सोमवार, 12 मई 2014

मतदान के दिन लौटती बारात के संग

... बारात प्रात: 5 बजे ही वापस चल दी। प्रयाग से बलिया पहुँच कर मतदान अनिवार्यत: करना था, भले बस सीधे बूथ पर ले जानी पड़े! मैं उत्साह को देख अभिभूत हो गया।
लौटती बारात एक स्थान पर चाय के लिये उतरी तो पार्श्वासीन श्वेतकेशी वृद्ध समाचारपत्र ले आये और बस के चलते ही उद्घोषणा किये - अपने ही जड़ मट्ठा डाल दिया! ग़ैर क़ानूनी माल उनके काशी ऑफिस में पकड़ा गया।
मैं नेट पर पहले ही प्रशासन की इस मामले में हुई छीछालेदर पढ़ चुका था लिहाजा मैंने उन्हें वैसे ही सलाह दी जैसे इस मंच पर वहाबियों और सेकुलरों को देता रहता हूँ - पहले पढ़ तो लीजिये!
उन्हों ने मेरी ओर तिरस्कार भरी दृष्टि फेंकी ही थी कि पीछे से नमो समर्थकों के शब्द रेले आये - अरे, पूरा बताइये तो सही, क्या हुआ?
सज्जन समाचार पढ़ कर वास्तविकता जान चुके थे लेकिन हार कैसे मानें? पुन: दुहरा दिये  - ग़ैर क़ानूनी माल ...
मुझसे रहा नहीं गया - बासी समाचार है दद्दू! कुछ भी ऐसा वैसा नहीं मिला और जो बरामद हुआ था, उसे वापस भी कर दिया बिना कोई केस किये!
आगे बैठे युवा को मसखरी सूझी - ये बताइये चचा, अबकी किसे भोट देंगे?
चचा उवाच - अब की तो कुंजर को
युवा - कुंजर को या चक्रिका को देने से अच्छा है कि कर को ही दे दें।
चचा भड़क उठे - काहें?
युवा - चुनाव के बाद ये दोनों कर का ही दंडवत करने वाले हैं। दलालों के बजाय सीधे महरानी को ही न दिया जाय, कम से कम क्रय विक्रय जोड़ तोड़ तो न होंगे!
बस में ठहाके गूँज उठे। खिसियाये वृद्ध ने कहा - अरे, मेरे एक भोट से क्या होगा?
युवा ने कहा - वही तो सब सोचते हैं, इसीलिये तो बंटाधार है।
... मामला और लम्बा खिंचता किंतु बस का वीडियो प्लेयर ठीक हो गया था। कलात्मक फिल्म 'गुंडईराज' चल पड़ी और बाल, किशोर, युवा, वृद्ध सभी मुँह बाये, आँखें फाड़े, आँखें चुराते, निर्विकार आदि आदि मुद्राओं में शांत हो महासाहित्यिक भोजपुरी गीत 'देख'ने लगे - ले ल, ले ल, ले ल ... ले ल हमके कोरा में, चोली के बटाम खोल ...
मुझ रात भर के जगे को नींद आने लगी, पब्लिक तो  हँचड़ के खाने के बाद ए सी डॉरमेट्री में फसड़ के सोयी थी, तरो ताजा थी सो बटन खुलने के बाद के 'गुंडईराज' की कल्पना के साथ दृश्य़ श्रव्य नृत्य का आनन्द लेने लगी।
मैं इस सोच को लिये निद्रालीन हो गया - इस पब्लिक को लोकतंत्र के बन्द खुलने के बाद उससे हो रहे बलात्कार को देखने में मजा आता है... 'गुंडईराज' सनातन है!

7 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की ८५० वीं बुलेटिन खेल खतम पैसा हजम - 850 वीं ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. गुंडईराज' और नंगईराज का बोलबाल कमोवेश बहुत जगह दिखते हुये भी नहीं दिखती ..
    इसे बहुत से लोग अपना सनातन धर्म समझते हैं और अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं

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