पुरी हो चुकी रहतीं। मात पिता हीन नवल्द बहोरन बाबू के  होलिका में आग लगाने से पहले छठ्ठू अहिर-महातम कोइरी और निरगुन तेली-सनारी पंडित में जोगीरा कबीरा कम्पटीशन होता। खरहरा पंडित की मानें तो वह सवर्न राज था।
परधानी में पहली बार रक्षण हुआ तो सीट पिछड़ी हो गई और बैस राज शुरू हुआ। छठ्ठू अहिर के परधान बनने के बाद अहिरटोली के लोग यादव लिखने लगे और खुद को जदुवंशी बताने लगे यानि कि असल छत्री। प्रतिक्रिया में कोइटोले के केदार मास्टर चन्द्रगुप्त मौर्य की जन्मकुंडली कहीं पर बाँच आये और गाँव में मौर्यवंश का प्रादुर्भाव हुआ। बैस राज की एकमात्र उपलब्धि यह रही कि गाँव समाज की वह जमीन जिस पर सम्हति गड़ती चली आ रही थी, जर-जोरू-जमीन की परम्परा का निर्वाह करती छ्ठ्ठू यादव की गोंयड़ा खेत हो गई। मारा पीटी में बस एक लहास गिरी थी। मरने वाले का नाम था महातम कोइरी।
ठाकुरों और पंडितों को बस पीट पाट हाथ गोड़ तोड़ कर छोड़ दिया गया। सम्हति मइया गतिशील हो गईं – कभी इस तिराहे कभी वो सिवाने! उस साल छठ्ठू अहिर गारी गाने की जगह भोंकार छाड़ के रोये थे लेकिन जो बीत गया उसे कौन वापस ला सकता है भला? उत्साह खत्म हुआ और पंचमी का महातम भी। प्रास्चित में हफ्ता भर पहले अहिरटोली के लोग यहाँ वहाँ बाँस गाड़ देते और गाँव बकिया काम कर देता। मुकदमा तो खैर आज भी चल रहा है।
रोटेशन में सीट सुरक्षित हुई तो सूदराज शुरू हुआ। तेलिया पट्टी और चमटोली के जुवा बाभनों और बबुआनों के लिये ‘यूरिया नस्ल’ शब्ददो का इस्तेमाल करने लगे। पंडित टोले का एक जुवा जब जे एन यू में पहुँचा तो उसे यूरिया नस्ल का राज समझ में आया। असल में उनके पुरखे हमलावर यूरेशियन थे जिन्हों ने मूलवासियों का दमन कर अपनी परम्परायें और लोकाचार थोप दिये थे। ये हमलावर बला के कामुक थे और इनके शास्त्र पुराण बेभिचारी ब्यंजन। हिरनाकस्सप और होलिका आदि मूल निवासियों के पुरखे थे जिनके नाश का यूरिया नस्ल वाले उत्सव मनाते थे... जाने कैसे जुवा इतना अधिक प्रभावित हुआ कि चोटी जनेऊ काट तोड़ कर पांडेय से नाग बन गया! गाँव वाले तो इसे किसी स्वैरिणी नागिन का असर ही बताते हैं।
पहले रैदास परधान के चुनाव के बाद चमटोली ने अपनी सम्हति अलग लगानी शुरू की और बाद के वर्षों में उसका भी त्याग कर दिया। तेलिया पट्टी ने मज्झिम मार्ग अपनाया – खड़े हो तमाशा देखना, न गाना न बजाना। हफ्ता सिकुड़ कर तीन दिन हो गया और एक खास क़ानून के डर से लोगों ने सम्हति मइया को भरी पुरी बनाने में होने वाले चौर्य कर्म का परित्याग कर दिया। जोगीरे और कबीरे अब भी कहे जाते थे लेकिन ललकारा और लुकारा भाँजने ग़ायब हो गये... छ्ठ्ठू अहिर पर भूमि हड़पन का मुकदमा दर्ज हुआ।
यही समय था जब खरहरा पंडित को ज्ञान प्राप्त हुआ – गीता में कृष्ण की चातुर्वर्ण वाली बात ग़लत है। असल में भारत में बस दो वर्ण हैं – बाभन और बबुआन। अपनी उठान में जो बाभन कहलाता है वह पतन में सूद हो जाता है। बबुआनों और बैस बनियों के साथ भी ऐसा ही है। इस दृष्टि से देखने पर सवर्न, बैस या सूद राज की बात ग़लत साबित होती है। खरहरा पंडित ने अपनी पुरानी ग़लती को स्वीकार भी कर लिया और बहुजन से सर्वजन की वैचारिक क्रांति में अपनी धोने को धारा में हाथ भी डाल दिया।
सीरी बाबू को पुरोहित के समझाने से यह सब तो समझ में नहीं आया लेकिन छ्ठ्ठू अहिर ने अपोजिट पाइंट किलियर कर दिया कि इस ज्ञान की रमायन लखनऊ के लिये रची गयी है। छठ्ठू अहिर को दोनों की दोस्ती पता थी वरना यादव कृष्ण पर अंगुली उठाने के जुर्म के लिये खरहरा पंडित की कुलस्त्रियों से वचनसम्बन्ध जोड़ने में कोई कोताही नहीं बरतते।  जनम के दो मित्र अब दो खेमों में अलग अलग थे लेकिन भले एक्के न हगें, दोस्ती और जजमानी-पुरोहिती यथावत बनी रही।  
ज्ञानप्राप्ति के उस साल एक दिन पहले तक सम्हति नहीं गड़ी। सीरी बाबू की ललकार पर अंत समय में अहिरटोली के जुवा वर्ग ने उन्हीं की खोंपी में बाँस बाँध कर आग लगा दी। सर र र र ... के ललकारे में किसी ने नहीं जाना कि सीरी बाबू वास्तव में दुखी नहीं हुये बल्कि भीतर भीतर ही कहीं संतुष्ट हुये कि एक साल और परम्परा आगे खिसकी। जुवा नाग की मानें तो यूरिया नस्ल का अभिचार फिर से दहका!  

