शनिवार, 11 जनवरी 2014

ट्यूब में दो एक जन पल

हम दो एक बराबर तीन थे। भागते जीवन की एक साँस भर ठहर में अनचाहे यूँ ही मिल जाने वालों के लिये 'हम' कहना अब अधिकई होगी लेकिन रेल यात्रा के उस सीमित समय में हम हम ही थे। उन्हों ने मुझे कैसे देखा, नहीं पता लेकिन मैं तीनों के बारे में बता सकता हूँ, दो के लिये तो प्राणवायु भरा रंगहीन कैनवस और अँखिया गहरानी थीं और स्वयं को तो पाँच छ: लाख बार उस चौंध में निहारा ही है जिसके पीछे आत्ममुग्धता की कलई लगी होती है।

भारी भीड़ के रेले में उस लघु वृत्त की परिधि पर तीन सिरों के व्यवस्थित होते ही मैंने जिस पहली बात का अनुभव किया वह यह थी कि उसके अधोमुखी शंकु केन्द्र पर तीखी गन्धों वाली साँसें इकट्ठी हो रही थीं क्यों कि हम समान ऊँचाई के थे। उस केन्द्र पर मुझे बहुत दया आई कि तीन तीन मानवों को झेलता वह बिन्दु वासना भावहीन ऊष्मा से तप्त हो जाने किस असंतुलन से ग्रसित हो रहा होगा।

एक ऐसा था जिसे ऐसे जाना जा सकता है कि अश्वेत अभिनेता वाशिंगटन उस आर्य ललछौंहे रंग को ओढ़ सामने खड़ा हो जिसके साथ आक्रांता होने का विशेषण बाइ डिफाल्ट जुड़ा हुआ है। प्रकृति के इस अलबेले खेल पर मैं मुस्कुराया, जाने उसकी माँ अश्वेत थी या पिता या वह बस उत्परिवर्तन की उपज था! अपरिचित की मुस्कान पर मुस्कुराने का जो सहज आदिम संस्कार है, उसने जोर मारा तो वह भी मुस्कुराया और मैंने जाना कि उसके उभरे भरे पुरे होठ अद्भुत सुन्दर थे। संस्कृत उपमा ध्यान में आई बिम्बाफल! मैंने अपनी मुस्कान इस स्वार्थ हेतु चौड़ी की कि वह भी चौड़ा हो और मुझे दाड़िम दंत उपमा के दर्शन हो जायें लेकिन वह शमित हो पुन: अपरिचित हो चुका था। मुझे तेज भागती ट्यूब पर झल्लाहट हुई जो अपरिचय को सान्द्र करने पर बाध्य करती थी।
और तब मैंने अनुभव किया कि उसकी साँसों से रह रह आती गन्ध पायरिया रोग को अगोपित कर रही थी। सभ्यता वश मैं निर्विकार बना रहा किंतु उसने मुझे प्राणवायु के रंगहीन कैनवस में निहारना आरम्भ कर दिया। मुझे लगा कि वह इस बात की प्रतीक्षा कर रहा था कि कब मेरा निर्विकार भाव टूटे, कलई के पीछे से घिरना झाँके और तब वह चेहरे पर वह तिरस्कार भाव लाये जो असहिष्णु जन के लिये माया सँजो कर रखती है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, असह्य को निरपेक्ष निर्जीव रूप हो सहने की मुझमें अद्भुत क्षमता है। मैंने उससे दृष्टि हटा दूसरे की ओर फेर दी और वह उस अंतरंगताहीन घेरे के केन्द्र पर स्थिर हो गया।

जो दूसरा था वह गेंहुआ था, इसलिये बहुत ही परिचित लगा वैसे ही जैसे प्रतिदिन थाली में गर्म रोटी लगती है हालाँकि उसमें न तो भूख को और उच्छृंखल बनाती वह गन्ध थी और न वह भाप, ममत्त्व का तो प्रश्न ही नहीं उठता। वह ताजे नहाये दाढ़ी बनाये क्रीम लगाये उस संतुष्ट कर्मचारी सा दीप्त हो रहा था जिससे मातहत और ऊपर वाले दोनों प्रसन्न रहते हैं। मुझे उससे ईर्ष्या हो आई, बहुत ही गहरी ईर्ष्या क्यों कि कलई केपीछे छिपी अपनी इस सचाई से मैं भिज्ञ था - मुझसे सब घृणा करते हैं। मुझे वह गेंहुअन साँप सा लगा - कुछ भय, कुछ रहस्य, कुछ सम्मोहन किंतु ढेर सा विष!
उसके केश उड़ रहे थे। चेहरा ऐसा था जैसे सपाट भूदृश्य पर दूर सूर्योदय हो रहा हो। मुझे लगा कि सम्मोहित सा मैं शब्दहीन बुदबुदाया - हेलो! तत्काल ही मैंने सोचा कि यदि ऐसी बुदबुदाहट उस गन्धाते बिम्बाफल से आती तो गेंहुआ अवश्य उत्तर देता। साँप सुन्दरता के प्रेमी जो होते हैं लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। हमदोनों एक दूसरे को यूँ घूरते रहे जैसे दुर्गापूजा पंडाल की द्वितीयक प्रतिमायें आमने सामने हों।

सबअर्बन क्षेत्र के स्टेशन के निकट होने की उद्घोषणा से हम तीनों की तन्द्रायें टूटीं और मुझे आश्चर्य नहीं हुआ कि तीनों वहीं उतरने वाले थे। वृत्त टूटा, उसके केन्द्र को अनचाही साँसों से मुक्ति मिली। ट्यूब के वातानुकूलित वातावरण में उत्पन्न हो गये छोटे से उत्पाती क्षेत्र में ऊष्मागतिकी के नियम अपनी गणित लगाने लगे। रेला आगे बढ़ा। कल्पित बिम्बाफल पैरों के नीचे आ गिरा। गेंहू की रोटी और उसके विष आने वालों के लिये छोड़ दिये गये और मैं अपनी कलई ठीक करते संसार में पुन: उतर गया।       

7 टिप्‍पणियां:

  1. अपनी सारी पुरानी ट्यूब यात्रा के दृश्य याद हो आए!! और भी बहुत कुछ...! :)

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  2. कछू पल्लौ नाहिं परैय...
    हिंहा तौ ट्यूबौ नाहिं होय :(

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  3. दद्दा रे । आप गजब हैं । एकदम रूटीन बातों को कितना स्पेशल बना कर रख देते हैं !!

    याद आता है कि तकरीबन यही की यही बात कुछ रोज़ पहले रश्मि रविजा के फेसबुक स्टेटस पर लिखी थी :)

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  4. "मुझमें अद्भुत क्षमता है।" ......... ...ये आपके लिए सही है ..........

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  5. भीड़भरी और तेज़ गति से भागती ट्यूब, व्यक्तिगत सीमायें तोड़ते शरीरों के अतिक्रमण

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