मंगलवार, 26 मार्च 2013

2013 होली : संक्षिप्त

हाथ गोड़ बचा के रंग खेलिये। भाँग में सुरा मिला कर पीजिये 'मत', अलग अलग के लिये डॉक्टर से सलाह लीजिये। होठों का रस पीने पिलाने के लिये स्वयं को तैयार रखिये, जाने कब मौका हाथ लग जाये!
किसी को भींचने के अरमान हों तो जकड़ लीजिये लेकिन मौके का ध्यान रखते हुये! ध्यान रहे कि न खुद के मुँह कालिख लगे और न उनके।

होठों से होठ रगड़ दिये, अंगुलियाँ फिसलीं बहकीं
छलक गईं गोलाइयाँ, मसलन गालों पर दहकी।

काम ऐसे करिये कि आगे वर्षों तक आप दोनों चिपटा चिपटी, पटका पटकी, गटका गटकी, रगड़ा रगड़ी इत्यादि आदि को याद कर अकेले में मुस्कुरा सकें; कोई भी मौसम हो, फगुनिया सकें और देह में सनसनी उठा सकें (सनसनी का अर्थ उस दरद से नहीं है जो लाता मुक्की के दौरान बने भितरघावों में पुरुवा बहने पर उमगता है, खास यादों पर कसमसाने मचलने वाले खास अंगों की सनसनी से है)।

आप सब को रंगपर्व की अम्बर, दिगम्बर, अधनंग, नंग, अनंग, रंगारंग, हुड़दंग शुभकामनायें।

ब्लॉग जगत में मेरे होली हुल्लड़ खास कहे जाते रहे, इस बार व्यक्तिगत व्यस्तताओं के कारण बस ऐंवे ही होली बीतेगी... बीते वर्षों का माल भी ठीके ठाक है। आनन्द लीजिये:

होलियान

मंगलवार, 19 मार्च 2013

पिट्ठा, खाजा(खाझा), तिलकुट और पुआ(होली पकवान)

संस्कृत के 'पिष्' धातु से बना है पिसाना जैसे गेहूँ पिसाना (कुछ लोग आटा भी पिसाते हैं!)। 'आटा पिसाने वालों' से ही प्रेरणा ले कर शब्द बना 'पिष्टपेषण'। पिसा हुआ कहलाता है पिष्ट और उसे भी पिसाने की बात हुई पिष्टपेषण माने व्यर्थ का श्रम या दुहराव भरा निरर्थक काम। तर्क वितर्क में व्यर्थ के विवाद के लिये भी इसका प्रयोग होता है। 
पिसे हुये आटे को पानी या दूध में गूँथ कर गोल या चपटे आकार के उबले या तले खाद्य को 'पिष्टक' कहा गया। चावल के आटे से बनाये जाने पर पिष्टिक भी कहा जाता था। पूर्वी उत्तरप्रदेश और पश्चिमी बिहार का एक व्यंजन पिट्ठा इसी पिष्टक का अपभ्रंश है।
momoभरवा पिट्ठा आजकल 'युवाप्रिय' चीनी व्यंजन मोमो या नेपाली ममचा के तुल्य है। संस्कृतिकरण आर्थिक और औद्योगिक उन्नति एवं प्रभुता से भी निर्धारित होता है, पिट्ठा या ममचा की मोमो की तुलना में स्थिति इसे रेखांकित करती है।
मथने की क्रिया 'खज' कहलाती थी और दही को मथ कर निकलता है मक्खन। उससे बना घी कहलाता था 'खजपं'। विशिष्ट विधि से बेले हुये पिट्ठा को घी में तलने और शर्करा पाग में डुबोने के बाद बनाई गयी मिठाई के लिये जातक कथाओं में संज्ञा मिलती है - 
'पिट्ठखज्जक'।
बताते हैं कि बुद्ध के शिष्य सारिपुत्र को पिट्ठखज्जक इतना प्रिय था कि उन्हों ने उसे न खाने की शपथ ले ली क्यों कि khajaवह उन्हें लालची बनाता था :) यह कुछ अपने जैसा मामला है। जो मुझे अधिक प्रिय होता है, उससे आगे चल कर सुरक्षित दूरी बना लेता हूँ ;)
यह 'पिट्ठखज्जक' ही आगे चल कर और घिस गया और लोग 'खाजा' या 'खाझा' कहने लगे। हजारो वर्षों पुरानी यह मिठाई आज भी मंगल कार्यों में देश के पूर्वी क्षेत्रों में बनती है। कन्या की बिदाई के समय लड्डू के साथ यह अनिवार्य है।
tilkutकूट पीस कर बनी तिल की मिठाई के लिये भी पिष्टक संज्ञा ही प्रयुक्त होती थी। आधे पिसे तिल से बनने वाली आज की मिठाई 'तिलकुट' इसी की परवर्ती संस्करण है। पाणिनी इसका नाम 'पलल' भी बताते हैं। यह भी उतना ही पुराना है।

ऋग्वेद में एक मिष्ठान्न चर्चित है 'अपूप'।  देवताओं के प्रिय इस व्यंजन की उन्हें आहुति दी जाती थी और लोकखाद्य तो था ही।
कई नव्यताओं के सर्जक विश्वामित्र पहली बार इसे भुने अन्न और सोम के साथ इन्द्र को अर्पित करते हुये गाते हैं (3.52.1):apoop_rv3_52_1ऋषि अपाला कहती हैं कि कन्यायें इन्द्र को अपूप अर्पित कर रोग मुक्त हो स्वस्थ और कांतिमयी यौवन सम्पन्ना होती हैं (8.91)।
ऋग्वेद में इन्द्र किसी एक अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ है। यह बहुत ही व्यापक और बहुअर्थी शब्द है। इन ऋचाओं में इन्द्र का अर्थ देह की जीवनशक्ति से है जिसे उत्तम आहार द्वारा पुष्ट करना होता है। यह भी ध्यातव्य है कि एक स्त्री ऋषि ने कन्याओं के हित इसे प्रतिपादित किया है। इन्द्र को आहुति का अर्थ यज्ञकुंड में अपूप झोंकना नहीं है बल्कि सोमादि औषधीय वनस्पतियों के साथ प्रार्थना के पश्चात उसे स्वयं वैसे ही पाना है जैसे आजकल 'तुमहिं निवेदित भोजन करई' भावना के साथ आस्तिक जन भोजन ग्रहण करते हैं: apoop_apala_rv8_91 इस अपूप का जातक कथाओं में भी खूब वर्णन है। आज का पुआ यही 'अपूप' है। इसे बनाने की विधि हजारो वर्षों से यथावत रही है। आटे को दूध में घोल कर घी में छान लिया जाता है और शर्करा पाग में डुबो दिया जाता है। इसमें एक गुण यह भी होता है कि कई दिनों तक बिना दुर्गन्धित हुये खाने लायक बना रहता है। इस गुण की ओर भी ऋग्वेद में संकेत है।
रबड़ी, खोया या मलाई के साथ खाये जाने के कारण बाद में पुआ के साथ 'माल' जुड़ गया होगा जिसमें सम्पन्नता यानि आज की बोली में रिच कैलोरी का भाव है – 'मालपुआ'।
यह होली का प्रमुख पकवान है और युवा गृहिणी का देहराग रूपक भी। यौवन से भरी पुरी देह लिये सहज सुन्दरी आकर्षणगुण सम्पन्ना मधुरा की कामपर्व के दिन इससे अच्छी रसोई क्या हो सकती है? रसिया के लिये चुनौती भी है - दम है लाला तो...मेरे पुये खा कर दिखाओ!
images 
(सभी चित्र सम्बन्धित साइटों से साभार)

शनिवार, 16 मार्च 2013

और एक दिन .... गंगा सरस्वती हो गयी!



... सरस्वती के साथ उसकी सभ्यता भी गई। उसके किनारों के वासी भटकते जन ने गंगा के पहले यमुना को जाना क्यों कि उसने सरस्वती का जल 'चुरा' लिया था। यमुना के सहारे वे गंगा तक पहुँचे; उन नाग, किरात आदि जनों के भू पर पहुँचे जो उनके साथ अल्प संख्या में आव्रजक के रूप में रहते थे। एक अभूतपूर्व संघर्ष, संलयन, समायोजन, विनाश और निर्माण का युग प्रारम्भ हुआ जिसमें निर्माण प्रभावी हुआ तो गंगा के कारण!
गंगा ने पवित्रता में सरस्वती का स्थान ले लिया। सरस्वती को गंगा यमुना संगम में 'लुप्त' कर उसकी स्मृति सर्वदा के लिये संरक्षित कर दी गयी - यह सांस्कृतिक बोध था जिसमें न भौगोलिक सच था और न ऐतिहासिक तर्क किंतु वह हजारो वर्षों तक जीवित रहने वाली थी।
महाविनाश को काव्य रूपकों में पुराणों और ब्राह्मणों में संरक्षित कर दिया गया। आम जन महाध्वंस के विलाप में बझे रहते तो पीढ़ियाँ जीवन यात्रा को आगे कैसे बढ़ा पातीं? जिजीविषा वाला उत्साह ही चुक जाता! लेकिन उस युक्ति में एक दोष था - विस्मृति का। लोग सरस्वती के सूखने से हुये महाविनाश को ही भूलते गये और नदी के जीवन को जनजीवन से जोड़ने वाली नेहधारा सूखती गयी।
गंगा माँ थी, देवी थी और भगीरथ प्रयत्न के कारण धरती पर स्वर्ग की अमरता भी ले आयी थी। वह मर नहीं सकती थी। लोग भूल गये कि नदियाँ अमर नहीं होतीं।
हजारो वर्षों के पश्चात विकास और औद्योगिक क्रांति का बिगुल यहाँ भी फूँका गया। संतान का मल भी सहने वाली माँ जैसी और अति विशाल धारा वाली समर्थ गंगा के लिये सीवर क्या चीज? गंगा सभ्यता की गन्दगी से बजबजाने लगी। जलचर सभ्यता के विष से लुप्त होने लगे।
ग्राम नगर, नगर महानगर होते गये। जनसंख्या के विस्फोट ने अन्न के अधिक उपज की आवश्यकता बताई तो सहायक नदियाँ बाँधी जाने लगीं, नहरें निकाली जाने लगीं और अन्न उगलती भूमि अति सिंचन से भीतर ही भीतर ऊसर होती चली गयी। विद्युत की आवश्यकता ने स्रोत की धाराओं से भी खिलवाड़ किया, गंगा मरण शय्या पर पड़ गई। उसकी स्थिति पर त्राहि त्राहि मचाने वालों की कोई सुनवाई नहीं थी। अनशन करते एकाध सिरफिरे मरे भी किंतु प्रगति की बाढ़ के लिये ऐसी बलियाँ तो लेनी ही होती थीं! उन्हें प्रतिक्रियावादी विगत युग के आदी कह कर चौराहों की प्रतिमाओं में गढ़ दिया गया जिन पर नेतृत्त्व कपोत मलमाल चढ़ाया करते थे। 
दूर पूर्व में ब्रह्मपुत्र को चीन के ब्रह्मा ने अपने कमंडल में बाँध लिया था। सदानीरा, गंडक, सरयू आदि सभी अन्य नदियाँ नेपाल और हिमालय के रास्ते चीनी दोहन से कर्मनाशा सरीखी हो गयी थीं।
उस समय गंगा की पापी संतानों को चेताने वाले कल्पनाधुरन्धर ऋषि नहीं थे। बौद्धिकता के आतंक में लोग जीवनदायी कल्पनायें भूल गये थे। कल्पना वास्तविकता से कटी सोसल साइटों में बन्दी थी, हर व्यक्ति कम से कम दो संसारों में जी रहा था, अधिक की कोई सीमा नहीं थी। गंगा वाला संसार प्राथमिकता में सबसे नीचे था हालाँकि उसे लेकर और संसारों में बौद्धिक बकवासें खूब चलती थीं।    
गंगा को जिलाये रखने के लिये जो ग्लूकोज चढ़ाने के उपाय किये गये उनमें भी भ्रष्टाचार का विष था। उसकी स्थिति और खराब होती गयी
और एक दिन गंगा सरस्वती हो गयी!
गंग क्षेत्र के वासियों के लिये आव्रजन ही एकमात्र विकल्प बचा लेकिन राह दिखाने को कोई यमुना नहीं थी। उनके उपग्रह भी धरा के नीचे बहती किसी धार को ढूँढ़ पाने में असमर्थ थे। विन्ध्य पार के क्षेत्र और दक्षिणावर्त तो पहले ही दुर्भिक्ष की मार के कारण अल्पजनी हो गये थे।
ऐसे में नयी धुरी के एक राष्ट्रसमूह ने अपने अत्याधुनिक अस्त्र के परीक्षण के लिये हिमालय के दक्षिण के क्षेत्र को सबसे उपयुक्त माना। राष्ट्रसंघ में औपचारिक अनुमोदन लेने के पश्चात सम्पूर्ण मानव जाति के व्यापक हित में परीक्षण किया गया और अदृश्य कृत्या ने पशु, पक्षी, मत्स्य, वृक्ष आदि सबके प्राण कुछ पलों में ही हर लिये।
आज वह विशाल भूमि संसार के सभी तरह के हानिकर वस्तुओं के उत्पादन की केन्द्र है। उसकी प्राचीन गाथाओं को चन्द विद्रोहियों के सर्वर डीप वेब पर सुरक्षित रखे हुये हैं। आम इंटरनेट और पुस्तकालयों आदि में कहीं भी उनके बारे में कुछ भी उपलब्ध नहीं है। सिंडिकेट संचार तंत्र उन्हें मिथक बताते हैं।   
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http://aajtak.intoday.in/story/muse-muse-detected-in-the-hell-did-1-724211.html

सोमवार, 11 मार्च 2013

हाशिये पर पाँच रफ


(1) 
और जब मैं अन्धा हो जाऊँ
तब तुम मुझे स्पर्श देना
वह मेरा प्रकाश होगा।

(2)   
चश्मिस! 
जहाँ भी हो, सुनो! 
किशोर भोरों में जो 
टप टप टपकता 
ऊषा का आह्वान करता
अभिशप्त विश्वामित्र
देख लेता था तुम्हें 
तम के पार भी; 
आज जान गया है प्रकाश को 
अन्धा होने के बाद, 
उसका चश्मा उतर गया है।

(3)
कहो कि जब वही प्रकाश, वही पुतलियाँ, वही आकाश होगा 
कहो कि जब उनके संघनन का रेटिना से नहीं साथ होगा 
तुम उतरोगी हर साँझ उस उदास दिये सी मेरी आँखों में 
जिसकी कालिख है जमा घर के इंतजारी ताखों में!

(4)
अन्धेरों ने कहा है हाथ बढ़ाने को 
रोशनदानी हवा बही है पाँव उठाने को 
मौन है कि कानों के लिये कुछ भी नहीं
छील गयी है याद खाल जलती भी नहीं 
बस नथुने हैं कि काम जारी है 
स्वेद वही भूमा की गन्ध वही
सूखे फागुन बस धूल भरी आँधी है।

(5)
अबीर लिये बैठा हूँ मैं 
तुम सेनुर थोड़ी ले आना।

बुधवार, 6 मार्च 2013

हनुमान की वापसी

मोबाइल स्क्रीन पर चमकते नाम को देख कर मैं चौंक गया हूँ – इतने दिनों के बाद? अभिवादन के पश्चात सामने वाले ने मिलने की इच्छा जतायी है। स्मृतियों के बवंडर में घिरा मैं बस कह पाया हूँ कि पहले सूचना दे देना, कहीं मैं...उधर से वही अक्खड़ स्वर है - अरे साहब! बस एक मिनट। मैं पहुँच गया।

आजकल ऑफिस का वातावरण ऐसा है कि सबके कान रेडियो रिसीवर हो गये हैं और आगंतुक के शॉर्ट, मीडियम वेव में तो अब एफ. एम. भी जुड़ गया होगा! बालकनी से बाहर चमकती धूप में नहाया बबूल दिखा है, उससे मिलने को वही छाँव ठीक रहेगी। मैं बाहर आ गया हूँ – उसका एक मिनट जाने कितना लम्बा हो!...  

... छात्र जीवन से ही मुझे अभिशप्त आत्मायें मिलती रहीं और उनसे मित्रता भी होती रही। लेकिन वह मेरे चाकरी में आने के बाद दस साल पहले पहली बार मिला था - मरियल सा, मुझसे आयु में चार पाँच बरस छोटा लड़का, ठिगना कद, बिना शर्टिंग के पैंट पहने भव्य होटल के बैकग्राउंड में चिप्पी सा दिख रहा था। गर्मियाँ थीं और साँझ की उमस का आभास लेने मेरे बाहर आने पर वह सामने आया था। उसने नमस्ते किया और सीधे बोल पड़ा - मुझे काम चाहिये! मैं चौंका तो उसने अपने बारे में सब कुछ बताया। संक्षेप में कहें तो छोटे मोटे, हजार के काम सबलेट पर कराता था और आर्ट ‘साइज’ से इंटर थर्ड डिविजन पास था। घरेलू वायरिंग में प्रशिक्षण ले रखा था। क़स्बे में छोटी सी दुकान थी।   

नेपाल सीमा पर एक बहुत ही समस्याग्रस्त स्थान पर काम के सिलसिले में मैं वहाँ गया था। मुझे आँखें बहुत लगती हैं और उस लड़के की आँखों में आग थी। मैंने कहा - मेरे वश में नहीं तुम्हें काम देना, छोटा आदमी हूँ। उसने ग़जब छूट लेते कहा - मुझे बनाइये मत, आप के बारे में पता है। अगर आप चाहें तो दिल्ली तक कोई नहीं काटने वाला!

भीतर भीतर मैं कुछ सहम सा गया, सारी अफसरी भूल भभक पड़ा - फलाँ स्थान पर काम करोगे? एक पार्टी और होगी। मेरे साथ चल नहीं पाओगे। उसने कहा - आप कहिये तो...
 बजट मिलते मिलते और काम शुरू होते शीतलहर शुरू हो गयी। एक रात जब इंस्पेक्शन परिपथ पूरा करते दो बजे मैं उसके साइट पर पहुँचा तो सड़क की दूसरी ओर विशाल अलाव के किनारे उसकी छाया किसी प्रेत की तरह दिखी – साहब, इस समय? यहाँ? मैंने कहा – तुम भी तो जमे हुये हो!

“लेबर जम रहे हैं साहब! गाहे बगाहे हाथ पत्थर उठाने से इनकार कर देते हैं, यहाँ आ हाथ सेंकते हैं और फिर काम करते हैं। मैं घर में कैसे सोया रह सकता हूँ?” सैम्पल के पत्थर उसने अपने हाथों बोरी में भरे थे। 

उसने स्पेसिफिकेशन के हिसाब से समय पर काम पूरा कर दिखाया। पहले काम का फाइनल बिल बना कोई पाँच लाख। उसने कहा - आप नहीं जानते कि आप ने क्या किया है! ये लाख आगे पाँच वर्षों में करोड़ बनेंगे। मुस्कुराते हुये मैंने उसकी ओर प्रोजेक्ट फेयरवेल हाथ बढ़ाया – घपले न करने लग जाना! उसने हाथ जोड़ लिये – आप से हाथ नहीं मिला सकता। मैं तो बस कउड़ा वाला घपला जानता हूँ, चलता हूँ।   


उसके बाद वह सभी समस्याग्रस्त स्थानों के लिये मेरा विश्वस्त साथी हो गया। चाहे बावन टोलों का वह गाँव हो जहाँ काम के दौरान ही दो लाशें गिरीं या बिहार सीमा का वह स्थान जहाँ उत्तर प्रदेश के बजाय पहले बिहार पहुँच कर वापस आना आसान था। मैं पहली बार यू पी की ओर से गया तो सुबह से साँझ हो गयी। नदी किनारे पाट पर तिमंजले भवन के बराबर बालू की भराई थी जो पहले एक बार बह चुकी थी। कुछ दूरी पर यू पी ने अपनी ओर का आधा पुल बनवा दिया था लेकिन बिहार में उड़नखटोले वाले को ज़मीन से कुछ नहीं लेना देना था, सो पुल अधूरा था। दिन में ही चार बजे के बाद लूट पाट शुरू हो जाती। बिसखोपड़ा और नेवले की लड़ाई को देखते हुये मेरे मन में कर्मनाशा बढ़िया चली – कहाँ फँस गये! तीन साल पुराना बजट, प्रेशर, बिहारी ठीकेदार पूरा कर पायेगा?

 आशंका सच साबित हुई। स्थिति इतनी खराब हो गई कि ऊपर की बनी बनाई जमीन पर ट्रैक्टर चलवा कर मैंने सब कुछ फेंकवा दिया और ठीकेदार भाग खड़ा हुआ। लोगों ने कहा – बिहार में होते तो तुम्हारी कहीं लाश पड़ी मिलती, बच गये!

साँझ थी और मैं बस सिर पर हाथ रखे नहीं बैठा था, मन:स्थिति उसी लायक थी। उसे खबर मिल गयी थी। वह आया। खड़े खड़े ही बोल पड़ा – जब हनुमान है तो राम को सोचने की क्या ज़रूरत?  मैंने भयानक बारिश में छोड़े गये काम को उस कउड़े के प्रेत को सौंप दिया। जाने कितनी बार मैंने उसके लाये सामानों को रिजेक्ट किया और एक बार तो भारतीय मानक ब्यूरो को शत प्रतिशत लागू करने की ज़िद ने तीन महीनों की देरी की, पेनाल्टी पूरी लगी लेकिन उसने काम पूरा किया।

जुबान का कड़वा था और फ्रैंक भी। लोग कहते थे - इस स्ट्रीट स्मार्ट डॉग को तुम कैसे झेलते हो? मैं कहता -  झेलना पड़ता है जब पता हो कि इसके किसी साइट पर कोई गड़बड़ी नहीं मिलनी और आवश्यकता पड़ने पर दो दिन लगातार बिना रुके बिना सोये काम करवा सकता है!

वह अभिशप्त था। कुछ लोगों को कभी श्रेय नहीं मिलता।


वहाँ से मेरे ट्रांसफर के बाद भी उसकी खबर मिलती रही। अक्खड़ता के कारण उसके भुगतान रुक जाते।  सबसे बड़ा दोष यह कि वह मेरा नाम ले सरेआम कहता रहता कि आदमी हो तो वैसा!

लोग उसे यूज करते रहे और वह सब समझते हुये भी डटा रहा, काम करता रहा। दो साल बाद दिल्ली में मिला तो पाँच सौ किलोमीटर बाइक चला कर पहुँचा था। सारी दास्ताँ उसकी जुबानी सुन मैंने कहा – अपने को बदलो। हुलिया ठीक करो - ढंग के कपड़े, नफासत; कम बोलो, नहीं कहना सीखो और एक गाड़ी रखो मय ड्राइवर।

कुछ देर चुप रहने के बाद उसने कहा - इजाजत हो तो एक और बात जोड़ दूँ? मुझे मौन पा उसने पूछा - आदमी देख कर काम किया करूँ? 

उस एक प्रश्न में गहरी पीड़ा छिपी हुई थी। वे आँखें नम सी लगीं जिनमें मैं केवल आग देखने का आदी था। वह जारी रहा - आप को गुरु मानता हूँ... कॉलेज लाइफ में भी साथियों से स्वयं के लिये गुरु'जी' सुन सुन मैं चिढ़ता रहता था, उसके मुँह से सुन मैंने रोका तो भी वह जारी रहा - बेईमानी नहीं करूँगा लेकिन अनपढ़ लोगों की धौंस भी क्यों सहनी जब उनके कारण चूना लगता हो? बिना मेरे उत्तर की प्रतीक्षा या परवाह किये उसने कहा - आप के सामने कह दिया, हल्का हो गया। किसी से भी अच्छा काम करूँगा लेकिन उस तरह से नहीं जैसे आप के साथ करता था। पाँच से पचास लाख तक पहुँच चुका हूँ लेकिन करोड़ ... 
मैंने जड़ा - तुम्हारी जैसी मर्जी लेकिन दूसरी राहें भी पकड़ो, तुम्हारे लक्षण ठीक नहीं। वह ठठा कर हँसा था - आप बहुत अच्छे आदमी हैं और भोले भी; चुप हुआ और जब अगला वाक्य निकला तो उसकी आँखों में वही संझाती आग दिखी - सब आप के जैसे नहीं हैं और रिक्वेस्ट है कि अगर आप इस मुगालते में हैं तो बाहर आइये। नमस्ते के बाद बाइक स्टार्ट कर चलने के पहले उसने कहा - अगले साल करोड़, कहने नहीं आऊँगा। आप तो जान ही जायेंगे...

...करोड़ तक पहुँचने के बाद वह 'बड़ा आदमी' हो गया। उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के सरकारी विभागों में काम करने लगा। उसके बाद मिला तो यह बताने को कि उसने न लौटने की शपथ ले ली थी! हम दोनों मुस्कुराये और उसने कृतज्ञता जतायी कि खादी सिल्क की नेतागीरी वाली पोशाक, इनोवा गाड़ी मेरे कहने के कारण हुये थे और .... उसने बहुत कम बात की थी, जाने के पहले हाथ मिलाने को बढ़ाया था, हाथ जोड़े नहीं थे! और मुझे उतना ही संतोष हुआ था जितना किसी पिता को अपने पुत्र को निज पैरों खड़े देख होता है।...   

 
...उसके नमस्ते से बबूल के नीचे जम गयी तन्द्रा टूटी है। वह आयकर विभाग से मुकदमे के सिलसिले में राजधानी आया है - जींस और टी शर्ट पहने, बढ़ी हुई दाढ़ी, इनोवा के बजाय माँगी हुई मारुति कार लेकिन खुश है - साहब! अँवाट बवाँट घूस की माँग मैंने कभी पूरी नहीं की इसलिये कभी सेल्स टैक्स वाले तो कभी इनकम टैक्स वाले दौड़ाते रहते हैं। आप की दया से मकान बन गया है। नेतागीरी भी चमक गयी है, बीस घरों की रोटी का जुगाड़ मेरे यहाँ है... लेकिन मार्केट में काम नहीं है, अब आप के पास फिर से शुरू से काम करने की माँग ले कर आया हूँ। उम्र के साथ मैं थोड़ा सुधर गया हूँ और आप भी अब ... संसार है साहब! ऐसे ही चलता रहेगा। इस जमाने में सड़क छाप फटीचर को लाखों के काम दे कौन अपनी इज़्ज़त दाँव पर लगाता है? 

मैंने उसकी बात की फाँस को समझ लिया है लेकिन प्रकट में पूछा है - अब अरब के सपने तो नहीं? वह मुस्कुराया है - आप ने कहा था कम बोलो। उस दिन से तो मैं सपने भी कम देखने लगा था। करोड़ तो आप का आशीर्वाद था। अरब सरब अपने बस का नहीं!

जाने के पहले उसने हाथ नहीं मिलाया है, हाथ जोड़े हैं। ड्राइवर ने कार आगे बढ़ा दी है। मुझे उड़ती धूल में कर्मनाशा की रेती भी दिखी है... मंगल के दिन हनुमान! सब मंगल हो।

आने वाले दिनों को देखता ऑफिस में दाखिल हुआ हूँ - अभिशप्त लोग ठगा ही जाते हैं, लौट भी आते हैं!